Posted on 04 January 2021 by admin
राहुल गांधी की राजनीति का अंदाज भी निहायत निराला है, पिछले कुछ हफ्तों से जब पार्टी में इतना कुछ तूफानी चल रहा है तो वे अंतरराष्ट्रीय मसलों पर चिंतन-मनन कर रहे हैं। हालांकि किसान आंदोलन को लेकर लगभग रोज ही उनका कोई न कोई ट्वीट या बयान आ जाता है। पर उनकी असल दिलचस्पी कहीं और लगती है। पखवाड़े पूर्व नई दिल्ली के जिमखाना क्लब में राहुल के लिए काम करने वाले कौशल किशोर विद्यार्थी ने एक चाय पार्टी रखी थी और उस चाय पार्टी में बड़ी तादाद में विदेशी राजनियकों (डिप्लोमेट्स) को आमंत्रित किया गया था। कहना न होगा कि राहुल से मिलने और बात करने के लिए बड़ी संख्या में डिप्लोमेट्स आए और सबसे हैरानी की बात यह है कि राहुल स्वयं उस चाय पार्टी में दो घंटे से ज्यादा वक्त तक मौजूद रहे। आमंत्रित डिप्लोमेट्स को इस बात का कहीं गहरे इल्म हुआ कि राहुल अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर अपनी पैनी नज़र रखते हैं और भारत की विदेश नीति को भी लेकर उनका नज़रिया बेहद साफ-सुथरा है, पर उन्हें चिंता बस इसी बात को लेकर थी कि जब खुद राहल के देश में इतना कुछ चल रहा है तो क्या उन्हें दो घंटों की चाय पीनी चाहिए थी?
Posted on 04 January 2021 by admin
’तुम अगर आइना हो तो सब सच दिखाते क्यों नहीं हो
कोई हाथ लगाए तो टूट कर बिखर जाते क्यों नहीं हो’
सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस में असंतोष का बुलबुला इस कदर फूट रहा है कि इसे देख गांधी परिवार भी हैरान-परेशान है। बैचेनी इस कदर है कि परिवार के चिराग राहुल गांधी के नेतृत्व को भी चुनौतियां मिलने लगी हैं? इस शनिवार को आहूत हुई कांग्रेस की बैठक की रूप-रेखा प्रियंका गांधी ने तैयार की थी, प्रियंका की इस मुहिम को परवान दी कमलनाथ ने, उन्होंने पार्टी के एक-एक असंतुष्ट नेता से खुद बात की और कहते हैं इस बात की जानकारी भी उन्होंने प्रियंका से साझा की। इन नेताओं को बताया गया कि बैठक से पहले स्वयं प्रियंका गांधी उनसे वन-टू-वन बात करेंगी यानी यह एक तरह से असंतुष्ट नेताओं की नाराज़गी दूर करने का ही पूरा उपक्रम था। सूत्र बताते हैं कि प्रियंका ने सचमुच बैठक षुरू होने से पहले अषोक गहलोत के साथ मिल कर कई असंतुष्ट नेताओं से सीधी बात की। गांधी परिवार का यह पूरा उपक्रम इस बात के लिए भी था कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में बात चुनाव तक पहुंचे ही नहीं, कहीं ओर से राहुल को चुनौती मिले नहीं और वे निर्विरोध पार्टी अध्यक्ष चुन लिए जाएं। वहीं दूसरी ओर राहुल हैं जो लगातार पार्टी को ये संकेत भेज रहे हैं कि वे अध्यक्ष बनना ही नहीं चाहते सो, एक बड़ा वर्ग है जो कह रहा है कि आखिर कब तक ऐसा चलेगा? बहुत हुआ, कम से कम अब तो चुनाव हों। दस जनपथ के वफादारों को अपने ही कुछ नेताओं पर षक है कि वे भाजपा की हाथों में खेल रहे हैं, और कांग्रेस के अंदर क्या चल रहा है इसकी पल-पल की जानकारी भाजपा तक पहुंचा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो शक के इसी दायरे में गुलाम नबी आजाद जैसे नेता भी आते हैं। इससे भाजपा का सूचना तंत्र मजबूत होता है और कांग्रेस गांधी परिवार पर उनके हमले की धार और भी पैनी होती है।
Posted on 13 December 2020 by admin
