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जेतली जरूरी हैं

Posted on 15 March 2015 by admin

नरेंद्र मोदी इन दिनों श्रीलंका में हैं, राजनाथ सिंह जापान के दौरे पर हैं और अरुण जेतली ब्रिटिश सरकार के न्यौते पर पार्लियामेंट स्वॉयर में गांधी जी की प्रतिमा के अनावरण के सिलसिले में लंदन में हैं, जहां से वे अमरीका भी जा सकते हैं। इन तीन दिग्गजों की संसद से अनुपस्थिति ने केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू को हैरान-परेशान कर रखा है। उनकी कोशिश थी कि सदन में बजट पर चर्चा इसी सप्ताह समाप्त हो जाए, पर कांग्रेस की अगुवाई में संयुक्त विपक्ष इस मांग पर अड़ा रहा कि वह वित्त मंत्री जेतली की अनुपस्थिति में बजट पर किसी तरह की चर्चा नहीं चाहता, वहीं वेंकैया का तर्क था कि चूंकि वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा संसद में मौजूद हैं, सो विपक्ष बजट पर चर्चा जारी रख सकता है। और जब जेतली सोमवार को वापिस लौटेंगे तो इस चर्चा पर जवाब दे देंगे, पर सदन में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना था कि सदन में वित्त मंत्री जेतली की उपस्थिति जरूरी है, मोदी सरकार को अपने किसी अन्य मंत्री को लंदन भेजना था।

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मेघवाल बनाम निहाल

Posted on 15 March 2015 by admin

राजस्थान से आने वाले दो भगवा नेताओं अर्जुन मेघवाल और केंद्रीय राज्य मंत्री निहालचंद में बेतरह ठन गई है। ये दोनों ही नेता मेघवाल समाज से ताल्लुक रखते हैं, दोनों ही जाति के दलित हैं। अर्जुन मेघवाल का दर्द उनका केंद्र में मंत्री नहीं बन पाने की वजह से है, उन्हें लगता है कि चूंकि वे प्रशासनिक सेवा से आए हैं, शासन चलाने का उन्हें पूर्व अनुभव है, चुनांचे वे निहालचंद की तुलना में कहीं योग्य मंत्री साबित होते। रही बात निहालचंद की तो उन्हें भले ही वसुंधरा राजे का साथ मयस्सर नहीं, पर उन्हें भाजपा के एक प्रभावशाली नेता और मोदी करीबियों में शुमार होने वाले ओम माथुर का वरदहस्त प्राप्त है। सूत्र बताते हैं कि सबसे पहले मेघवाल दिल्ली में भाजपा के शीर्ष नेताओं से मिले और कथित तौर पर उनसे कहा कि निहालचंद के पास काफी ऐसी जमीनें हैं जिसको उन्होंने ‘डिक्लेयर’ नहीं किया है, समझा जाता है कि मेघवाल ने भाजपा के बड़े नेताओं को इसकी सूची भी सौंपी है। इसके जवाब में निहालचंद ने पार्टी के बड़े नेताओं से मिलकर उनसे कथित तौर पर मेघवाल की शिकायत करते हुए कहा कि उनके (निहाल)के नाम पर एक मोबाइल कनेक्शन लेकर उससे अनाप-शनाप मैसेज भेजे जा रहे हैं, निहाल को शक है कि इसमें मेघवाल का हाथ हो सकता है। अब पार्टी कोशिश कर रही है कि इन दोनों नेताओं के झगड़े की खबर मीडिया में कहीं लीक न हो जाए, सो इन दोनों को समझाया-बुझाया जा रहा है कि वे आपस में मिल बैठकर मामला निपटा लें, समझौता कर लें।

