Posted on 21 April 2021 by admin
पांच राज्यों के इन विधानसभा चुनावों में प्रियंका गांधी कांग्रेस की सबसे बड़ी स्टार प्रचारक के तौर पर सामने आ रही थीं, असम और केरल जैसे राज्यों में उनकी सभाओं में अच्छी-खासी भीड़ जुट रही थी, एक तरह से लोगों में उनका करिश्मा चलने लगा था कि अचानक से उन्हें कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्षा यानी उनकी मां सोनिया गांधी की ओर से यह आदेश प्राप्त हुआ कि वे अपना फोकस यूपी तक ही सीमित रखें। कांग्रेस से जुड़े सूत्रों का दावा है कि दरअसल सोनिया गांधी चाहती हैं कि अगर केरल, असम और तमिलनाडु में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती है तो इसका एकमात्र श्रेय राहुल गांधी को ही मिलना चाहिए, जो इन राज्यों में काफी पहले से जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। सो, जब चुनाव प्रचार में दो दिन का समय शेष रह गया था तो प्रियंका ने स्वयं को पीछे कर लिया, कारण बताया गया कि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा की कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। जबकि प्रियंका की स्वयं की रिपोर्ट निगेटिव आई थी। सो, अब एक बदले परिदृश्य में प्रियंका ने अपना फोकस यूपी पर कर लिया है। जहां आने वाले 15,19,26 और 29 अप्रैल को पंचायत चुनाव होने हैं, इन चुनावों के नतीजे भी 2 मई को ही आने हैं। एक तरह से पंचायत चुनाव यूपी की भाजपा सरकार के लिए अग्नि परीक्षा साबित होंगे, खास कर पचिश्मी यूपी में कि किसानों का आंदोलन भाजपा को कितना नुकसान पहुंचा रहा है। वैसे भी यूपी विधानसभा चुनावों में भी अब कुछ महीनों का ही समय बचा है। यूपी के संभावित विधानसभा चुनावों को देखते हुए प्रियंका ने वहां 8 टीमें गठित की हैं। विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस सूत्रों की मानें तो प्रियंका ने इन संभावित उम्मीदवारों से कहा है कि ’निकाय चुनावों में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों को लड़ाने और जिताने की जवाबदेही आपकी है,’ वैसे भी इस वक्त कांग्रेस पार्टी फंड के कमी से जूझ रही है सो इन संभावित दावेदारों से यह भी कहा गया है कि ’निकाय चुनाव में अपने क्षेत्रों के उम्मीदवारों का खर्च भी वे स्वयं वहन करें।’ यानी एक तरह से दस जनपथ ने प्रियंका गांधी से साफ कर दिया है कि देश के नेता तो राहुल गांधी ही रहेंगे, वे अपने आपको सिर्फ यूपी तक ही सीमित रखें।
Posted on 21 April 2021 by admin
सियासत जब रंग बदलती है तो बड़े सियासी सूरमाओं के रंग भी उड़ जाते हैं, सूत्रों की मानें तो आने वाले कुछ समय में चिराग पासवान अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कर सकते हैं। पिछले दिनों बिहार में चिराग की लोक जनशक्ति पार्टी के एकमात्र विधायक राजकुमार सिंह ने नीतीश के जदयू का दामन थाम लिया है। राजकुमार से पहले भी लोक जनशक्ति पार्टी के कोई 200 से ज्यादा नेताओं ने नीतीश की शरण ले ली है। यहां तक कि चिराग की पार्टी के कई सांसद भी नीतीश के संपर्क में बताए जाते हैं, इनमें से एक नाम सूरजभान सिंह के भाई चंदन सिंह का भी है। यहां तक कि चिराग के अपने चाचा पशुपति पारस भी नीतीश