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भाजपा-संघ रिश्तों की नई तान छेड़ेंगे कृष्ण गोपाल

Posted on 21 October 2014 by admin

महाराष्ट्र और हरियाणा में भगवा परचम लहराने के बाद भाजपा और संघ के रिश्तों में एक नया आयाम देखा जा सकता है। पर सबसे खास बात यह है कि इन रिश्तों की गांठ-गिरह खुलने लगी हैं, मोदी और भागवत के अंतर्संबंधों से संघ-भाजपा के बीच एक नया ताना-बाना बुना जाने लगा है। भाजपा व संघ के बीच रिश्तों में सेतु बनाने का कार्य अब कृष्ण गोपाल ने संभाल लिया है, जो मथुरा के ब्राह्मण हैं और जिन्हें संघ प्रमुख मोहन भागवत का सौ फीसदी विश्वास हासिल है। सुरेश सोनी ने लंबे समय तक भाजपा इंचार्ज का जिम्मा संभाले रखा था, उनके जाने की अटकलें पिछले 2 वर्षों से सुनी जा रही थीं, पर व्यापाम घोटाले की व्यापकता से उनका आभामंडल धूमिल पड़ गया। सो, इतना तो तय है कि सोनी के जाने का असर भाजपा के कई नेताओं के राजनैतिक भविष्य पर देखा जा सकेगा। सब जानते हैं कि सोनी अरुण जेतली और राजनाथ सिंह के सबसे करीबियों में शुमार होते थे, सुरेश सोनी के खास वफादारों में जेतली, राजनाथ के अलावा वेंकैया नायडू, अनंत कुमार, रवि शंकर प्रसाद, धमर्ेंद्र प्रधान, पीयूष गोयल, प्रकाश जावड़ेकर, निर्मला सीतारमण व देवेंद्र फड़नवीस का नाम लिया जा सकता है। महाराष्ट्र के दिवंगत ओबीसी नेता गोपीनाथ मुंडे भी सोनी की ‘गुडबुक’ में थे। सनद रहे कि यह सुरेश सोनी ही थे जिन्होंने विदर्भ के एक जन नेता और कुशल वक्ता सुधीर मुंगातिवार की कीमत पर देवेंद्र फड़नवीस को भगवा राजनीति में तेजी से आगे बढ़ाया था।

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मोदीत्व का ताना-बाना

Posted on 21 October 2014 by admin

यूपीए के शासनकाल में एक बार अडवानी ने अपने एक मुंहलगे पत्रकार से दिल की बात कही थी और फर्माया था कि कांग्रेस का ग्राफ देशभर में जिस तेजी से गिर रहा है, उस अनुपात में भाजपा का ग्राफ उतनी तेजी से उठ नहीं पा रहा है। अडवानी को लगता है कि कांग्रेस जिस ‘स्पेस’ को खाली कर रही है वहां क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व कायम हो रहा है। उस वक्त नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उन्हें भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने की राह में तमाम तरह की अड़चनें थीं, फिर भी मोदी तब अपने करीबियों से कहा करते थे कि ‘अगर भाजपा हिंदी हार्टलैंड की पार्टी है तो उसे यहां भी किसी न किसी सहारे या बैसाखी की जरूरत क्यों है?’ जाहिर है तब मोदी का इशारा नीतीश की ओर भी था, तब मोदी को इस बात को लेकर भी चिंता थी कि दक्षिण, पश्चिम व पूर्वोत्तर में भी भाजपा में वह दमखम नहीं। सो, मोदी ने उसी वक्त तय कर लिया था कि लोकसभा चुनाव 2014 के चाहे जो भी नतीजे रहे, भाजपा अकेले अपने दम पर पूरे देश में आगे बढ़ेगी। क्योंकि भाजपा के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, सिवा 75 पार नेताओं की उदात्त महत्त्वाकांक्षाएं। सो अब हरियाणा, महाराष्ट्र के बाद मोदी-शाह द्वय का सारा जोर पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के चुनावों को लेकर रहेगा। पंजाब में भी पार्टी ने ‘एकला चलो’ का ताना-बाना बुन लिया है। सो, दक्षिण में भी मोदी को न द्रमुक चाहिए न अन्नाद्रमुक, ओडिशा में भी भाजपा संगठन को नए सिरे से परवान चढ़ाया जा रहा है, मोदी-शाह को उनके इस भगीरथ कार्य में संघ की पूरी मदद मिल रही है, क्योंकि संघ की शाखाएं और इसके लोग देश-विदेश तक फैले हैं।

