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डर स्मृति का

Posted on 16 April 2018 by admin

कर्नाटक में लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने का प्रस्ताव कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने केंद्र को भेज दिया था और अब इनका यही दांव मास्टर स्ट्रोक साबित हो रहा है। क्योंकि अभी पिछले दिनों लिंगायतों के 70 संगठनों ने मोदी व षाह को पत्र लिख कर सिद्दारमैया के इस प्रस्ताव पर तुरंत हामी भरने का अनुरोध किया है और इस पर विचार करने के लिए और अपनी स्वीकृति देने के लिए पीएम और भाजपा प्रेसिडंेट को बुधवार तक का समय दिया है, साथ ही उन्होंने धमकी भी दी है कि अगर इस बुधवार तक इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं दी जाती है तो लिंगायतों का वोट इस चुनाव में कांग्रेस के लिए होगा। वहीं भाजपा का तर्क है कि बासवन्ना हिंदू धर्म को मानने वाले थे, पर ये संगठन इसके लिए राजी नहीं।

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…और अंत में

Posted on 16 April 2018 by admin

कर्नाटक में लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने का प्रस्ताव कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने केंद्र को भेज दिया था और अब इनका यही दांव मास्टर स्ट्रोक साबित हो रहा है। क्योंकि अभी पिछले दिनों लिंगायतों के 70 संगठनों ने मोदी व षाह को पत्र लिख कर सिद्दारमैया के इस प्रस्ताव पर तुरंत हामी भरने का अनुरोध किया है और इस पर विचार करने के लिए और अपनी स्वीकृति देने के लिए पीएम और भाजपा प्रेसिडंेट को बुधवार तक का समय दिया है, साथ ही उन्होंने धमकी भी दी है कि अगर इस बुधवार तक इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं दी जाती है तो लिंगायतों का वोट इस चुनाव में कांग्रेस के लिए होगा। वहीं भाजपा का तर्क है कि बासवन्ना हिंदू धर्म को मानने वाले थे, पर ये संगठन इसके लिए राजी नहीं।

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नए अवतार में पीयूष

Posted on 02 April 2018 by admin

रेल मंत्री पीयूश गोयल की उम्मीदों की रेल चल निकली हैं, इन दिनों वे भाजपा अध्यक्ष अमित षाह के बेहद भरोसेमंदों में षुमार होने लगे हैं। सो, यूपी के उप चुनावों के नतीजों से फक्क हुई भाजपा ने कुम्हलाए कमल को नया स्पंदन देने की जिम्मेदारी गोयल के कंधों पर रखी, और इस राज्यसभा चुनाव में यूपी में भगवा कमल खिलाने की खातिर गोयल पखवाड़े पहले से लखनऊ में जमे बैठे थे। विपक्ष को चारो खाने चित्त करने के लिए एक चाक चौबंद व्यूह रचना रची गई, सबसे पहले वरीयता के क्रम में भगवा उम्मीदवारों को सजाया गया, मसलन अरूण जेटली को सबसे ऊपर रखा गया। जरूरी 37 की जगह, दो अतिरिक्त यानी 39 सीनियर विधायकों का एक गुलदस्ता तैयार हुआ, इस गुलदस्ते को मांजने-संवारने की महती जिम्मेदारी मंत्री सतीष म्हाना को सौंपी गई, इसी तरह 39-39 विधायकों के समूह पर नज़र रखने की जिम्मेदारी एक अदद मंत्री को सौंपी गई। चुनाव से ऐन पहले विधायकों से वोट देने की ’मॉक ड्रिल’ कराई गई। फर्स्ट टर्म एनडीए विधायकों को बकायदा ट्रेनिंग दी गई कि वे अपना वोट कैसे कास्ट करें और इस महती जिम्मेदारी को स्वयं पीयूश गोयल ने उठाया। गोयल अब वोट मैनेजमेंट में भी सिद्दहस्त हो चुके हैं, चुनांचे अनिल अग्रवाल की जीत पक्की करने के लिए तलवार की धार पर चलने की तरह था, सेकिंड प्रिफ्रेंस के 14 वोटों की उन्हें जरूरत थी, भाजपा के अपने 12 वोट बचे थे, जरूरत थी सिर्फ 2 वोट की, जब चुनाव के नतीजे आए तो अग्रवाल को निर्दलीय व अन्य उच्च जाति के विधायकों के 4 वोट मिल गए और उन्होंने मैदान मार लिया और पीयूश गोयल ने भी खुद को एक नवअवरित रणनीतिकार के तौर पर साबित कर दिया।

