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अडवानी की महामहिम चाहत

Posted on 21 December 2015 by admin

देश के अगले राष्ट्रपति के लिए अभी से लाॅबिंग शुरू हो गई है, हालांकि मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को 2017 में रिटायर होना है। 2017 में उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी भी रिटायर होने वाले हैं। सूत्र बताते हैं कि इसी सिलसिले में भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण अडवानी ने कोई पखवाड़े पूर्व संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की और उनके समक्ष अपना पक्ष रखा। अडवानी चाहते थे कि राष्ट्रपति पद की उनकी उम्मीदवारी को लेकर मोहन भागवत स्वयं नरेंद्र मोदी से बात करें और उन्हें इस बारे में तैयार करें। सूत्र बताते हैं कि अडवानी ने जोर देकर भागवत से कहा कि अगर एनडीए उन्हें अपने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करता है तो कई गैर एनडीए दल भी उन्हें समर्थन देने के लिए आगे आ सकते हैं। समझा जाता है कि अडवानी ने इस कड़ी में जदयू के नीतीश कुमार, राजद के लालू यादव, बीजद के नवीन पटनायक और अन्ना द्रमुक की जयललिता के नाम विशेष तौर पर उल्लेखित किए। पर सूत्र बताते हैं कि भागवत ने फिलवक्त अडवानी को चुप रहने की नसीहत दी है और कहा कि पहले वे नरेंद्र मोदी का मन टटोलेंगे, फिर उनकी उम्मीदवारी के बारे में बात करेंगे। भागवत की सलाह के बाद अडवानी ने इस मुद्दे पर अपनी एक सुविचारित चुप्पी साध ली है।

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पवार उप राष्ट्रपति की लाइन में

Posted on 21 December 2015 by admin

सिर्फ अडवानी ही क्यों मराठा क्षत्रप शरद पवार भी राष्ट्रपति बनने का सपना संजोए हुए हैं, सूत्र बताते हैं कि अपने 75वें जन्मदिवस के मौके पर पवार ने अपने मन की बात नरेंद्र मोदी के साथ शेयर की। समझा जाता है कि पीएम मोदी ने पवार से कहा है कि राष्ट्रपति तो नहीं पर एनडीए उप राष्ट्रपति पद के लिए उनकी उम्मीदवारी पर विचार कर सकता है। बातों-बातों में मोदी ने अपने उदगार इस अंदाज में व्यक्त कर डाले-’पवार साहब एक किसान हैं और ऋतु चक्र को एक किसान से बेहतर और कौन समझ सकता है।’ यानी प्रधानमंत्री ने बातों ही बातों में यह इशारा दे डाला कि सियासी मौसम को समझने और उसका रूख जानने में पवार साहब को विशेषज्ञता हासिल है। वहीं दूसरी ओर प्रकाश सिंह बादल ने भी उप राष्ट्रपति पद की अपनी उम्मीदवारी को लेकर वित्त मंत्री अरूण जेटली के मार्फत प्रधानमंत्री से बात की है। पर मोदी की ओर से उन्हें कोई पक्का भरोसा नहीं मिल पाया है।

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अजीत ने नीतीश का थामा हाथ

Posted on 21 December 2015 by admin

नीतीश कुमार ’एक अनार और सौ बीमार’ वाली परेशानियों से जूझ रहे हैं, अगले कुछ महीनों में उनकी पार्टी जदयू के 5 राज्यसभा सांसद (जिसमें शरद यादव, के सी त्यागी, पवन वर्मा, आर सी पी सिंह और गुलाम रसूल बलवायी शामिल हैं) रिटायर होने वाले हैं, नीतीश अपने दम पर बमुश्किल दो सांसद फिर से ऊपरी सदन में भेज सकते हैं और इसमें भी उन्हें कांग्रेस का सहयोग चाहिए होगा। सूत्र बताते हैं कि नीतीश शरद को ऊपरी सदन में भेजने में दिल से इच्छुक नहीं, पर सियासी मजबूरियों के चलते उनके लिए पार्टी के वरिष्ठ नेता शरद यादव की अनदेखी कर पाना संभव नहीं होगा। चुनांचे उन्होंने एक नया दांव चलते हुए अजीत सिंह से वादा कर दिया है कि वे उन्हें जदयू के कोटे से राज्यसभा में भेजेंगे, बदले में अजीत ने भी उनसे वायदा किया है कि वे भी 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में नीतीश के कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे।

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क्या चैन्नई-हादसा रोका जा सकता था?

