Posted on 28 January 2018 by admin
क्या 2019 के आम चुनाव अपने निर्धारित कार्यकाल से पहले हो सकते हैं? कयास इसी बात के लगाए जा रहे है कि मोदी-शाह की जोड़ी अगला आम चुनाम समय से पूर्व कराने के लिए कृत संकल्प जान पड़ती है। जनवरी 2019 में राजस्थान व मध्यप्रदेश की राज्य सरकारों का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। कयास इस बात के भी लगाए जा रहे हैं कि सितंबर माह में (चूंकि अक्टूबर में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा रिटायर होने वाले हैं) उसके बाद राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला आने वाला है। शायद यही वजह है कि रामरथ की भावनाओं पर सवार मोदी-शाह एक बार फिर से 2019 में सत्ता में आने की रणनीतियां बुन रहे हैं।
Posted on 24 January 2018 by admin
गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल से किया गया वादा भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को निभाना ही पड़ा, अंततः उन्हें मध्यप्रदेश का नया गवर्नर नियुक्त करने का एलान हो चुका है। इससे पहले आनंदी बेन और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के दरम्यान शह-मात काएक लंबा दौर चालू था। गुजरात चुनाव में टिकट वितरण से लेकर सरकार के गठन व मंत्रालय के बंटवारे तक में आंनदी बेन की नाराजगी सिर चढ़कर बोलती रही। पटेल समुदाय से ताल्लुक रखने वाले और आनंदी बेन के करीबियों में शुमार होने वाले नितिन पटेल ने जब खुद को एक कम महत्व वाला मंत्रालय दिए जाने पर बगावत का झंडा बुलंद कर दिया तो उन्हें जाहिर तौर पर आनंदी बेन की सरपरस्ती हासिल हुई। सबसे पहले हार्दिक पटेल का फोन नितिन पटेल के पास पहुंचा तो नितिन ने कथित तौर पर व्हाटसअप कॉल करने को कहा, इस पर हार्दिक ने कहा कि इसमें छिपाने वाली कोई बात नहीं, दुनिया (मोदी-शाह) को जानना चाहिए कि इतनी विपरीत परिस्थितियों के बाद भी हम पटेल एक हैं। सूत्र बताते हैं कि इसके बाद आनंदी बेन के घर पटेल विधायकों की एक अहम बैठक हुई, जिस बैठक में 17 पटेल विधायकों की मौजूदगी बताई जाती है। कहते हैं इसके बाद शाह का आनंदी बेन को फोन गया कि- ‘आप ऐसा क्यों कर रही हैं?’ सूत्र बताते हैं कि इस पर आनंदी ने कहा- ‘आप अपने वादे पर टिके नहीं रहे, आप पटेल विरोधी हैं। आपने मेरे बेटे को टिकट नहीं दी, मेरी सीट पर मेरे विरोधी को टिकट दिया।’ कहते हैं इसके बाद कमान स्वयं मोदी को संभालनी पड़ी, तब जाकर आनंदी बेन ने हथियार डाले, जिसका इनाम अब जाकर उन्हें मिला है।
Posted on 24 January 2018 by admin
राजस्थान के दो लोकसभा उपचुनाव अजमेर और अलवर के लिए कांग्रेस अपनी पूरी ताकत झोंक देना चाहती है। अपनी नयी ताजपोशी से उत्साहित राहुल गांधी भी इन दोनों उपचुनावों को लेकर खासे सक्रिय हैं। शुरुआत से ही राहुल चाहते थे कि अजमेर से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट मैदान में उतरे जहां उनकी टक्कर अजमेर के दिवंगत सांसद सांवर लाल जाट के पुत्र से होनी थी, पर मामले की नाजुकता को भांपते हुए सचिन ने मैदान से हट जाना ही बेहतर समझा, उन्हें कहीं ना कहीं ऐसा लग रहा था कि यह पूरा उपचुनाव सहानुभूति की लहर पर जीता-हारा