Archive | विशेष

क्यों रूठे हैं चिराग पासवान?

Posted on 12 July 2020 by admin

लोजपा नेता और बिहार के जमुई से सांसद चिराग पासवान इन दिनों रूठे-रूठे से हैं, उनकी नाराज़गी भाजपा और नीतीश दोनों से ही है। उन्हें लगता है कि भाजपा और जदयू में जो बड़ा भाई और छोटा भाई बनने की होड़ मची है, इससे लोजपा नज़रअंदाज हो रही है। चिराग की नाराज़गी का आलम यह है कि जब उनकी पार्टी के मुंगेर के जिलाध्यक्ष ने बयान दिया कि राजग में सब ठीक-ठाक चल रहा है, तो फौरन उस जिलाध्यक्ष की छुट्टी कर दी गई। चिराग चाहते थे कि राज्य की 12 विधान परिषद की सीटों में से कम से कम एक सीट उनकी पार्टी के हिस्से भी आए, पर नीतीश ने इनमें से 7 सीटें जदयू के लिए रख लीं और चिराग से कहा कि वह भाजपा से उनके कोटे की सीट मांगे। चिराग को नीतीश का रवैया समझ में आ गया। वे पहले से ही नीतीश से इस बात पर नाराज़ चल रहे थे कि वे
चाहते थे कि उनके 2 में से कम से कम एक विधायक को तो नीतीश अपने मंत्रिमंडल में शामिल करें, पर नीतीश ने उन्हें ठेंगा दिखा दिया।

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जाते-जाते बची खट्टर सरकार

Posted on 01 July 2020 by admin

मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार जाने से व्यथित कांग्रेस ने इसका बदला हरियाणा में लेने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया था, इसकी बागडोर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को सौंपी गई थी। एक बार पार्टी हाईकमान से हरी झंडी मिल जाने के बाद हुड्डा खट्टर और उनके मंत्रियों से नाराज़ विधायकों को एकजुट करने में जुट गए। विधायकों में सबसे ज्यादा नाराज़गी प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की कार्यशैली को लेकर थी, दुष्यंत के बारे में यह माना जाता है कि जो भी फाइल एक बार इनके पास पहुंच जाती है वे इस पर कुंडली मार कर बैठ जाते हैं। उनकी अक्खड़ कार्यशैली का यह आलम है कि वे मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की भी एक नहीं सुनते हैं। चूंकि कई महत्वपूर्ण विभाग दुष्यंत के पास हैं सो, सरकार की कई योजनाएं भी वहां अटकी पड़ी हैं। सूत्रों की मानें तो हुड्डा तेजी से नाराज़ विधायकों से संपर्क साधने में जुटे थे और एक वक्त ऐसा आया कि उन्हें प्रदेश के 90 में से 40 विधायकों का समर्थन हासिल हो गया। इससे पहले कि हुड्डा अपनी मंशाओं को परवान चढ़ा पाते कि खट्टर सरकार के एक मंत्री चौधरी रणजीत सिंह को इसकी भनक लग गई, जो इस वक्त एक निर्दलीय विधायक की हैसियत से खट्टर सरकार में मंत्री हैं और उनके पास पॉवर और जेल जैसे दो अहम मंत्रालय भी हैं। रणजीत सिंह ने फौरन इस योजना की जानकारी खट्टर को दे दी। जैसे ही भाजपा को हुड्डा की इस योजना की भनक लगी, भाजपा ने 5 कांग्रेसी विधायकों पर डोरे डाल दिए, उधर अभय चौटाला ने भी हुड्डा को कोई खास भाव नहीं दिया, सो, खट्टर सरकार जाते-जाते रह गई।

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भारतीय मीडिया की असलियत की खुली पोल