काफी पहले से संकेत मिल रहे थे कि मोदी मंत्रिमंडल का चिर प्रतीक्षित विस्तार 8 या 9 दिसंबर को हो सकता है, पर जब दिल्ली में किसान आंदोलन ने गति पकड़ी तो विस्तार का यह कार्यक्रम आगे के लिए टाल दिया गया। सूत्रों की मानें तो अब चूंकि खरमास शुरू हो गया है और शुभ दिन तो अब 14 जनवरी के बाद शुरू होंगे तब ही मंत्रिमंडल विस्तार की यह योजना परवान चढ़ पाएगी। 31 जनवरी से संसद का बजट सत्र शुरू होने वाला है जो अप्रैल तक चलेगा। आम मान्य परंपराओं में जब सदन का सत्र चल रहा होता है तो मंत्रिमंडल फेरबदल या विस्तार तब नहीं होता है, सो यह 14 जनवरी से 30 जनवरी के दरम्यान ही संभव है, या फिर बजट सत्र की समाप्ति के बाद मई में इसके आसार बन सकते हैं। मई में सरकार के भी दो साल पूरे हो जाएंगे। ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे लोग जो मार्च से मंत्री बनने की कतार में खड़े हैं। बिहार से 2-3 मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है, सुशील मोदी और संजय जायसवाल की किस्मत चमक सकती है। यूपी से एक बड़ा सरप्राईज डॉ. सुधांशु त्रिवेदी दे सकते हैं, वे पढ़े-लिखे, सोच-समझ कर बोलने वाले एक ब्राह्मण फेस हैं, जिनके नाम का संघ भी समर्थन कर सकता है। वैसे इस दफे यूपी से दो ब्राह्मण चेहरों सीमा द्विवेदी और हरिद्वार दुबे को राज्यसभा में जगह मिली है, पर डॉ. त्रिवेदी इनके मुकाबले ज्यादा हैवीवेट नाम हैं। किसान आंदोलन की धमक
देखते हुए हरियाणा से किसी की लॉटरी निकल सकती है। दिल्ली से मनोज तिवारी, प्रवेश वर्मा या मीनाक्षी लेखी का नाम हो सकता है, बंगाल से रूपा गांगुली, दिलीप घोष या लाकेट चटर्जी के नाम के चर्चे हैं। भूपेंद्र यादव, विनय सहस्त्रबुद्दे, राम माधव, अनिल जैन के नाम तो काफी पहले से चल ही रहे हैं। अगर वाईएसआर कांग्रेस एनडीए ज्वॉइन करती है तो मोदी मंत्रिमंडल में इन्हें भी नुमाइंदगी मिल सकती है। जद-यू के भी मंत्री सरकार में शामिल हो सकते हैं।
Posted on 09 November 2020 by admin
अगर भाजपा बिहार हारती है तो इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल चुनाव पर भी पड़ सकता है, क्योंकि पिछले चुनाव में भाजपा बंगाल की अधिकांश वे सीटें जीत गई थी, बंगाल के जो क्षेत्र बिहार से लगते थे, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा भी अलग गोरखालैंड की मांग फिर से बुलंद करते भाजपा का साथ छोड़ गए हैं यानी दार्जिलिंग की तमाम सीटों पर भी भाजपा को अब नाको चने चबाने पड़ सकते हैं। अगर भाजपा बिहार के बाद बंगाल में भी मुंह की खाती है तो इसका सीधा असर यूपी के 2022 के चुनावों पर भी पड़ सकता है।
Posted on 09 November 2020 by admin
मध्य प्रदेश के 28 सीटों के उप चुनाव महाराज यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए परेशानियों का नए सबब बन गए हैं, एक बार तो वे रूठ कर दिल्ली स्थित अपने घर में कैद हो गए थे, अब बाहर निकले हैं और अपने वफादारों के लिए चुनाव में ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं तो उनका दर्देदिल बाहर आ रहा है। अपने करीबी पत्रकार मित्रों से बातचीत में वे अपने दिल का हाल बयां करते हुए कह रहे हैं कि जब तक वे कांग्रेस में थे तमाम चुनावी पोस्टरों पर राहुल गांधी के बराबर में बस उन्हीं की तस्वीर लगती थी, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे बड़े नेताओं की तस्वीरों के साइज भी उनकी तस्वीर से छोटे हुआ करते थे, जब