Posted on 29 June 2014 by admin
एक चर्चा यह भी है कि कई मंत्रियों के विभाग भी बदले जा सकते हैं, जिन्हंं उनके कद के मुकाबले कहीं हल्का विभाग मिला है, इस क्रम में उत्तर प्रदेश के सीनियर भाजपा नेता कलराज मिश्र का दावा सबसे मजबूत बताया जाता है, मौजूदा समय में वे सूक्ष्म लघु व मध्यम उद्योग मंत्री हैं, 27 तारीख को कलराज मिश्र ने अपने विभाग की ओर से एक प्रेजेंटेशन भी प्रधानमंत्री को उनके आधिकारिक निवास पंचवटी में दिया, समझा जाता है कि प्रधानमंत्री इस उम्र में भी मिश्र की सक्रियता के कायल हो गए। उसी तरह उमा भारती के मंत्रालय को भी बदला जा सकता है, मेनका गांधी की वरिष्ठता को देखते हुए उन्हें और महत्त्व का मंत्रालय दिए जाने की अटकलें तेज हैं। उसी प्रकार नितिन गडकरी का दावा रक्षा मंत्रालय को लेकर गंभीर बताया जाता है। पर मोदी को करीब से जानने वाले एक नेता का कहना है कि मोदी अपने मंत्रियों के विभागों के फेरबदल में कभी हड़बड़ी नहीं करते, वे अपने मंत्रियों को पूरा मौका दिए जाने के पक्षधर हैं, बतौर मुख्यमंत्री उनका गुजरात का कार्यकाल इस बात की पुष्टि करता है।
Posted on 21 June 2014 by admin
‘रेप’ के आरोप का सामना कर रहे केंद्रीय राज्य मंत्री निहालचंद अपने प्रति मोदी का इस कदर भरोसा देख सचमुच निहाल हैं। जब निहाल के ‘रेप’ का मसला मीडिया में बेतरह उछला तो निहालचंद मेघवाल ने प्रधानमंत्री से मिल कर उनके समक्ष अपने इस्तीफे का प्रस्ताव रखा, पर समझा जाता है कि मोदी ने जांच पूरी हो जाने तक उन्हें अपने पद पर ही बने रहने को कहा है। दरअसल,राजस्थान में गहलोत सरकार के दौरान निहालचंद को इस मामले में ‘क्लीनचिट’ मिल चुकी थी। सो, मोदी को लगता है कि निहाल मामले में वसुंधरा राजे ने कहीं पेंच अटकाया है। दरअसल इस बार जब राजस्थान में टिकटों का वितरण हो रहा था तो मोदी के भरोसेमंदों में शुमार होने वाले ओम माथुर ने मोदी से फोन कर निहालचंद के लिए टिकट मांगा था, जिन्हें वसुंधरा टिकट नहीं देना चाहती थीं, मोदी के हस्तक्षेप के बाद निहालचंद को टिकट मिल गया। अपनी अभूतपूर्व जीत के बाद जब मोदी अपनी संभावित कैबिनेट की गठन की कवायद कर रहे थे तो उन्होंने वसुंधरा से राजस्थान से 4-5 सांसदों के नाम मांगे थे, जिनको मंत्री बनाए जाने पर विचार किया जा सके। पर सूत्र बताते हैं कि वसुंधरा की ओर से सिर्फ एक नाम आया, वह भी उनके पुत्र दुष्यंत का, मोदी ने पहले ही साफ कर दिया था कि किसी भी नेता पुत्र-पुत्री को इस बार उनके कैबिनेट में जगह नहीं मिलेगी। सो उन्होंने वसुंधरा से दुष्यंत के अलावा अन्य नाम भेजने को कहा, पर वसुंधरा नहीं मानीं। उल्टे उन्होंने मोदी को कथित तौर पर धमकाते हुए कहा कि ‘फिर जाटों को आप ही संभालना, मैं कुछ नहीं करूंगी।’ मोदी ने इस बात का बेहद बुरा माना, उन्होंने तत्काल ओम माथुर को फोन लगाया और उनसे कहा कि ‘आपने एक व्यक्ति के लिए टिकट मांगा था, वह कहां है? उसे फौरन दिल्ली भेज दो’, तब निहाल की ढुंढाई शुरू हुई तब वे गंगानगर में थे, उन्हें फौरन दिल्ली तलब किया गया। मोदी को उनके सूत्रों ने खबर दी कि वसुंधरा ने एडीजी लॉ एंड ऑर्डर को बुलाकर कहा है कि निहालचंद के खिलाफ वारंट निकालो, और तब यह मामला तूल पकड़ गया, पर कहीं न कहीं मोदी ने इस मामले को अपनी नाक का सवाल बना लिया है। चुनांचे केंद्रीय जांच एजेंसियां निहालचंद को बचाने में जुट गई है, पर मोदी बनाम वसुंधरा के बीच एक अघोषित युध्द का शंखनाद तो हो ही चुका है।
Posted on 21 June 2014 by admin