Posted on 01 July 2020 by admin

लद्दाख की गलवान घाटी में जब हमारी फौज की चीनी फौज के साथ हिंसक झड़प हो गई तो उसे कवर करने के लिए दिल्ली से नामचीन पत्रकारों की एक बड़ी टोली लेह पहुंची, चूंकि यह कोरोना संक्रमण का काल है इसे देखते हुए वहां के प्रशासन ने पत्रकारों की टीम को लेह एयरपोर्ट से ही कवर कर लिया और उनसे कहा गया कि कोरोना संक्रमण को देखते हुए उन्हें 7 दिनों तक उनके संबंधित होटल के कमरों में ही क्वारेंटीन रहना पड़ेगा पर टीवी न्यूज जगत की कुछ नामचीन और उत्साही पत्रकार कहां मानने वाली थीं, जब वे अपने क्रू के साथ होटल के बाहर निकलने लगीं तो होटल के मुख्यद्वार पर तैनात पुलिस ने उन्हें बाहर नहीं निकलने दिया। सो इन नामचीनों ने चीन को गरियाने का एक रास्ता निकाला और अपने होटल की छत पर जाकर वहीं से रिपोर्टिंग करने लगे और वहीं खड़े होकर उन्होंने नंबर वन बने रहने की होड़ में अपने दर्शकों को पीस टू कैमरा में गलवान घाटी के दर्शन भी करा दिए, जो वहां से सैंकड़ों मील दूर अवस्थित थी, अब लद्दाख के नागरिक सोशल मीडिया पर वीडियो बना कर टीवी चैनलों की इन करतूतों का भंडाफोड़ कर रहे हैं, सो अब ये उत्साही रिपोर्टर लद्दाख के म्यूजियम की रिपोर्ट दिखाने में जुट गए हैं।

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देश को मिल सकता है नया विदेश मंत्री

Posted on 01 July 2020 by admin

भारतीय-चीनी सेना के बीच लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की चुप्पी को लेकर हमारी कूटनीति पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। स्वयं पीएम ने अन्य देशों से भारत के रिश्ते बेहतर करने के लिए दुनिया भर के चक्कर लगाए, कुछ इतना कि राहुल गांधी उन्हें ‘टूरिस्ट पीएम’ कहने लगे। लेकिन गलवान की हिंसक झड़प के बाद जब भारत अंतरराष्ट्रीय समर्थन की बाट जोह रहा था तो उसका सबसे नजदीकी माने जाने वाला कथित मित्र अमेरिका भी चार दिन बाद बोला, वह भी बेहद नपा-तुला। वहीं जब पुलवामा पर हमारे जवानों पर पाक का अटैक हुआ था तब सुषमा स्वराज हमारी विदेश मंत्री थीं, कहते हैं कि उनकी प्रयासों के बदौलत तब अमरीका, आस्ट्रेलिया, फ्रांस यहां तक की चीन, सऊदी अरब, श्रीलंका, बांग्लादेश समेत 48 देश भारत के साथ खड़े थे। जब भारत-भूटान-तिब्बत बार्डर पर हमारा चीन के साथ डोकलाम विवाद हुआ तो जापान जैसे देशों ने खुल कर चीन को आड़े हाथों लिया था और डोकलाम मुद्दे पर हमें दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का खुल कर समर्थन मिला था। सुना जा रहा है कि पीएम इस मुद्दे पर गंभीरता से विमर्श कर रहे हैं कि हमारी विदेशी नीति की बागडोर क्या किसी राजनैतिक व्यक्ति के हाथ में होनी चाहिए, खबर गर्म है कि नौकरशाह से नेता बने एस जयशंकर का विकल्प ढूंढा जा रहा है।

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15 अगस्त को पीएम कर सकते हैं कोरोना वैक्सीन का ऐलान