जाएगा। सचिन ने यह कहते हुए किनारा कर लिया कि वे अजमेर और अलवर दोनों ही जगह कांग्रेस को जिताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाएंगे, वहीं सचिन के करीबी खुलासा करते हैं कि उन्हें डर लग रहा था कि वे यहां यानि अजमेर से चुनाव हार जाएंगे और ऐसा हुआ तो फिर राजस्थान का अगला सीएम बनने के उनके मंसूबे पर ग्रहण लग सकता है। वहीं दूसरी ओर राहुल करीबी भंवर जितेंद्र सिंह ने भी चुनावी जंग में उतरने से मना कर दिया, क्योंकि अलवर से भाजपा ने यहां के निवर्तमान विधायक और वसुंधरा सरकार में मंत्री जसवंत यादव को मैदान में उतारा है, एक यादव बहुल्य सीट होने की वजह से भंवर जितेंद्र सिंह को लगा कि उन्हें इस उप चुनाव में मुश्किल हो सकती है तो उन्होंने 71 वर्षीय करण सिंह यादव का नाम आगे कर दिया और खुद पीछे हो गए।
Posted on 24 January 2018 by admin
मीडिया के समक्ष हैरान-परेशान व खस्तेहाल दिख रहे विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया पिछले दो-ढाई वर्षों से लगातार अपने मंगल दोष निवारण के उपायों में जुटे दिखे। दिल्ली के वसंत विहार इलाके के लोगों ने पिछले दो-ढाई वर्षों से लगातार तोगड़िया को सुबह साढ़े पांच बजे नियम से हर मंगलवार व शनिवार मलाई मंदिर में उन्हें कार्तिक जी के दर्शन को जाते देखा है। पहले वे सीढ़ियां चढ़ कर मुख्य मंदिर में कार्तिक जी के दर्शन करते और उसके बाद सीढ़ियां उतर नवग्रह की नौ बार नियम से परिक्रमा करते थे। तोगड़िया जब भी मंदिर आते थे तो उनके पास सुरक्षा का पूरा तामझाम होता था। पर दिसंबर के आखिरी सप्ताह से तोगड़िया अचानक से रडार से गायब हो गए। सबसे पहले मलाई मंदिर पहुंचने वाले तोगड़िया की लगातार अनुपस्थिति कई सवालों को जन्म दे रही थी। इसके बाद जो कुछ हुआ उससे देश वाकिफ है और कहा यह जा रहा है कि तोगड़िया व संजय जोशी जैसे जिन लोगों ने इस गुजरात चुनाव में भाजपा का अहित किया है, उन्हे सबक सिखाने की पूरी तैयारी है।
Posted on 24 January 2018 by admin
सूत्र बताते हैं कि पिछले पखवाड़े विहिप कार्यकारिणी की एक अहम बैठक आहूत थी, जिसमें संघ के पर्यवेक्षक के तौर पर संघ के नंबर दो भैय्याजी जोशी भी मौजूद थे। सूत्र बताते है कि इस बैठक में तय हुआ कि अब जरुरी हो गया है कि विहिप को एक नया चेहरा-मोहरा दिया जाए, चुनांचे विहिप के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष राघव रेड्डी और इसके ओवरसीज मामलों के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया जो लंबे समय से संगठन में कुंडली मारे बैठे हैं, उनकी जगह नए लोगों को संगठन में लाया जाए। कहते हैं कि इस प्रस्ताव का तोगड़िया की ओर से तीव्र विरोध सामने आया, तोगड़िया का कहना था कि ऐसे मनमाने तरीके से किसी को हटाया नहीं जा सकता, अगर ऐसा है तो फिर संगठन के चुनाव करवाने चाहिए। कहते है इस बात का संघ ने बहुत बुरा माना और जब इन दिनों इलाहाबाद में विश्व हिंदू परिषद का संत सम्मेलन आहूत है, उसमें विहिप के वरिष्ठ सदस्य स्वामी चिन्मयानन्द की ओर से पत्रकारों को यह संकेत मिल गए हैं कि प्रवीण तोगड़िया समेत कुछ अन्य नेताओं की विहिप से छुट्टी कर दी गई है। मुमकिन है कि आने वाले दिनों में आपको विहिप दो खेमों में बंटा हुआ दिखाई दे।
