Posted on 30 November 2015 by admin
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पोते सिद्धार्थ नाथ सिंह आने वाले दिनों में एक बांग्ला फिल्म दंगा में भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के एक अहम किरदार में नज़र आ सकते हैं। सबसे खास बात तो यह है कि इस रोल के लिए सिद्धार्थ नाथ सिंह के नाम की प्रस्तावना कोलकाता स्थित श्यामा मुखर्जी स्मारक समिति ने की है, इस समिति के सदस्यों को ऐसा लगता है कि सिद्धार्थ नाथ का चेहरा-मोहरा श्यामा प्रसाद मुखर्जी से काफी मेल खाता है। देखना दिलचस्प रहेगा कि इस रोल को निभाने के लिए क्या सिद्धार्थ को पार्टी हाईकमान की हरी झंडी मिलेगी।
Posted on 23 November 2015 by admin
याद कीजिए, इस दफे का लंदन में मोदी जी का वेम्बले स्टेडियम का ग्रांड-शो! कहीं न कहीं इस आयोजन के एक अहम सूत्रधार बनकर उभरे थे मनोज लाडवा, जिनकी मोदी के 2014 के चुनावी अभियान को मूर्त्त रूप देने में एक महती भूमिका थी। सूत्र बताते हैं कि इस दफे के ’वेम्बले-शो’ को शानदार बनाने में उस गुजराती उद्योगपति की भी एक अहम भूमिका थी, जो मोदी के बेहद करीबियों में शुमार होते हैं। इनकी कंपनी का एक दफ्तर दुबई में भी अवस्थित है, सूत्रों का दावा है कि इस ग्रैंड-शो के लिए भी एक बड़ा धन दुबई के उसी दफ्तर होकर आया था। सूत्र यह भी बताते हैं कि इस ग्रैंड- शो की समाप्ति के बाद आमद-खर्च का अकाउंट सेट्ल करने लाडवा दुबई भी गए थे। सनद रहे कि लाडवा 2003 से ही मोदी के साथ जुड़े थे और ’वायब्रेंट गुजरात’ आयोजित करवाने में भी उनकी एक अहम भूमिका थी। लाडवा का संघ कनेक्शन भी बहुत पुराना है, ये जाहिरा तौर पर संघ की ब्रिटिश इकाई, हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) के मेंबर भी हैं, यह भी कहा जाता है कि चैरिटी के नाम पर लाडवा लंदन के अप्रवासी भारतीयों से काफी रकम इकट्ठी करने में भी सक्षम हैं, 2001 के गुजरात भूकंप और 1999 के ओडिशा साइक्लोन के दौरान एचएसएस के माध्यम से लाडवा ने काफी पैसे जुटाए थे, ये तमाम रकम संघ के एक आनुशांगिक संगठन सेवा भारती के माध्यम से भारत भेजी गई थी। लाडवा की आय का एक प्रमुख स्रोत उनकी पीआर और लॉबिंग कंपनी ’सैफरन चेज़ है’, लाडवा ने यह कंपनी अपने मित्र विकास पोटा के साथ मिलकर खड़ी की है, सनद रहे कि पोटा भी लंदन स्थित हिंदू स्वयंसेवक संघ के एक अहम मेंबर है। सूत्र यह भी खुलासा करते हैं कि लाडवा व पोटा की कंपनी सैफरन चेज़ एपको की लंदन में काउंटर पार्ट है। सनद रहे कि एपको वही अमरीकन कंपनी है जिसने ’वायब्रेंट गुजरात’ से लेकर मोदी के तमाम चुनावी अभियानों को एक नई धार दी थी। सूत्र बताते हैं कि 2001 में भारतीय दूतावास ने भी लेबर पार्टी और टॉनी ब्लेयर को रिझाने के लिए लाडवा की कंपनी को हायर किया था और इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए थे।
Posted on 23 November 2015 by admin
शिकागो के अपने मित्र डा. भरत बिराई के साथ मिलकर तमाम यूरोपीय देशों और अमरीका में संघ के विचारों का परचम फहराने वाले और संघ के लिए घोषित-अघोषित तौर पर ढेर सारा पैसा इकट्ठा करने वाले लाडवा से संघ नेतृत्व इन दिनों क्यों नाराज़ है, सवाल यही सबसे बड़ा है। दरअसल, लाडवा की ब्रिटेन की लेबर पार्टी से व्यक्तिगत ताल्लुकात हैं, कहते हैं इस दफे जब मोदी लंदन आए तो कंजरवेटिव पार्टी के डेविड कैमरून ने भारतीय प्रधानमंत्री के लिए पलक पांवड़े बिछा दिए। सूत्र बताते हैं कि इन गर्मजोशियों के बीच ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने