Posted on 02 August 2017 by admin
अगर दीवारों के कान होते हैं और खबरें अपने प्रस्फुटन से पहले कुलांचें भरती हैं तो 17 अगस्त के आस-पास प्रधानमंत्री मोदी अपनी कैबिनेट में एक बड़ा फेरबदल कर सकते हैं। सूत्रों की मानें तो मोदी अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी अमित शाह को देश का अगला रक्षा मंत्री बना सकते हैं। अमित शाह गुजरात से राज्यसभा में एंट्री ले रहे हैं, जानने वाले तो यह भी दावा कर रहे हैं कि अब राज्यसभा में भाजपा की कमान भी शाह के हाथों में आ सकती है और वे अरुण जेटली की जगह नेता सदन बनाए जा सकते हैं। भले ही ऊपरी सदन में भाजपा अब भी अल्पमत में हो, पर शाह के नए सियासी तेवर सदन में भाजपा की मंशाओं को एक नई धार दे सकते हैं। माना जा रहा है कि शाह को सामने लाकर मोदी काम के बोझ से दबे जेटली को भी थोड़ा आराम देना चाहते हैं। सदन की कार्यवाहियों से फारिग होकर जेटली अपने अहम वित्त मंत्रालय के काम-काज पर भी और ध्यान दे सकते हैं। वहीं शाह के सदन में आने से भाजपा सदस्यों की सदन के काम काज में सुचारू भागीदारी भी सुनिश्चित हो सकेगी। वैसे जब भी सदन का सत्र चालू होता है मोदी अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त पार्लियामेंट हाउस में गुजारते हैं, पर सदन के बजाए उन्हें संसद भवन स्थित अपने ऑफिस में ज्यादा देखा जा सकता है। समझा जाता है कि अब बहुत हद तक यह कमी शाह पूरी कर सकते हैं, अगर एक बार वे कैबिनेट की जिम्मेदारी संभालते हैं तो दोनों ही सदनों में उनका आना-जाना लगा रहेगा, इस वजह से वे दोनों ही सदनों में भाजपा सदस्यों पर अपनी पैनी नजर रख पाएंगे। पर भाजपा शीर्ष नेतृत्व से जुड़े सूत्र इसे मात्र अटकलें करार दे रहे हैं, इनका कहना है शाह मंत्री बनने के बजाए गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक के आसन्न विधानसभा चुनावों को मद्देनजर रखते अपनी व्यूह रचना को अंतिम रूप देने में सक्रिय रहेंगे। अगर वे कैबिनेट मंत्री बन जाते हैं तो उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ सकता है, चूंकि 2019 के आम चुनावों में अभी मात्र दो वर्षों का ही समय बचा है। चुनांचे स्वयं मोदी शाह को लेकर इतना बड़ा रिस्क नहीं लेना चाहेंगे। वास्तव में भगवा सियासत क्या करवट लेगी आने वाले दो हफ्ते इसका खुलासा कर ही देंगे।

Posted on 02 August 2017 by admin
नार्थ ईस्ट में भाजपा की बंपर जीत के तीन नायकों का इनाम बनता है, ये तीनों भगवा नेता हैं- राम माधव, मुरलीधर राव और भूपेंद्र यादव। 11 अगस्त को संसद का मानसून सत्र खत्म हो रहा है, उम्मीद जताई जा रही है कि इसके अगले हफ्ते यानी 17 अगस्त के आसपास मोदी मंत्रिमंडल के चेहरे मोहरे में व्यापक बदलाव लाया जा सकता है। फिलवक्त कई बड़े मंत्रालय खाली पड़े हैं और उन्हें सीनियर मंत्री अतिरिक्त प्रभार के तौर पर चला रहे हैं। जब से मनोहर पर्रिक्कर गोवा गए हैं तब से उनका रक्षा मंत्रालय अपने पूर्णकालिक मंत्री की बाट जोह रहा है। अनिल माधव दवे के आकस्मिक निधन से खाली हुए पर्यावरण मंत्रालय का अतिरिक्त जिम्मा हर्षवर्द्धन के पास है। वेंकैया नायडू के पास दो अहम मंत्रालय थे शहरी विकास और सूचना प्रसारण, ये दोनों मंत्रालय भी अपने पूर्णकालिक मंत्री की बाट जोह रहे हैं। खबर