Posted on 24 January 2018 by admin
इस 27 जनवरी को जयपुर के लिटररी फेस्टिवल में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की आत्मकथा “सिटिजन दिल्लीः माइ टाइम, माइ लाइफ” रिलीज होने जा रही है। इस पुस्तक को ब्लूम्सबेरी ने प्रकाशित किया है। अभी इस आत्मकथा का विमोचन नहीं हुआ है और अभी से इस पुस्तक को लेकर गांधी परिवार की घिग्गी बंध गई है। सूत्र बताते हैं कि इस आत्मकथा में शीला दीक्षित ने कई बड़े रहस्यों से पर्दा उठाया है, खासकर कॉमनवेल्थ घोटाला को लेकर भी बड़े विस्तार से बताया है। और जानने वाले जानते हैं कि कॉमनवेल्थ घोटाले के तार कथित तौर पर राबर्ट वाड्रा यानी गांधी परिवार से जुड़े बताए जाते हैं। कांग्रेस अभी से डैमेज कंट्रोल के प्रयासों में जुट गई है। पार्टी के कम्युनिकेशन विभाग के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने दिल्ली के कई सीनियर कांग्रेसी नेताओं को अपने घर भोजन पर बुलाया और इस पुस्तक के रहस्यों से पर्दा उठने के बाद की स्थिति को हैंडिल करने के सुझाव मांगे। एक सुझाव तो यह भी आया कि श्रीमती दीक्षित से फिलहाल पुस्तक का विमोचन रोकने को कहा जाए, पर इतना तो सब जानते हैं कि अब पानी सिर से उपर निकल चुका है।
Posted on 24 January 2018 by admin
71 वर्षीय राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी में बगावत के सुर सुनाई देने लगे हैं, पार्टी के एक तबके का आरोप है लोक जनशक्ति पासवान परिवार पार्टी बनकर रह गई है। पासवान केंद्र में मंत्री हैं उनके छोटे भाई पशुपति कुमार पारस बिहार के नीतीश सरकार में मंत्री हैं। रामविलास के पुत्र चिराग पासवान बिहार के जमुई से पार्टी सांसद हैं और अब रामविलास ने अपने एक और भाई रामचंद्र पासवान जो लोजपा के सांसद भी है, उनके पुत्र प्रिंस राज को लोजपा की छात्र ईकाई का प्रेसिडेंट बना दिया है। इससे पूर्व प्रिंस राज 2015 में बिहार विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं, जहां उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।
Posted on 29 December 2017 by admin
प्रेम कुमार धूमल भले ही इस दफे सुजानपुर से विधानसभा का चुनाव हार गए हों पर हिमाचल का अगला मुख्यमंत्री घोषित होने के आखिरी क्षणों तक उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, अपने लिए प्रयास करते रहे और वे मोदी व शाह से भी सीधे अपनी मन की बात बताते रहे। सूत्र बताते हैं कि दरअसल, धूमल को इस बार कहीं गहरे इल्म हो चुका था कि अगर उन्होंने इतनी आसानी से आत्मसमर्पण कर दिया तो उनके पुत्र अनुराग सिंह ठाकुर के राजनैतिक भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा। वैसे भी धूमल कैंप के लिए सुजानपुर से उनकी हार अप्रत्याशित थी, क्योंकि इस चुनावी महासमर में धूमल को पटकनी देने वाले कांग्रेस के राजेंद्र राणा कभी धूमल के ही अनन्य भक्तों में शुमार होते थे। फिर राणा ने धीरे -धीरे अपने एनजीओ के मार्फत सुजानपुर के घर-घर में अपनी पैठ बना ली। महिलाओं व लड़कियों के बीच उनकी एनजीओ ने बड़े पैमाने पर वहां सिलाई मशीन वितरित की। गरीबों को पक्का घर बना कर दिए गए। धूमल