Posted on 26 September 2016 by admin
एक प्रमुख हिंदी भाषी राज्य के भगवा मुख्यमंत्री जो कभी अडवानी के अनन्य भक्तों में शुमार होते थे, इन दिनों राग मोदी गाने में अपनी पारंगता सिद्ध करने में जुटे हैं, पिछले दिनों सीएम साहब दिल्ली आए तो वे पीएम से मिलना चाहते थे, उनसे कहा गया कि वे अमित शाह से मिल लें। अपने ही पार्टी अध्यक्ष से मिलने के लिए उन्हें दो दिन तक दिल्ली में इंतजार करना पड़ा। जब राष्ट्रीय अध्यक्ष से उनकी मुलाकात हुई तो उन्होंने सर्वशक्तिमान शाह से यूं ही पूछ लिया कि ’मेरे लायक कोई सेवा हो तो बताइए?’ उनसे कहा गया कि वक्त आने पर उन्हें बता दिया जाएगा। 4-5 दिनों बाद उन्हें दिल्ली से फोन गया और उनसे कहा गया कि ’ऑपरेशन अरूणाचल’ में उनकी मदद की जरूरत है। आनन-फानन में मदद का इंतजाम हुआ और एक बड़ी मदद के बाद सीएम साहब एक छोटे से आश्वासन की बाट जोह रहे हैं। सीबीआई की तलवार की धार की चमक पैनी से पैनी हुई जाती है और सीएम साहब दिल्ली के सन्नाटों से अपने लिए सांत्वना के दो बोल इकट्ठा करने में जुटे हैं।
Posted on 26 September 2016 by admin
दक्षिण भारतीय फिल्मों की एक प्रमुख अभिनेत्री रमैया (दिव्या स्पंदना) जिन्होंने 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था और मात्र 15-17 हजार वोटों से चुनाव हार गई थीं। पिछले काफी समय से राहुल गांधी से मिलने का समय मांग रही थी। पर आर जी के ऑफिस से उन्हें कोई जवाब नहीं मिल रहा था। निराश होकर उसने एक स्थानीय समाचार पत्र में बयान दिया कि-’भले ही राज्य में हमारी पार्टी की सरकार है, पर हमारे समाज (वोकालिग्गा) के लोगों के साथ न्याय नहीं हो रहा है।’ इस बयान के आते ही कर्नाटक में वोकाल्लिगा के सबसे बड़े नेता एचडी देवेगौड़ा सीधे रमैया के घर चले गए और उन्हें अपनी पार्टी जेडीएस में शामिल होने का न्यौता दे आए। रमैया ने भी देवेगौड़ा की पार्टी को ज्वॉइन करने का पूरा मन बना लिया था कि इस बात की भनक प्रियंका गांधी को लगी, प्रियंका ने फौरन रमैया को फोन लगाया और कहा-’राहुल जी सचमुच यूपी चुनाव में व्यस्त हैं, वे आपसे मिलना भी चाहते हैं, पर इसमें वक्त लग सकता है, सो आप दिल्ली आकर फिलहाल मुझसे मिल लो।’ प्रियंका के दो बोल ने चमत्कारी असर दिखाया व रमैया ने कांग्रेस छोड़ने का इरादा बदल दिया, उन्होंने देवेगौड़ा को फोन लगाकर उनसे कहा-’आप मेरे पिता तुल्य हैं, पर मैं आपकी पार्टी ज्वॉइन करने का निर्णय 2019 में करूंगी।’
Posted on 26 September 2016 by admin
कांग्रेस आंध्र प्रदेश और झारखंड में एक बड़ा सियासी दांव चलने का इरादा रखती है, इन दोनों राज्यों में कमान किसी बाहरी व्यक्ति को सौंपी जा सकती है, क्योंकि इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस का संगठन न केवल अंदरूनी कलह से जूझ रहा है, बल्कि पार्टी भी उस कदर ’एक्टिव मोड’ में नज़र नहीं आती है। आंध्र में कांग्रेस एक्टर चिरंजीवी के भाई पवन कल्याण पर दांव लगाना चाहती है, जो कापू जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं, इस जाति का आंध्र में 15-17 फीसदी वोट शेयर है। दूसरा प्रदेश झारखंड है जहां कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के साथ बाबूलाल मरांडी की बातचीत अंतिम दौर में है। सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस ने मरांडी से साफ कर दिया है कि अगर वे अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर देते हैं तो मरांडी को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बना कर बतौर सीएम प्रोजेक्ट किया जा सकता है। पर कांग्रेस के अंदर ही इस बात का विरोध शुरू हो गया है, झारखंड कांग्रेस के कई कद्दावर नेता मसलन सुबोध कांत सहाय, फुरकान अंसारी, राजेंद्र सिंह और अजय कुमार अपनी पार्टी की इस राय से सहमत नहीं हैं, इनका कहना है कि अगर कांग्रेस सब कुछ बाबूलाल को ही दे देगी तो, फिर पार्टी के पुराने नेताओं का भविश्य क्या रह जाएगा? चुनांचे ये नेतागण राग जेएमएम अलापने में जुट गए हैं।
Posted on 26 September 2016 by admin
अपने राजनैतिक भविष्य को लेकर नवजोत सिंह सिद्धू की चिंता सहज समझी जा सकती है। भाजपा छोड़ने के बाद उनकी आम आदमी पार्टी के साथ बात नहीं बनी, लगे हाथ वे कांग्रेस से भी निरंतर संपर्क में थे। सूत्र बताते हैं कि उन्होंने कांग्रेस से अपने लोगों के लिए 22 सीटों की मांग कर डाली थी। जाहिर तौर पर कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं थी। भाजपा से जुड़े विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि पिछले कुछ दिनों में सिद्धू ने भाजपा के कम से कम 3 शीर्ष नेताओं से मुलाकात की है। इसमें वेंकैया नायडू व नितिन गडकरी भी शामिल हैं। सूत्रों का दावा है कि गडकरी से सिद्धू उनके दिल्ली स्थित आवास पर देर रात मिले और मुलाकात में भाजपा को अपनी ’मां’ बताया। सियासत के दस्तूर भी निराले हैं, समय, काल व जरूरतों के हिसाब से रिष्ते तो बदल ही जाते हैं।
Posted on 18 September 2016 by admin
किसी को कानों कान खबर नहीं हुई, प्रधानमंत्री मोदी के बुलावे पर गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल यूं अचानक पिछले शनिवार को एक विशेष चार्टर्ड विमान से दिल्ली पधारीं। विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि आनंदीबेन और प्रधानमंत्री के बीच यह वन- टू-वन मुलाकात तकरीबन एक घंटे तक चली। सूत्र बताते हैं कि इस मुलाकात में प्रधानमंत्री का आग्रह इस बात को लेकर कहीं ज्यादा था कि अमित शाह की पिछले दिनों हुई पाटीदार रैली में किन लोगों ने हंगामा किया था। सियासत की नब्ज़ बखूबी समझने वाले प्रधानमंत्री के पास इस बाबत आईबी और राज्य सीआईडी की गुप्त रिपोर्ट पहले ही पहुंच चुकी थी। गुजरात में आसन्न विधानसभा चुनाव की आहट को भांपते और यह समझते हुए कि भगवा पार्टी के लिए इस बार कांग्रेस और आप की चुनौती किंचित ज्यादा गंभीर होगी, पीएम गुजरात भाजपा के किसी गुट को अभी स्पष्ट नहीं करना चाहते। चुनांचे आनंदीबेन के समक्ष एक नया प्रस्ताव रखा गया। सूत्रों पर अगर यकीन करें तो देश के अगले उपराष्ट्रपति पद के लिए भी आनंदीबेन की दावेदारी हो सकती है। हालांकि भाजपा सिरमौर अमित शाह आनंदीबेन को किसी राज्य का गवर्नर नियुक्त कर उनकी सियासी पारी को विराम देना चाहते हैं, पर इसके लिए आनंदीबेन तैयार नहीं बताई जाती हैं, सो पीएम की ओर से एक नायाब आइडिया उछाला गया है, आमतौर पर पीएम का दांव इतनी आसानी से कभी खाली नहीं जाता।
Posted on 18 September 2016 by admin
