Posted on 19 December 2016 by admin
यूपी और गोवा को लेकर भगवा पार्टी के हौंसले बम-बम हैं, यूपी में जहां पार्टी अपने अंदरूनी सर्वे में 215 सीटें जीतने का दावा कर रही है तो वहीं गोवा में उसे अपने दम पर सरकार बना लेने का भरोसा है। गोवा के प्रभारी नितिन गडकरी हैं, सूत्र बताते हैं कि पिछले दिनों रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिक्कर यूं अचानक गडकरी से मिलने जा पहुंचे और उनके समक्ष यह इच्छा जाहिर की कि अगर गोवा में भाजपा की सरकार बनती है तो वे दिल्ली छोड़ कर गोवा जाना पसंद करेंगे। कहते हैं गडकरी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे उनकी भावनाओं से संघ और भाजपा नेतृत्व को अवगत करा देंगे।
Posted on 13 December 2016 by admin
आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य देने का दावा करने वाले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की तबियत इन दिनों किंचित नासाज लगती है, यहां के मौजूदा डायरेक्टर एम सी मिश्रा (30 जनवरी 2017 को रिटायर होने वाले हैं) जो अपने मनमाने फैसलों के लिए ख्यात हैं, उन्होंने इस दफे कुछ गजब ही कर दिया है। उन्होंने एम्स के गैस्ट्रोएंटरोलोजी विभाग का मुखिया अपने एक ऐसे खास व्यक्ति डा. उमेश कपिल को बना दिया है जो हुयूमन न्यूट्रीशन विभाग से संबंध रखते हैं। गैस्ट्रोएंटरोलोजी विभाग के मुखिया होने की पात्रता में उस डॉक्टर का एमडी (मेडिसिन) और इसी विधा में डीएम होना शामिल हैं, पर डा. कपिल इन दोनों ही पात्रता को पूरी नहीं करते हैं। सूत्र बताते हैं कि डा. कपिल कुछ ऐसे डॉक्टरों की फेहरिस्त में शुमार होते हैं, शायद यही वजह है कि 1997 में उस विभाग के तत्कालीन मुखिया डा. राकेश टंडन ने डा. उमेश को हटाने की सिफारिश की थी। इस पूरे मामले में सबसे हैरतअंगेज वाकया यह है कि एम्स के इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ है कि किसी विभागाध्यक्ष की नियुक्ति के पत्र पर स्वयं निदेशक के हस्ताक्षर हों, नहीं तो आम प्रचलन के मुताबिक कोई भी नियुक्ति या पदोन्नति पत्र फैकल्टी सेल से आता है, जिसमें निदेशक की ओर से आदेश दिया जाता है। एम्स से जुड़े सूत्रों का दावा है कि डा. मिश्रा का यह सारा उपक्रम इस बात को लेकर था कि इस पद के उपयुक्त दावेदार डा. अनूप सराया को किनारे लगाया जा सके, क्योंकि डॉ सराया को ही अनुभव व वरिष्ठता के हिसाब से इस विभाग का मुखिया बनना था। एक ओर तो एम्स में डॉक्टरों की कमी का रोना रोया जाता है, वहीं काबिल डॉक्टरों को प्रशासनिक कार्यों में लगा दिया गया है, सेलेक्शेन बॉडी में प्राइवेट प्रैक्टिशनर को सदस्य बना दिया गया है, बावजूद इसके डा. मिश्रा अपने लिए सेवा विस्तार चाहते हैं और इसकी लॉबिंग में जुटे हैं। एम्स के नए निदेशक की रेस में अटल बिहारी वाजपेयी के रिश्तेदार डा. रसिक वाजपेयी, डा. रणदीप गुलेरिया, डा. जगदीश प्रसाद, डा. ए बी डे के नाम आगे हैं।
Posted on 13 December 2016 by admin
भाजपा के बिसरा दिए गए लौहपुरूष अडवानी ने कोई दो सप्ताह पूर्व अपने घर एक लंच रखा था, उस लंच में अनंत कुमार, रविशंकर प्रसाद जैसे अडवानी के कई पुराने वफादार शामिल हुए थे। दावत का मैन्यू था कि कैसे अडवानी जी को देश का अगला राष्ट्रपति बनवाने की कवायद की जाए। अडवानी ने तो यहां तक हामी भर दी थी कि अगर राष्ट्रपति नहीं तो फिर उप राष्ट्रपति ही सही, पर उनके पुराने प्रशंसकगणों ने समवेत स्वरों में कहा कि अडवानी जी के कद के हिसाब से उनका राष्ट्रपति बनना ही समीचीन रहेगा, चुनांचे उनकी कोर टीम की इस अहम बैठक में तय हुआ कि 3-4 वरिष्ठ मंत्रियों का एक समूह जाकर प्रधानमंत्री से मिलेगा और उनके समक्ष यह प्रस्ताव रखेगा कि देश के अगले राष्ट्रपति के तौर पर अडवानी का नाम ही चलाया जाना चाहिए, क्योंकि भाजपा के अंदर व बाहर उनकी सर्वमान्यता सबसे ज्यादा है। सूत्र बताते हैं कि इस प्रतिनिधिमंडल के नेतृत्व की जिम्मेदारी अनंत कुमार को सौंपी गई थी। वक्त गुजरता गया और हर गुजरते लम्हे के साथ लौहपुरूष के सब्र का बांध टूटता गया, पर अडवानी जी के यह पुराने विश्वासपात्र अपने इस वयोवृद्ध नेता की फरियाद लेकर पीएम मोदी तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। इस बात से नाराज़ अडवानी ने भरी संसद में संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार को डपट दिया कि ‘वे ठीक से संसद नहीं चला पा रहे हैं।’ इतना तो अनंत भी समझ गए थे कि अडवानी जी नाराज़गी की असली वजह क्या है?