है कि स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को हिमाचल भेजा जा सकता है, जहां वे भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के चेहरे होंगे। आंध्र के ईस्ट गोदावरी के अमालापुरम से आने वाले राम माधव ने हालिया दिनों में मोदी-शाह के कई ’डैमेज कंट्रोल’ प्रोग्राम को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, सो मुमकिन है कि उन्हें अनिल माधव दवे के निधन से रिक्त हुई राज्यसभा सीट से लाया जा सकता है, इस सीट का टर्म 2022 तक है। मुरलीधर राव को वेंकैया नायडू द्वारा रिक्त की जा रही राज्यसभा सीट से लाया जा सकता है, यह सीट राजस्थान से हैं। यानी भाजपा में आने वाले दिन पुरस्कार वितरण के हैं, मुमकिन है कि कुछ असफल योद्दाओं पर पार्टी की गाज भी गिरे।
Posted on 26 July 2017 by admin
लालू यादव व उनके परिवार पर ईडी के धुआंधार छापों के बाद अगला निशान कौन? वही जिनका लंबे समय से लोगों का इंतजार था, वही जो भारत को अब भी एक ’बनाना रिपब्लिक’ समझते हैं यानी कि दामादजी रॉबर्ट वाड्रा। क्योंकि पिछले कुछ समय से ईडी के अधिकारियों ने जिस तरह से रॉबर्ट वाड्रा के बिजनेस पार्टनर संजय भंडारी को घेर रखा है, उनसे जिस स्तर पर कड़ी पूछताछ हो रही है और जो नए खुलासे हो रहे हैं वे चौंकाने वाले हैं। सूत्र बताते हैं कि हवाला मामले में भंडारी की 21 करोड़ की संपत्ति ईडी ने अटैच कर दी है, ’प्रीवेंशन ऑफ मनी लांडरिंग एक्ट’ के तहत। सनद रहे कि इस एक्ट में 10 साल की सजा का भी प्रावधान है। सूत्र बताते हैं कि ईडी की जांच में वाड्रा की दुबई, लंदन स्थित कई संपत्तियों के कागजात खंगाले जा रहे हैं, जिसमें लंदन के ब्रेक्सटॉन स्क्वायर स्थित एक बेहद महंगे संपत्ति की जांच भी शामिल है। ईडी से जुड़े सूत्रों का दावा है कि वाड्रा ने ये तमाम अचल संपत्तियां भंडारी के माध्यम से ही खरीदी है। सूत्रों का यह भी दावा है कि भंडारी अप्रूवर बनने को भी तैयार हो गए हैं। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस दूर-दूर तक सत्ता के करीब आती नहीं दिख रही और भंडारी नहीं चाहते कि ललित मोदी की तरह उन्हें भी देश से बाहर रहना पड़ जाए। बताते हैं कि दिल्ली से प्रकाशित होने वाले एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक के वरिष्ठ पत्रकार वित्त मंत्रालय और भंडारी के बीच एक सूत्र का काम रहे हैं। सरकारी एजेंसियों से जुड़े सूत्र खुलासा करते हैं कि वाड्रा की तमाम संपत्तियों के ऑन रिकार्ड खुलासे की तैयारियां भी हो चुकी हैं, पर वाड्रा पर शिकंजा कब कसेगा इसका निर्धारण तो देश का सियासी तापमान ही तय करेगा, जब मोदी और उनकी सरकार कांग्रेसनीत विपक्ष के केंद्र में होगी, तब हो सकता है यह बड़ा धमाका, शायद अगले वर्ष कभी भी।
Posted on 26 July 2017 by admin