मोदी के समक्ष इस बात पर अपनी नाखुशी जाहिर की कि उनके अभिन्न में शुमार होने वाले लाडवा लंदन के मेयर चुनाव में लेबर पार्टी के लिए कैंपेन कर रहे हैं। और यही वह बात है कि जो संघ नेतृत्व के भी गले नहीं उतर रही है कि लाडवा भला एक पाकिस्तानी ब्रिटिश सादिक खान के लिए क्यों प्रचार कर रहे हैं, जो मेयर पद के लिए लेबर पार्टी के उम्मीदवार हैं। जाहिर है आने वाले दिनों में लाडवा को ऐसे कई अप्रिय सवालों से जूझना पड़ सकता है। और इसकी प्रतिच्छाया मोदी के उपर भी देखी जा सकती है।
Posted on 23 November 2015 by admin
देश के प्रमुख उद्योगपति गौतम अदानी को लेकर भी संघ की भृकुटियां तनी हुई हैं। सूत्र बताते हैं कि संघ के प्रमुख नेताओं ने प्रधानमंत्री के समक्ष यह साफ कर दिया है कि अदानी के साथ उनका सार्वजनिक रूप से दिखना पार्टी और सरकार के लिए हितकारी नहीं है और विपक्ष इस मुद्दे को बेवजह तूल दे सकता है। सूत्र बताते हैं कि 15 वर्ष पूर्व जब अटल बिहारी वाजपेयी भी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में न्यूयार्क गए थे तो उसी न्यूयार्क पैलेस होटल में ठहरे थे, जिसमें मोदी जी अब ठहरा करते हैं, न्यूयार्क की एक शाम वाजपेयी से मिलने उनके दो पुराने मित्र घटाटे जी और बी.के.मोदी आए, ये दोनों वाजपेयी को यही समझाने में जुटे थे कि वे संत सिंह चटवाल को ज्यादा महत्त्व न दें, क्योंकि उनके उपर कई बैंकों के पैसे गबन करने के गंभीर आरोप हैं। वाजपेयी इस तर्क से सहमत भी जान पड़ते थे कि वाजपेयी के होटल के बेड रूम से बाहर आसन जमाए उनके दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य को चटवाल एंड कंपनी ने साध लिया और वाजपेयी सरकार में कथित रूप से उनके हित सधने लगे। सवाल यही सबसे अहम है कि क्या मोदी युग में रंजन भट्टाचार्य का वही स्थान उनके मित्र उद्योगपति गौतम अदानी ने ले लिया है? कहते हैं कि संघ की आपत्तियों का संज्ञान लेते हुए मोदी ने भी आदानी से एक घोषित दूरी बनानी शुरू कर दी है, इसकी पुष्टि मोदी के हाल के लंदन दौरे से होती है जब गौतम अदानी ने आनन-फानन में अपनी लंदन की होटल बुकिंग रद्द करवा दी। सूत्र बताते हैं कि अदानी के रूम की बुकिंग भी लंदन के उसी जेम्स कोर्ट होटल में थी, जहां मोदी ठहरने वाले थे, बाद में मोदी के तुर्की दौरे के वक्त भी गौतम अदानी का वहां कोई नामो-निशां नहीं दिखा।
Posted on 23 November 2015 by admin
अमित शाह की अध्यक्ष पद की कुर्सी बचाने के लिए संघ के एक प्रमुख नेता दत्तात्रेय होसबोले पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं। सनद रहे कि दत्तात्रेय नरेंद्र मोदी के बेहद करीबियों में शुमार होते हैं। दत्तात्रेय की इस मुहिम में उनका बढ़-चढ़ कर साथ दे रहे हैं राम माधव और अनंत कुमार। जबकि संघ के दोनों शीर्षस्थ नेता मोहन भागवत और भैयाजी जोशी इस राय के बताए जाते हैं कि शाह की विदाई से ही सन्निपात झेल रहे भाजपा संगठन में एक नई जान आ सकती है। भागवत और भैयाजी अब भी अपने उसी पुरानी राय पर कायम बताए जाते हैं कि देश के प्रधानमंत्री और भाजपा के सिरमौर को एक ही राज्य गुजरात से नहीं होना चाहिए। पिछले काफी समय से शाह संघ के साथ अपना बेहतर तालमेल बनाने में जुटे हैं और उन्हें इस भगीरथ कार्य में संघ दुलारे नितिन गडकरी का सबसे ज्यादा साथ मिला है। पिछले दिनों जब भैयाजी के भाई का मध्य प्रदेश में देहांत हो गया तो शाह खास तौर पर अपनी शोक-संवेदना व्यक्त करने वहां गए। इसके अलावा अपने पुत्र जय शाह के विवाह के मौके पर भी शाह ने संघ के तमाम शीर्ष नेताओं को न्यौता भेजा था, दत्तात्रेय होसबोले उस विवाह समारोह में भी तब बेहद सक्रिय दिखे थे।
