Posted on 11 January 2015 by admin
भारतीय राजनीति में शुचिता और स्वच्छता का नया राग अलाप कर मोदी ने जन मानस के बीच भले ही अपनी एक खास स्वीकार्यता बना ली हो, पर कई क्षेत्रीय सूरमाओं के लिए ‘मोदी के अच्छे दिन’ में कुछ बुरी खबरों के छौंक लग गए हैं, मसलन जे.जयललिता, मायावती, ममता, करुणानिधि, लालू के बाद अब मुलायम सिंह भी इसकी चपेट में आने वाले हैं। पिछले महीने मुलायम सिंह के आय से अधिक संपत्ति के मामले में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस दत्तू ने एक रिमार्क दिया है जो इस पूरे केस को एक नया मोड़ दे सकता है। दरअसल, मुलायम के आय से अधिक संपत्ति के मामले में तत्कालीन सीबीआई प्रमुख रंजीत सिन्हा ने एक ‘क्लोजर रिपोर्ट’ सौंपी थी जिसे चीफ जस्टिस ने ‘नल ऑर वॉयड’ करार दिया है, चुनांचे इस मामले में प्रतिवेदी विश्वनाथ चतुर्वेदी कोर्ट में एक रिव्यू पिटीशन डालने का इरादा रखते हैं, यानी मुलायम के लिए आने वाले दिन मुश्किल भरे हो सकते हैं।
Posted on 11 January 2015 by admin
काला धन का खटराग अलाप देश भर में भगवा अलख जगाकर भले ही नमो मंडली ने चुनावी वैतरणी पार कर ली हो, पर विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों का काला धन वाकई क्या देश वापिस लौटेगा? इस पर एक बड़ा सवालिया निशान अब भी लगा हुआ है, पर देश के अंदर जमा काला धन बाहर निकालने की कवायद बदस्तूर जारी है। इस श्रृंखला में यूपी के कई नामचीन बिल्डर्स, मंत्रियों और अफसरों पर एसआईटी की पैनी निगाहें हैं। एसआईटी कईयों की जांच शुरू कर चुकी है, कईयों के नंबर बस आने वाले हैं। अभी 3 दिन पहले नोएडा के एक नामी बिल्डर (जो लक्ज़री अपार्टमेंट्स बनाने के लिए जाने जाते हैं) पर आयकर का छापा पड़ा, माना जाता है कि इस बिल्डर कंपनी में सपा के कई मंत्रियों का पैसा लगा है और यह बिल्डर्स यूपी के एक बड़े कांग्रेसी नेता के रिश्तेदार भी हैं। इनकी फाइल भी एसआईटी ने अपने कब्जे में ले ली है। अगला नंबर एक ऐसे बिल्डर का लगने वाला है जिसने मायावती राज में दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की की है। सूत्र बताते हैं कि नोएडा प्राधिकरण के कई बड़े अफसरों का पैसा इस बिल्डर कंपनी में लगा हुआ है। यूपी के भूतत्व एवं खनिकर्य मंत्री के खिलाफ भी भ्रष्टïाचार के तमाम दस्तावेज एसआईटी के हाथ लग गए हैं, यूं समझिए कि उनकी शामत भी बस आने ही वाली है।
Posted on 11 January 2015 by admin
30 जनवरी को यूपी विधान परिषद की 12 सीटें खाली हो रही है, जिसमें से 7 सपा कोटे की है। अब मुलायम की पार्टी में जो लोग राज्यसभा की सवारी नहीं गांठ पाए उनकी नज़रें एमएलसी की सीट पर टिक आई है। मुलायम ने सातों नाम फाइनल कर दिए थे, सातवें नंबर पर सपा नेता जसवंत सिंह का नाम था। पर इस सीट पर आशु मल्लिक की भी नज़र थी। सनद रहे कि ये मल्लिक वही हैं जिन्होंने कभी अहमद बुखारी और मुलायम को साथ लाने में महती भूमिका निभाई थी, इन दिनों वे अरशद मदनी के साथ हैं। मदनी को मुलायम के करीब लाने का श्रेय भी वे खुद ही लेते हैं। चुनांचे पिछले दिनों कथित तौर पर मल्लिक के उकसावे पर मदनी ने मुलायम को फोन कर हडक़ाया-‘आपके राज में जब हमारा कोई काम ही नहीं होता तो आपका साथ देने का क्या फायदा?’ मुलायम फौरन हरकत में आए और उन्होंने लिस्ट में से जसवंत सिंह का नाम काट कर उसकी जगह आशु मल्लिक का नाम लिख दिया।
