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…और अंत में

Posted on 26 February 2017 by admin

सूत्र बताते हैं कि इस एक्जिट पोल के प्रकाश में आने से अखिलेश यादव सबसे ज्यादा नाराज थे, हालांकि प्रकाशन समूह ने इस एक्जिट पोल रिपोर्ट को तुरंत ही अपनी वेबसाइट से हटा लिया। बावजूद इसके अखिलेश के गुस्से का आलम यह था कि जब रात के साढ़े नौ बजे अपने सरकारी आवास पर वे अपने उच्च अधिकारियों के साथ मीटिंग ले रहे थे तो कहते हैं कि मीटिंग में मौजूद एडीजी लॉ एंड ऑर्डर से उन्होंने बेसाख्ता पूछ डाला कि-’एक्जिट पोल मामले में हुआ क्या?’ अधिकारियों ने एक स्वर में कहा-’सर, एफआईआर दर्ज हो गई है।’ फिर अखिलेश ने पूछा-’कोई गिरफ्तारी भी हुई?’ तो उनसे अधिकारियों ने जानना चाहा कि ’सर क्या गिरफ्तारी करनी है?’ पर इस पर वे बिना कुछ बोले अपने घर के अंदर चले गए। अफसरों ने भी 15-20 मिनट तक उनका इंतजार किया, सीएम नहीं आए तो अफसर गणों ने भी अपने-अपने घरों का रास्ता पकड़ा। और इसके तकरीबन एक घंटे बाद यानी रात के कोई 11 बजे खबर आई कि डॉट कॉम के हिंदी संपादक को गिरफ्तार कर लिया गया है। (एनटीआई-gossipguru.in)

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महामहिम की महिमा

Posted on 26 February 2017 by admin

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के प्रयासों से राष्ट्रपति भवन के दर्शन के लिए पिछले पखवाड़े सवा सौ से ज्यादा पत्रकार अपने परिवार के साथ वहां पहुंचे, उन्होंने दरबार हॉल देखा, मुगल गार्डन देखा और राष्ट्रपति भवन के वास्तुशिल्प व विहंगम दृश्यों का आनंद उठाया। इसके 10 दिनों बाद प्रेस क्लब व राष्ट्रपति भवन की ओर से इस कार्यक्रम को और आगे बढ़ाया गया, और यह तय हुआ कि राष्ट्रपति भवन का वह दुर्लभ म्यूजियम जिन्हें प्रणब दा ने आम जनता के लिए खोल दिया है, पहले पत्रकार लोग इसका दर्शन कर पाएंगे। 100 से ज्यादा पत्रकारों ने म्यूजियम देखने के लिए अपने नामांकन कराए, पर उस दिन पहुंचे बस गिनती के लोग। यह एक दिलचस्प अनुभव था, पूर्व राष्ट्रपतियों के सामान, उनको मिले महंगे-महंगे गिफ्ट, उनके हाथों से लिखे नोट्स, कुर्सी के सामने लगे ट्च स्क्रीन को छूते ही सारा ब्यौरा पलभर में हाजिर। एक कुर्सी थी जिसमें लगा बटन दबाते ही पलक झपकते आपकी तस्वीर राष्ट्रपति महोदय के साथ खिंच जाती थी, यह 3डी तकनीक का एक नायाब उदाहरण था। राष्ट्रपति भवन के शुभारंभ के रोज महात्मा गांधी और इरविन के साथ-साथ चलने का पत्रकारगणों ने वर्चुअल अनुभव भी प्राप्त किए।

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…क्योंकि जानना आपका अधिकार है