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मोदी से मिले पप्पू

Posted on 15 March 2015 by admin

कहीं बिहार भी दिल्ली न बन जाए, इस आशंका से निपटने के लिए बिहार चुनाव के आलोक में टीम मोदी बेहद फूंक-फूंक कर कदम रख रही है, रूठों को मनाया जा रहा है, अन्य दलों के कई बड़े सूरमाओं पर डोरे डाले जा रहे हैं, इसी परिप्रेक्ष्य में लालू यादव की पार्टी के बाहुबली सांसद पप्पू यादव की पिछले दिनाें प्रधानमंत्री से मुलाकात हुई। सूत्र बताते हैं कि यह मुलाकात कोई 45 मिनट तक चली। दोनों नेताओं के बीच दो टूक, पर अर्थपूर्ण बातचीत हुई। जैसे ही पप्पू यादव ने यह प्रस्ताव दिया कि वे भाजपा में आने को तैयार हैं बशर्ते पार्टी उन्हें बिहार में अपने मुख्यमंत्री का चेहरा बनाएं, इस प्रस्ताव को मोदी ने छूटते ही खारिज कर दिया, बोले ऐसा मुमकिन नहीं। सूत्र बताते हैं कि मोदी ने पप्पू के समक्ष यह महती चुनौती उछाली कि क्या वे सांसद पद से त्याग पत्र देकर मधेपुरा से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं? तो समझा जाता है कि इस बात पर पप्पू यादव ने हामी भरी और कहा कि ऐसा मुमकिन है बशर्ते मोदी पहले उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री बना दें। मोदी ने पप्पू को इस प्रस्ताव पर विचार करने का आश्वासन दिया है।

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कोई कुर्सी भारत मां से बड़ी नहीं

Posted on 15 March 2015 by admin

भगवा पार्टी सियासी नेपथ्य के सन्नाटों को बखूबी महसूस करने लगी है, कभी पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र का खटराग अलापने वाली पार्टी में शायद इन दिनों सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है, मोदी-शाह जोड़ी के चंद बड़े फैसलों से पार्टी में असहमति के स्वर उभरने लगे हैं और इसका खुल्लम खुल्ला इजहार सोशल मीडिया पर भी होने लगा है। किसी स्वयं सेवक की लिखी एक कविता इन दिनों सोशल मीडिया पर बेतरह वायरल हो रही है, जो मुफ्ती व भाजपा की नई बेमेल दोस्ती और अलगाववादी नेता मसर्रत की रिहाई को लेकर है, इस कविता की चंद पंक्तियों पर गौर फरमाइए, यहां सीधे मोदी को निशाने पर रखा गया है-‘देश प्रेम का दंभ भरते थे जो भी नायक दिल्ली से, सत्ता की लोलुपता में वे बन गए भीगी बिल्ली से, बीजेपी बिन राष्ट्रवाद के खड़ी नहीं हो सकती है, कोई कुर्सी भारत मां से बड़ी नहीं हो सकती है।’ सनद रहे कि इससे पूर्व इसी भाव की एक कविता लिखने व उसे सोशल मीडिया पर शेयर करने के आरोप में भाजपा की आगरा यूनिट ने अपने मीडिया इंचार्ज राजकुमार पथिक को बर्खास्त कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

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तब गडकरी हुए मौन

Posted on 15 March 2015 by admin

मोदी सरकार में राज्य मंत्री संजीव बालियान के घर पर पिछले दिनों भूमि अधिग्रहण बिल और इसके संशोधनों को लेकर भाजपा सांसदों की एक महत्त्वपूर्ण बैठक हुई, इस बैठक में नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी समेत भाजपा के सभी शीर्ष पंक्ति के नेता मौजूद थे। ज्यादातर भाजपा सांसदों को यह आशंका थी कि भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर भाजपा सरकार की छवि किसान विरोधी और कॉरपोरेट समर्थक के तौर पर उभरी है, नितिन गडकरी ने कहा कि अभी चुनाव में 4 साल बाकी है, तब तक लोग ये बातें भूल जाएंगे। इस पर मधुबनी से भाजपा सांसद हुक्मदेव नारायण यादव खड़े हुए और तल्खी से बोल पड़े-‘यूपीए के जमाने में सीडब्ल्यूजी और 2जी जैसे घोटाले आम चुनाव से 3 साल पहले हुए थे, क्या देश की जनता 2014 के चुनाव में उसे भूल गई?’ इस पर पार्टी के बड़े नेता एक-दूसरे का मुंह तकते दिखे।

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मिल गए राहुल गांधी!