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रामलाल की जगह शिव प्रकाश

Posted on 21 October 2014 by admin

सुरेश सोनी के जाने की अनुगूंज बहुत जल्दी ही भाजपा में सांगठनिक स्तर पर भी दिखाई और सुनाई देने लगेगी। वैसे लोग जिन्हें कहीं न कहीं पार्टी और संगठन में सोनी का वरदहस्त प्राप्त था, उनकी कुर्सी डगमगाने लगेगी, ठीक वैसे ही जैसे भाजपा के संगठन महासचिव रामलाल के जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। सनद रहे कि रामलाल सोनी के खास वफादारों में शुमार होते थे और उन्हें संगठन महासचिव बनवाने में तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की उतनी ही महती भूमिका थी। सूत्र बताते हैं कि रामलाल की जगह लेने के लिए मुरादाबाद के ठाकुर द्वारा के रहने वाले शिव प्रकाश सिंह का नाम सामने आ रहा है। ये पूर्व में पश्चिमी यूपी के क्षेत्र प्रचारक भी रह चुके हैं, माना यह भी जाता है कि ‘लव जिहाद’ के हालिया थयोरी के जनक भी यही रहे हैं। शिव प्रकाश के राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ से कतिपय बहुत मधुर संबंध हैं, संघ के शीर्ष नेतृत्व ने बहुत सोच विचार कर इस साल के जुलाई में राम माधव और शिव प्रकाश को भाजपा में एंट्री दिलवाई थी ताकि संघ भगवा पार्टी पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रख सके। चुनांचे अगर शिव प्रकाश रामलाल की जगह लेते हैं तो उन्हें कई नई चुनौतियों से रूबरू होना पड़ सकता है।

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संघ को मिलेगा नया चेहरा

Posted on 21 October 2014 by admin

भाजपा व संघ के अंतर्संबंधों को एक नई परिभाषा देने की जद्दोजहद शुरू हो चुकी है। कृष्ण गोपाल ने संबंधों को एक बदला कलेवर देने के लिए अपनी रणनीति बुन ली है, और उनकी इस रणनीति में पक्के तौर पर मोहन भागवत की उदात्त महत्त्वाकांक्षाएं भी समाहित हैं। सनद रहे कि अब से पहले तक संघ व भाजपा में तालमेल का संपूर्ण जिम्मा सुरेश सोनी का था, पर भाजपा में उनको इतने चाहने वाले थे कि वे संघ की बजाए भाजपा की ज्यादा पैरवी करते दिखते थे, उनकी इसी आदत से भागवत उनसे नाराज रहा करते थे। सुरेश सोनी को जब लगा कि उनका अब अपने पद पर बने रहना मुश्किल है तो उन्होंने अपनी जगह दत्तात्रेय होसबोले को भाजपा का इंचार्ज बनाए जाने की वकालत की, सनद रहे कि दत्तादेत्र की निगाहें कहीं दूर की कौड़ी पर हैं और भाजपा में भी उनको चाहने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है। समझा जाता है कि अनंत कुमार को अपने मंत्रिमंडल में रखने के लिए मोदी तैयार नहीं थे, वह तो दत्तात्रेय के दबाव बनाने पर मोदी अनंत को अपने कैबिनेट में शामिल करने को राजी हुए, पर इस शर्त के साथ कि दत्तात्रेय अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनवाने के लिए संघ के शीर्ष नेतृत्व में सर्वानुमति बनाने का काम करेंगे। क्योंकि स्वयं सर संघ चालक मोहन भागवत इस राय के बताए जा रहे थे कि प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष को एक ही प्रदेश से नहीं होना चाहिए पर सोनी और दत्तात्रेय के दबाव के आगे भागवत झुक गए। सो, जब सोनी ने भाजपा का प्रभार संभालने के लिए दत्तात्रेय का नाम चलाया तो भागवत ने अपने वीटो का इस्तेमाल करते हुए कृष्ण गोपाल के नाम पर रजामंदी की मुहर लगा दी। भागवत का स्पष्ट तौर पर मानना है कि संघ भाजपा का अनुषांगिक संगठन नहीं है, अत: संघ की ओर से कमान किसी ऐसे नेता के हाथों में होनी चाहिए जो भाजपा नेताओं को आदेश दे सके। कृष्ण गोपाल सोनी के मुकाबले ज्यादा व्यवहार कुशल हैं और उनके भागवत और मोदी दोनों से ही मधुर संबंध हैं।

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पांच का दम!