कभी छोटे परदे पर बेरोक टोक राज करने वाली स्मृति ईरानी ने सत्ता की सवारी गांठने में भी महारथ हासिल कर ली है। अपने अचूक सियासी दांव से विरोधियों को पल भर में चित्त करने का हौसला रखने वाली स्मृति ने राजस्थान के अलवर के एक कार्यक्रम में बकायदा इसे सिद्ध करके दिखा दिया। अलवर के उसी कार्यक्रम में स्मृति मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित थीं, पर किसी कारणवश अलवर के स्थानीय भाजपा सांसद कांतिलाल भूरिया का नाम उस आमंत्रण पत्र में छपने से रह गया। भूरिया को उस कार्यक्रम में आमंत्रित भी नहीं किया गया था। लेकिन भूरिया जी कार्यक्रम में आए और माइक थामकर बाकायदा उन्होंने आयोजकों को कोसना शुरू कर दिया कि नए लोग आ गये हैं, जिन्हें इतनी भी औपचारिकताओं का निर्वहन करना नहीं आता कि स्थानीय सांसद का नाम भी कार्ड में छपना चाहिए। इसके बाद बोलने की बारी स्मृति की थी। उन्होंने अपनी अदभुत वाक् कला से सचमुच ही समां बांध दिया। बकौल स्मृति- “कांतिलाल जी मेरे बड़े भाई हैं, उन्होंने उत्तेजना में जो कुछ भी कहा, वे नहीं जानते थे कि उनके बाद मैं बोलने वाली हूं। रक्षाबंधन पर तो भाई बहन को कुछ देता है, पर यहां तो भाई इनविटेशन (आमंत्रण) मांग रहा है। प्रोटोकोल में लोकल एमपी को सिर्फ सूचित करने की परंपरा है, उन्हें बुलाया ही जाए, ऐसा कहीं नहीं लिखा है, और हर कार्यक्रम के कार्ड पर लोकल एमपी का नाम छपा हो, यह भी जरूरी नहीं। कहना न होगा, इसके बाद के स्मृतिमय माहौल में भूरिया जी के चेहरे की कांति मलिन पड़ चुकी थी।
Posted on 18 September 2016 by admin
यूपी के सबसे बड़े यदुवंशी परिवार की लड़ाई सड़कों पर उतर आई है, पर यादव परिवार को बेहद नज़दीक से जानने वाले लोग इसे बड़ा सियासी ड्रामा करार दे रहे हैं। इनका मानना है कि मंत्रिमंडल से गायत्री प्रजापति की छुट्टी फिर वापसी, शिवपाल यादव से महत्त्वपूर्ण मंत्रालय वापिस लेना और फिर ये मंत्रालय सौंप दिया जाना न सिर्फ एक सियासी बड़ा ड्रामा है बल्कि अखिलेश के ’इमेज मेकओवर’ का एक अहम हिस्सा है। यह सारा ड्रामा एक मीडिया मैनेजमेंट कंपनी के कहने पर हुआ है, जो इन दिनों अखिलेश की बतौर एक ब्रांड स्थापित करने में जुटी है। पर जहां तक यूपी के चीफ सेक्रेटरी दीपक सिंघल की रुखसती का मामला है इसको अंजाम देने के पीछे स्वयं राज्य के युवा मुख्यमंत्री हैं। सिंघल यूपी के एक बड़े अखबार समूह के मालिक के दामाद हैं और उन्हें अखिलेश की मर्जी के बगैर शिवपाल लेकर आए थे, पर अखिलेश ने सेवा निवृत हो चुके आलोक रंजन को अपना सलाहकार रख लिया, क्योंकि सिंघल के मुकाबले रंजन की छवि एक ईमानदार अफसर की रही है और अखिलेश रंजन की राय को बेहद अहमियत देते रहे हैं। पिछले दिनों लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में आलोक रंजन अखिलेश के बगल में बैठकर उन्हें कुछ सुझाव दे रहे थे। सूत्र बताते हैं कि वहां अचानक से सिंघल आ गए और उन्होंने रंजन को लगभग झिड़कने वाले अंदाज में कह डाला-’सलाह बाद में दीजिएगा, पहले कुछ सरकारी कामकाज हो जाने दीजिए।’ अखिलेश समेत वहां उपस्थित लोग भी इस बात से सन्न रह गए। लिहाजा अखिलेश ने भी तभी ठान लिया था कि उन्हें सिंघल को शिवपाल व पिता की परवाह किए बगैर बाहर का दरवाजा दिखाना है और उन्होंने वैसा ही किया।
Posted on 18 September 2016 by admin