Posted on 08 March 2015 by admin

सियासी परिदृश्य से ओझल होती सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के युवा सेनापति राहुल गांधी की नाराागी अब कोई छुपी बात नहीं रह गई है, पर वे इन दिनों अज्ञातवास पर कहां है किसी कांग्रेसी को कानों कान खबर नहीं, पर दस जनपथ से जुड़े एक सूत्र के मार्फत ज्ञात हुआ है कि राहुल अपनी ‘मम्मा’ सोनिया से नाराज होकर सबसे पहले बर्मा यानी म्यांमार गए थे, वहां उन्होंने एक सप्ताह के लिए एक बौद्ध विपश्यना केंद्र ज्वॉइन की, अपनी आत्मिक शुद्धि के लिए, एक नए बदले अवतार में अवतरित होने के लिए। सूत्र बताते हैं कि म्यांमार से निकल कर राहुल बैंकाक पहुंचे और फिर बैंकाक से उन्हाेंने किसी यूरोपीय देश की फ्लाइट पकड़ ली, और अब उसी यूरोपीय देश में वे कथित तौर पर अपने मौसा वॉल्टर विंसी के साथ अपनी छुट्टियां बिता रहे हैं। सबको मालूम है कि एनजीओवादी कल्चर के मुरीद राहुल को देर रात तक चलने वाली पार्टियां पसंद हैं। स्कूवा डाइविंग पसंद है, साइकिलिंग पसंद है और जिम जाना यानी सेहत व शरीर बनाना पसंद है, सो कहना न होगा कि राहुल इन दिनों अपने इन्हीं पसंदीदा शगल की पूर्ति में जुटे हैं।

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कब आएगी प्रियंका?

Posted on 08 March 2015 by admin

अब भी कांग्रेसी नेताओं के एक बड़े तबके ने प्रियंका गांधी से अपनी तमाम आशाएं लगा रखी है, प्रियंका ने नजरें अपनी प्यारी मां पर टिका रखी हैं, पर मां मजबूर हैं अपने पुत्रमोह के समक्ष! दस जनपथ से जुड़े सूत्र खुलासा करते हैं कि जहां राहुल अब भी चाहते हैं कि उनकी बहन प्रियंका सियासी नेपथ्य में रह कर पार्टी चलाने की गतिविधियों में उनकी मदद करे, वहीं अब पुत्री प्रियंका को लेकर मां सोनिया का नजरिया बदल गया है। वह चाहती हैं कि प्रियंका अब सामने आकर पार्टी संगठन में कोई महती जिम्मेदारी (महासचिव) उठाएं और पार्टी को सुचारू रूप से चलाने में अपने भाई की मदद करें, पर कहते हैं राहुल फिलवक्त इसके लिए तैयार नहीं हैं। वहीं अधिसंख्यक कांग्रेसी इस राय के बताए जाते हैं कि जब तक सियासी जंग मोदी बनाम राहुल की रहेगी, विजयश्री मोदी का ही वरण करेंगी, खेल तब दिलचस्प होगा जब मोदी बनाम प्रियंका की जंग का आगाज होगा।

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राहुल घर लौट आओ!

Posted on 08 March 2015 by admin

पर राहुल भी जाते-जाते अपनी मांगों की लंबी फेहरिस्त अपनी मां को सौंप कर गए हैं, शायद यही वजह है कि कांग्रेस के हालिया कुछ बड़े फैसलों में राहुल की राामंदी की झलक दिखाई दे रही है। जैसे गुजरात के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर भरत सिंह सोलंकी की नियुक्ति में सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल की रजामंदी शामिल नहीं है, हालांकि पिछले दो दशक में गुजरात कांग्रेस में एक पत्ता भी अहमद पटेल के चाहे बगैर नहीं हिलता था, सियासी मौसम बदलने के साथ निष्ठाएं भी बदलती हैं और नेपथ्य के मायने भी। यही सोलंकी हैं जिन्हें पहले पहल पटेल के कहने पर गुजरात प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया था, पर चर्चित सीडी कांड में सोलंकी का नाम आने के बाद अहमद पटेल ने उनसे किनारा कर लिया। शायद यही वजह है कि इस बार राहुल दरबार में सोलंकी के पैरवीकार के रूप में मधुसूदन मिस्त्री का नाम सामने आया था, वैसे ही दिल्ली में जिनके नायकत्व में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया, उस सेनापति को दिल्ली की बागडोर सौंपने के पक्ष में सोनिया नहीं थीं, पर राहुल की जिद के समक्ष उन्हें झुकना पड़ा और अजय माकन को दिल्ली की कमान सौंप दी गई, वैसे भी अशोक चव्हाण भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे थे, पर उन्हें महाराष्ट्र का जिम्मा दिया गया है। संजय निरूपम जब तक सामना और शिवसेना में थे सोनिया पर उन्होंने खुलकर ‘हल्ला बोल’ की अलख जगाई थी, पर सिर्फ राहुल के चाहने पर उन्हें मुंबई कांग्रेस की बागडोर सौंप दी गई। वक्त आ गया है कि अब कांग्रेस अपना वह इश्तहार सार्वजनिक करें, जिसमें राहुल की एक श्वेत-श्याम तस्वीर लगी हो-‘बेटा घर लौट आओ, कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा, मां ने भी तुम्हारी हर मांग मान ली है।’

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कौन है ये वॉल्टर विंसी?

