Posted on 19 March 2018 by admin
राजीव शुक्ला सेंट्रल हॉल में बैठे अपने कुछ दोस्तों के साथ गपशप लड़ा रहे थे कि अचानक उनके पास भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आ खड़े हुए, शाह को अपने पास आया देख, भौचक शुक्ला जी ने अपने स्थान पर खड़े होकर उनका अभिवादन किया। शाह ने शुक्ला से कहा-’ अरे आप यहां बैठे हो आराम से, गुजरात नहीं जाना है क्या?’ तब तक शुक्ला जी को इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि पार्टी उन्हें नामांकन के ऐन आखिरी रोज, आखिरी वक्त पर गुजरात भी भेज सकती है, क्योंकि गुजरात के कांग्रेस प्रत्याशी के कागजों को लेकर अब भी भ्रम का आलम बना हुआ था। पर पार्टी ने अभी तक इस बारे में उन्हें इंफॉर्म नहीं किया था कि उन्हें कवर कैंडिडेट बनाया जा सकता है। शाह ने शुक्ला से चुटकी ली-’आप कहो तो हम अपनी ओर से आपके लिए चार्टर्ड प्लेन की व्यवस्था कर दें।’ शुक्ला जी को लगा कि अध्यक्ष भी मजाक के मूड में है, पर बाद में यह बात सच निकली और इसके बाद के घटनाक्रम के बारे में सबको मालूम है कि निर्माण कार्य की वजह से अहमदाबाद का एयरपोर्ट 7 बजे तक बंद कर दिया गया था, जब शुक्ला जी की दिल्ली अहमदाबाद फ्लाइट वहां लैंड होने वाली थी। सूत्र बताते हैं कि दरअसल शुक्ला जी बिहार से टिकट चाहते थे, पर वहां भाजपा की सहयोगी पार्टी जदयू मीरा कुमार के पक्ष में थी जबकि बिहार कांग्रेस की स्थानीय इकाई स्थानीय उम्मीदवार चाहती थी। इसीलिए बिहार से शुक्ला जी का नाम नए पेंचोखम में अटक गया। अब सुनने को यह आ रहा है कि शुक्ला जी के अभिन्न मित्र अरूण जेटली ने उन्हें भाजपा ज्वॉइन करने का सुझाव दिया है, शुक्ला जी के बारे में सबको मालूम है कि वे सियासत के उस्ताद बाजीगर हैं, जो सियासत के बदलते रंग को भी पढ़ लेते हैं और रंगे चेहरों को भी।
Posted on 19 March 2018 by admin
अरविन्द केजरीवाल के सितारे भंवर में गोते खा रहे हैं, इतनी उठापटक कि बस उन्हें रह-रह कर अब यह दर्द सालने लगा है कि वे बस आधे राज्य के मुख्यमंत्री क्यों हैं? मजीठिया से माफी एक बड़ा सियासी इश्यू बन गया है, उनकी ही पार्टी में बगावत शुरू हो गई है। सो, अपने करीबियों से मन का दर्द बयां करते हुए केजरीवाल ने इच्छा जताई है कि अब उन्हें हरियाणा का मुख्यमंत्री बनना है। हरियाणा न सिर्फ उनका गृह राज्य है अपितु वहां उनके सजातीय वोटरों की भी अच्छी खासी तादाद है। इस आने वाले 25 मार्च को केजरीवाल हरियाणा में एक बड़ी रैली करने जा रहे हैं। इस रैली को सफल बनाने के लिए आम आदमी पार्टी के हरियाणा चीफ नवीन जय हिंद और हालिया दिनों में राज्यसभा सांसद बने सुशील गुप्ता ने जमीन-आसमान एक कर रखा है। रैली में ज्यादा से ज्यादा लोग जुटे इसके लिए आप के कार्यकर्ता घर-घर जाकर पीले चावल देकर न्यौता बांट रहे हैं, इस रैली का मूल उद्घोष भी यही है-’घर आया अपना धरती पुत्र।
Posted on 19 March 2018 by admin