Posted on 20 February 2017 by admin

’नेशन वांट्स टू नो’ फेम के चर्चित टीवी एंकर ने जब अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ अपना चैनल लाने की हठधर्मिता पकड़ ली तो उनकी ’ब्रांड वैल्यू’ को देखते हुए उनके पीछे निवेशकों की लाइन लग गई, पर इन्होंने अपने लिए बेंगलुरु के जिस उद्योगपति का चयन किया। वे न सिर्फ राज्यसभा सदस्य हैं, अपितु एक से ज्यादा क्षेत्रीय चैनलों के घोषित स्वामी भी हैं। बिल्कुल शुरुआती चरण में इस बिजनेसमैन ने एंकर व उनकी पत्नी की सहस्वामित्व वाली कंपनी में 50 करोड़ रुपयों का निवेश किया। फिर एंकर अपनी कंपनी का प्रस्तावित निवेश प्लॉन लेकर सामने आए। सूत्र बताते हैं कि यह चार वर्षीय वित्तीय योजना कोई 500 करोड़ रुपयों की थी, जिसमें चैनल को स्थापित करने का प्रारंभिक खर्च 200 करोड़ रुपये और प्रतिवर्ष 75 करोड़ के खर्चे के अनुमान के मुताबिक चार वर्षों के लिए 300 करोड़ रुपयों की अतिरिक्त जरूरत थी। बेंगलुरु वाले उद्योगपति भड़क गए, बोले- ’50-100 करोड़ में तो एक अच्छा चैनल खड़ा हो जाता है, आपकी 500 करोड़ रुपयों की मांग गैरवाजिब है।’ इस तकरार के बाद एंकर महोदय ने वाहन-निर्माण क्षेत्र की एक बड़ी कंपनी के मालिक से बात की। पर वहां भी बात नहीं बनी तो वे देश के शीर्ष उद्योगपति की शरण में जा पहुंचे और उनसे कहा कि ’हमारा चैनल खरीद लो।’ जवाब आया-’चैनल है कहां, जो खरीद लें?’ एंकर ने कहा – ’फिर आप ’सायलेंट पार्टनर’ बन कर इसमें पैसे लगा दो।’ पर वहां भी बात नहीं बनी तो एंकर ने बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के साथ अपने पुराने संबंधों का हवाला देते हुए बात की। बात बन गई है और सुना जा रहा है कि विदेशी निवेश की शक्ल में एंकर को अपना नया चैनल शुरू करने के लिए पैसा मिल गया है। चैनल पिछले वर्ष नवंबर में शुरू होना था। फिर इसकी शुरुआत के लिए 20 जनवरी की तारीख मुकर्रर की गई। अब मुमकिन है कि यह चैनल अप्रैल माह से शुरू हो पाए, और देश को फिर उसके जानने का अधिकार प्राप्त हो जाए।

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महामहिम के मुरमुरे पर आफत

Posted on 20 February 2017 by admin

देश के महामहिम को मूढ़ी यानी मुरमुरे का बहुत शौक है। उनके लिए ये मुरमुरे खास तौर पर कोलकाता से मंगाए जाते हैं क्योंकि कोलकाता की मूढ़ी में जो खास बात है या उसका जो स्वाद है, अन्य प्रांतों के मुरमुरे इसका मुकाबला नहीं कर सकते। पर राष्ट्रपति भवन में सुरक्षा कारणों से इन मुरमुरों की तीन अलग-अलग जगहों पर जांच की जाती है। सूत्र बताते हैं कि जांच के क्रम में इन मुरमुरों का पैकेट भी खोल दिया जाता है। नतीजतन, जब तक यह मूढ़ी राष्ट्रपति जी के रसोई में पहुंचती है, उसका कड़कपन जाता रहता है और ऐसी सीली हुई मूढ़ी खाना दादा को पिछले कई बार से नागवार गुजर रहा था। सूत्र बताते हैं कि उन्होंने इस बात की शिकायत अपने ’पर्सनल स्टॉफ’ से की पर उनसे सुरक्षा कारणों का हवाला देकर माफी मांग ली जाती थी। दादा को यह बात इतनी नागवार गुजरी है कि अब उन्होंने मूढ़ी खाने से ही तौबा कर ली है।

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…और अंत में

Posted on 20 February 2017 by admin

नोटबंदी का मुद्दा इन पांच राज्यों के चुनावों में ठंडा पड़ा रहा। वजह चाहे जो भी हो, राजनीतिक दलों ने इस पर ज्यादा हाय-तौबा मचाना उचित नहीं समझा। सूत्र बताते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक के पास साढ़े 15 लाख करोड़ की जगह 17 लाख करोड़ रुपये वापिस आ गए हैं। अब ये डेढ़ लाख करोड़ रुपयों की अतिरिक्त रकम खातों में कहां से जमा हो गई, न कोई बताने वाला है,न कोई पूछने वाला। फिर भी, हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का हिस्सा हैं। (एनटीआई-gossipguru.in)