Posted on 08 March 2015 by admin

ऐसे में यह जानना निहायत दिलचस्प हो जाता है कि आखिरकार यह वाल्टर विंसी हैं कौन? वॉल्टर विंसी राहुल से उम्र में कोई 20-25 साल बड़े हैं, पर उनके सबसे करीबी दोस्त हैं, वाल्टर से हालांकि राहुल की मौसी का विधिवत तलाक हो चुका है, पर इससे राहुल और वॉल्टर की दोस्ती को कोई आंच नहीं आई है। वॉल्टर इटली की फियेट कंपनी में टेस्ट ड्राइवर यानी एक किस्म के ऑटोमोबिल इंजीनियर हैं। वॉल्टर को जिम जाने और फिजिकल ट्रेनिंग का शौक हद से ज्यादा है। सो, फिटनेस को लेकर राहुल की दीवानगी को वे अक्सर धार दिया करते हैं। हालांकि स्वयं सोनिया और प्रियंका तलाक के बाद से वाल्टर को बिल्कुल पसंद नहीं करतीं, यहां तक कि उनकी 10 जनपथ में इंट्री भी बैन है। बावजूद इसके वाल्टर का भारत आना-जाना लगा रहता है, यहां तक कि वे जब भी इंडिया आते हैं, वे राहुल के तुगलक लेन स्थित उनके घर पर ही रुकते हैं, इसी तरह राहुल भी अपने इस भूतपूर्व मौसा से मिलने अक्सर यूरोप का चक्कर लगा लिया करते हैं। यहां तक कि इस दफे के चुनाव प्रचार के दौरान भी वाल्टर को साए की तरह पूरे समय राहुल के साथ देखा गया, वॉल्टर का भारतीय परंपरागत पहरावेर् कुत्ते-पाजामे में देश की काबिल ऑथरिटी को सूचित किए बगैर यूं चुनाव प्रचार में राहुल के साथ शामिल रहना कई बड़े कांग्रेसी नेताओं को भी हैरान करता रहा, पर राहुल के आगे वे कुछ कह नहीं पाए।

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सदन में पस्त सत्ता पक्ष

Posted on 08 March 2015 by admin

एक अदद प्रमोद महाजन की कमी मोदी सरकार को बेतरह महसूस हो रही है, संसद के दोनों सदनों में सत्ता पक्ष का ‘फ्लोर मैनेजमेंट’ बेदम नार आता है, संसदीय कार्य मंत्रियों को इस बात का इल्म भी नहीं होता कि विपक्ष क्या सोच रहा है, उनकी रणनीतियां क्या बुनी गई है? इस बाबत यूपीए 2 के तत्कालीन संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ला की तारीफ करनी पड़ेगी जब उन्होंने राज्यसभा में सरकार का एक तिहाई बहुमत नहीं होने के बावजूद ‘ज्यूडिशियल अपाइंटमेंट बिल’ पर एनडीए घटक दलों में ही विभाजन करवा दिया था, तब शिवसेना व अकाली दल जैसे एनडीए के पार्टनर दलों ने सरकार के पक्ष में वोट किया था, शुक्ला संसद चलाने के मामले में प्रणब मुखर्जी को अपना गुरू मानते रहे हैं। प्रणब दा का कहीं शिद्दत से मानना है कि एक कुशल संसदीय कार्य मंत्री की पहचान है कि वह कितना ‘गवमर्ेंट बिजनेस’ सफलतापूर्वक सदन में चला पाता है, इस बाबत रघु रामैय्या की मिसाल दी जा सकती है, सदन चलने के दौरान जिनकी नारें सदैव विपक्षी बेंचों पर ही टिकी रहती थी। मोदी सरकार कम से कम तीन बिल-भूमि अधिग्रहण बिल, कोयला बिल और बीमा बिल को संसद के संयुक्त सत्र में पास करना चाहती है, ऐसे में नजरें माननीय राष्ट्रपति की ओर भी होनी चाहिए कि क्या वे ऐसी परंपराओं को शुरू करने के लिए हरी झंडी देंगे?

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