प्रकाश जावडेक़र को मध्य प्रदेश से, निर्मला सीतारमण को जहां आंध्र प्रदेश से राज्यसभा में लाने पर भाजपा में सहमति बन गई है, वहीं शाहनवाज हुसैन, सुब्रह्मण्यम स्वामी और वाइको को भी राज्यसभा देने पर विचार हो रहा है।
Posted on 07 June 2014 by admin
प्रकाश जावडेक़र को मध्य प्रदेश से, निर्मला सीतारमण को जहां आंध्र प्रदेश से राज्यसभा में लाने पर भाजपा में सहमति बन गई है, वहीं शाहनवाज हुसैन, सुब्रह्मण्यम स्वामी और वाइको को भी राज्यसभा देने पर विचार हो रहा है।
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Posted on 07 June 2014 by admin
सवाल बड़ा है कि क्या अडवानी को पार्टी में सचमुच कुछ नहीं मिलेगा? अटल जी की तर्ज पर अब नरेंद्र मोदी एनडीए की अध्यक्षीय पारी संभालने को तैयार बताए जाते हैं।
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Posted on 01 June 2014 by admin
समझा जाता है कि दस जुलाई को मोदी अपने मंत्रिमंडल का पहला विस्तार कर सकते हैं, कोई 15 मंत्री और बनाए जा सकते हैं, जिनमें 4 कैबिनेट और 11 राज्यमंत्री हो सकते हैं, क्योंकि इससे पूर्व पार्टी के बड़े नेता अपने पुत्र-पुत्रियों को मंत्री बनाने के लिए जबर्दस्त लॉबिंग कर रहे थे। सबसे बड़ी लॉबिंग तो राजस्थान में 25-0 से जीत दिलाने वाली राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की थी जो अपने पुत्र दुष्यंत के लिए मोदी मंत्रिमंडल में जगह चाहती थीं, पर जहां तक प्रधानमंत्री मोदी की बात है वे वंशवाद राजनीति के सख्त खिलाफ हैं। सो वे आख़िरी वक्त तक वसुंधरा से यही कहते रहे कि दुष्यंत के सिवाए कोई और नाम भेजें, पर वसुंधरा अंत-अंत तक अड़ी रहीं। उसी तरह यशवंत सिन्हा अपने फॉरेन रिटर्न पुत्र जयंत सिन्हा के लिए पैरवी कर रहे थे, रमण सिंह अपने पुत्र के लिए लॉबिंग कर रहे थे, दिवंगत प्रमोद महाजन की पुत्री पूनम महाजन अपने लिए संघ के बड़े नेताओं से पैरवी करा रही थीं। दिवंगत साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश वर्मा के भी अपने दावे थे, संघ की ओर से वरुण गांधी का भी नाम आया, धूमल के पुत्र अनुराग ठाकुर का नाम भी चल रहा था, पर मोदी ने बेहद साफगोई दिखाते हुए पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे किसी भी नेता पुत्र-पुत्री को मंत्री बनाना पसंद नहीं करेंगे और वे अपने इरादे से कतई भी न डिगे। अभी मोदी मंत्रिमंडल में कुल 45 मंत्री हैं, मोदी यह संख्या 60 तक ले जाना चाहते हैं। सो आने वाले दिनों में 15 भाग्यशालियों की लॉटरी निकल सकती है।
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Posted on 01 June 2014 by admin
अभी -अभी भले ही मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली हो, पर मोदी सरकार की नीतियों और उसके चेहरे-मोहरे को जनता के बीच चमकाने की कवायद शुरू हो गई है और इसका रोडमैप तैयार होने लगा है। इस काम में मोदी ने अपने तीन विश्वस्तों को लगाया है। ये तीनों वही हैं जो 2014 के आम चुनाव में भाजपा के चुनाव प्रचार-प्रसार अभियान को एक नई उंचाइयां दी थीं, यानी पीयूष गोयल, मुख्तार अब्बास नकवी और मनोज लडवा। इस आम चुनाव की तैयारियों में भी मनोज लडवा के नेतृत्व में मोदी की एक कोर टीम 3-4 साल पहले से ही उनके चुनावी अभियान की रूपरेखा बुनने में जुट गई थी। इस टीम ने अमेरिका और ब्रिटेन के पूरे चुनावी अभियान का अध्ययन किया। इस काम में उन्हें ‘एपको वल्र्डवाइड’ और सुकांति घोष का भी पूरा सहयोग मिला। खासकर अमेरिकी प्रेसीडेंट ओबामा के प्रचार अभियान को भारतीय संदर्भ में उतारने के लिए उसकी एक पूरी ‘रेप्लिका’ तैयार की गई थी, अकेले मोदी की ब्रांडिंग पर 3 से 4 हजार करोड़ रूपयों का बजट रखा गया था।