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षह, षाह व जाटों की आह

Posted on 12 February 2017 by admin

यूपी में जाटों के भाजपा विरोधी रूख को देखते हुए वहां पहले चरण के मतदान के कोई पांच दिन पहले केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह के नई दिल्ली स्थित आवास पर प्रमुख जाट नेताओं की अहम बैठक बुलाई गई। इस बैठक को आयोजित कराने में यूपी से आने वाले और केंद्र सरकार में मंत्री संजीव बालियान की भी एक महती भूमिका रही। सूत्रों का दावा है कि यह बैठक भाजपाध्यक्ष अमित षाह के निर्देष पर बुलाई गई थी। षाह चाहते थे कि बैठक में 100 से 150 प्रमुख जाट नेताओं को बुलाया जाए। पर जब षाह वहां पंहुचे तो देखा 1200 के आसपास जाट नेताओं की भीड़ वहां जमी थी। कहते हैं इस पर षाह ने सिंह व बालियान को डपटा भी कि उन्हें कोई जनसभा नहीं चाहिए थी, बल्कि आपस में बात करनी थी। फिर षाह ने उपस्थित जनसमूह से जानना चाहा कि आखिर जाटों को भाजपा से तकलीफ क्या है? इस पर बेहद प्रायोजित अंदाज में कुछ जाट नेताओं ने षाह से कहा कि मोदी सरकार में बीरेंद्र सिंह और संजीव बालियान दोनों ही जाट नेताओं को छोटा मंत्रालय दिया गया है। इससे बिरादरी नाराज़ है। षाह को सारा माज़रा समझ आने लगा था। इतने में एक युवा जाट ने बेहद तल्खी भरे अंदाज़ में कहा-‘आपने हमारे छोटे चौधरी जयंत को मिलने के लिए बुलाया और उनसे डेढ़ घंटे इंतज़ार करवाया।’ सूत्र बताते हैं कि इस पर षाह ने कहा कि ’उनकी हमें जरूरत नहीं।’ जवाब आया-‘यह तो समय बताएगा कि किसको किसकी जरूरत पड़ेंगी।’ फिर जब षाह भोजन करने बैठे तब भी अप्रिय सवालों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।

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मीडिया फ्रेंडली होतीं बहिनजी

Posted on 12 February 2017 by admin

मायावती भी बदल रही हैं और इनके हाथी की दुलकी चाल भी। यूपी के पहले चरण के मतदान के कोई सप्ताह भर पूर्व बहिनजी ने लखनऊ के चार प्रमुख पत्रकारों को चाय पर बुलाया। इनमें से यूपी के एक बड़े हिंदी दैनिक के स्थानीय संपादक भी थे। चाय पर बहिनजी के साथ इनके दो खास विष्वासपात्र सतीष मिश्रा और अंबिथ राजन भी मौजूद थे। षुरूआती बातचीत के बाद बहिनजी ने मिश्रा व राजन को वहां से जाने को कहा और पत्रकारों से दोटूक पूछा, ‘आप लोग हमें इतना पीछे क्यों दिखा रहे हैं? क्या इसके पीछे अखिलेष हैं?’ पत्रकारों ने कहा कि ‘वैसे तो ऐसे निर्णय ऊपर से यानी टॉप मैनेजमेंट का होता है, फिर भी आप से इतना तो कह ही सकते हैं कि आप ना तो पत्रकारों से, ना ही मीडिया घरानों से रिष्ता बनाती हैं। न ही अपनी पार्टी का चुनावी विज्ञापन ही देती हैं, तो आपको कोई कैसे सपोर्ट करे?’ सूत्र बताते हैं कि पत्रकारों से यह ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने के बाद बहिनजी अब राज्य के तीन बड़े समाचार पत्रों को विज्ञापन देने को तैयार हो गई हैं और वह भी पूरे-पूरे पेज का।

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तस्लीमा के नक्षेकदम पर इरोम?