Posted on 13 December 2016 by admin
प्रतिकूल सियासी हालात से जूझने के लिए स्मृति इरानी ने अपने आपको काफी बदल लिया है अब वह एक नए सियासी अवतार में सामने आई हैं, पहले की तुलना में वह अब सोच-समझ कर बोलती हैं, फूंक-फूंक कर कदम रखती हैं, मृदुभाषी हो गई हैं और अपने विरोधियों से भी हंस-बोल कर बतियाती हैं। मंत्रालय के कामकाज को लेकर वह पहले से कहीं ज्यादा चौकस हो गई हैं। सूत्र बताते हैं कि पिछले दिनों उनसे मिलने के लिए मुंबई के दो विवादास्पद मिल मालिकों ने समय मांगा था, और इनकी पैरवी जो व्यक्ति कर रहा था वह इनके पीएस का जानकार था और वह जांच एजेंसियों द्वारा जारी की गई ‘अनवांटेड’ लोगों की सूची में शुमार था। इससे पहले कि बात आगे बढ़ती, स्मृति ने अपने ही स्टॉफ की क्लास लगा दी और उन्होंने अपने मातहत अधिकारियों से साफ कर दिया कि वह भविष्य में भी ऐसे किसी संदिग्ध छवि वाले व्यक्तियों से मिलना पसंद नहीं करेंगी और ऐसे व्यक्तियों की पैरवी में जुटे लोगों की पहुंच अब उन तक नहीं होनी चाहिए। इस पर फौरन अमल हुआ।
Posted on 13 December 2016 by admin
शनैःशनैः राज बब्बर भी राहुल गांधी की विश्वासपात्र मंडली के अहम सदस्यों में शुमार हो गए हैं। कांग्रेस व सपा के चुनावी गठबंधन के प्रारूप पर द्विपक्षीय सहमति की मुहर लगवा पाने में नाकाम प्रशांत किशोर की जगह लेने की गरज से राज ने यह पहल अपने हाथों में ले ली। सूत्र बताते हैं कि वे लगातार मुलायम सिंह यादव से मिलने का समय मांगते रहे पर उन्हें नाकामी हाथ लगी। एक दिन संसद में वे प्रोफेसर रामगोपाल यादव से टकरा गए, प्रोफेसर साहब उन्हें वहीं सेंट्रल हॉल में चाय पर लेकर गए। प्रोफेसर से लंबी गुफ्तगू के बाद राज बब्बर को यह समझ में आया कि यह बाप (मुलायम) बेटे (अखिलेश) की सोची समझी रणनीति है कि इनमें से एक कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन की हिमायत करेगा तो दूसरा इसकी खिलाफत, यानी कांग्रेस का धर्मसंकट बरकरार रखना है ताकि उन्हें 60 या उससे कम सीटों पर राजी किया जा सके। कहते हैं बब्बर ने प्रोफेसर साहब से कहा कि इस दफे प्रियंका गांधी भी सक्रिय चुनावी प्रचार में उतर सकती हैं, रामगोपाल का मानना था कि प्रियंका ने यह फैसला लेने में देर लगा दी है, क्योंकि यूपी के वोटरों ने अब अपना मन बना लिया है कि उन्हें किधर जाना है।
Posted on 13 December 2016 by admin
1) ये सोचना गलत है कि तुम पर नज़र नहीं है,
मसरूफ हम बहुत हैं मगर बेखबर नहीं हैं
(यह कोई शायरी नहीं, आय कर विभाग का नोटिस है)
2) अकेला आदमी परिवर्त्तन लाता है, और शादीशुदा एटीएम की लाइन में नज़र आता है।
Posted on 05 December 2016 by admin
एचटी के लीडरशिप समिट में हिस्सा लेने जब देश के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिक्कर पहुंचे तो श्रोताओं ने उनके समक्ष प्रश्नों की झड़ी लगा दी। उनसे यह भी पूछा गया कि उनके बयानों से अक्सर इतने विवाद क्यों छिड़ जाते हैं? इसका पर्रिक्कर ने बेहद रोचक तरीके से जवाब दिया, उनका कहना था कि उनकी मातृभाषा कोंकणी है, जो पंजाबी की तरह उतनी रंगीन भाषा नहीं है, न ही इसमें मां-बहन की उपमाओं की गुंजाइश है। शायद यही वजह है कि वे कहते कुछ हैं और पत्रकार उनकी बातों का कुछ और ही अर्थ लगाकर वैसी रिपोर्टिंग कर देते हैं, जिससे तिल का ताड़ बन जाता है। और बार-बार उन्हें इस बारे में सफाई देनी पड़ती है।