Posted on 03 January 2015 by admin
प्रधानमंत्री मोदी भले ही एक ओर ‘इलेक्शन मोड’ से बाहर निकलने की जद्दोजहद करते दिख रहे हों, वहीं उनके कई काबिल कैबिनेट साथियों ने तो उनके चुनावी वायदों के परचम से कागज की नाव बना ली है, और वे उसी से सियासी मंझधार को पार करने का इरादा रखते हैं। अपनी चुनावी सभाओं में मोदी ने बढ़-चढ़ कर दावा किया था कि वे पिंक मीट यानी गऊ मांस के निर्यात को हत्तोसाहित करेंगे यदि केंद्र में उनकी सरकार आई तो, इसके लिए वे टैक्स प्रावधानों को और कड़ा बनाने की वकालत करते भी देखे गए। पर पिछले दिनों संसद में वाणिज्य व उद्योग राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार निर्मला सीतारमण ने पिंक मीट के एक्सपोर्ट को लेकर संसद में जो आंकड़े पेश किए उससे साफ जाहिर होता है कि मोदी सरकार के छह महीनों में पिंक मीट क्रांति पर ब्रेक लगना तो दूर, उसके एक्सपोर्ट की रफ्तार दोगुनी हो गई है। 2013-14 के वित्तीय वर्ष में जहां 27163.01 करोड़ रुपयों की कीमत वाले 1389018 मीट्रिक टन पिंक मीट का निर्यात हुआ, वहीं वित्तीय वर्ष 2013-14 के (अप्रैल-सितंबर) मात्र छह महीने में 703535 मीट्रिक टन व 13945.34 रुपयों का पिंक मीट निर्यात हुआ। यह आंकड़ा यकीनन चौंकाने वाला है। संघ व हिंदुवादी संगठनों के एजेंडे से उलट मोदी सरकार के कुछ काबिल मंत्री इस गऊ मांस व्यापार इंडस्ट्री की खुली हिमायत करते देखे गए। इनका मानना है कि इस दो लाख करोड़ रुपयों वाली इंडस्ट्री से सरकार को तकरीबन 17 हजार करोड़ की राजस्व प्राप्ति होती है, यानी जब तक सरकारी खजाने में पैसा आता है कोई व्यापार बुरा नहीं है, तंबाकू व शराब के मानिंद ही महज चंद वैद्यानिक चेतावनियों के साथ भारत से भी पिंक मीट एक्सपोर्ट यूं ही फलता-फूलता रहेगा।
Posted on 03 January 2015 by admin
संघ सर चालक मोहन भागवत की आंखों के तारे, बिजनेस वालों के दुलारे नितिन गडकरी तो मीट व्यापारियों के पक्ष में खुल कर अलख जगा रहे हैं, कुछ महीनों पहले गडकरी एआईजेक्यू यानी ऑल इंडिया जमाइतुल कुरैश की एक मीटिंग में खुलकर बोले थे- ‘मैंने इस कम्युनिटी की मांगों को पूरी करने वाली फाइल पर अपने दस्तख्त कर दिए हैं, और मेरी जहां जरूरत होगी आपके बिजनेस को आगे बढ़ाने में मैं आपके साथ खड़ा हूं।’ नरेंद्र मोदी सरकार के इस काबिल मंत्री ने इन मांस व्यापारियों को यह भी आश्वासन दिया था कि कत्लगाहों में ले जा रहे निरीह जानवरों को पुलिस या पशु अधिकार आंदोलनकर्मी रोक-टोक न करें इसके लिए वे परिहवन कानूनों में बदलाव को भी तैयार हैं। मामले के तुरंत-फुरंत निपटारे के लिए मोबाइल मैजिस्ट्रेट की तैनाती पर गडकरी ने बल दिया। सनद रहे कि कुरैशी फोरम के अध्यक्ष सिराजुद्दीन कुरैशी से गडकरी की गहरी छनती है, सिराजुद्दीन नई दिल्ली के लोदी रोड स्थित इंडिया इस्लामिक सेंटर के अध्यक्ष भी हैं और उन्हें राजनैतिक आकाओं को खुश रखने का हुनर बखूबी मालूम है। जबकि पशु अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले कई संगठनों ने परिवहन मंत्री से कहा था कि कत्लगाहों तक जानवरों को ले जाने वाले ट्रकों में एक खास किस्म के पिंजरे लगाए जाएं, ताकि जानवरों को कोई नुकसान न पहुंचे, नहीं तो अभी