Posted on 23 November 2015 by admin
टीम मोदी के अंदर हालिया दिनों में इस विचार ने भी जन्म लिया है कि क्यों नहीं दिसंबर के बाद अमित शाह को गुजरात की कमान सौंप दी जाए और वहां की निवर्त्तमान मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल को किसी राज्य का गवर्नर बना दिया जाए। इससे न सिर्फ हार्दिक पटेल मामले से हुई क्षति की भरपाई हो सकेगी, बल्कि शाह के नेतृत्व में गुजरात के शासन को मोदी वाला पुरानी धार भी वापिस मिल सकेगी। वैसे भी शाह डैमेज कंट्रोल करने में सिद्दहस्त माने जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि इस बात का फैसला इस दफे के गुजरात के निकाय चुनावों से हो जाएगा जो 2 दिसंबर से आहूत हैं। माना जा रहा है कि इस बार के निकाय चुनाव में भाजपा एक कमजोर विकेट पर खेल रही है, वहीं कांग्रेस के हौंसले बम-बम हैं। चुनांचे इन निकाय चुनावों में अगर आनंदी बेन पटेल भाजपा के परचम को सर्वत्र नहीं लहरा पाईं तो उनकी गद्दी को ग्रहण लग सकता है।
Posted on 23 November 2015 by admin
प्रशांत किशोर को राज्यसभा दिलवाने में गिनती के खेल में उलझ गए हैं नीतीश कुमार। सनद रहे कि अगले वर्श जदयू कोटे से राज्यसभा की 5 सीटें खाली होने वाली है, जदयू कोटे के शरद यादव, रामचंद्र प्रसाद सिंह, के सी त्यागी, गुलाम रसूल बलियावी और पवन वर्मा रिटायर होने वाले हैं। नीतीश ने अरूण शौरी और प्रशांत किशोर से पहले ही वायदा कर रखा है कि वे उन्हें राज्यसभा में लेकर आएंगे। वहीं नीतीश के लिए शरद यादव और रामचंद्र प्रसाद सिंह की अनदेखी कर पाना संभव नहीं होगा। सनद रहे कि आर सी पी सिंह वही हैं जो कभी नीतीश के प्रिंसिपल सेक्रेटरी हुआ करते थे, नालंदा के रहने वाले हैं, नीतीश के सजातीय हैं और अपनी आईएएस की नौकरी छोड़कर नीतीश की पार्टी से जुड़े। पर गिनती बल के हिसाब से नीतीश की पार्टी की 2 सांसद जिताने की भी हैसियत नहीं है, क्योंकि राज्यसभा की एक सीट के लिए 40 विधायकों की गिनती चाहिए, मौजूदा विधानसभा में नीतीश के 71 विधायक हैं, यानी गिनती पूरी करने के लिए उन्हें कांग्रेसी विधायकों का साथ चाहिए। वहीं कांग्रेस पहले से ही नीतीश से एक सीट मांग रही है, कांग्रेस के 27 विधायक हैं, उन्हें 13 विधायकों की कमी है, इसमें से कम-कम 11 जदयू विधायकों का साथ उन्हें मिल गया तो उनके लिए दो अन्य विधायकों का समर्थन जुटाना आसान रहेगा। कांग्रेस बिहार की राज्यसभा सीट से सीपी जोशी या डा. शकील अहमद को भेजना चाहती है। सो नीतीश के समक्ष एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति पैदा हो गई है।
Posted on 17 November 2015 by admin
पिछले 16-17 महीनों में मोदीमय हो गई भाजपा के कमल के प्रस्फुटन में अंतहीन सवालों की कडि़यां अटक गई हैं, मोदी व शाह की आत्मुग्धतापूर्ण रवेये के विरोध में पार्टी के वरिष्ठ नेता एकजुट होकर एक नई पार्टी या मंच के गठन के बारे में गंभीरता से मनन कर रहे हैं। बिहार में भाजपा की ताजा और करारी हार ने इन असंतुष्ट नेताओं के मंसूबों को संजीवनी देने का काम किया है। लालकृष्ण अडवानी, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा, शांता कुमार, अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा, राम जेठमलानी जैसे पार्टी नेताओं को किंचित इस बात की पीड़ा है कि हाल के वर्षों में मोदी के अभ्युदय के बाद भाजपा अटल जी के आदर्शों