Posted on 01 July 2020 by admin

भगवा दुलारे बाबा रामदेव को उनके कोरोनिल की खोज पर आयुष मंत्रालय का झटका कोई यूं ही नहीं है, इसके पीछे केंद्र सरकार की एक सुविचारित नीति का हाथ है। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो पुणे की सरकारी प्रयोगशाला में कोरोना वैक्सीन का ट्रायल अपने अंतिम चरण में है, देश को गौरवान्वित करने वाले भारतीय वैज्ञानिकों ने चूहों और खरगोशों पर इसका सफल परीक्षण कर लिया है, इसके नतीजे उत्साहवर्द्धक हैं। अब इंसानों पर इसका परीक्षण चल रहा है, माना जा रहा है कि जुलाई के अंत तक इस वैक्सीन के बारे में तस्वीर साफ हो जाएगी। यदि इंसानों पर भी यह ट्रायल सफल रहता है तो फिर आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर यानी 15 अगस्त को प्रधानमंत्री भारत निर्मित यह कोरोना वैक्सीन देशवासियों को समर्पित कर सकते हैं, यह वैक्सीन न केवल देशवासियों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है बल्कि इसके ऐलान से भारत का अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में भी कद बढ़ जाएगा। शायद यही वजह थी कि आयुष मंत्रालय ने बाबा की खोजी दवा कोरोनिल पर अपनी जांच बिठा दी। जो बाबा कभी 2014 के चुनाव में भगवा परचम लहरा कर चले थे, उन्होंने बकायदा इस दफे भी पीएम केयर फंड में 20 करोड़ रूपए दिए थे, बावजूद इसके मोदी राज 2.0 में उनका ग्राफ लगातार नीचे गिरता गया। क्योंकि जब से बाबा के योग गुरू पर उनका बिजनेस गुरू हावी हुआ है, उन्होंने लगातार गैर भाजपाई नेताओं से भी अपने अच्छे ताल्लुकात बनाएं हैं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तो उन्होंने जी खोल कर तारीफ भी कर दी थी। सो, बाबा को समझा दिया गया है कि केंद्र सरकार नहीं चाहती है कि ऐसी दवाईयों के ऐलान से अंतरराष्ट्रीय जगत में उनकी कोई किरकिरी हो सो आयुष मंत्रालय ने ऐसा कदम उठाया है।

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…और अंत में

Posted on 01 July 2020 by admin

भारत की विदेश नीति हो या रक्षा नीति इसकी नाकामी का ठीकरा भाजपा का आईटी सेल हमेशा जवाहर लाल नेहरू पर फोड़ता रहा है। जैसे नेहरू की गलतियों की वजह से हमने अक्साई चिन गंवा दिया जो आज चीन के कब्जे में है। लेकिन अब हमने लद्दाख की पैगांग लेक गंवा दी है जिस पर चीन अब अपना कब्जा बता रहा है, क्या अब भाजपा आईटी सेल नेहरू को फोटो से निकाल इसका ठीकरा भी उनके सिर फोड़ देगी?

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चीन हमसे चाहता क्या है?

Posted on 01 July 2020 by admin

चीन आखिरकार भारत से शत्रुता क्यों पालना चाहता है? एक बदले हुए परिदृश्य में सुपर पॉवर बनने की होड़ भी नए सिरे से परिभाषित हो गई है, पूरी दुनिया का चलन और इसका शेप भी बॉयोपोलर हो गया है। और ये बेहद स्पष्ट तौर पर चीन और अमेरिका के बीच बंट गया है। पहले पाकिस्तान अमेरिका का ही एक पिट्टू था और अफगानिस्तान के खिलाफ जंग में अमेरिका ने पाक को ही अपना बेस बनाया हुआ था। अमेरिका से ठोकर खाने के बाद, बाद के दिनों में पाकिस्तान चीन के पाले में आ गया। चीन की नज़र भारत को भी अपना शागिर्द बनाने पर टिकी थी। पिछले 6 वर्षों में मोदी से हुई चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 18 मुलाकातों से भी चीन ने कुछ ऐसा ही अंदाजा लगाया हुआ था। वैसे भी भारत का राजनैतिक इतिहास उसे हमेशा से रूस के ज्यादा करीब बताता है, पर एक दौर आया जब नरसिंह राव के नेतृत्व वाली सरकार में भारत आर्थिक उदारवाद का नया प्रर्वतक बन कर उभरा और अमेरिका से उसकी नजदीकियां बढ़ने लगी, अटल बिहारी वाजपेयी के काल में भी यह ट्रेंड बना रहा, भारत अमेरिका के करीब और ज्यादा करीब आता गया। चीन भी चुपचाप यह सब देखता रहा कि मोदी पहले अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलते हैं, इसके पश्चात चीनी राष्ट्रपति से। पर जब मोदी ने खुल कर ‘नमस्ते ट्रंप’ किया तो चीन की बौखलाहट बढ़ गई और रही-सही कसर निकाल दी भाजपा के आईटी सेल ने जिसने कोरोना का जिम्मेदार चीन के वुहान शहर को ठहरा दिया और इसके बाद चीन हमारे पीठ में छुरा घोंपने की अपनी पुरानी नीति पर अमल करने लग गया।