जानवरों को एक ही ट्रक में एक-दूसरे पर बेदर्दी से लाद दिया जाता है, स्लॉटर हाउस तक पहुंचते-पहुंचते कई घायल हो जाते हैं, कई दम तोड़ देते हैं, फिर भी इनके मांस का व्यापार होता है, जबकि लंदन में हर स्लॉटर हाउस में सरकार की ओर से डॉक्टरों की नियुक्ति होती है, एक बार जब वे जानवरों को स्वस्थ और फिट घोषित कर देते हैं तब ही इनके मीट का सेवन हो सकता है, नहीं तो उन्हें ‘डाउन एनिमल’ की श्रेणी में डाल दिया जाता है। पर भारत में ये सब जिस तरह धड़ल्ले से हो रहा है इसे आप ‘डाउन मोरल’ की रवायत मान सकते हैं।
Posted on 03 January 2015 by admin
मोदी सरकार के एक पॉवरफुल मंत्री हैं जो कभी अडवानी के हनुमान में शुमार हुआ करते थे। उन्होंने अभी पिछले दिनों कैबिनेट की एक बैठक में अनोखा प्रस्ताव रखा, कि किसी भी बिल्डर के खिलाफ पीड़ित, उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज नहीं करा सकते, अपितु उपभोक्ताओं के शिकायत निपटारण के लिए एक ‘रेग्युलेटरी’ का गठन कर दिया जाए। इस पर सबसे पहले मेनका गांधी ने विरोध दर्ज कराया कि यानी ‘पीलीभीत में रहने वाले किसी व्यक्ति को अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए नोएडा या लखनऊ आना पड़ेगा?’ फिर रामविलास पासवान, कलराज मिश्र, राधामोहन सिंह जैसे केंद्रीय मंत्रियों ने मेनका के सुर में सुर मिलाया कि ‘यानी सरकार बिल्डर्स को एक गरीब आदमी का पैसा मारने का हक देना चाहती है?’ जब विरोध के इतने प्रस्फुटन को पीएम ने महसूस किया तो उन्होंने अपने इस दुलारे कैबिनेट मंत्री के प्रस्ताव को खारिज कर दिया, हालांकि पीएम पहले से जानते थे कि उनके इस मंत्री का बड़ा पैसा एक बिल्डर कंपनी में लगा है जो संभावनाओं के नए कमल खिलाने में माहिर है।
Posted on 03 January 2015 by admin
मोदी सरकार का हर बड़ा छोटा मंत्री अपने बॉस (मोदी) को खुश करने की जुगत भिड़ाने में जुटा है, मोदी का यकीन चूंकि पुरस्कार व दंड की नीति में है, चुनांचे उनके मंत्रिगण भी अपनी प्रो-एक्टिव इमेज को पीएम, जनता व मीडिया के समक्ष रखना चाहते हैं। मुख्तार अब्बास नकवी ने मोदी के एक अहम चुनावी नारे ‘मोदी सरकार, जनता के द्वार’ कोर् मूत्त रूप देने का बीड़ा उठाया है, वैसे भी मोदी खुद को प्रधानमंत्री के बजाए जनता का प्रधान सेवक कहते आए हैं। इस बाबत जब नकवी ने अपने अल्पसंख्यक मंत्रालय के पिछले 15 वर्षों के कामकाज की समीक्षा की तो पाया कि योजना मद में नियोजित और व्यय किए गए पैसे बमुश्किल ही हाशिए पर खड़े आखिरी आदमी तक पहुंच पाएं हैं, सो उन्होंने एक सुविचारित तरीके से ‘मिशन सशक्तिकरण योजना’ को अमलीजामा पहनाया है और देश भर के ऐसे 100 अल्पसंख्यक बहुल जिलों को चिन्हित किया है जहां अब तक संबंधित मंत्रालय 200 करोड़ से ज्यादा पैसा खर्च कर चुका है। अब मंत्री जी अपने दलबल के साथ इन चिन्हित जिलों में स्वयं जाकर जनता दरबार लगा रहे हैं और यह जानने-समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिरकार यहां सूरतेहाल बदली क्यों नहीं? ग्राउण्ड जीरो पर बदलाव की आहट क्यों नहीं सुनाई दे रही? मंत्रालय द्वारा तय अल्पसंख्यक विकास के 15 सूत्री कार्यक्रम को कैसे परवान चढ़ाया जा सकता है? नव वर्ष 2015 से नकवी ने बकायदा अपने इस अभियान का आगाज कर दिया है, पर अंजाम तक का सफर अभी लंबा है।