मोदी के पूरे प्रचार अभियान का सारा जिम्मा तीन विज्ञापन कंपनियों पीयूष पांडे की ‘ओएंडएम’, प्रसून जोशी के ‘मेक्कन वल्र्ड ग्रुप’ और सैम बलसारा के ‘मेडिसन वल्र्ड’ ने संभाली थी। इनको मोदी और भाजपा के साथ लाने में भाजपा के राष्टीय कोषाध्यक्ष पीयूष गोयल की एक महती भूमिका थी। पीयूष पांडे पहले भी मोदी के लिए ‘खुशबू गुजरात की’ एक सफल कैंपेन चला चुके थे। सो, जब पूरे कैंपेन की टैगलाइन ‘अबकी बार मोदी सरकार’ पीयूष पांडे लेकर आए, प्रसून जोशी ने एक अलग टैगलाइन गढ़ी थी-‘देश की पुकार, मोदी सरकार।’ मोदी के इस पूरे प्रचार अभियान में स्पाइस जेट के अजय सिंह की भी एक महती भूमिका थी। पीयूष गोयल व अजय सिंह समेत प्रचार अभियान के ज्यादातर सदस्यों को प्रसून जोशी की टैगलाइन अच्छी लग रही थी, पर पीयूष पांडे अपनी बात पर अड़े रहे तो अंतिम निर्णय के लिए यह मामला मोदी दरबार में पहुंचा और मोदी ने ‘अबकी बार मोदी सरकार’ की टैगलाइन को अप्रूव किया। उसी प्रकार ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का फलसफा टीम मोदी के नीलेश जैन और अनुराग ने गढ़ा था। मोदी के पूरे वाराणसी के प्रचार अभियान को लखनउ में बैठकर मनोज लडवा ने संचालित किया था। सो, मोदी सरकार के नए चेहरे को गढ़ने की तैयारी में टीम मोदी अभी से जुट गई है।
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Posted on 01 June 2014 by admin
नरेंद्र मोदी के दिल्ली के निााम पर काबिज होते ही कम से कम डेढ़ दर्जन राज्यपालों की धड़कनें बढ़ गई है, इनमें से अधिकांश महामहिम पुराने कांग्रेसी हैं, 10 जनपथ के वफादारों में शुमार होते हैं। नए राज्यपालों के नाम भी सामने आने लगे हैं। सूत्र बताते हैं कि दिल्ली भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय कुमार मल्होत्रा या यशवंत सिन्हा को हंसराज भारद्वाज की जगह कर्नाटक का गवर्नर बनाया जा सकता है। सनद रहे कि भारद्वाज का कार्यकाल इसी 28 जून को पूरा हो रहा है, उन्होंने 29 जून 2009 को कर्नाटक राजभवन की ठौर पकड़ी थी। सनद रहे कि एक गवर्नर का कार्यकाल 5 वर्षों के लिए होता है, पर केंद्रनीत सरकार चाहे तो वह राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ पहले भी उनकी रूखसती की इबारत लिख सकती है। उसी प्रकार गुजरात में नरेंद्र मोदी की नाक में दम करने वाली कमला बेनीवाल 26 जून को, असम के जानकी बल्लभ पटनायक इसी वर्ष 10 दिसंबर को, आंध्र के गवर्नर ई.एस.एल नरसिम्हन 28 दिसंबर को, हरियाणा के जगन्नाथ पहाड़िया 26 जुलाई को, यूपी के बनवारी लाल जोशी 27 जुलाई 14 को रिटायर हो रहे हैं। इसके अलावा हिमाचल की गवर्नर उर्मिला सिंह 25 जनवरी 2015 को, महाराष्ट्र के के.शंकर नारायणन 21 जनवरी 2015 को, पंजाब के शिवराज पाटिल 21 जनवरी 2015 को, पश्चिम बंगाल के एम.के.नारायणन 22 जनवरी 2015 को रिटायर हो रहे हैं।
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Posted on 01 June 2014 by admin