राहुल गांधी भी बिलावजह विवादों की चपेट में आ जाते हैं, कहां तो वे चीन के मुद्दे पर पीएम से खम्म ठोक कर सफाई मांग रहे थे, पर जब से चीनी राजदूत से उनकी मुलाकात के ऊपर पार्टी और उनके स्वयं के मंतव्य में विरोधाभास आया है, वे चहुं ओर से आलोचनाओं से घिर आए हैं। विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि विवादों की इस चिंगारी को हवा देने में भारत स्थित चीन के राजदूत की भी उतनी ही अहम भूमिका है। सूत्र बताते हैं कि राहुल ने जब अपने घर चीन के राजदूत लू झाओई को चाय पर बुलाया तो उनकी जानकारी के बगैर उसी वक्त अपने घर भूटान के भारत स्थित राजदूत को भी आमंत्रित कर लिया। जब चीन के राजदूत राहुल से मिलने उनके घर पहुंचे तो वहां पहले से भूटान के राजदूत को मौजद पाकर एकदम से दंग रह गए। और कहते हैं कि 45 मिनट की यह तय शुदा मुलाकात मात्र 15 मिनट में सिमट कर रह गई। आम तौर पर भारत में अपनी राजनैतिक मुलाकातों की मीडिया से दूर रखने वाले चीनी राजदूत ने राहुल से हुई मुलाकात की फोटो जारी कर दी। मीडिया ने इसे लपक लिया। भूटानी राजदूत ने भी एक प्रेस नोट बनाकर उसे पारो भेज दिया। सूत्र बताते हैं कि दरअसल राहुल डोकलाम पर चीन और भूटान का नजरिया समझना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने 8 जुलाई को इन दोनों राजदूतों को एक साथ अपने घर चाय पर न्यौता भेजा, पर वे मौजूदा सियासी उबाल की तपिष मापने में चूक कर गए।
Posted on 17 July 2017 by admin
पिछले पांच वर्षों से रायसिना हिल्स की शोभा बढ़ा रहे प्रणब दा अगले कुछ रोज में रिटायर होने वाले हैं, पर सिर्फ अपने पद से, अपनी महत्वाकांक्षाओं से नहीं। उनको करीब से जानने वाले लोगों का मानना है कि प्रणब मुखर्जी जैसी शख्सियत डूबती कांग्रेस की नैया को पार लगा सकती है। सो, कयास इस बात के लगाए जा रहे हैं कि पार्टी में राहुल की निरंकुश कार्यशैली से नाराज़ कांग्रेसी नेताओं का एक बड़ा तबका प्रणब के इर्द-गिर्द कदमताल कर सकता है। सूत्र बताते हैं कि वैसे भी प्रणब दा राहुल के मुकाबले प्रियंका को ज्यादा राजनैतिक मानते हैं, चुनांचे यही वजह रही होगी कि पिछले दिनों दादा ने प्रियंका को लंच पर बुलाया, कहते हैं दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई। प्रणब दा के भाजपा समेत अन्य दलों के शीर्ष नेतृत्व से भी अच्छे रिश्ते हैं, पिछले दिनों एक पुस्तक विमोचन समारोह में भावुक हो आए नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना पिता तुल्य माना। वैसे भी प्रणब दा न केवल पूर्ण राजनैतिक व्यक्ति हैं अपितु पूरी तरह ’रूल बुक’ को फॉलो करने में यकीन रखते हैं, शायद यही वजह है कि इन तीन वर्षों में उनके और प्रधानमंत्री के बीच के रिश्तों में कभी खटास नहीं आई, उन्होंने बतौर राष्ट्रपति नरेंद्र मोदी का पूरी तरह से साथ दिया। मुमकिन है कि आने वाले दिनों में प्रणब दा कांग्रेसी राजनीति की एक प्रमुख धुरी बनकर उभरेंगे और कांग्रेस में एक नई राजनीति का उभार देखने को मिलेगा।
Posted on 17 July 2017 by admin
आखिरकार कांग्रेसी युवराज का राजतिलक कब होगा? सूत्रों की मानें तो मम्मा यानी स्वयं सोनिया गांधी एक लंबे समय से अपने पुत्र पर दबाव बना रही हैं कि वह पूरी तरह कांग्रेस का जिम्मा संभालें और पार्टी अध्यक्ष बन जाएं। पर राहुल हैं कि वे अब भी टालमटोल कर रहे हैं। पार्टी में राहुल की महत्ता प्रतिपादित करने की नीयत से सोनिया ने पिछले कुछ दिनों से पार्टी नेताओं से मिलना-जुलना भी एक तरह से बंद कर रखा है। चूंकि वे विपक्षी राजनीति की केंद्र बनी हुई हैं सो, अन्य दलों के नेताओं से मिलते-जुलते रहना उनकी मजबूरी है। अब सवाल उठता है कि आखिरकार राहुल पार्टी की पूर्ण जिम्मेदारी उठाने से क्यों बच रहे हैं? तो एक