हालिया लोकसभा चुनाव में अपने 7 में से 6 पार्टी उम्मीदवारों को जीत दिलवाने के बाद पिता-पुत्र द्वय यानी रामविलास व चिराग पासवान के हौंसले बेहद बुलंद हैं। रामविलास पासवान बतौर कैबिनेट मंत्री जहां अपने मंत्रालय को नया ‘लुक’ देने में व्यस्त हैं, वहीं चिराग पासवान पार्टी संगठन को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इस मामले में पासवान की पार्टी लोजपा को अव्वल माना जा सकता है कि उसने बिहार विधानसभा के आसन्न चुनावों के मद्देनजर प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया अभी से आरंभ कर दी है, जबकि गठबंधन की बड़ी पार्टी भाजपा ने अब तक यह तय नहीं किया है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में लोजपा को कौन-कौन सी सीटें दी जाएगी, पर लोजपा फिलवक्त सातों लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों पर अपना फोकस रख रही है, चिराग इस बात से इंकार कर रहे हैं कि नीतीश द्वारा जीतन मांझी एक दलित सीएम बनाए जाने के बाद दलित वोटों का ध्रुवीकरण जदयू के पक्ष में होगा। चिराग ने नीतीश के समक्ष चुनौती उछाली है कि अगर नीतीश को सचमुच प्रदेश के दलितों से इतना प्यार है तो वह जीतन मांझी को आने वाले चुनाव में जदयू के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करें। पिछले दिनों जदयू संसदीय दल ने नीतीश को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित करते हुए उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा की है।
Posted on 21 June 2014 by admin
सियासत जब रंग बदलती है तो तमाम दुश्वारियों को एक नया मुकाम मिल जाता है, पर पूर्र्ववत्ती यूपीए सरकार के लिए दुश्वारियों की नई इबारत लिखने वाले लोगों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिनके लिए अच्छे दिन अभी आए नहीं हैं। मसलन, मधु किश्वर, राम जेठमलानी, सुब्रह्मण्यम स्वामी, बाबा रामदेव आदि-आदि। सूत्र बताते हैं कि पिछले दिनों सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कथित तौर पर मोदी से मिल कर उनसे अनुरोध किया कि ‘मुझे कोई राोगार दे दो, नहीं तो एक बेराोगार के तौर पर मैं बहुत खतरनाक हो जाता हूं’ मााक-मााक में कही यह बात मोदी को कहीं गहरे चुभ गई, उन्हें लगा स्वामी अपरोक्ष तौर पर उन्हें धमकी दे रहे हैं। स्मृति ईरानी का इतना जोरदार विरोध मधु किश्वर के लिए भी घातक साबित हुआ है, मोदी के शपथ ग्रहण का निमंत्रण भी उन्हें बमुश्किल मिला था और अब तो जाहिरा तौर पर पीएमओ की ओर से सख्त हिदायत है कि किश्वर की किसी भी सिफारिश पर कान न धरा जाए। राम जेठमलानी का भी धड़ाधड़ चिट्ठियां लिखने में यकीन है, और ऐसी चिट्ठियां यदा-कदा मीडिया को ‘लीक’ भी हो जाया करती है, यह बात प्रधानमंत्री मोदी को बेहद नागवार गाुरती है। चुनाव प्रचार के दौरान बाबा रामदेव की कई भाव-भंगिमाएं मोदी को रास नहीं आई थी, सो अब अपने प्रति मोदी के बदले तेवर को देखकर बाबा अब ‘संन्यास मोड’ में आ गए हैं। सो, लगता है कि मोदी के कई चेहेतों के अच्छे दिन इतनी आसानी से नहीं आने वाले।
Posted on 21 June 2014 by admin
प्रकाश जावडेक़र सियासी नेपथ्य से बाहर आने के बाद अपने लिए संभावनाओं की नई जमीन तैयार कर रहे हैं, अब उनकी नज़र महाराष्ट्र पर टिक गई है। सो, यूं अचानक वे महाराष्ट्र की राजनीति में सक्रिय हो गए हैं, जावडेक़र जब दिल्ली में होते हैं तो उनका ऑफिस चुन-चुन कर मराठी पत्रकारों को मंत्री जी से मुलाकात के लिए बुलवाता है, और उन मराठी पत्रकारों को जावड़ेकर बेहद भरोसे के साथ यह समझाने का यत्न करते हैं कि माननीय मुंडे जी के आकस्मिक निधन के बाद भाजपा के पास महाराष्ट्र में ऐसा कोई चेहरा नहीं बचा है जिसे वह सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट कर सके। पिछले चुनाव में भी शिवसेना के मुकाबले भाजपा को दो सीटें ज्यादा मिली थी और अगर इस चुनाव में भी भाजपा गिनती में सेना के मुकाबले बड़े दल के तौर पर उभरती है तो सीएम भाजपा का ही होगा। मराठी पत्रकार गण इतना तो समझ ही रहे हैं कि प्रकाश जावड़ेकर आखिर कहना क्या चाह रहे हैं?