पर कांग्रेसी इस बात को लेकर अभी से हाय-तौबा मचा रहे हैं कि गवर्नर का पद राजनीति से इतर एक संवैधानिक पद है, कांग्रेस के कुछ बड़े नेता संविधान की धारा 156 का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि केंद्र की कोई सरकार किसी गवर्नर पर इस्तीफा देने का दवाब नहीं बना सकती। जबकि सच यह है कि जब 2004 में यूपीए-I की सरकार ने केंद्र की वाजपेयी सरकार को बेदखल किया तो सोनिया गांधी के तुरंत प्रभाव से सिक्किम के तत्कालीन गवर्नर केदार नाथ साहनी, जो संघ पृष्ठभूमि के दिल्ली भाजपा के एक प्रमुख नेता रह चुके थे, कैलाश पति मिश्र (बिहार के एक पूर्व भाजपा नेता) को तुरंत प्रभाव से हटा कर उनकी जगह बलराम जाखड़ को भेज दिया गया। संघ से सहानुभूति रखने वाले बिहार के गवर्नर रमा ज्वॉयस को, राजस्थान के गवर्नर मदनलाल खुराना को, यूपी में विष्णुकांत शास्त्री को फौरन हटने पर मजबूर कर दिया गया। उसी प्रकार संघ पृष्ठभूमि वाले भाई परमानंद को भी तुरंत प्रभाव से हरियाणा के गवर्नर पद से हाथ धोना पड़ा। सूत्र बताते हैं कि स्वयं नरेंद्र मोदी कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले 18 राज्यपालों की तुरंत रूखसती के पक्षधर नहीं, पर संघ व पार्टी कैडर का उन पर भारी दवाब है। कम से कम जिन राज्यों में हालिया दिनों में चुनाव होने हैं वहां के गवर्नर बदले जाने की प्रबल संभावना है। पर ऐसे में मैडम शीला दीक्षित का क्या होगा जो महा दो महीने पूर्व ही दिल्ली से अपना बोरिया बिस्तर लेकर केरल के राजभवन में पहुंची हैं। पर लगता है पश्चिम बंगाल के गवर्नर एम.के.नारायणन और महाराष्ट्र के के.शंकर नारायणन की राह सबसे मुश्किल है, मोदी सरकार की पहली गाज इन पर गिर सकती है।
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Posted on 01 June 2014 by admin
सत्ता के गलियारों में अब इस बड़े सवाल ने सिर उठाना शुरू कर दिया है कि क्या बाबा रामदेव का हश्र भी प्रवीण तोगड़िया का होगा? सनद रहे कि सन् 2001 से पहले तक प्रवीण तोगड़िया की गुजरात में तूती बोलती थी, राज्य की भाजपा सरकार के हर अहम फैसले में कहीं न कहीं तोगड़िया की रायशुमारी शामिल रहती थी, पर जैसे ही 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के राजनैतिक फलक पर अभ्युदित हुए उन्होंने शनै: शनै: तोगड़िया के कद को कांट-छांट कर इतना छोटा कर दिया कि वे ‘बोन साई’ लगने लगे। गुजरात में यही हाल कहीं न कहीं संघ व उनके अनुषांगिक संगठनों का भी हुआ। सो, रामदेव ने जब चुनाव प्रचार के दौरान किसी न किसी बात को लेकर मोदी पर दवाब बनाना शुरू किया तो चुनाव संपन्न हो जाने तक मोदी ने चुपचाप इन्हें सहा। पर जब भाजपा को बहुमत मिलने के बाद रामदेव ने अपनी ओर से मंत्रियों की एक लिस्ट मोदी को भिजवाई तो मोदी बिदक गए। बाबा व नमो में तानातनी इस कदर बढ़ी की बाबा मोदी के शपथ ग्रहण में भी नहीं आए और उसमें बालाकृष्ण और अपने कुछ अन्य शिष्यों को शामिल होने के लिए दिल्ली भेज दिया। बाबा के बारे में कहा गया कि अभी वे मौन व्रत में हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब आने वाले कुछ महीनों में बाबा को भी अपने धन का हिसाब-किताब देना पड़े। काले धन मसले पर मोदी ने अपनी पहल पर एसआईटी का गठन पहले ही कर दिया है। अब मोदी के समक्ष यह साबित करने की चुनौती है कि न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर!