Posted on 15 December 2015 by admin

आगे आप जो पढ़ने जा रहे हैं, इसको पढ़कर यकीनन आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे और जनतंत्र की बेचारगी को लाख लानतें भेजेंगे। चैन्नई में जो कुछ हुआ यानी चार सौ से ज्यादा निर्दोष लोगों की मौतें, 25 हजार करोड़ रूपयों से ज्यादा की बर्बादी, इसे समय रहते रोका जा सकता था। दरअसल दुखद घटना के छह महीने पहले एक टेंडर निकला था, जो चैन्नई की बंद और जर्जर पड़ी सीवर लाइन की सफाई और उसकी मरम्मत से जुड़ा था। देश के एक बड़े काॅरपोरेट ने एक विदेशी कंपनी के साथ मिलकर वह टेंडर हासिल भी कर लिया था। सूत्र बताते हैं कि तमिल महारानी से जुड़े उनके एक अतिविश्वासी मंत्री के साथ ’प्रतिशत’ को लेकर कंपनी व राज्य सरकार के बीच कुछ अनबन हो गई। कथित तौर पर यह मंत्री टैक्स के साथ कुल रकम पर एक निश्चित ’हिस्सेदारी’ चाहते थे, जबकि कंपनी टैक्स पूर्व के रकम में हिस्सा देने को तैयार थी। कोई छह महीने पूर्व ही कंपनी की ओर से वहां की सीवर लाइन की सफाई और मरम्मत के लिए 70 ट्रक रवाना भी कर दिए गए थे, और सौ से ज्यादा ट्रक रवाना होने को तैयार थे। पर कमीशन पर बात नहीं बनी और सीवर सफाई का मामला अधर में अटक गया, बेमौसम बारिश की मार चैन्नई सह नहीं पाया और इतने बड़े हादसे का शिकार हो गया।

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मोदी के बाद दीदी-चाय

Posted on 15 December 2015 by admin

ग्रीन पीस जैसी संस्थाओं को भले ही बड़े बेआबरू कर देश निकाला का फरमान सुनाया गया हो पर अमरीकी दबाव की वजह से मोदी सरकार की यह सदइच्छा भी पूरी तरह से सिरे नहीं चढ़ पाई है। पर जाते-जाते भी ग्रीन-पीस जैसी संस्थाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था के पेट पर जबर्दस्त लात मारी है। अगर आपको याद हो तो यह वही ग्रीन पीस है जिसने भारत के चाय को लेकर खासा बखेड़ा खड़ा किया था और यह तुर्रा उछालने में कामयाब रही थी कि भारतीय चाय में कीटनाशकों की एक बड़ी नुकसानदेह मात्रा छुपी है। इसके बाद से ही लगातार हमारे बड़े चाय बागान एक के बाद एक बंद होते चले गए। चाय बागान के मजदूरों को उकसाने में भी कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिकाएं संदेह के घेरे में है, सनद रहे कि इनमें से ज्यादातर ’एनजीओ’ को विदेशी अनुदान प्राप्त होता है। इन एनजीओ ने एक वाजिब सा लगने वाला सवाल उठाया कि चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों को बागान मालिक न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दे रहे हैं, मजदूरों और बागान मालिकों के बीच खींचतान बढ़ती गई और एक बाद एक लगातार चाय बागान बंद होते गए। आज हालत यह है कि चाय बागान के मजदूर भुखमरी की कगार पर हैं, आत्महत्याओं का दौर शुरू हो चुका है। ऐसे में बंगाल की उत्साही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एंट्री होती है जिनका शायद शिद्दत से मानना रहा हो कि एक चाय वाला (मोदी) अगर देश का प्रधानमंत्री बन सकता है तो फिर क्यों नहीं उन्हें भी इस चाय के धंधे में कूद जाना चाहिए? सो, कोलकाता में चाय बागान के मालिकों से मिलने के बाद ममता को यह बुद्धत्व प्राप्त हुआ कि चाय बागानों का राष्ट्रीयकरण किया जाएगा यानी ममता दीदी भी अब चाय बेचने की तैयारी में हैं।

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संजय जोशी की वापसी?