Posted on 21 June 2014 by admin
सूत्र बताते हैं कि सहाराश्री सुब्रत राय यूपी के दो कद्दावर नेताओं कांग्रेस के प्रमोद तिवारी और सपा के नरेश अग्रवाल से बेतरह नाराज हैं कि राय के मुश्किल वक्त में ये दोनों उनके काम नहीं आ पा रहे। जबकि नरेश अग्रवाल को राजनीति में स्थापित करने में और उनके पुत्र को सांसद बनवाने में सहाराश्री की एक अहम भूमिका रही थी। फिर प्रमोद तिवारी ने कथित तौर पर राय से कहा कि अगर वे उन्हें दिल्ली भेज दें तो वे उनके लिए कुछ कर पाएंगे, सूत्र बताते हैं कि प्रमोद तिवारी को राज्यसभा दिलवाने में भी सहाराश्री की एक महती भूमिका थी, पर अब जब कि सहाराश्री बेहद मुश्किल घड़ियों में हैं, न तो अग्रवाल और न ही तिवारी जी उनकी कोई खास मदद कर पा रहे हैं।
Posted on 21 June 2014 by admin
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की करीबी अर्चना डालमिया ने तेलगांना राष्ट्र समिति के चंद्रशेखर राव की पुत्री के मार्फत अपने राज्यसभा में आने का रास्ता प्रशस्त कर लिया था, वहीं अर्चना के बहनोई अमिताभ आधार जो कि सपा के कोषाध्यक्ष भी हैं, उन्होंने अपनी राज्यसभा के लिए टीआरएस प्रमुख से आश्वासन भी पा लिया था, पर ऐन वक्त वे मौके से चूक गए, मौका तो अर्चना डालमिया भी चूक गई हैं।
Posted on 15 June 2014 by admin
दिल्ली का निााम बदलने से बहुतों के लिए भले अच्छे दिन आ गए हों, पर अरुण शौरी के लिए न तो हालात बदले और न ही सियासत। सूत्र बताते हैं कि मोदी कैबिनेट में अपने लिए जगह न पाने से निराश शौरी वापिस पुणे की ल्वासा सिटी में रहने को चले गए हैं। चुनाव के बाद तो एक वक्त ऐसा लग रहा था कि शौरी ही देश के अगले वित्त मंत्री होंगे, कई अंग्रेजी न्यूज चैनल को दिए उनके इंटरव्यू भी इस बात की गवाही देते हैं। पर कालांतर में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के बारे में उनके निजी विचार ही उनकी राह के सबसे बड़े रोड़े साबित हुए, समझा जाता है कि अडवानी और सुषमा के बारे में शौरी का मानना था कि ‘इनकी कोई शख्सियत नहीं’, कहते हैं कि राजनाथ के बारे में उनका एक कथन खूब पॉपुलर हुआ था कि ‘ही इज फिट फॉर ए रेडियो अनांऊसर’ अरुण जेतली के बारे में भी उनके विचार कोई अच्छे नहीं थे। चुनांचे जब शौरी का नाम मंत्री बनने की लिस्ट में आया तो अडवानी, सुषमा, राजनाथ व जेतली ने समवेत स्वरों में विरोध की अलख जगाई और शौरी होम करते हाथ जला बैठे।
Posted on 15 June 2014 by admin
यह अभी पिछले दिनों संपन्न हुए संसद के विशेष सत्र की बात है, एक दिन जब सोनिया गांधी दस जनपथ से संसद भवन के लिए निकलने लगीं, तो उन्होंने जाते-जाते अपने निजी स्टॉफ से कहा कि वह पीएम का टाइम ले लें, और यह कह कर वह अपने कार में बैठ कर संसद भवन की ओर चल पड़ीं। संसद भवन पहुंच कर उन्हें ध्यान आया कि कहीं उनका निजी स्टॉफ मनमोहन सिंह की बजाए नरेंद्र मोदी का टाइम न ले लें, 10 साल पुरानी आदत तो छूटते-छूटते ही छूटेगी, क्योंकि अब से पहले सोनिया मनमोहन को ‘पीएम’ का ही संबोधन देती रही