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हम चीन का नाम लेने से डरते क्यों हैं?

Posted on 01 July 2020 by admin

कभी मोदी और भाजपा की आंखों के तारे हुआ करते थे प्रशांत किशोर, 2014 में भाजपा की चुनावी रणनीति बुनने में उनकी भी एक अहम भूमिका रही थी, उनके एक ताजा-ताजा ट्वीट पर जरा नज़र डालिए, पीके कहते हैं-’कोरोना से लड़ाई 21 दिन में जीती गई और चाईना से तो लड़ने कोई आया ही नहीं। अब बचा आर्थिक विकास तो इसे सरकारी डेटा वाले ही ठीक कर लेंगे… चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि सरकार बता रही है कि सब ठीक है। बाकी आत्मनिर्भर बनाने के लिए चुनाव प्रचार से जुड़े रहिए।’ इस तंज की तंगदिली से मुंह भी चुरा लें तो भी यह तो सच है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-चीन तनाव पर सर्वदलीय बैठक में कहा कि ’न कोई हमारे क्षेत्र में घुसा, न ही किसी ने हमारी चौकी पर कब्जा किया। कोई हमारी एक इंच जमीन की तरफ भी आंख उठा कर नहीं देख सकता।’ पर विडंबना देखिए कि वहीं सरकार के एक मंत्री श्रीपद नायक जो रक्षा राज्य मंत्री भी हैं, नायक जब इस सर्वदलीय बैठक से चंद रोज पूर्व अपने गृह प्रदेश गोवा पहुंचते हैं तो वहां पत्रकारों से बात करते हुए दो टूक कहते हैं-’हम उन्हें बख्शेंगे नहीं, हमारे यहां घुस कर हमारे सैनिकों पर हमला किया है, यह चीन की पूर्व नियोजित साजिश है।’ वहीं पिछले एक महीने से सरकार भक्त न्यूज चैनल भी खूब बजा रहे थे और तस्वीरें दिखा रहे थे कि लद्दाख की पेगांग झील (जहां ’थ्री इडिएट्स’ फिल्म की शूटिंग हुई थी) जो 134 किलोमीटर लंबी है, चीन ने इसके दो-तिहाई हिस्से पर कब्जा जमा लिया है। यहां अब भी चीनी सेना का जमावड़ा है जिससे आम भारतीय नागरिक झील के आसपास भी नहीं फटक सकते। सवाल यह भी उठता है कि 15 जून को भारत-चीन सीमा पर खूनी झड़प किसकी जमीन पर हुई थी, हमारे जवान तो कम से कम चीन के हिस्से में नहीं घुसे थे, यानी चीन हमारे हिस्से में आकर हमारे सैनिकों पर हमला बोला था। चीन अब भी गाल बजा रहा है कि गालवान घाटी चीन की है, हम इसका माकूल जवाब क्यों नहीं देते?