Posted on 15 December 2015 by admin

बिहार चुनावों के नतीजों ने मानो संघ को एक नई संजीवनी देने का काम किया है, मोदी- शाह जोड़ी के समक्ष अमूमन चुप्पी साध लेने वाले संघ नेताओं का अंदाज किंचित बदल गया है, उनके बात बताने और समझाने का तरीका भी बदल गया है, चुनांचे मामला चाहे बंगाल में अपनी पसंद के एक पुराने स्वयंसेवक दिलीप घोष को पार्टी की कमान दिलवाने का हो या ठंडे बस्ते में पड़े संजय जोशी को एक नए सियासी अवतार में सामने लाने की व्यूह रचना गढ़ने की। संघ से जुड़े विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि बहुत जल्दी सियासी निर्वासन की पीड़ा झेल रहे संजय जोशी की धूम-धड़ाके के साथ वापसी हो सकती है और उन्हें भाजपा की ओर से यूपी का इंचार्ज बनाया जा सकता है। सूत्र यह भी खुलासा करते हैं कि संजय जोशी को लेकर संघ के तीनों शीर्ष नेताओं यानी मोहन भागवत, भैय्याजी जोशी और दत्तात्रेय होसबोले ने स्वयं नरेंद्र मोदी से संवाद स्थापित किया और कहीं न कहीं उन्हें यह समझाने में कामयाब रहे कि अब पुराने वैर भुलाने का समय आ गया है, सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, जोशी गुजरात में भी उतने ही मददगार साबित हो सकते हैं। सूत्र बताते हैं कि इस मसले पर होसबोले ने संघ और मोदी के बीच सेतु का काम किया, कहते हैं दबे-छुपे तौर पर जैसे ही यह सूचना लीक हुई, पूरे अहमदाबाद में ’संजय जोशी लाओ भाजपा बचाओ’ वाले पोस्टर लग गए।

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सब धान बाइस पसेरी

Posted on 15 December 2015 by admin

साफ-सुथरी सरकार देने का दावा और दंभ की हवा निकलती नज़र आ रही है, ताजा मामला हरियाणा का है, जहां भाजपा की सरकार है और जहां अपेक्षाकृत एक ईमानदार मुख्यमंत्री मनोहर लाल वहां गद्दी पर काबिज हैं। झारखंड सरकार के लिए 45 लाख टन चावल का भंडारण होना था, इस कड़ी में हरियाणा के किसानों से 1250 रूपए प्रति क्विंटल की दर से धान की खरीद चालू हुई। पर बिचैलियों ने यहां भी गोरखधंधा शुरू कर दिया, बिचारे किसानों को 1200 रूपए का समर्थन मूल्य भी बमुश्किल मिल पाया, उनसे कह दिया गया कि जो धान वे बेचने को लाए हैं उसमें म्याइश्चर यानी आर्द्रता की मात्रा काफी अधिक है। सूत्र बताते हैं कि झारखंड सरकार से 2000 का भाव तय हुआ था। पर यह फसल जब तक झारखंड पहुंचती, उसके पहले ही बिचैलियों ने इसका वारा-न्यारा कर दिया, सूत्र बताते हैं कि व्यापारियों ने 3 हजार के भाव पर इसे हासिल कर लिया, भाजपा शासित झारखंड भी मुंह ताकता रह गया और सरकार के अंदाज और आगाज की पोल भी खुल गई।

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बेसहारों के सहारा

Posted on 15 December 2015 by admin

सहारा प्रमुख सुब्रत राय इन दिनों भले ही एक मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं, पर तिहाड़ के अपने कई साथी कैदियों के लिए वे किसी तारणहार से कम नहीं, वे अपने उन तमाम कैदी साथियों को कानूनी मदद देने के लिए सामने आए हैं, जिनकी हैसियत कोई अच्छा वकील रख सकने की नहीं है। सूत्र बताते हैं कि तिहाड़ के ऐसे कैदियों को सहाराश्री न सिर्फ मुफ्त कानूनी सलाह दे रहे हैं, अपितु उन्होंने कईयों के कोर्ट-कचहरी के खर्चों को भी वहन करने का वायदा किया है। पर सहाराश्री अपने भतीजे की कोई कानूनी मदद नहीं कर पा रहे हैं जो इन दिनों दुबई के कानूनी-पचड़ों में उलझा है। वहीं उनके छोटे बेटे सीमांतो को यूपी के एक बड़े बिजनेसमैन के साथ हालिया दिनों में दिल्ली के एक हाई-प्रोफाइल शादी समारोह में देखा गया। सिर्फ सीमांतो ही क्यों इस विवाह रिसेप्शन समारोह में अशोक चतुर्वेदी, केतन देसाई जैसे चर्चित-कुचर्चित लोगों की उपस्थिति भी देखी गई। सोचने वाली बात है कि जहां पिता जेल की रोटियां तोड़ने को विवश है, वहीं उनके सुपुत्र शादी के लड्डू उड़ा रहे हैं।