से भटक गई है, सो 25 दिसंबर को अटल जी के जन्मदिन के मौके पर ये नेतागण सामूहिक रूप से एक मंच पर आकर भारतीय जनता पार्टी (वाजपेयी) का गठन कर सकते हैं, अगर किसी राजनैतिक पार्टी के गठन में अड़चनें आई तो इन बुजुर्ग नेताओं के नवप्रयास किसी मंच की शक्ल में भी सामने आ सकते हैं। अडवानी से जुड़े एक विश्वस्त सू़त्र का दावा है कि बुजुर्ग नेताओं की इस पहल को अंदरखाने से संघ का भी समर्थन प्राप्त है, जो इसे मोदी के ऊपर एक प्रेशर ग्रुप की तरह देख रहा है। मोदी कैंप की ओर से भी इन रूठे बुजुर्गों को मनाने की कवायद शुरू हो गई है, सूत्र बताते हैं कि इन्हें मनाने का जिम्मा मोदी ने अपने तीन विश्वस्तों जेटली, गडकरी और वेंकैया नायडू को सौंपा है, अनंत कुमार भी अपनी ओर से कुछ पहल करते दिख रहे हैं। पर इस बार नाराज़ बुजुर्गों को मनाना इतना आसान नहीं होगा।
Posted on 17 November 2015 by admin
भाजपा की बुजुर्ग-ब्रिगेड मोदी से कहीं ज्यादा पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की कारपोरेट कार्यशैली से नाराज़ है, सो उनकी सर्वप्रमुख मांग भी यही है कि अमित शाह को जाना होगा, वहीं फिलवक्त शाह को नरेंद्र मोदी ने अपनी नाक का सवाल बना रखा है, मोदी खेमे का तर्क है कि शाह ने अभी तक तो अपना कार्यकाल शुरू भी नहीं किया है वे तो पूर्व पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बचे हुए टर्म को ही अब तलक पूरा कर रहे हैं। पर बिहार की ताजा हार ने शाह के सियासी भविष्य पर ग्रहण लगा दिया है। अब तो संघ भी कहीं न कहीं इस राय को अहमियत देता हुआ दिख रहा है कि शाह के जाने से ही पार्टी में चल रही इस असंतोष की लहर पर ब्रेक लगेगी, नहीं तो पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की दुहाई देकर असंतोश के स्वर आने वाले दिनों में और भी बलवती हो सकते हैं। सनद रहे कि शाह का मौजूदा अध्यक्षीय टर्म दिसंबर में पूरा हो रहा है, सो दुनिया की इस सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी को उसका नया अध्यक्ष जनवरी 2016 में मिल सकता है।
Posted on 17 November 2015 by admin
अब सवाल उठता है कि अगर अमित शाह की रूखसती का फरमान जारी होता है तो फिर पार्टी का अगला अध्यक्ष कौन होगा? वैसे भी भाजपा के अंदर यह एक मान्य परंपरा रही है कि उसका सिरमौर संघ ही तय करता आया है। अमित शाह को भी अध्यक्ष बनवाने में संघ करीबी नितिन गडकरी की एक महती भूमिका रही है। सूत्रों की मानें तो इस वक्त संघ के जेहन में बस दो ही नाम चल रहे हैं-राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी। सूत्र बताते हैं कि बिहार के चुनावी नतीजों के तुरंत बाद जब राजनाथ संघ प्रमुख मोहन भागवत से मिले तो उन्होंने अमित शाह को लेकर अपनी नाराज़गी भागवत से दर्ज करा दी, राजनाथ का कहना था कि पार्टी के अधिसंख्यक नेताओं की राय में शाह के साथ काम करना आसान नहीं। पर अगर शाह को जाना भी पड़ा तो कैंप मोदी राजनाथ की अध्यक्षीय पारी के लिए शायद ही सहमत हो, ऐसे में नितिन गडकरी एक सर्वमान्य चेहरा बनकर उभर सकते हैं। पर गडकरी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि गडकरी अपने मंत्रीय अवतार में खुश हैं, ना तो वे अपना विभाग छोड़ना चाहते हैं और ना ही संगठन की सेवा में जाना चाहते हैं। अगर गडकरी राजी नहीं हुए तो अगला नंबर जेपी नड्डा का लग सकता है। पर स्वयं मोदी अगले अध्यक्ष के तौर पर मनोहर पर्रिक्कर का चुनाव चाहेंगे, क्योंकि वे उनके लिए अमित शाह नंबर दो की भूमिका में आसानी से अवतरित हो सकते हैं।