के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखते हैं, क्योंकि कालांतर में नीतीश ने उन्हें बिना विधायक रहते अपनी सरकार में मंत्री बना दिया था। इसे देखते हुए चिराग की पार्टी और उनके परिवार में टूट का खतरा लगातार बना हुआ है। विधानसभा चुनाव से पहले बिहार भाजपा के कई बागी नेता लोजपा में शामिल हुए थे, जिसमें रामेश्वर चौरसिया से लेकर राजेंद्र सिंह तक के नाम लिए जा सकते हैं, चिराग ने बकायदा इन बागियों को लोजपा का टिकट भी दे दिया था, पर ये तमाम नेतागण चुनाव हार गए थे, अब ये भी अपने पुराने घर भाजपा में लौटने को बेकारार बताए जाते हैं। चिराग के समक्ष एक और रास्ता बचता है कि वे अपने मित्र तेजस्वी का हाथ थाम लें और राजद से गठबंधन कर लें। पर पूर्व में लोजपा का यह प्रयोग बिहार में पूरी तरह धराशायी हो गया था, जब 2004 के लोकसभा चुनावों में रामविलास पासवान ने लालू का हाथ थाम लिया था, तब पासवान की लोजपा महज़ चार सीट ही जीत पाई थी। सो, नीतीश ने इस दफे चिराग को अब तलक अपने निशाने पर रखा हुआ है, उनके रहते लोजपा का एनडीए गठबंधन में पुनर्वापसी मुमकिन नहीं, सो भाजपा के बड़े रणनीतिकारों ने चिराग को सलाह दी है कि ’वे अपनी पार्टी लोजपा का विलय भाजपा में कर दें, ताकि उन्हें केंद्र में मंत्री बन सकने से नीतीश चाह कर भी न रोक पाए।’ चिराग के पास अभी उम्र का साथ है, उन्हें लंबी राजनैतिक पारी खेलनी है, सो वे भाजपा के इस प्रस्ताव पर गंभीरता से मनन कर रहे हैं।
Posted on 07 April 2021 by admin
उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की रूखसती की इबारत तो साल भर पहले लिखी जा चुकी थी। कहते हैं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने त्रिवेंद्र सिंह के बारे में एक झन्नाटेदार रिपोर्ट पहले ही पार्टी हाईकमान को सौंप दी थी, जिसमें साफ तौर पर इस बात का उल्लेख था कि ’अगर इन्हें नहीं बदला गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार तय है।’ पर कोरोना महामारी की वजह से रावत को कोई साल भर की मुहलत मिल गई। त्रिवेंद्र की विदाई के पीछे कई कारण थे, मसलन नौकरशाही के ऊपर उनकी जरूरत से ज्यादा आत्मनिर्भरता, पार्टी कैडर की अनदेखी और भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप। एक आईएएस अधिकारी राधिका झा की त्रिवेंद्र के राज में इतनी तूती बोलती थी कि उन्हें सुपर सीएम कहा जाता था। त्रिवेंद्र के उत्तराधिकारी के तौर पर धन
सिंह रावत, रमेश पोखरियाल निशंक, अजय भट्ट, अनिल बलूनी समेत कई नाम चले, पर बाजी मारी एक अनजाने से चेहरे तीरथ सिंह रावत ने, जिनका 2017 के विधानसभा चुनाव में टिकट भी काट दिया गया था पर वे 2019 के लोकसभा चुनाव में पौढ़ी से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीत गए। तीरथ के नाम को आगे करने में डोभाल, संघ और निशंक की अहम भूमिका रही। डोभाल की नज़र कहीं पहले से पौढ़ी संसदीय सीट पर थी, जहां से वे अपने पुत्र शौर्य डोभाल को चुनाव लड़वाना चाहते हैं। कहा जा रहा है कि त्रिवेंद्र सिंह को चलता कर भाजपा शीर्ष ने अपने और कई मुख्यमंत्रियों को सीधा संदेश दिया है, ’काम करो या जाने के लिए तैयार रहो,’ यानी मनोहर लाल खट्टर, विप्लव देब, जयराम ठाकुर के ऊपर खतरे की तलवारें लटकने लगी हैं।