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पवार पर एतबार

Posted on 02 April 2018 by admin

तीसरे मोर्चे को एक नया चेहरा-मोहरा देने की गरज से बंगाल की उत्साही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिल्ली में थीं। उन्हें एनसीपी नेता षरद पवार से मिलना था, मिलने का वक्त तय हो चुका था कि ममता-षरद मुलाकात के ठीक ऐन पहले कांग्रेस के वरिश्ठ नेता गुलाम नबी आजाद आनन-फानन में पवार से मिलने एनसीपी के दफ्तर में पहुंचे। सूत्र बताते हैं कि आजाद ने पवार से गुजारिष की कि वे ममता को समझा दें कि उनसे मिलने के बाद ममता दीदी का मीडिया में जो बयान आए उससे कहीं ऐसा नहीं लगना चाहिए कि कांग्रेस विपक्षी एका की इस पहल से अलग-थलग है। पवार की सहमति हासिल करने के बाद आजाद वहां से चले गए। फिर दीदी वहां पहुंची और सियासत के उस्ताद बाजीगर पवार ने ममता को जाने क्या समझाया कि षाम की प्रेस-कांफ्रेंस में दीदी ने बेखटके कहा-’हम मिलकर लड़ेंगे।’ और इसके बाद दीदी ने सोनिया को फोन कर उनसे मिलने का समय मांगा और हंसी खुषी उनसे मिलने भी गईं।

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वेणु ने ऐसा क्या कहा?

Posted on 02 April 2018 by admin

इस मंगलवार को लोकसभा में कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल ने सदन में अन्नाद्रमुक के सदस्यों से जाने ऐसा क्या कह दिया कि नौबत मारपीट की आ पहुंची। हुआ कुछ ऐसा कि जब स्पीकर सुमित्रा महाजन ने अन्नाद्रमुक सदस्यों के वेल में आ जाने पर सदन स्थगित कर दिया तो सांसदगण एक-एक कर सदन से बाहर आने लगे। ठीक उसी वक्त सोनिया गांधी के पीछे बैठे वेणुगोपाल ने कथित तौर पर अन्नाद्रमुक सांसदों से तमिल में कुछ ऐसा कह दिया कि वे भड़क उठे और वे वेणुगोपाल की ओर लपके। यह तो षुक्र है कि सोनिया ने इस पूरे मामले की नजाकत को भांपते, फौरन अपनी जगह से उठ खड़ी हुईं और अपने दोनों हाथ उठाकर अन्नाद्रमुक सांसदों को रोकने में कामयाब हुईं, यह नजारा जैसे ही कांग्रेस के युवा सांसद को देखने को मिला, वे भागकर आए और वेणुगोपाल के इर्द-गिर्द एक घेरा बना लिया। चूंकि उस वक्त तक सदन स्थगित हो गया था, तो पत्रकार गैलरी भी खाली थी, एक उत्तर भारतीय पत्रकार इत्तफाक से वहां मौजूद था और वह सारा नज़ारा देख रहा था, तब उसने कांग्रेसी सांसदों से जानना चाहा कि वेणुगोपाल ने आखिर ऐसा क्या कह दिया था, जो इतना हंगामा बरप गया, तो जवाब मिला-’जब आप इसकी रिपोर्ट ही नहीं कर सकते तो उस तमिल षब्द को जानकर क्या करेंगे?’ और यह बात सियासी नेपथ्य में दफन हो गई।

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सियासी रंगरेज कैंब्रिज

Posted on 02 April 2018 by admin

जिस कैंब्रिज एनालिटिका पर इतना बवाल मचा है, सूत्र बताते हैं कि इसके भगवा सरोकार व कनेक्षन के दर्षन 2012 से लेकर 2014 तक हो चुके थे। सूत्रों का दावा है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी के चुनावी अभियान को धार देने में इस संगठन की एक महती भूमिका थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की भद्द पिट गई और महीनों जब कांग्रेस में आत्ममंथन का दौर चला तो सूत्र बताते हैं कि तब राहुल ने अपने लोगों से कहा कि कांग्रेस क्यों नहीं इस संगठन की सेवा लेती है? कहते हैं फिर कैंब्रिज के लिए कांग्रेस के दरवाजे खुल गए। और इसका साथ मिलने के बाद सोषल मीडिया में कांग्रेस की छवि बदलने लगी। राहुल की इमेज में भी निरंतर सुधार आने लगा। सूत्र बताते हैं कि भाजपा के मन में कांग्रेस की इस बदलती छवि को लेकर एक भय का आलम व्याप्त होने लगा और इसके बाद जो कुछ भी हुआ वह इसी भय से बाहर आने का कष्मकष माना जा सकता है।

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कैंब्रिज का प्रताप

Posted on 02 April 2018 by admin

कैंब्रिज एनालिटिका से भाजपा का कहीं पहले से चोली-दामन का साथ रहा है। सूत्रों की मानें तो जब 2004 में भाजपा के हाई प्रोफाइल नेता राजीव प्रताप रूढ़ी छपरा से लालू यादव के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ा था तो रूढ़ी ने इस कंपनी की मदद ली थी। कहते हैं इस कंपनी की रूढ़ी के छपरा चुनाव में एक महती भूमिका थी। कंपनी ने छपरा में एक व्यापक सर्वेक्षण करवाया था, और हर बूथ का गणित निकाल लिया था कि बूथ पर किस जाति, वर्ग और आय वर्ग के मतदाता हैं, उनका पारंपरिक रूझान किस पार्टी की ओर है और इसमें से कितने फ्लोटिंग वोटर्स हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर ही रूढ़ी और भाजपा ने अपने बूथ मैनेजमेंट की रणनीतियों का अंतिम रूप दिया था, यह और बात है कि इस चुनाव में राजीव प्रताप रूढ़ी को लालू के हाथों पराजय का घूंट पीना पड़ा था।