मनीष तिवारी को अब भी भले अहमद पटेल कैंप का एक प्रखर योद्धा माना जाता हो पर पिछले कुछ समय से वे अपनी सियासी प्रोजिशनिंग बदलने की कवायदों में जुटे हैं। सनद रहे कि मनीष वाशिंगटन स्थित प्रतिष्ठित अटलांटिक काऊंसिल के मेंबर हैं, इस नाते उनका अमरीका आना-जाना लगा रहता है, पिछले दिनों भी वे इस काऊंसिल की मीटिंग के सिलसिले में वाशिंगटन में थे, कहा जाता है कि इस काऊंसिल के कई लोगों को अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने व्हाइट हाउस में ब्रेकफास्ट पर न्यौता भेजा था, इसमें मनीष भी शामिल हुए। कहते हैं राहुल गांधी के पिछले अमरीकी दौरे को सफल बनाने के लिए मनीष ने सैम पित्रोदा के साथ मिलकर काफी मेहनत की थी। सूत्रों की मानें तो अब राहुल महत्वपूर्ण कानूनी व विदेशी मामलों में मनीष की राय को तरजीह देने लगे हैं। मनीष करीबियों को उम्मीद थी कि इस बार के राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में उनका भी नाम होगा, पर कहते हैं मनीष ने 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए अभी से तैयारियां शुरू कर दी है, पर देखना दिलचस्प रहेगा कि पार्टी उन्हें लुधियाना या चंडीगढ़ कहां से चुनावी मैदान में उतारती है।
Posted on 19 March 2018 by admin
भाजपा के बागी सांसद कीर्त्ति आजाद का 2019 के चुनाव में दरभंगा संसदीय क्षेत्र से टिकट कटना तय माना जा रहा है, भाजपा शीर्ष नेतृत्व उनकी जगह दरभंगा से संजय झा को मैदान में उतारना चाहता है। सूत्र बताते हैं कि इस बीच कांग्रेस ने कीर्त्ति के लिए अपने दिल के दरवाजे खोल दिए हैं, वैसे भी कांग्रेस कीर्त्ति के पिता की पार्टी रह चुकी है और वहां के दस्तूर से वे पहले से ही वाकिफ हैं। (एनटीआई-gossipguru.in)
Posted on 19 March 2018 by admin
उत्तर प्रदेश चुनावों के हालिया नतीजों ने भाजपा की हालत ऐसी कर दी है जैसे शोर वाली गली में दबे पांव सन्नाटों ने दबिश दी हो। पर भगवा सियासत के ताने-बाने में कई ऐसे अनसुलझे सवाल लिपटे हैं, जिनकी शिनाख्त जरूरी है। विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के समक्ष पहले ही यह खुफिया रिपोर्ट पहुंच चुकी थी कि गोरखपुर में इस दफे पासा पलट सकता है, फिर दोनों भाजपा के शीर्ष पुरूषों मोदी व शाह में से किसी ने यह जहमत नहीं उठाई कि वे चुनाव प्रचार के लिए गोरखपुर पहुंचे, इन्होंने एक तरह से गोरखपुर की हार या जीत को योगी के सियासी ताकत से जुड़ा मान लिया, वैसे भी योगी अपनी अलग किस्म की राजनीति के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, इन दिनों वे भाजपा के एक अनुशासित सिपाही के मानिंद आचरण कर रहे थे, वहीं भाजपा के शीर्ष नेतृत्व कहीं न कहीं अपने लो प्रोफाइल मुख्यमंत्रियों मसलन मनोहर खट्टर, रघुबर दास, त्रिवेन्द रावत जैसे को ज्यादा तरजीह देता है। यूपी के इन उप चुनावों में संघ की भूमिका को लेकर भी सवाल किए जा रहे हैं कि क्या संघ योगी का अपना स्वाभाविक प्रतिनिधि नहीं मानता? नहीं तो क्या वजह थी कि उप चुनावों से ऐन पहले जब संघ के नंबर तीन दत्तात्रेय होसबोले लखनऊ पहुंचे थे, तो उन्होंने योगी और उनके डिप्टी केशव प्रसाद मौर्य की उपस्थिति में संघ कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे उप चुनावों से ज्यादा 2019 के चुनावों की तैयारियों में अभी से जुट जाएं। इस बैठक में यूपी भाजपा चीफ महेंद्र नाथ पांडेय और प्रभारी सुनील बंसल भी मौजूद बताए जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि योगी कई बार अपने करीबियों से इस बात का जिक्र कर चुके हैं कि उन्हें शासन चलाने में राज्य की ब्यूरोक्रेसी का इतना साथ नहीं मिल पा रहा