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मोहल्ला क्लीनिक व दिल्ली की राजनीति

Posted on 15 December 2015 by admin

’मोहल्ला राजनीति’ से सियासत की सीढि़यां चढ़े अरविन्द केजरीवाल दिल्ली की जनता की अपेक्षाओं को लेकर खासे चैकस जान पड़ते हैं। उन्हें नौकरशाही, अपने मंत्रियों के साथ अपनी ही पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं पर नज़र रखनी पड़ रही है। सूत्र बताते हैं कि केजरीवाल को जैसे ही सूचना मिली की जल बोर्ड में एक टेंडर दिलवाने के नाम पर उनकी पार्टी के एक लोकप्रिय नेता ने मुंबई के एक बिजनेस हाउस से दो करोड़ रूपए पकड़ लिए हैं तो उन्होंने आगे बढ़कर खुद ही यह टेंडर कैंसिल करवा दिया। इन दिनों रेवेन्यू सर्विस के एक अधिकारी सुकेश कुमार जैन मुख्यमंत्री के आंखों के तारा बने हुए हैं, वे न सिर्फ मुख्यमंत्री के ओएसडी हैं, अपितु पाॅवर डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी भी हैं और उनके पास सचिव व डायरेक्टर विजिलेंस की अहम जिम्मेदारियां भी है। और सबसे खास बात तो यह कि यह अधिकारी मुख्यमंत्री की पत्नी सुनीता केजरीवाल के साथ काम कर चुके हैं और इनकी अच्छी दोस्ती भी है। केजरीवाल इन दिनों अपना सारा ध्यान मोहल्ला क्लीनिक पर फोकस कर रहे हैं, 65 स्क्वाॅयर मीटर जगह में बने इन मोहल्ला क्लीनिक में लोगों को निःशुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होगी, उन्हें यहां दवाईयां भी मुफ्त मिलेगी, और एक मोहल्ला क्लीनिक में प्रतिदिन 250 से ज्यादा मरीजों का इलाज भी मुमकिन है, दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके में पहले-मोहल्ला क्लीनिक ने काम करना भी शुरू कर दिया है, केजरीवाल की योजना दिल्ली में ऐसे 1000 मोहल्ला क्लीनिक शुरू करने की है। यानी आप के वोटरों पर मुहर लगाने की चाक-चैबंद तैयारियां अभी से शुरू हो गई है।

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नए साल में बदलेगा मोदी कैबिनेट का चेहरा

Posted on 06 December 2015 by admin

अपनी सरकार की प्रो-एक्टिव इमेज बनाने को बेकरार प्रधानमंत्री के लिए अपने कुछ मंत्रियों की सुस्ती और नकारेपन का बोझ उठाना आसान नहीं जान पड़ता। सूत्रों की मानें तो अगले वर्ष 14 जनवरी के बाद (जब खरमास समाप्त हो जाएगा) मोदी अपने मंत्रिमंडल में एक बड़ा बदलाव कर सकते हैं। कई मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है, कई नए मंत्री सरकार में शामिल हो सकते हैं, कई मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं तो कईयों की पदोन्नति हो सकती है। इस बड़े फेरबदल का आधार मंत्रियों की ’परफॉरमेंस -रिपोर्ट’ होगी, जिसे पीएमओ खुद मॉनिटर कर रहा है। मंत्रियों के कामकाज की बाबत पार्टी अध्यक्ष के तौर पर भी वक्त-बेवक्त अमित शाह भी अपनी राय दिया करते हैं और समझा जाता है कि मोदी शाह की राय को खासी अहमियत भी देते हैं। शाह के अलावा मोदी अपने मंत्रियों के कामकाज पर अजित डोवल, नृपेंद्र मिश्र और पी के मिश्रा के मार्फत भी नज़र रखते हैं। पीएमओ बकायदा काम-काज के आधार पर हर मंत्री और उनके मंत्रालय की रेटिंग भी करता है। यह स्कोर ही किसी मंत्री की गद्दी बचाने या पदोन्नत होने में काम आने वाले हैं।

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