Posted on 21 October 2014 by admin

भाजपा और संघ के बीच संबंधों की नवअंकुरित श्रृंखला में 5 ऐसे लोग शामिल हैं जो सरकार और संगठन के महत्त्वपूर्ण फैसलों में अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं। इस पंच मंडली में नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत के अलावा कृष्ण गोपाल, अमित शाह और जेपी नड्डा की एक महती भूमिका है। कृष्ण गोपाल संघ की ओर से भाजपा का प्रभारी होने के साथ सह सरकार्यवाह भी हैं।

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मोदी सब जानते हैं!

Posted on 13 October 2014 by admin

मोदी फैंस क्लब के पुराने लोगों को मोदी सरकार के अभ्युदय के बाद भर-भर कर काम भी मिल रहा है और उसका दाम भी, पर वे अब भी नाम की पहचान से जूझ रहे हैं। अब अशोक मलिक का ही उदाहरण ले लें, उन्हें बड़ी उम्मीद थी कि उन्हें पीएमओ में कोई रसूखदार पद मिलेगा। पर उनकी भावनाओं की अनदेखी करते मोदी ने उन्हें राम माधव का साथ ‘अटैच्ड’ कर दिया यानी वे मोदी की विदेश नीति को नई पहचान देने में दिलोजां से जुटे हैं, इन दिनों वे आस्ट्रेलिया में हैं और प्रधानमंत्री के संभावित आस्ट्रेलिया दौरे को धार देने में जुटे हैं। वे मोदी के एक थिंक-टैंक के मानिंद आचरण कर रहे हैं, पर उस आचरण को अब तक कोई औपचारिक पहचान नहीं मिल पाई है। अब मोदी-ब्रिगेड के एक और महत्त्वपूर्ण सदस्य स्वप्नदास गुप्ता की मिसाल ले लें, बहुत शोर था कि वे लंदन में भारत के उच्चायुक्त बनेंगे या प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार की नई भूमिका में अवतरित होंगे, पर हुआ क्या? कंचन गुप्ता भी ऐसा ही कुछ चाहते थे, पर मोदी गान के तमाम ऊफान के बाद भी वे फिलवक्त ठंडे बस्ते में ही हैं। सूर्या प्रकाश भी मोदी करीबियों में शुमार होते हैं, बहुत चर्चा थी कि उन्हें प्रसार भारती का सीईओ बनाया जाएगा, पर नतीजा क्या रहा, वही ढाक के तीन पात। वैसे ही तरुण विजय, शेषाद्रिचारी जैसे लोगों का भी यही हश्र है। यानी ऐसे लोग जो किसी न किसी बड़े सरकारी पद की आकांक्षा पाले हुए थे, मोदी ने उसे ‘बाबा जी का ठुल्लू’ थमा दिया। पर मोदी ने इतना जरूर किया है कि अपने ब्रिगेड के ऐसे लोगों को व्यस्त रखने के लिए उन्हें किसी न किसी महत्त्वपूर्ण नेता के साथ अनौपचारिक तौर पर जोड़ दिया है, मोदी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि सरकार के खर्च पर अपने मित्रों को उपकृत करने का प्रधानमंत्री का कोई इरादा नहीं।

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डोवल को मंत्री पद का दर्जा क्यों नहीं?

Posted on 13 October 2014 by admin

प्रधानमंत्री के प्रिंसीपल सेक्रेटरी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल भले ही मोदी की आंखों के तारे हों और हालिया दिनों में 5 जनपथ पर उन्हें एक बड़ा बंगला रहने को आवंटित कर दिया गया हो, पर सवाल यह सबसे मौजू है कि आखिरकार क्यों अब तलक उन्हें मंत्री का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है? सनद रहे कि जब एनडीए के शासनकाल में तब के लोकप्रिय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने खासमखास ब्रजेश मिश्र के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद सृजित किया था, तब मिश्र को भी मंत्री का दर्जा हासिल था, बाद में केंद्र में आई यूपीए-I और यूपीए-II सरकारों में भी इस परंपरा का निर्वहन हुआ। पर सवाल बड़ा है कि आखिरकार अजीत डोवल को क्यों अब तलक मंत्री पद से महरूम रखा गया है? क्या इसके पीछे मोदी की कोई सुविचारित नीति काम कर रही है?

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सत्यार्थी के सच!