है, योगी का तो यहां तक मानना है कि राज्य के कई अफसर सीधे पीएमओ से जुड़े हैं और वहीं से निर्देश लेना पसंद करते हैं। क्या यही वजह नहीं है कि योगी ने शनिवार को अपने 37 आईएएस अफसरों के आनन-फानन में तबादले कर दिए। वहीं दबे-छुपे स्वरों में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी योगी के ’कॉर्डिनेशन और कम्यूनिकेशंस’ में कमी की बात मानता है। वक्त-वक्त की बात है त्रिपुरा में योगी पार्टी के स्टार प्रचारक थे, अब उनकी चमक को अपनों की नज़र लग गई है।
Posted on 19 March 2018 by admin
अब अहम बात यह कि गोरखपुर में योगी का रथ आखिरकार सियासी कीचड़ में धंस कैसे गया? सूत्र बताते हैं कि योगी ने अपने पार्टी अध्यक्ष के समक्ष तीन संभावित प्रत्याशियों के नाम प्रस्तुत किए थे और ये तीनों का जुड़ाव भी किंचित गोरखनाथ पीठ से था। पर टिकट मिला एक ऐसे चेहरे को जो कहीं न कहीं योगी विरोधियों में शुमार होते थे क्योंकि उपेंद्र शुक्ला केंद्र में मंत्री शिव प्रताप शुक्ला के खासमखास बताए जाते हैं और शिव प्रताप व योगी आदित्यनाथ में छत्तीस का आंकड़ा तो जग जाहिर है। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि योगी उपेंद्र शुक्ला की भगवा उम्मीदवारी को मन से स्वीकार ही न कर पाए हों। गोरखपुर व फूलपुर की हार के बाद पार्टी के एक तबके में यह फुसफुसाहट तेज हो गई है कि इस हार के बाद राज करने की योगी की ’मोरल ऑथरिटी’ खत्म हो गई है, सो ऐसे लोग अब अंदर ही अंदर एक अन्य डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा का नाम आगे कर रहे हैं, जिनका अक्स बहुत हद तक किसी खट्टर, रावत या दास से मेल खाता है। सीएम पद पर पहले से ही अपनी दावेदारी पेश करने वाले केशव प्रसाद मौर्य की भी ’मोरल ऑथरिटी’ सवालों के घेरे में हैं, जो दबे छुपे अपने समर्थकों से यह कहते सुने गए हैं कि ’फूलपुर में पार्टी ने उम्मीदवार देने में गलती कर दी, अगर उनके कहने से यहां से उनकी धर्मपत्नी को मैदान में उतारा जाता तो चुनावी नतीजे कुछ और होते?
Posted on 12 March 2018 by admin
इस दफे जब होली पर पूरा यादव कुनबा जुटा था तो अखिलेश और शिवपाल के बीच मध्यस्थता की बागडोर स्वयं नेताजी ने संभाल रखी थी। पिता मुलायम ने बेहद नरमी से पुत्र अखिलेश को समझाया कि ’क्यों नहीं इस बार शिवपाल को राज्यसभा में दिल्ली भेज देते हैं, ये दिल्ली में हमारे ’प्वाइंट मैन’ रहेंगे और बाकी दलों के साथ भी समन्वय का काम देखेंगे।’ पिता चाहते थे कि पुत्र के लिए यूपी की राजनीति किंचित कंटक मुक्त हो जाए, कम से कम परिवार के अंदर से तो विरोध के तेवर मद्दिम पड़ें। इस बात पर शिवपाल ने भी रजामंदी दे दी, पर अखिलेश थे कि आखिरी क्षणों तक नहीं माने, उन्होंने अपने पिता से दो टूक कह दिया-’मैं जानता हूं कि आप लोग ऐसा क्यों करना चाह रहे हैं, आप दिल्ली में बैठे चाचा रामगोपाल के पर कतरना चाहते हैं।’ पुत्र की इस बात ने पिता को भी आहत कर दिया, दिल टूटा तो टूटा, आगे के संवाद सूत्र भी टूट गए, मुलायम ने बेहद तल्खी से कहा-’मुझसे ज्यादा तुम रामगोपाल को पसंद करते हो, तुम्हें सीएम बनवाया मैंने और तवज्जो रामगोपाल को देते हो?’ नेताजी ने असहज से पसरे उन सन्नाटों को रिश्तों के बीच एक लिबास बनाकर ओढ़ लिया है, परिवार में तनातनी आगे भी जारी रह सकती है।