हैं, और जब से मनमोहन सिंह ने सात रेसकोर्स रोड से अपने मोतीलाल नेहरू मार्ग वाले घर में शिफ्ट किया है, सोनिया उनसे एक बार भी मिलने उनके घर नहीं गई थीं, चुनांचे सोनिया मनमोहन के नए घर में एक शिष्टाचार मुलाकात चाहती थीं। सो, संसद भवन पहुंचते ही सोनिया ने कार से ही अपने ऑफिस को फोन मिलाना शुरू कर दिया, पर फोन लगा नहीं, क्योंकि संसद भवन परिसर में ‘जैमर’ लगा हुआ होता है, सो अपनी कार से उतर कर वह बजाए संसद भवन के अंदर प्रवेश करने के, उस दिशा की ओर बढ़ चलीं जहां उनके मोबाइल फोन को थोड़ा-बहुत भी ‘सिग्नल’ मिल रहा था, फोन कनेक्ट हुआ तो सोनिया ने हड़बड़ी में अपने स्टॉफ से पूछा कि ‘उन्होंने किससे टाइम मांगा है?’ उधर से जवाब मिला कि ‘मुलाकात के समय के लिए नरेंद्र मोदी के दफ्तर को उनका आग्रह नोट करा दिया गया है’ सोनिया ने सिर पीट लिया और अपने ऑफिस से कहा कि वह जल्दी से पीएमओ में उनके इस आग्रह को कैंसिल कराए और मनमोहन सिंह का टाइम ले लें, ‘पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह’, सोनिया ने जोर देकर अपने स्टॉफ से कहा। तब कहीं जाकर भूल-सुधार का नया उपक्रम साधा जा सका, दस जनपथ से, पीएम हाउस को फोन गया कि कृपया सोनिया जी के मुलाकात के आग्रह को रद्द किया जाए, तब कहीं जाकर सोनिया गांधी आराम से संसद भवन में प्रवेश कर पाईं।
Posted on 15 June 2014 by admin
पराजय, सियासत की नई पटकथा की सबसे बड़ी सूत्रधार होती है। संसद में मात्र 44 सीटों वाली कांग्रेस को प्रदेश में अपने क्षत्रपों को संभालने में बड़ी मुश्किलें आ रही हैं, पार्टी के असंतुष्ट नेता बागी तेवर दिखा रहे हैं, मसलन महाराष्ट्र में नारायण राणे को इस बात की बड़ी उम्मीद थी कि चव्हाण की जगह उन्हें सीएम बनाया जाएगा, पर कांग्रेस हाईकमान की मनाही के बाद उनके हाव-भाव तनिक बदले-बदले से हैं, उनकी पार्टी छोड़ने की अटकलें तेज हो गई हैं। असम में भी पार्टी में भयंकर असंतोष है, यहां भी कभी भी पार्टी दो-फाड़ हो सकती है। उत्तराखंड और हरियाणा में कांग्रेस के कई विधायक और वरिष्ठ नेता भाजपा का दामन थामने को बेकरार हैं। यूपी और बिहार में भी विद्रोह के स्वर सुने जाने लगे हैं। कभी पानी पी-पीकर नरेंद्र मोदी को कोसने वाले ट्वीट की झड़ी लगाने वाले शशि थरूर का भी मन बदल गया है, वे मोदी के नए प्रशंसकों में शुमार हो गए हैं। सूत्र बताते हैं कि उन्होंने मोदी से मिलने का समय भी मांगा है, कांग्रेसी भी लगतार थरूर से दबी जुबान में पूछ रहे हैं कि जिस व्यक्ति (मोदी)ने उनकी पत्नी सुनंदा (अब दिवंगत) को 50 करोड़ की गर्ल-फ्रेंड कहा था, आज थरूर उसके कदमबोशी को कैसे तैयार हो गए हैं? जब कि भाजपा से जुड़े सूत्र खुलासा करते हैं कि शशि थरूर के लिए भाजपा में अपार सियासी संभावनाएं हैं, उन्हें पार्टी अपने दक्षिण का चेहरा बना सकती है, और अगर उन्हें भाजपा में शामिल होने के लिए अपनी लोकसभा की सदस्यता छोड़नी भी पड़ती है तो कोई बात नहीं, पार्टी उन्हें राज्यसभा में लाकर कांग्रेस को एक माकूल जवाब दे सकती है।