Posted on 13 October 2014 by admin

‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के प्रणेता कैलाश सत्यार्थी को नोबल शांति पुरस्कार मिलना जहां देश के लिए गौरव की बात है, वहीं आने वाले दिनों में यह विवाद गर्मा सकता है कि नोबल की रेस में कैलाश से बेहतर कई और लोग शामिल थे, कैलाश सत्यार्थी के कुछ पुराने साथी कई नए सवाल उछालने जा रहे हैं कि क्या कैलाश के लिए तमाम लॉबिंग ‘क्रिश्चियन लॉबी’ ने की? कुछ लोगों के ये भी आरोप हैं कि कालीन उद्योग का सत्यानाश करने का श्रेय भी सत्यार्थी को जाता है, बालश्रम की दुहाई देकर भारत के अरबों करोड़ के निर्यात वाले कालीन उद्योग का जानबूझ कर भट्ठा बिठा दिया गया। सूत्रों का यह भी दावा है कि जब सत्यार्थी के साथ उनके सहयोगी की भूमिका में स्वामी अग्निवेश जुड़े तो ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ को एक व्यापक आयाम मिला, और इस पूरे आंदोलन को व्यापकता देने और उसकी जमीन तैयार करने में अग्निवेश की एक महती भूमिका थी, पर कहते हैं कि अग्निवेश का भगवा वस्त्र धारण करना पश्चिमी देशों खास कर क्रिश्चियन लॉबी को पसंद नहीं आया। ऐसे में कैलाश सत्यार्थी ने अपने लिए इस लॉबी में एक खास जगह बना ली, कैलाश के लिए यही लॉबी पिछले 14 वर्षों से निरंतर प्रयास कर रही थी। कहते हैं कि सन् 2006 में तो कैलाश सत्यार्थी नोबल की अंतिम 10 लोगों की सूची में चयनित हो गए थे। पर नोबल कमेटी को उनके आंदोलन की व्यापकता को लेकर संदेह था, चुनांचे इस संदेह निवारण के लिए पूरी क्रिश्चियन लॉबी एकजुट हो गई और अब परिणाम सबके सामने है। भले ही इस प्रक्रिया में तकरीबन 8 वर्षों का वक्त क्यों नहीं लग गया हो।

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थरूर की ठौर मुश्किल में

Posted on 13 October 2014 by admin

सुनंदा पुष्कर की रहस्यमय मौत के मामले में नई मेडिकल रिपोर्ट से शशि थरूर की परेशानियां यकीनन बढ़ गई लगती हैं, अब उनके लिए नई जांच से बच पाना उतना आसान नहीं होगा और न ही सिर्फ मोदी की तारीफें उन्हें बचा पाएगी, इस पूरे मामले में दो अहम बिंदु हैं कि आखिरकार होटल लीला के क्लोज सर्किट कैमरे क्यों नहीं काम कर रहे थे, जो ये रिकार्ड कर पाने में नाकाम रहे कि कौन संदिग्ध सुनंदा के रूम तक आए? यानी होटल की गैलरी में कैमरे उन्हें कैप्चर ही नहीं कर पाए, ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या जान-बूझकर ऐसे होटल में उन्हें ठहराने का इंतजाम किया गया था? और अगर सुनंदा अपने मृत्यु के रात्रि सचमुच इतनी बीमार थीं तो आखिरकार क्यों थरूर उन्हें अकेला छोड़ कर दिनभर के लिए गायब हो गए। सूत्रों का दावा है कि सुनंदा को जिस जहर देने का जिक्र हो रहा है, हो न हो वह एक किस्म का रूसी जहर है, रक्त या विसरा में जिसकी मौजूदगी की थाह पाना बेहद मुश्किल होता है, यही वजह है कि जांच एजेंसियां इस पूरे मामले में किसी विदेशी एजेंसी की भूमिका से भी इंकार नहीं कर रही है।

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प्रियंका गांधी डॉट कॉम

Posted on 13 October 2014 by admin

प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाने की यह एक महत्त्वपूर्ण कवायद है, जल्द ही ‘प्रियंका गांधी डॉट कॉम’ नामक एक वेबसाइट लांच होने जा रही है, इस वेबसाइट के माध्यम से कांग्रेसी कार्र्यकत्ता सीधे प्रियंका से अपने संवाद स्थापित कर पाएंगे। उत्साही पत्रकारों के लिए भी एक सुविधा हो सकती है कि वे प्रियंका से अपने सवाल-जवाब का क्रम यहां स्थापित कर सकते हैं। अगले वर्ष सोनिया गांधी का अध्यक्षीय कार्यकाल पूरा हो रहा है। सो, राहुल ब्रिगेड के लोग चाहते हैं कि तब सोनिया पार्टी की संरक्षक की भूमिका में आ जाएं और बतौर अध्यक्ष पार्टी की कमान राहुल को सौंप दी जाए, रही बात प्रियंका की तो उन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि राहुल के नेतृत्व में काम करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं, चुनांचे प्रियंका को भी वैसी सूरत में पार्टी में कोई महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

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