Posted on 03 January 2015 by admin
संसद के बजट सत्र से पहले मोदी सरकार में एक और बड़ा फेरबदल मुमकिन है, यह फेरबदल इसी जनवरी माह के अंत तक हो सकता है। इस फेरबदल में मंत्रियों के काम-काज और उनकी कार्य कुशलता को आधार बनाकर उन्हें ‘रेट’ किया जा सकता है, और परफॉरमेंस के आधार पर पिछड़ने वाले, विवादों में घिरने वाले और उम्र को आधार बनाकर कई मंत्रियों की छुट्टी की जा सकती है। आने-वाले दिनों में 6-7 राज्यपालों की नियुक्तियां भी होनी है, ऐसे में कई बुजुर्ग मंत्रियों को किसी राज्य का राज्यपाल बनाकर भी भेजा जा सकता है, इस कड़ी में नजमा हेपतुल्लाह जैसे कैबिनेट मंत्रियों का नाम लिया जा रहा है।
Posted on 03 January 2015 by admin
इस बार के गणतंत्र दिवस समारोह को भव्य व अविस्मरणीय बनाने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री ने कमर कस रखी है, उनके लिए इस बार का यह समारोह इसीलिए भी विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा इसमें मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित हो रहे हैं। मोदी का विशेष जोर झांकियों को लेकर है, झांकियों की विषय वस्तु क्या हों, इसकी प्रस्तुति व रंग-संयोजन कैसा हो, इनकी बारीकियों पर भी मोदी का विशेष ध्यान है, मोदी ने अपने मंत्रियों से कहा है कि झांकी वे सिर्फ अधिकारियों के भरोसे न छोड़े अपितु व्यक्तिगत रूप इसकी दैनंदिन निगरानी रखें और इस बारे में पीएमओ को सूचित करते रहें, चूंकि मोदी जानते हैं कि जो दिखता है, वहीं बिकता है।
Posted on 29 December 2014 by admin
सीबीआई के नए डायरेक्टर अनिल सिन्हा अपने पूर्ववर्ती निदेशक की तुलना में कहीं ज्यादा स्वच्छ और ईमानदार छवि के माने जाते हैं, राजीव गांधी के जमाने में वे एसपीजी के प्रमुख भी रह चुके हैं, इस नाते उनके गांधी परिवार और कांग्रेस से भी अच्छे ताल्लुकात हैं, सीवीसी के अतिरिक्त सचिव रहते हुए भी उनके काम-काज का रिकार्ड खासा अच्छा था। पूर्व सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा से भी उनके गहरे ताल्लुकात हैं, चूंकि दोनों ही बिहार कैडर से हैं, और कायस्थ हैं, शायद यही वजह रही कि अनिल सिन्हा ने निदेशक के लिए आवंटित बंगला 8 महीनों के लिए रंजीत सिन्हा को ही रहने के लिए दे दिया है। एक और जहां अनिल सिन्हा सदैव विवादों से दूर रहे हैं, वहीं रंजीत सिन्हा से विवादों का चोली-दामन का साथ रहा है। जैसे, 2जी मामले में विभाग की 250 पेज की रिपोर्ट को उन्होंने महा छह लाइन में खारिज कर दिया था। इस पर मुकुल रोहतगी ने कड़ा ऐतराज जताया था और इस मामले में कोर्ट को संज्ञान लेना पड़ा था। चूंकि इस मामले में तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री मारन का नाम भी आ रहा था, सो मारन ने इस बाबत कथित तौर पर रंजीत सिन्हा से कुछ लेन-देन कर ली, इस बात की जानकारी मारन ने ‘ट्राई’ के तत्कालीन चैयरमैन नृपेंद्र मिश्र को भी दी थी। सूत्र बताते हैं कि रंजीत सिन्हा से जुड़ी एक सीडी और ऑडियो टेप काफी समय से राजनैतिक गलियारों में घूम रही है। शायद यही वजह है कि अमित शाह ने एक वक्त रंजीत सिन्हा को दिल्ली का उप राज्यपाल बनाना तय कर लिया था, पर इस प्रस्ताव से अरुण जेतली इत्तफाक नहीं रखते थे, सो शाह को यह मामला ठंडे बस्ते में डालना पड़ा।