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…और अंत में

Posted on 02 April 2018 by admin

दिल्ली से देहरादून जाने वाली उस इंडिगो फ्लाइट के यात्री उस वक्त अचंभे में रह गए, जब उन्होंने देखा कि फ्लाइट छूटने के ऐन वक्त पर दो वीआईपी यात्री प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा ने फ्लाइट में प्रवेष किया और वे चुपचाप विमान की सबसे पिछली सीट की ओर बढ़ चले। बाद में जब फ्लाइट के पायलट ने अनाऊंसमेंट की तो यात्रियों को पता चला कि यह विमान उड़ा रहा पायलट इटली का है और कैबिन क्रू पॉलेंड का। वाड्रा दंपत्ति अपने बच्चों से मिलने देहरादून जा रहे थे।

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बहुमुखी प्रतिभा के धनी देव

Posted on 26 March 2018 by admin

शून्य से शिखर तक की ऐसी ही एक यात्रा त्रिपुरा के नए नवेले भगवा चिराग और वहां के मुख्यमंत्री विप्लब देब की भी है, जो त्रिपुरा से दिल्ली अपनी पढ़ाई के सिलसिले में आए थे। यहां दिल्ली में उनकी मुलाकात सतना से भाजपा के सांसद गणेश सिंह से होती है, गणेश सिंह को मृदुभाषी और मल्टी टैलेंटेड विप्लब इतने भाए कि इस भाजपा नेता ने इन्हें अपने सहायक के तौर पर नियुक्त कर लिया। जिक्र पहले हो चुका है कि विप्लब की प्रतिभा के अनेक आयाम थे जिसमें उनका एक कुशल ड्राइवर होना भी शामिल था सो वे न सिर्फ सांसद महोदय की गाड़ी ड्राईव किया करते थे बल्कि उनकी उद्दात राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाओं को भी एक नई दिशा देते रहे, विप्लब ने दिल्ली में अपना एक कोर ग्रुप तैयार किया था, इस ग्रुप से कई मंझे पत्रकार, शिक्षाविद् आदि जुड़े थे जिनका काम सांसद महोदय के लिए संसद में पूछे जाने वाले सवालों को तय करना था। सनद रहे कि गणेश सिंह तीन टर्म से मध्य प्रदेश के सतना से भाजपा के मौजूदा सांसद हैं। इसके बाद विप्लब संघ विचारक और मोदी करीबी सुनील देवधर के संपर्क में आए और देवधर ने विप्लब को त्रिपुरा में भगवा जमीन तैयार करने की मुहिम में अपने साथ ले लिया और यहीं से विप्लब का सितारा नई बुलंदियों की ओर अग्रसर हो चला।

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खनन मंत्रालय का मनन

Posted on 26 March 2018 by admin

मोदी सरकार में अनुभवी खनन मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अपनी डिलिवरी व परफॉरमेंस की समस्याओं से जूझ रहे हैं, शायद यही वजह रही कि सरकार में अब तक कई बार उनके पोर्टफोलियो से छेड़छाड़ हो चुकी है। सो, इन दिनों तोमर अपने मंत्रालय के कामकाज को लेकर अतिसक्रिय जान पड़ते हैं। पिछले दिनों उनके मंत्रालय ने रेत खनन को लेकर दिल्ली में ’सैंड माइनिंग फ्रेमवर्क कॉन्क्लेव’ का आयोजन किया, यह अपने तरह का एक अनूठा प्रयोग था, जिसमें अलग राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए, नौकरशाही और रेत खनन से जुड़ी कंपनियों ने भी इस कॉन्क्लेव में शिरकत की। जैसे ही कॉन्क्लेव खत्म हुआ कई अफसर और मंत्रालय के लोगों और खनन कंपनियों से जुड़े मातहत अधिकारियों ने आयोजकों से इस ’फ्रेमवर्क’ की कॉपी मांगी। जिस व्यक्ति को कॉपी वितरण के कार्य में लगाया गया था उसने बताया कि एक व्यक्ति अपने को मंत्रालय का अधिकारी बता सारी कापियां ले गया, उसके पास कुल गिनती की 10 कांपियां रह गई है। तब लोगों ने कहा कि कोई बात नहीं इसकी डिजिटल या सॉफ्ट कॉपी ही हमें मेल कर दो, सूत्र बताते हैं कि मंत्रालय की ओर से इसकी डिजिटल कॉपी ही तैयार नहीं हुई थी। हमारे प्रधानमंत्री जी देश को नए डिजिटल युग में ले जाना चाहते हैं, पर वे अपने कैबिनेट साथियों का क्या करें?

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