के पक्ष में स्वयं मोदी ने चुनावी रैली की थी। वहीं धूमल के अपने हमीरपुर क्षेत्र में भाजपा 5 में से मात्र 3 सीटों पर ही जीत दर्ज करा सकी। दरअसल हमीरपुर की जनता को केंद्रनीत भाजपा सरकार का तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के यहां उनकी पुत्री के विवाह के ऐन रोज पुलिस भेजना पसंद नहीं आया। षायद यही वजह है कि वीरभद्र के पुत्र विक्रमादित्य पूरे चुनाव के दौरान हमीरपुर में ही डेरा डंडा जमाए रहें।
Posted on 29 December 2017 by admin
प्रेम कुमार धूमल भले ही इस दफे सुजानपुर से विधानसभा का चुनाव हार गए हों पर हिमाचल का अगला मुख्यमंत्री घोषित होने के आखिरी क्षणों तक उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, अपने लिए प्रयास करते रहे और वे मोदी व शाह से भी सीधे अपनी मन की बात बताते रहे। सूत्र बताते हैं कि दरअसल, धूमल को इस बार कहीं गहरे इल्म हो चुका था कि अगर उन्होंने इतनी आसानी से आत्मसमर्पण कर दिया तो उनके पुत्र अनुराग सिंह ठाकुर के राजनैतिक भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा। वैसे भी धूमल कैंप के लिए सुजानपुर से उनकी हार अप्रत्याशित थी, क्योंकि इस चुनावी महासमर में धूमल को पटकनी देने वाले कांग्रेस के राजेंद्र राणा कभी धूमल के ही अनन्य भक्तों में शुमार होते थे। फिर राणा ने धीरे -धीरे अपने एनजीओ के मार्फत सुजानपुर के घर-घर में अपनी पैठ बना ली। महिलाओं व लड़कियों के बीच उनकी एनजीओ ने बड़े पैमाने पर वहां सिलाई मशीन वितरित की। गरीबों को पक्का घर बना कर दिए गए। धूमल के पक्ष में स्वयं मोदी ने चुनावी रैली की थी। वहीं धूमल के अपने हमीरपुर क्षेत्र में भाजपा 5 में से मात्र 3 सीटों पर ही जीत दर्ज करा सकी। दरअसल हमीरपुर की जनता को केंद्रनीत भाजपा सरकार का तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के यहां उनकी पुत्री के विवाह के ऐन रोज पुलिस भेजना पसंद नहीं आया। षायद यही वजह है कि वीरभद्र के पुत्र विक्रमादित्य पूरे चुनाव के दौरान हमीरपुर में ही डेरा डंडा जमाए रहें।
Posted on 29 December 2017 by admin
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास की कार्यशैली से नाराज़ भाजपा के कोई 8 विधायक अपनी शिकायतों का पुलींदा लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिले। इन विधायकों की शिकायत थी कि राज्य में राजनैतिक इच्छाशक्ति का सर्वथा अभाव दिखता है और एक तरह से शासन की पूरी बागडोर राज्य की ब्यूरोक्रेसी के पास गिरवी है। इन विधायकों के तर्क थे कि राज्य में मुख्यमंत्री की लोकप्रियता में निरंतर गिरावट आ रही है, राज्य के ब्राह्मण और आदिवासी जनता में भाजपा को लेकर भयंकर नाराज़गी है। वैसे भी झारखंड में अभी बस वहां की मुख्य सचिव राजबाला वर्मा की तूती बोलती है जो इसी फरवरी माह में रिटायर हो रही हैं। पर रघुवर दास इस बात की कोशिशों में जुटे हैं कि किस प्रकार राजबाला वर्मा को एक्सटेंशन मिल सके। सूत्र बताते हैं कि शाह ने भाजपा विधायकों की बातों को ध्यानपूर्वक सुना और उन्हें चाय पिलाकर विदा कर दिया इस आश्वासन के साथ कि अब उन्हें रघुवर दास के रूख में बदलाव दिखेगा। अब सबको इस बदलाव का इंतजार है।