सीनियर कांग्रेस मैन बताते हैं कि अभी भी पार्टी में सभी अहम निर्णय राहुल ही लेते हैं, यह और बात है कि वे अपने इस निर्णय में पार्टी के सीनियर नेताओं को कम ही शरीक करते हैं, उनकी एक कोटरी है, जिससे वे सदैव घिरे रहते हैं, और अपने इन्हीं चंद दोस्तों की बातों पर ही कान धरते हैं। लेकिन फिर भी कहीं कोई गड़बड़ हो जाती है वे इसका ठीकरा ’मम्मा’ के करीबियों पर फोड़ देते हैं। शायद इन्हीं बातों को मद्देनजर रखते पिछले कुछ दिनों से सोनिया ने अपने इन करीबियों से मिलना-जुलना बंद कर रखा है, अब वह चाहती हैं कि राहुल आगे आएं और अपनी जिम्मेदारियों, नाकामियों और सफलताओं को गले लगा लें।
Posted on 10 July 2017 by admin
राहुल गांधी के एक बदले अवतार में सामने आने के लिए कृतसंकल्प जान पड़ते हैं, इटली जाकर अपनी नानी से मिलकर आने के बाद उन्होंने पहला काम किया कि राजस्थान व मध्य प्रदेश के जनमत व कार्यकर्ता सर्वेक्षण रिपोर्ट को खंगाला है। दरअसल, राहुल ने एक नामचीन सर्वेक्षण एजेंसी को यह जिम्मा सौंपा था कि वे राजस्थान और मध्य प्रदेश में अलग-अलग जनता व पार्टी कार्यकर्ताओं का मत जाने कि कांग्रेस वहां किस नेता को आने वाले विधानसभा चुनाव में अपने लीडर के तौर पर प्रोजेक्ट करे। राजस्थान में मुकाबला पूर्व सीएम अशोक गहलोत और युवा तेज तर्रार नेता सचिन पायलट के बीच था। आरजी ऑफिस से जुड़े एक विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि इस सर्वे में हैरतअंगेज रूप से बुजुर्ग गहलोत ने युवा पायलट को पटखनी दे दी। पार्टी कार्यकर्ताओं के सर्वे में गहलोत को 71 तो सचिन को मात्र 29 फीसदी मतों से संतोष करना पड़ा। ’इनमें से कोई नहीं’ के पक्ष में कोई भी वोट नहीं पड़ा। वहीं पब्लिक की राय में गहलोत 64 और सचिन 36 फीसदी जनता की पसंद बनकर उभरे। सीपी जोशी इस बात से सबसे ज्यादा नाराज हैं कि राहुल ने इस सर्वे में उनका नाम ही नहीं रखा। कहते हैं सर्वेक्षण नतीजे आने के बाद सचिन ने राहुल से मिलकर सफाई दी कि जो नेता पहले सरकार के मुखिया रह चुके हैं, पार्टी में उनके अनुयायियों की संख्या जाहिरा तौर पर ज्यादा है। सो, सचिन ने ग्रांउड जीरो पर काम करने के लिए राहुल से थोड़ा और वक्त मांगा है।
Posted on 10 July 2017 by admin
अब बात मध्य प्रदेश की करते हैं। यहां इस गुप्त सर्वे में पार्टी के चार कद्दावर नेताओं की मौजूदगी दर्ज थी-कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह और कांतिलाल भूरिया। मध्य प्रदेश से आए नतीजे वाकई चौंकाने वाले थे, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ में लगभग बराबर का मुकाबला रहा। तीसरे नंबर पर भूरिया रहे तो आश्चर्यजनक रूप से चौथे नंबर पर दिग्विजय सिंह। पार्टी व जनता की राय भी काफी मिलती-जुलती रही। पर मध्य प्रदेश के नतीजे इस मामले में चौंकाने वाले रहे कि लगभग 14 फीसदी पार्टी कार्यकर्ताओं ने और 30 फीसदी जनता ने इन चारों नेताओं से अलग नाम लिए। पार्टी में एक राय यह भी उभरकर सामने आई कि हालिया दिनों में दिग्विजय सिंह ने अपनी इमेज का कबाड़ा कर लिया है, कमलनाथ की छवि एक उद्योगपति की है, तो ज्योतिरादित्य तो घोषित तौर महाराज हैं। ले देकर कांतिलाल भूरिया बचते हैं जिनकी छवि एक आदिवासी नेता की है और मध्य प्रदेश में तकरीबन 30 फीसदी आदिवासी वोटर हैं, पर भूरिया की दिक्कत है कि वे लोगों के बीच भी कम ही जाते हैं और चुनाव प्रचार भी बहुत ज्यादा नहीं करते हैं। सो, राहुल ने भूरिया को जनता के बीच थोड़े और एक्टिव होने की सलाह दी है।