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Posted on 01 June 2014 by admin
मोदी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के समक्ष यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि वे पार्टी क्षत्रपों की मनमानी के आगे घुटने नहीं टेकेंगे, शायद यही वजह है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सियासी शह-मात के खेल में उलझाए रखने के लिए मोदी मध्य प्रदेश से नरेंद्र सिंह तोमर (जिन्हें वे अपने मंत्रिमंडल में भी लेकर आए हैं) और कैलाश विजयवर्गीय की सियासी महत्त्वाकांक्षाओं को हवा दे रहे हैं। वसुंधरा राजे पर चेक एंड बैलेंस रखने के लिए ओम माथुर और घनश्याम तिवाड़ी जैसे पार्टी नेताओं को महत्त्व मिलना शुरू हो गया है। धूमल परिवार पर नार रखने के लिए शांता कुमार को पार्टी संगठन में एक महती भूमिका दी जा सकती है। मनोहर परिक्कर की कार्यशैली से मोदी अमूमन खुश रहते हैं, रमण सिंह भी वक्त के हिसाब से सियासी ढांचे में फिट हो जाने वाले नेताओं में से हैं, बिहार के लिए मोदी सुशील मोदी की जगह नया चेहरा तलाश रहे हैं। झारखंड में भी अर्जुन मुंडा के समांतर किसी को खड़ा किया जा सकता है। हरियाणा में भी एक नए चेहरे की तलाश शुरू हो गई है। महाराष्ट्र में मोदी को कोई ऐसा नेता चाहिए जो शिवसेना और मनसे में संतुलन साधने की बाजीगरी दिखा सके।
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Posted on 18 May 2014 by admin
2014 के आम चुनावों के नतीजों से भाजपा में आह्वïाद की अनुगूंज हैं, कांग्रेस परेशान है, नीतीश हैरान हैं, मोदी के हौंसले बम-बम हैं। केंद्र में मोदी सरकार की गठन की आहटों के बीच कयासों के दौर गर्म है कि कैसा होगा मोदी-मंत्रिमंडल का स्वरूप? मोदी से जुड़े एक विशेष सूत्र बताते हैं कि मोदी ने संकेत दे दिया है कि उनकी सरकार ‘मिनिमम गवर्मेंट, मैक्सिमम गवर्नेंसÓ के तर्ज पर गठित होगी, यानी मंत्रिमंडल का आकार छोटा होगा और शासन का स्वरूप वृहद, कई अहम मंत्रालय मसलन गृह, भूतल परिवहन, शिपिंग आदि मोदी अपने पास रख सकते हैं। गृह इसीलिए कि मोदी कैबिनेट में नंबर दो कोई नहीं होगा। मोदी का ध्यान आतंरिक सुरक्षा पर होगा। सो, गृह मंत्रालय को मुस्तैद बनाए रखना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। भूतल परिवहन इसीलिए कि मोदी अटल बिहारी की तर्ज पर देश में अच्छी सड़कों का मजबूत जाल बिछाना चाहते हैं, राष्टï्रीय राजमार्गों की सूरत बदलना चाहते हैं और कहीं न कहीं ‘टोल गेट घपलोंÓ से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि कैसे सड़क निर्माण के नाम पर राजनेताओं की मिली भगत से अरबों का घोटाला हुआ है। शिपिंग इसीलिए कि भारत में हजारों मील का कोस्टल एरिया बेकार पड़ा है, मोदी उसे सिंगापुर की तर्ज पर डेवलप करना चाहते हैं। मोदी के लिए एक और काम प्रमुखता की सूची में शुमार है, यह है नदियों को जोडऩे की योजना, इसके लिए शिवसेना कोटे से सुरेश प्रभु जल संसाधन मंत्री बनाए जा सकते हैं। प्रभु की छवि एक ईमानदार नेता की है और मोदी उन्हें निजी तौर पर पसंद भी करते हैं।
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Posted on 18 May 2014 by admin
मोदी कैबिनेट में सबसे ज्यादा मार-धाड़ चार मंत्रालयों को लेकर मची है, ये मंत्रालय हैं गृह, वित्त, रक्षा व विदेश। क्योंकि इन संबंधित मंत्रालयों के मंत्री सीसीएस यानी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी में शामिल हो जाते हैं, इस कमेटी के पांच सदस्य होते हैं, जिसमें इन चारों मंत्रालयों के मंत्रियों के अलावा स्वयं प्रधानमंत्री भी शामिल रहते हैं, इसे अनौपचारिक तौर पर रायसिना हिल भी कहा जाता है, जिसके अंतर्गत नार्थ और साउथ ब्लॉक आते हैं, यह कमेटी इस मायने में भी महत्त्वपूर्ण है कि इसके जिम्मे राष्टï्रीय सुरक्षा और न्यूक्लीयर पॉवर जैसे मुद्दों की देख-रेख भी शामिल हैं। जहां तक मोदी की बात है वे नहीं चाहते कि इन चारों में से किसी भी मंत्रालय में कोई ऐसा मंत्री आ जाए जो बात-बेबात उनकी राय को धत्ता बताए। चुनांचे यही वजह है कि मोदी गृह मंत्रालय अपने पास रखना चाहते हैं। रक्षा मंत्रालय को लेकर सुषमा व राजनाथ दोनों के ही दावे मजबूत हैं, हालांकि राजनाथ की पहली पसंद गृह मंत्रालय हैं, ऐसे में अगर मोदी गृह अपने पास रख लेते हैं तो फिर वे रक्षा के लिए दांव चलेंगे, वित्त मंत्रालय को लेकर अरुण जेतली और अरुण शौरी दोनों के अपने दावे हैं, पर मोदी देश को एक ऐसा वित्त मंत्री देकर चौंका सकते हैं, जिनकी नाम की चर्चा अभी सुनी नहीं जा रही। विदेश को लेकर भी सुषमा व जेतली के अपने दावे हैं। पर आखिरी फैसला तो देश के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही लेना है।
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