Posted on 07 April 2021 by admin
कांग्रेस के असंतुष्ट नेता गुलाम नबी आजाद की अगुवाई वाले फ्रंट ’जी-23’ में भले ही टूट हो गयी हो और इससे निकल कर शशि थरूर, जितिन प्रसाद जैसे नेता फिर से अपने हाईकमान की शरण में पहुंच गए हों, पर आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, विवेक तन्खा, भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे नेता ’जी-7’ की आड़ में अब भी आजाद के हाथों गुलाम बने हुए हैं। अब तो यह भी साफ हो गया है कि जिन राज्यों में चुनाव होंगे, उन राज्यों में ’जी-7’ के नेतागण अपनी ही पार्टी कांग्रेस के खिलाफ अलख जगाएंगे। आनंद शर्मा ने बंगाल चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ ट्वीट कर मोर्चा खोल दिया है। आने वाले समय में ’जी-7’ हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में रैलियां कर सकता है। कहा जा रहा है कि अगर हुड्डा चाहते तो हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार की नाक में दम कर सकते थे, पर हुड्डा की भंगिमाएं क्या बदली खट्टर सरकार ने पिछले दिनों अविश्वास प्रस्ताव आसानी से जीत लिया। कहते हैं हुड्डा सीबीआई और ईडी के अपने केस को लेकर खासे परेशान हैं। 1500 करोड़ रूपए के मनेसर जमीन घोटाले मामले की जांच अभी भी सीबीआई कर रही है, इसके अलावा ईडी ने भी इसी फरवरी माह में हुड्डा को ‘मनी लांडरिंग’ मामले में सम्मन किया है। कहते हैं परेशान हुड्डा आजाद की शरण में आए और आजाद ने भाजपा के एक बड़े नेता से बात कर हुड्डा को इन मामलों में फौरी राहत दिलवा दी है। गुलाम नबी आजाद भी जम्मू-कश्मीर विधानसभा का अगला चुनाव अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाकर लड़ सकते हैं, चुनाव पश्चात सरकार बनाने के दौर में वे भाजपा के साथ गठबंधन कर सकते हैं।
Posted on 31 March 2021 by admin
संघ रणनीतिकार एस.गुरूमूर्ति ने तमिलनाडु में भगवा आकांक्षाओं को चेहरा-मोहरा देने का काम शुरू कर दिया है। गुरूमूर्ति की सबसे बड़ी सफलता अम्मा की सहेली शशिकला को राजनीति से संन्यास लेने को प्रेरित करना है। सूत्रों की मानें तो पहले गुरूमूर्ति चाहते थे कि शशिकला के भतीजे दिनाकरण अन्नाद्रमुक में अपनी पार्टी का विलय कर दें और शशिकला की भी घर वापसी हो जाए, पर इस बात के लिए न पनीरसेल्वम और न ही पलानीस्वामी राजी हुए। शशिकला थेवर जाति से ताल्लुक रखती हैं, तमिलनाडु में इस जाति का वोट शेयर लगभग 10 फीसदी है। डीएमके और एआईडीएमके इन दोनों पार्टियों की नज़र इस वोट बैंक पर है, क्योंकि राज्य के 38 विधानसभा सीटों पर थेवर वोट निर्णायक होते हैं। शशिकला की रिटायरमेंट की खबर इसीलिए भी चौंकाने वाली थी कि कोई 10 दिन पहले ही शशिकला और टीटीवी दिनाकरण ने 2017 की उस याचिका को दुबारा खोलने की बात कही थी जिसमें अन्नाद्रमुक के नेतृत्व के फैसले को लेकर पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम दोनों घिरने वाले थे। भाजपा को यह भी लगता था कि अगर शशिकला दिनाकरण की पार्टी का प्रचार करती रही तो 60-70 सीटों पर इसका असर पड़ सकता है। पिछले 10 वर्षों में दिनाकरण की कुल संपत्ति 3.48 करोड़ से बढ़ कर 11.19 करोड़ रूपए हो