Posted on 26 June 2017 by admin
कांग्रेस अब अपने इमेज मेकओवर पर काम कर रही है, 2014 के आम चुनावों में भद्द पिट जाने के बाद जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को एंथनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी तो उसमें कहीं शिद्दत से इस बात का उल्लेख था कि कांग्रेस अपनी मुस्लिम परस्त छवि की वजह से ही आज इस हाल में पहुंच गई है। पर इसके बाद भी कुछ हुआ नहीं दस जनपथ और आर जी ऑफिस इस रिपोर्ट पर कुंडली मार कर बैठ गया, पर हालिया सियासी घटनाक्रमों के बाद सोनिया व राहुल के करीबियों को फिर से यह आत्मज्ञान प्राप्त हुआ कि इस मुद्दे पर कुछ करना ही होगा। सो, राहुल-सोनिया और उनके दरबारियों ने मिल-बैठ कर यह तय किया कि थोकभाव में कांग्रेस के जो मुस्लिम प्रवक्ता गण टीवी पर दिख रहे हैं उन्हें ठंडे बस्ते में डाला जाए और उनकी जगह कुछ हिंदूवादी चेहरों को मैदान में उतारा जाए जिससे कमल के प्रस्फुटन का काउंटर किया जा सके। शकील अहमद, मीम अफजल, गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद जैसे नेताओं से कह दिया गया है कि वे टीवी पर दिखने से परहेज करें, और प्रो हिंदू चेहरे ढूंढने के लिए एक कमेटी बना दी गई है। पर इसमें सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि राहुल गांधी पहले भी अलग-अलग कारणों से 8-9 कमेटियां बना चुके हैं, उन कमेटियों का हश्र क्या हुआ यह कांग्रेस जनों से छुपा नहीं है।
Posted on 26 June 2017 by admin
भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज राष्ट्रपति पद की रेस में सबसे आगे होते हुए भी मुकाबला चूक गईं और मोदी ने किंचित एक अनजाने से नाम रामनाथ कोविंद के नाम को हरी झंडी दिखा दी। चुनांचे 28 दलों के समर्थन के साथ एनडीए उम्मीदवार के तौर पर जब से कोविंद ने अपना पर्चा भरा तो एक तरह से उनकी जीत पक्की मानी जा रही है। पर क्या सिर्फ कोविंद का दलित होना ही उनकी योग्यता बन गया? क्या गुजरात के आसन्न विधानसभा चुनाव और वहां पनप रहे दलित आंदोलन को ठंडा करने की लिहाज से ही कोविंद का नाम आगे बढ़ाया गया? या इसके पीछे 2019 के आम चुनाव में देश भर के दलितों को भाजपा के पक्ष में लाने की मोदी-शाह द्वय की रणनीति है? सूत्रों की मानें तो कोविंद के नाम को सामने लाने और आगे बढ़ाने में इंदौर के एक आध्यात्मिक गुरु भय्यू जी महाराज की एक अहम भूमिका है। सनद रहे कि भय्यू जी के संघ व भाजपा के शीर्ष नेताओं से बेहद निजी ताल्लुकात हैं, मोदी से भी वे लंबे समय से जुड़े रहे हैं और माना जाता है कि मोदी ने ही भय्यू जी को गुजरात के सबरकांठा में संतनगरी बसाने का जिम्मा सौंपा हैं। सूत्रों की मानें तो इस सात अप्रैल को बिहार के गवर्नर रहते कोविंद भय्यू जी महाराज से मिलने इंदौर पहुंचे थे और भय्यू जी के निवास पर इन दोनों के बीच एक लंबी मंत्रणा चली थी, समझा जाता है कि इसके बाद ही भय्यू जी ने भाजपा व संघ के शीर्ष नेतृत्व से कोविंद की उम्मीदवारी को लेकर बातचीत की। और तब से ही कोविंद की गाड़ी चल निकली।