Posted on 05 December 2016 by admin
इसी एचटी समिट में सबसे मजेदार सेशन पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल और पंजाब कांग्रेस के सिरमौर कैप्टन अमरिंदर सिंह का रहा, यह सेषन लगभग 45 मिनट तक चला। सबसे पहले सुखबीर ने कैप्टन को सम्मान देते हुए उनके चरणस्पर्श किए। एंकर ने कैप्टन से जानना चाहा कि सुखबीर की ऐसी क्या बात है जो उन्हें पसंद हैं? कैप्टन का कहना था-’सुखबीर अपने पिता से अलग किस्म की राजनीति करते हैं, वे कभी अपनी बातों से मुकरते नहीं है। जैसे इनको डाईट कोक पसंद है और मुझे भी। चुनांचे जब मैंने इनको जेल भी भेजा तो जेल में इनके लिए डाईट कोक की कमी नहीं होने दी।’ अब बारी सुखबीर की थी, एंकर ने उनसे पूछा कि कैप्टन की वो कौन सी बात है जो उन्हें पसंद नहीं? सुखबीर ने छूटते ही कहा-’मुझे ये पंसद हैं, चूंकि ये एक मजबूत आदमी हैं, पर जाने क्यों अपने हाईकमान से दब जाते हैं, अब देखो नवजोत सिंह सिद्धू को कांग्रेस में लेने पर यह सहमति जता चुके हैं, पर अब तक इस बारे में हाईकमान की हामी नहीं आई है।’ फिर माहौल ठहाकों से रंग गया।
Posted on 05 December 2016 by admin
यूपी के पूरे चुनावी परिदृश्य पर नोटबंदी के बाद अनिश्चय के बादल मंडराने लगे हैं, नहीं तो एक वक्त इस रेस में भाजपा कहीं आगे दिख रही थी। टीम अमित शाह की ओर से नित्य नई रणनीतियों को बुना जा रहा है, भाजपा का एक बड़ा प्लॉन अन्य दलों से बड़े नेताओं को पार्टी में लाने का है, जिसमें उन्हें बहुत हद तक कामयाबी भी मिली है। इस वक्त भाजपा अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी बसपा को मानती है, चुनांचे बसपा दिग्गजों पर डोरे डालने के प्रयास जारी है। सूत्र बताते हैं कि बहिन जी के चाणक्य सतीश मिश्र से भी भाजपा अपनी पींगे बढ़ाने में जुटी है। और एक बेहद सोची-समझी रणनीति के तहत सतीश मिश्र की भतीजी को कहीं पहले ही भाजपा ज्वॉइन करा दिया गया है, ताकि एक बड़े क्लाईमेक्स की पटकथा लिखी जा सके।
Posted on 05 December 2016 by admin
एक वक्त था जब कांग्रेस के नवअवतरित रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने यूपी के सीएम अखिलेश के साथ मैराथन बैठकों का दौर कर कांग्रेस-सपा के बीच दोस्ती की नई इबारत को कैनवस मुहैया करा दिया था। बड़ी मुश्किल से अखिलेश कांग्रेस को 54 सीटें देने को राजी हो गए थे, पर पीके ने जोर लगाकर इस संख्या को 58 तक पहुंचा दिया। फिर वे राहुल के पास गए और उनसे कहा कि अगर राहुल सीधे अखिलेश से बात करें तो कांग्रेस के लिए अखिलेश 65 सीटें छोड़ने को राजी हो सकते हैं। राहुल ने पीके से दो टूक कहा कि वे अखिलेश से इस तरह की बात नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करना उनके स्वभाव में शुमार नहीं। पीके का मानना था कि सपा के साथ गठबंधन कर कांग्रेस कम से कम 35 सीटें जीत सकती है। वहीं राहुल का मानना था कि सपा के साथ चुनावी तालमेल का अर्थ होगा कि सपा के खिलाफ व्यवस्था विरोधी वोट यानी लोगों के आक्रोश को बिलावजह अपने पल्ले बांध लेना, इस बात से कांग्रेस के कार्यकर्त्ता कतई इत्तफाक नहीं रखेंगे।’ और पीके के मंसूबे ध्वस्त हो गए।