गई है। शशिकला की 200 करोड़ रूपए से ज्यादा संपत्ति की जांच पहले ही ईडी और इंकम टैक्स विभाग कर रहे हैं। बेनामी संपत्तियों में शशिकला उनकी भाभी जे आईलवारसी, भतीजे वीएन सुधाकरण की भी 2000 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति का अलग से मामला है। सो, शशिकला को साध कर भाजपा ने एक बड़ा दांव चला है, थेवर वोट अगर अन्नाद्रमुक के पाले में आ जाते हैं तो भाजपा का अपना ब्राह्मण और अगड़े वोटों पर असर है। वहीं दूसरी ओर डीएमके को कांग्रेस, लेफ्ट, पीएमके समेत कई अन्य छोटे दलों के लिए भी सीटें छोड़नी पड़ रही हैं। पीएमके का असर वानियार जाति पर है। भाजपा कम समय में ही इन जातीय गणित को बूझ गई है।
Posted on 31 March 2021 by admin
’कभी समंदर भी जैसे प्यासे के पास चला जाता है
सियासत वह जरूरत है जिसमें गधे को भी बाप कहा जाता है’
आज ही रविवार के दिन कोलकाता के चर्चित ब्रिगेड ग्राउंड पर पीएम मोदी की रैली है, इस रैली को सफल बनाने के लिए भाजपा ने काफी पहले से ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है, सियासी खबरें गढ़ने में माहिर भगवा आर्मी ने पूरा माहौल बना रखा है, कि पीएम की रैली में बंगाल के सबसे चहेते दादा यानी सौरभ गांगुली भी शामिल हो सकते हैं, चूंकि सौरभ भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष भी हैं इस नाते गृह मंत्री अमित शाह से सौरभ के संवाद सेतु काफी पहले से जुड़े हुए हैं, सियासी खेल के अलावा क्रिकेट के खेल में शाह उतनी ही दिलचस्पी लेते हैं। पर वामपंथी रूझानों वाले गांगुली अब भी भगवा खेमे में आने से कतरा रहे हैं और अपने हालिया ‘एंजियोप्लास्टी’ का हवाला दे रहे हैं। सूत्र तो यहां तक दावा करते हैं कि अगर दादा को पीएम के मंच तक आने में तकलीफ हुई तो पीएम खुद दादा का खैर-मकदम पूछने उनके घर भी जा सकते हैं। मीडिया के लिए यह एक ‘पिक्चर परफेक्ट’ मौका होगा और अगर इसके बाद भी सौरभ सक्रिय राजनीति में नहीं उतरे तो भाजपा सौरभ के नाम का ‘इमोशनल कार्ड’ चल सकती है कि ’अगर राज्य की जनता ने भाजपा को जिताया तो सौरभ ही बनेंगे मुख्यमंत्री।’ दिलीप घोष और शुभेन्दु अधिकारी राज्य के दो उप मुख्यमंत्री सौरभ को राजनैतिक ककहरा सिखाने के लिए नियुक्त हो सकते हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में टीएमसी के 43 फीसदी के मुकाबले भाजपा का वोट शेयर 40 फीसदी था, पर ये वोट यकीनी तौर पर मोदी को दुबारा देश का पीएम बनाने के लिए थे, क्योंकि 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को महज़ 10 फीसदी वोट मिले थे। सो, दीदी की बढ़त को कम करने के लिए पीएम की सात मार्च की रैली में मिथुन चक्रवर्ती और प्रसेनजीत जैसे सितारे भी भाजपा ज्वॉइन कर सकते हैं। मिथुन को ममता राज्यसभा में लेकर आई थी, पर सारदा घोटाला में नाम आ जाने की वजह से मिथुन को अपनी राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा था। हालिया दिनों में मिथुन नागपुर जाकर संघ दरबार में शीश नवा आए हैं, भागवत से उनकी क्या बात हुई यह पूछे जाने पर मिथुन ने कहा था-’अध्यात्मिक बातें हुई हैं।’ पीएम की आज की रैली में साफ हो जाएगा कि क्या मिथुन चक्रवर्ती को अपने नए भगवान का पता मिल गया है?