कर्नल देवेंद्र सहरावत ने आम आदमी पार्टी से निकाले जाने की अगली सुबह पहला काम क्या किया? सूत्रों की मानें तो उन्होंने भूतल परिवहन व जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी के घर पर उनके साथ सुबह का नाश्ता किया। दिल्ली के सियासी हालात को लेकर गंभीर राजनैतिक मंत्रणा हुई और फिर कर्नल साहब नितिन गडकरी की गाड़ी में साथ बैठकर प्रस्तावित पेरीफेरल एक्सप्रेसवे के मुआयने पर निकल गए, मंत्री जी के साथ प्रोजेक्ट का जायजा लिया और साथ गए अधिकारियों की क्लास भी ली। जाहिर है वे एक नए राजनैतिक पाठ का ककहरा कंठस्थ करने में जुटे हैं, उनके नए शिक्षक संघ के रंग में रंगे हुए हैं, फिज़ाओं में एक नई सियासी गंध की बौराहट है और नए विचारों के अंकुर बस फूटने ही वाले हैं।
Posted on 18 September 2016 by admin
पंजाब के प्रभारी संजय सिंह पर आरोप-प्रत्यारोप का बाजार गर्म है, हर ओर चर्चा है कि उनकी सीडी भी बना ली गयी है। इन चर्चाओं को हवा देते हुए अरविन्द केजरीवाल ने अपनी मोगा रैली में सार्वजनिक रूप से कह ही दिया कि आप नेताओं की 63 फर्जी सीडी बनायी गयी हैं। संजय के चिंतित पिता ने फोन करके संजय से पूछ ही लिया कि उन्हें किसी तरह की मदद की जरुरत तो नहीं? संजय अभी इंकार करके हटे ही थे कि सूत्र बताते हैं कि उनके ससुराल से फोन आ गया, उनके सालों का, जो जानना चाहते थे कि क्या वे दिल्ली आकर उनके बचाव में प्रेस कांफ्रेंस करें? हैरान-परेशान संजय सिंह ने उन्हें डपटते हुए कहा-’तुम्हारी बहन ने मुझ पर कभी शक नहीं किया, कभी कोई सफाई नहीं मांगी, अब तुम लोग इस मामले को क्यों तूल देना चाहते हो?’ फिर जाकर यह बात आई गई हो गई।
Posted on 18 September 2016 by admin
तमाम सियासी विरोधाभासों से जूझते हुए भी आम आदमी पार्टी का पंजाब में जोर दिख रहा है इसकी एक झलक केजरीवाल की मोगा रैली में देखने को मिली, जहां राज्य सरकार व प्रशासन की तमाम सख्तियों के बावजूद लाखों की भीड़ जुटी। जबकि उसी रोज़ कांग्रेस ने भी कार और बाइक रैली का आयोजन किया था, पर कांग्रेस की रैली में गिनती के ही लोग जुटे। बादल परिवार ने तो उन स्कूलों पर बाकायदा नकेल कस दी जिन्होंने मना करने के बावजूद अपनी स्कूल बसें रैली में भीड़ जुटाने के लिए दी थीं। जब मोगा रैली कवर कर दिल्ली के पत्रकारों का एक दल वापिस लौट रहा था तो उन्हें लुधियाना के पास 30-40 मोटरसाइकिल सवारों का एक जत्था मिला, जिन्होंने अपनी बाइक पर कांग्रेस का झंडा लगाया हुआ था। तो पता चला कि ये बाइक सवार पूर्व शिक्षा मंत्री दर्शन सिंह बरार के समर्थक हैं। पत्रकारों ने इनसे जानना चाहा कि इस बार पंजाब में क्या होगा? तो इन्होंने समवेत स्वरों में जवाब दिया-अबकी बार यहां कांग्रेस की सरकार बनेगी। फिर सवाल हुए-’ बरार साहब पिछले दो बार से चुनाव हार क्यों रहे हैं?’ पता चला कि बादल परिवार चतुराई से उनके समक्ष किसी न किसी कांग्रेसी बागी को खड़ा कर देता था, पर इस बार ऐसा नहीं होगा, क्योंकि बादल अपनी ज़मीन बचाने की चिंता में जुटे हुए हैं। फिर इन नौजवानों की ओर से पत्रकारों से आग्रह किया गया कि अगर ये कुछ देर और रुक जाए, कुछ पार्टी- षार्टी हो जाए। एक पत्रकार ने जानना चाहा-’कौन दे रहा है भाई पार्टी?’ ’बरार साहब और कौन?’ नौजवानों के बीच से जवाब आया।