Posted on 12 March 2018 by admin
दत्तात्रेय होसबोले अब संघ और भाजपा के तारतम्य को बेहतर बनाने में जुट गए हैं, पर इसमें पेंचोखम बस एक ही है कि होसबोले की पटरी भाजपा में अगर किसी से सबसे ज्यादा बैठती है तो वे स्वयं नरेंद्र मोदी हैं। मोदी के पक्ष में संघ के अंदर होसबोले नए तर्क गढ़ते हैं और हमेशा से उन्हें फ्री-हेंड देने की वकालत करते हैं। अब भाजपा व संघ के रिश्तों में बेहद अहम भूमिका निभाने वाले संगठन महामंत्री रामलाल के भाग्य का फैसला भी शीघ्र होने वाला है। रामलाल की जगह लेने के लिए होसबोले एक युवा चेहरे सुनील अंबेकर को आगे करना चाहते हैं, जो संघ की ओर से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिशद के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं। संघ भाजपा के युवा मोर्चे को भी बस एक दिखावटी संगठन मानता हैं, जिसके बारे में संघ की धारणा है कि युवा मोर्चा महज़ एक सजावटी संगठन है, जमीनी स्तर पर इसका कोई खास असर नहीं है, छात्रों और युवाओं के बीच तो सबसे ज्यादा कार्य एबीवीपी ही करता है, ऐसे में भाजपा की ओर से एक विचार निकल कर सामने आया कि फिर क्यों नहीं युवा मोर्चा और एबीवीपी का मर्ज कर दिया जाए, पर संघ इस राय से इत्तफाक नहीं रखता है, उसकी सोच है युवा मोर्चा को अपना काम करना चाहिए और एबीवीपी को अपना।
Posted on 12 March 2018 by admin
इस 1 मार्च को नीतीश कुमार का बर्थडे था, ट्विटर पर उनको बधाई देने वालों का तांता लगा था। भाजपा की ओर से मोदी, जेटली समेत कई बड़े नेताओं ने उन्हें ट्वीट कर बधाईयां दीं। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने मसलन फड़नवीस, राजे और सोनोवाल ने भी ट्वीट कर नीतीश को जन्मदिन की बधाईयां दीं। पर नीतीश की एक अहम दोस्त ममता का कोई बधाई संदेश उन्हें नहीं पहुंचा। इत्तफाक से 1 मार्च को ही द्रमुक नेता स्टालिन और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का जन्मदिन आता है, ममता ने जन्मदिन की बधाई के लिए ट्वीट तो जरूर किए पर वे ट्वीट नीतीश के बजाए बुद्धदेव व स्टालिन के लिए थे। राहुल गांधी ने भी स्टालिन को जन्मदिन की बधाई देने के लिए ट्वीट किए, पर वे भी नीतीश को भूल गए।
Posted on 12 March 2018 by admin
एनडीए के कुनबे में दरार दिखने लगी है, टीडीपी ने भले ही एनडीए न छोड़ा हो पर वह एनडीए सरकार का साथ छोड़ गई है। शिवसेना तो संसद के अंदर और बाहर विपक्ष के सुर में सुर मिलाती दिखती है। ताज़ा-ताज़ा बागी रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान दिख रहे हैं, जो अभी से 2019 के चुनावों की तैयारियों में जुट गए हैं, पर चिराग को लगता है कि भाजपा लोक जनशक्ति पार्टी के लिए बेहद कम सीटें छोड़ने का इरादा रखती है, चुनांचे उन्होंने भी अभी से अपने तेवर बदल लिए हैं। यूपी में ओम प्रकाश राजभर एनडीए का साथ छोड़ने के लिए एकदम से तैयार बैठे हैं। तो वहीं बिहार में उपेंद्र कुशवाहा ने भी अपने तेवर बदल लिए हैं, सूत्र बताते हैं कि कुशवाहा की लालू की आरजेडी से बात हो चुकी है। लालू की पार्टी कुशवाहा के लिए विधानसभा की 40 सीटें छोड़ने को राजी हो गई है। अपने बिखरते कुनबे को बचाने के लिए शाह की क्या तैयारी है, जब वे त्रिपुरा के जश्न से बाहर निकलेंगे तो इसका भी पता चल जाएगा।