Posted on 12 February 2017 by admin

अपने आमरण अनशन से चर्चित हुई मणिपुर की शर्मिला इरोम क्या अगली तस्लीमा नसरीन बनने जा रही हैं? विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि जब इरोम ने अपना अनशन तोड़ चुनावी राजनीति में आने का फैसला किया तो हमारी दो प्रमुख खुफिया एजेंसियों ने उनके भाई और उनके विदेशी ब्यायफ्रेंड को कथित तौर पर धन उपलब्ध कराया कि इरोम इससे पूरे मणिपुर में अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतार सकें। पर कहते हैं कि इरोम के मित्र ने उन्हें किसी और देश में बसने के लिए तैयार कर लिया है। सूत्र यह भी बताते हैं कि ये पैसे इरोम तक पहुंचे ही नहीं। सो, इरोम के जितने उम्मीदवार थे उनकी आर्थिक मदद वे चाहकर भी नहीं कर पाईं। चुनांचे वे मुकाबले से बाहर होते चले गए। एक इरोम हैं जो मणिपुर के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के खिलाफ मैदान में डटी हैं पर वहां भी उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। तो क्या इससे यह समझा जाए कि इरोम अपने विदेशी ब्यायफ्रेंड के साथ किसी अन्य देश में बसने की तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटी हैं।

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राहुल सब समझते हैं

Posted on 12 February 2017 by admin

किसी बात से नाराज़ तो हैं राहुल गांधी जो उन्होंने कांग्रेस पार्टी की एक अहम बैठक में आने से मना कर दिया और कह दिया कि वे यूपी में चुनाव प्रचार में बिजी हैं। उन्हें ब्रीफ करने और साथ ही मनाने के लिए कांग्रेस के सीनियर नेता गुलाम नबी आजाद को भेजा गया। सूत्र बताते हैं कि गुलाम नबी ने राहुल के घर पहुंच कर सबसे पहले उन्हें यह सूचना दी कि अब तो अखिलेष ने भी कह दिया है कि सपा-कांग्रेस का यह गठबंधन 2019 तक जारी रहेगा। पर इस बात पर खुष होने के बजाए राहुल उखड़ गए, बोले कभी-‘कांग्रेस देष की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी हुआ करती थी। आज उसे दक्षिण में किसी द्रविड़ पार्टी का सहारा चाहिए होता है। यूपी में 2019 में हम सपा के जूनियर पाटर्नर बनकर लड़ेंगे और वे हमें मेहरबानी करके गठबंधन की 20 सीटें दे देंगे, बिहार में भी महागठबंधन की हमें 6 सीटें मिल जाएंगी, झारखंड में 4, फिर क्या बचेगा हमारे पास, 2019 में हम बस गिनती की सीटों पर ही लड़ पाएंगे, आखिर कब तक हम पैरासाइट बनकर जीएंगे।’ राहुल की बातों में दम था, गुलाम नबी ने भी समझ लिया कि हालिया दिनों में राहुल की राजनीतिक परिपक्वता में इज़ाफा हुआ है।

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और अंत में

Posted on 12 February 2017 by admin

क्या बिल्ली के भाग्य से छींका टूटेगा? कम से कम अन्नाद्रमुक के सीनियर नेता थंबी दुरै तो ऐसा ही सोचते हैं। पिछले दिनों सेंट्रल हॉल में दुरै से उनके एक साथी सांसद ने पूछा कि आखिरकार वे षषिकला का साथ इस हद तक क्यों दे रहे हैं, षषिकला का तो मुख्यमंत्री बन पाना भी संदिग्ध है, सारा कुछ सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर करता है। थंबी दुरै ने षांत भाव से कहा-’जानता हूं, पर इसके बाद चिन्नम्मा अपने किसी खास विष्वासपात्र को ही तो मुख्यमंत्री बनवाएंगी न? साथी सांसद के भी ज्ञानचक्षु खुल गए।

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