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कोरोना के वार से बच न सकी सरकार

Posted on 20 June 2020 by admin

’बुझने से पहले दीए ने रोशनी का हर कतरा लुटा दिया/पगली हवाओं ने जब तक समझा सूरज ओढ़ कर वह सो गया’ कोविड-19 जैसे साम्यवाद की नई अलख जगाने आया हो, क्या हाशिए पर खड़े लोग, क्या अघाए-सताए लोग, इसने तो सत्ता के पॉवर हाऊस में भी सेंध लगा दी है। इस बात की पड़ताल अब उफान पर है कि आखिरकार कोविड-19 बड़े सरकारी अधिकारियों और हैवीवेट केंद्रीय मंत्रियों तक कैसे पहुंच गया? अनलॉक 2.0 में केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया कि सरकारी कार्यालय खुलेंगे और 50 फीसदी कर्मचारी काम पर आएंगे। बड़े अधिकारियों को तो नियमित आने का फरमान सुना दिया गया। लॉकडाउन के दौरान भी गृह मंत्रालय में जोर-शोर से काम चल रहा था। कश्मीर पर लाए गए विधेयक की तथ्यात्मक और व्याकरण संबंधी त्रुटियां सुधारी जा रही थीं। कहते हैं इस विधेयक में कोई 57 त्रुटियां निकल कर सामने आई, जिसे सुधार कर इसे फिर से संसद में भेजना था। तब इस विधेयक की पूर्ण पड़ताल के लिए होम मिनिस्ट्री ने कानून मंत्रालय के एक काबिल अफसर को अपने यहां तलब किया। बाद में इसी अफसर को कोरोना संक्रमित पाया गया। इधर कई मंत्रालय के अधिकारियों और कर्मचारियों के कोरोना संक्रमित होने का सिलसिला थमा नहीं। निर्माण भवन, शास्त्री भवन, रेल भवन, कृषि भवन, नेशनल मीडिया सेंटर और स्वास्थ्य मंत्रालय में कोरोना संक्रमितों की संख्या कितनी है इसकी आधिकारिक जानकारी कहीं उपलब्ध नहीं है, पर सूत्र बताते हैं कि एक अनुमान के अनुसार केंद्र सरकार के 300 से ज्यादा कर्मचारी अब तक इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं। बड़े लोगों में रक्षा सचिव अजय कुमार, नीति आयोग के विनोद पाल, वित्त मंत्रालय की अंडर सेक्रेटरी रीता मल (जो नार्थ ब्लॉक में बैठती हैं), पीआईबी के धतवालिया समेत अन्य 30 अधिकारी भी इसकी चपेट में है। कई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री तो स्वयं ही सेल्फ क्वाराइंटीन में चले गए हैं, जिनमें नितिन गडकरी, प्रकाश जावड़ेकर, रवि शंकर प्रसाद, नरेंद्र सिंह तोमर के नाम सामने आ रहे हैं। इसके अलावा 6 सचिव और 6 संयुक्त सचिव भी सेल्फ क्वाराइंटीन में बताए जा रहे हैं।

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क्या सिंधिया के लिए राहुल व अमित एक हैं?

Posted on 20 June 2020 by admin

ज्योतिरादित्य सिंधिया पुराने कांग्रेसी ठहरे, सो वे भाजपा के रंग में अभी ठीक से रंग नहीं पाए हैं। चूंकि वे विदेश में पढ़े-लिखे हैं सो उनकी मान्यताओं और आचरण में अब भी पश्चिमी सभ्यता की छाप साफ-साफ झलकती है। जब तक वे कांग्रेस में थे राहुल के बेहद वफादारों में शुमार होते थे और राहुल के पार्टी अध्यक्ष चुने जाने के बाद भी वे राहुल गांधी को उनके फर्स्ट नेम यानी राहुल कह कर ही पुकारते थे। राहुल ने भी किंचित इन बातों का कभी बुरा नहीं माना। अब जब उन्होंने भाजपा ज्वॉइन कर ली है तो यहां भी बड़े नेताओं को उनके ‘फर्स्ट नेम’ से पुकारने से गुरेज नहीं करते। कल्पना कीजिए कि अगर भाजपा में कोई नेता ‘अमित‘ या ‘जेपी‘ का संबोधन दे तो पार्टी के आम कार्यकर्ता इस बात को कैसे हजम करेंगे? क्योंकि संघ और भाजपा के संस्कार इन बातों की अनुमति नहीं देते कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को उनके पहले नाम से पुकारा जाए, सो अगर ज्योतिरादित्य को भाजपा में रहना है तो भगवा ककहरा तो सीखना ही पड़ेगा।

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