Posted on 31 March 2021 by admin
अगर आपको याद हो तो अभी तीन-चार रोज पूर्व ही पीएम ने अपनी बंगाल की रैली में एक नया शिगूफा उछाला था कि ’पिछली दफे 3 मार्च को बंगाल चुनाव की घोषणा हुई थी, लगता है इस दफे 7 मार्च को चुनाव की अधिसूचना जारी होगी’ क्या मोदी जैसे अनुभवी नेता इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके अनुमान के कोई 10 दिन पहले ही विधानसभा चुनावों की अधिसूचना जारी हो सकती है, या उन्होंने बेहद चतुराई से अपना सियासी दांव चला और इस दांव में ममता जैसी पकी-पकाई नेत्री उलझ गईं। सूत्रों की मानें तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पास लोक लुभावन घोषणाओं की एक लंबी फेहरिश्त थी और पीएम के भाषण से दीदी के लोगों ने यह गलत कयास लगा लिया कि अभी उनके पास 10 दिनों का और वक्त बचा है। पर शुक्रवार को जैसे ही चुनाव आयोग की प्रेस वार्ता आहूत हुई ममता के रणनीतिकारों के पसीने छूट गए, चुनाव आयोग ने उन्हें कुछ सोचने का मौका ही नहीं दिया। बंगाल में 8 चरणों में मतदान का ऐलान केंद्रनीत सरकार के कठोर मंसूबों का ऐलान है। यानी बंगाल में चरण दर चरण चुनाव संगीनों के साए में होंगे, चौकसी इतनी होगी कि परिंदा भी पर ना मार सके। यानी तृणमूल कैडर के बेलगाम मंसूबों पर ब्रेक लगाने की पूरी तैयारी है। वैसे भी बंगाल चुनाव को भाजपा ने अपनी नाक का सवाल बना लिया है, सूत्रों की मानें तो केंद्र असम चुनाव खत्म होते ही यानी 6 अप्रैल के बाद कभी भी नागरिकता संशोधन कानून के नियमों को नोटिफाई कर सकती है यानी पश्चिम बंगाल के बचे हुए 5 चरणों के चुनाव में ’का’ बड़ा मुद्दा हो सकता है। असम में भी भाजपा को भरोसा है कि वहां उसकी दुबारा सरकार बन सकती है, क्योंकि वहां विपक्ष काफी बिखरा हुआ है। कांग्रेस और बदरूद्दीन अजमल के एआईयूडीएफ में समझौते के बाद भाजपा को भरोसा है कि वहां बड़े पैमाने पर वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है और हिंदू वोट थोकभाव में यहां भाजपा को मिल सकते हैं। वहीं कांग्रेस के पास तरूण गोगोई जैसा कोई करिश्माई नेता भी नहीं बचा है, उनके पुत्र गौरव गोगोई अभी बेहद युवा हैं और उनमें अनुभव की भी कमी है। इसके अलावा बोडो पीपुल्स फ्रंट, असमगण परिषद, आसू जैसे तमाम दलों के मैदान में होने से विपक्षी वोटों के बंटने का खतरा बना हुआ है, भाजपा इसका फायदा उठा सकती है।
Posted on 31 March 2021 by admin
जब से 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए अधिसूचना जारी हुई है, केंद्रनीत भाजपा सरकार का सारा ध्यान इन राज्यों के चुनावों पर फोकस हो गया है। इन चुनावों के नतीजे 2 मई को आने हैं, यानी केंद्र सरकार के प्रमुख रणनीतिकारों का फोकस षिफ्ट हो गया है। वैसे भी पिछले एक महीने से केंद्र सरकार ने किसानों से बातचीत की कोई पहल नहीं की है, तो वार्ता हो कैसे? कटाई का मौसम सिर पर है सो अधिकांश किसानों को अपने फसलों के कटाई की फिक्र सताने लगी है, आंदोलन की कमान जो पहले पंजाब-हरियाणा के अलग-अलग किसान संगठनों की सरपरस्ती में थी, आज उस पर टिकैत बंधुओं का आधिपत्य हो गया है, जो कभी संसद मार्च की बात करते हैं, तो कभी पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार की। वहीं ज्यादातर किसान इस राय के हैं कि उनका किसी राजनैतिक धारा से कोई लेना-देना नहीं, उनका सरोकार तो बस खेती किसानी से है। वहीं कुछ किसानों को लगता है कि यह महज़ भाजपा का गेम है कि उनके आंदोलन को पंजाब-हरियाणा की सरहदों में कैद कर दिया जाए। पर आंदोलन को नैतिक और भावनात्मक समर्थन देने वाले लोगों की तादाद में निरंतर इजाफा हो रहा है, वे सरकारी जांच एजेंसियों की धमक या सरकार के घायल गुरूर पर भी मरहम लगाने को तैयार नहीं। लिहाजा केंद्र सरकार भी मामले की नज़ाकत को भांपते हुए अब राजनाथ सिंह को किसानों से बातचीत के लिए भेज सकती है।