से भाजपा में आए हैं एक पोस्टर पर दर्जनों अंडाकार वृत्त में तस्वीरें होती हैं, जिनमें से एक चेहरा उनका भी होता है। जबकि भाजपा के कई पोस्टरों से तो उनका चेहरा भी नदारद हो जाता है, जहां केवल मोदी, शाह और शिवराज के चेहरे पोस्टरों में प्रमुखता से छापे जाते हैं। ग्वालियर संभाग में तो उनके वफादार उनका ख्याल जरूर रख लेते हैं पर लगता है पार्टी की प्रदेश इकाई को उनकी इतनी परवाह नहीं। सूत्रों की मानें तो मध्य प्रदेश के उप चुनावों में कांग्रेस भाजपा को कड़ी टक्कर दे रही है, पर शिवराज को अपनी सरकार बचाने के लिए मात्र नौ सीटों की जरूरत है, लगता है भाजपा यह आंकड़ा आसानी से छू पाएगी। माना जाता है कि सिंधिया के अब भी राहुल और सोनिया से अच्छे ताल्लुकात हैं, उनकी असल समस्या कमलनाथ और दिग्विजय को लेकर है और वैसे भी सियासत अबूझ संभावनाओं का खेल है, कौन कब पलटी मार जाए कहना मुश्किल है।
Posted on 20 October 2020 by admin
’सियासत ऊनींदे ख्वाबों का ही तो एक सफ़र है
तुझे ख़बर हो न हो पर हर हाल में ये बाख़बर है’
भाजपा के जाज्वल्यमान नक्षत्र योगी आदित्यनाथ के निर्विघ्न भगवा यात्रा को जैसे किसी की नज़र लग गई है, एक वक्त ऐसा भी था जब इनकी गिनती भाजपा के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्रियों में होती थी, पार्टी के नंबर दो से अनबन की तमाम खबरों के बाद भी योगी की निष्कंटक उड़ान पर कोई विराम नहीं था, क्योंकि माना जाता था कि पीएम और संघ का उन्हें विशेष आशीर्वाद प्राप्त है। वक्त गुजरा और योगी की प्रशासनिक उलझनें बढ़ती गईं, अब हालात इस मुकाम पर आ पहुंचे हैं कि उनकी गद्दी पर उनके ही नंबर दो की नज़र है। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कोई दो हफ्ते पहले स्वयं ही ट्वीट कर अपने कोरोना संक्रमित होने की जानकारी दी थी, फिर खबर आई कि वे क्वारंटीन में है, मगर दिल्ली में है। सूत्रों के हवाले से खबर यह भी आई कि वे दिल्ली में रहते हुए अपने लिए पॉलिटिकल लॉबिंग कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो इस दौरान भाजपा के कुछ प्रमुख नेताओं के अलावा वे संघ के नंबर दो दत्तात्रेय होसाबोले और कृष्ण गोपाल से भी मिले। मौर्या खुद को योगी के रिप्लेसमेंट के तौर पर स्थापित करने में जुटे हैं और हाथरस मामले के बाद जब से इन कयासों को पंख लगे हैं कि योगी की छुट्टी हो सकती है, मौर्य की सक्रियता और बढ़ गई है। कहते हैं जब से इस बात की खबर योगी को लगी है उन्होंने अपने इरादे भी साफ कर दिए हैं कि मौर्य को डिप्टी सीएम पद से हटना होगा। संघ को भिजवाए गए संदेश में कहा जाता है कि उन्होंने दो टूक साफ कर दिया है कि ’अगर मौर्य को हटाने से ओबीसी वोटों के नाराज़गी का खतरा है तो वे केशव की जगह स्वामी प्रसाद मौर्य को उनकी जगह डिप्टी सीएम बनाने को तैयार हैं।’ यानी युद्ध का उद्घोष हो चुका है, योगी को अपनी भावनाओं पर काबू रख कर सियासी पैंतरे दिखाने ही होंगे।
Posted on 20 October 2020 by admin
Leider ist der Eintrag nur auf English verfügbar.
Posted on 06 October 2020 by admin
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Posted on 06 October 2020 by admin
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Posted on 06 October 2020 by admin
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