Posted on 31 March 2021 by admin
भले ही केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पेट्रो पदार्थों की आसमान छूती कीमतों को काबू में लाने के लिए इसे जीएसटी के दायरे में लाने की बात कर रहे हों और इस मामले को जीएसटी काऊंसिल में भेजने के लिए उत्सुक दिख रहे हों। पर यह मामला इतना आसान नहीं। अगर सचमुच पेट्रोल-डीजल जीएसटी के दायरे में आ जाता है तो इसकी कीमत आधी हो सकती है। सरकार को आयातित पेट्रोल 30 रूपए प्रति लीटर के आसपास मिलता है, अगर इसमें 5 रूपए डीलर कमीशन और हैंडलिंग चार्ज जोड़ दें तो यह 35 रूपए का हो जाएगा, इस पर अधिकतम 28 फीसदी जीएसटी भी लगा दी जाए तो इसमें 9.80 रूपए और जुड़ जाएगा, अगर इस पर 50 फीसदी केंद्र का सेस भी लगा दिया जाए तो 4.90 रूपए और, यानी पेट्रोल की कीमत फिर भी 50 रूपए से कम ही रह आएगी। पर केंद्र सरकार के मंसूबे और कुछ हैं, सरकार ने अपने ताजातरीन बजट में केवल पेट्रोल-डीजल से 3.60 लाख करोड़ रूपयों की टैक्स वसूली का लक्ष्य रखा है, ऐसे में पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने की संभावना ही मिथ्या लगती है।
Posted on 26 February 2021 by admin
क्या भारत की औद्योगिक राजधानी मुंबई नए सियासी दांव-पेंच के पेंचोखम में उलझ गई है? अब यह मांग जोरों से उठने लगी है कि मुंबई को महाराष्ट्र से अलग कर उसे केंद्र शासित प्रदेश यानी यूटी का दर्जा दे दिया जाए। इस पूरे बवाल की शुरूआत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के उस बयान से शुरू हुई जिसमें उन्होंने कहा था कि ’बेलागवी’ पर जब तक सुप्रीम कोर्ट का कोई निर्णय नहीं आता है उसको यूटी यानी केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया जाए, जिससे न उस पर कर्नाटक अपना दावा कर सकेगा और न ही महाराष्ट्र। ठाकरे के इस बयान के बाद कर्नाटक उबल पड़ा, कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सवाडी ने सबसे पहले मुंबई को कर्नाटक का हिस्सा घोषित करने की मांग उठाई, कर्नाटक के येदुरप्पा सरकार के दो अन्य मंत्रियों रमेश जर्की होली और शशिकला जोले ने भी सवाडी के सुर में अपने सुर मिला दिए। सनद रहे कि कर्नाटक बेलागवी क्षेत्र के कारबार, नियाणी जैसे कई हिस्सों में कन्नड़ से ज्यादा मराठी भाषा बोली जाती है, इनको मद्देनजर रखते ही उद्धव ने अपना इमोशनल कार्ड खेला था पर यह दांव उन्हें ही उल्टा पड़ गया। कालांतर में बंबई यानी आज के मुंबई का बांबे प्रेसीडेंसी एस्टेट का दर्जा हुआ करता था, जिसके कुछ हिस्सों को अलग कर कर्नाटक, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की नींव पड़ी थी। सनद रहे कि सन् 1960 में महाराष्ट्र आंदोलन के बाद बंबई को नवनिर्मित महाराष्ट्र राज्य की राजधानी घोषित किया गया था। हालांकि अभी कर्नाटक में भाजपा की सरकार है, पर पार्टी ने इस मुद्दे पर खामोशी ओढ़ रखी है, भाजपा जानती है कि मुंबई को छेड़ने से महाराष्ट्र में बवाल बढ़ सकता है, उस महाराष्ट्र में जहां की विधानसभा में अभी भाजपा के पास 105 विधायक हैं।