Posted on 15 November 2014 by admin
केंद्रीय महिला और बाल कल्याण मंत्रालय के पास देश-विदेश से अनाथ बच्चों को गोद लेने के लिए बड़ी संख्या में आवेदन आ रहे हैं। इसको देखते हुए मंत्रालय ने देश के सभी सरकारी सहायता प्राप्त अनाथ आश्रमों को पत्र लिख कर उनसे वैसे बच्चों की सूची मांगी है जिन्हें गोद दिया जा सकता हो, पर हैरानी की बात यह है कि इस बाबत ज्यादातर अनाथ आश्रम टाल-मटोल कर रहे हैं और ऐसे बच्चों की सूची देने में आनाकानी कर रहे हैं, कई कह रहे हैं कि उनके पास उतने बच्चे ही नहीं है जिन्हें गोद दिया जा सके। जबकि सच्चाई यह है कि ये आश्रम लगातार बच्चों के भरण-पोषण के नाम पर सरकार से अनुदान प्राप्त कर रहे हैं, आखिर जिन बच्चों के नाम पर अनुदान लिया जा रहा है, वे बच्चे कहां गए, अगर बच्चे नहीं हैं तो फिर अनुदान क्यों? या बच्चे गोद देने में इतनी आनाकानी क्यों? क्या पिछले दरवाजे से बच्चों की खरीद-फरोख्त हो रही है? इसे देखते हुए मंत्रालय गोद कानून में एक बड़े बदलाव का मसौदा केंद्रीय कैबिनेट में पेश करने जा रहा है।
Posted on 10 November 2014 by admin
यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वर्णिम उद्धोष के पल हैं, मोदी राज आते ही देश भर में इसकी तूती बोल रही है और पिछले तीन-चार महीनों में न सिर्फ संघ की नियमित शाखाओं का विस्तार हुआ है अपितु संघ स्वयंसेवकों की संख्या में भी खासा इजांफा हुआ है। माना जाता है कि मौजूदा वक्त में संघ और इसके आनुषांगिक संगठनों से जुड़े स्वयं सेवकों की संख्या देश-विदेश में कोई 50 लाख के आसपास है। संघ की कोशिश इस संख्या को 1 करोड़ के पार ले जाने की है। समझा जाता है कि संघ को मिल रहे गुरु दक्षिणा में भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज हुई है। संघ से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इस दशहरे के मौके पर सिर्फ गुरु दक्षिणा के मद में संघ की आमद कोई 60 करोड़ के आसपास थी। अन्य स्त्रोतों से मिल रही मदद, अनुदान व चंदे की रकम को मिलाकर यह आंकड़ा सौ करोड़ के भी पार जाता है। संघ के पास इस वक्त कोई 3 हजार पूर्णकालिक प्रचारक हैं, जिनकी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी संघ उठाता है। इन दिनों बड़े कॉरपोरेट्स और अनिवासी भारतीय संघ को चंदा देने के मामले में जिस तरह की उदारता दिखा रहे हैं, कहना न होगा कि आने वाले दिनों में संघ के हौंसले और उसकी उड़ान को नए पंख लग सकते हैं।
Posted on 10 November 2014 by admin
संघ के बढ़ते प्रभुत्व और प्रभाव का एक नजारा पिछले दिनों मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कांम्पलेक्स में देखने को मिला, जहां छत्रपति शिवाजी के जीवन पर आधारित एक नाटक ‘जानता राजा’ का हजारवां शो आयोजित था, हालांकि इस ‘प्ले’ से जानबूझ कर मीडिया को दूर रखा गया, पर शो को यादगार बनाने के लिए ‘बांबे इलिट क्लब’ समेत 200 गणमान्य लोगों को न्यौता भेजा गया। मुकेश अंबानी, कुमार मंगलम जैसे धन कुबेर अप्रत्याशित तौर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के बगलगीर दिखे। महाराष्ट्र के नए नवेले मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नीस और उनकी सरकार के एक अहम मंत्री विनोद तावड़े के अलावा वहां प्रांत प्रचारकों की मौजूदगी भी देखी गई। इस मौके पर फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण लोगों की उपस्थिति भी देखी गई। मसलन, अभिनेता रितिक रोशन और फिल्म निर्माता निर्देशक सुभाष घई इस पूरे कार्यक्रम में बेहद उत्साह से भाग लेते देखे गए। सुरेश सोनी की भले ही गद्दी छिन गई हो, पर संघ में उनकी पूछ कम नहीं हुई है, वे भी इस मौके पर खास तौर पर पधारे थे। सनद रहे कि सोनी इन दिनों ‘ट्रांन्सर्फर ऑफ पॉवर’ की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और वे भाजपा के नए संघ प्रभारी कृष्ण गोपाल को भाजपा-संघ अंतर्संबंधों की बारीकियों समझाने में जुटे हैं। शाम के 6 से साढ़े 6 बजे तक भागवत का संबोधन और नाटक का इंट्रोडक्शन था। हालांकि यह पूरा नाटक मराठी में था, मराठी न तो मुकेश अंबानी को समझ में आती है और न ही कुमारमंगलम बिड़ला को, और न ही रंगकर्म से इनका कोई जुड़ाव ही है। पर रंग बदलती सियासत की अनलिखी इबारतों को पढ़ पाने की महारथ होती है धन कुबेरों में, सो जब तक नाटक चलता रहा, कोई भी नहीं हिला, दो-ढाई घंटे बाद जब इसकी समाप्ति हुई तो अंबानी, बिड़ला सभी इस नाटक की तारीफों के पुल बांधते नजर आए, आज सियासत से बड़ा रंगमंच कुछ भी नहीं और अदाकरी चाहे असल जिंदगी में हो या रंगकर्म का हिस्सा बनकर, उससे गुजर कर जो आगे बढ़ता है सत्ता के कंगूरे झुक कर बस उन्हें ही सलाम बजाते हैं।
Posted on 10 November 2014 by admin
सियासत के माहिर खिलाड़ी नितिन गडकरी दीवार पर लिखी इबारत कहीं पहले पढ़ लेने में माहिर है, चुनांचे आज होने वाले मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल की आहटें उन्हें कहीं पहले लग गई थी और उन्हें इस बात का भी बखूबी इल्म हो गया था कि जिस रक्षा मंत्रालय पर उनकी नार है, मोदी वहां किसी निर्विवाद छवि के नेता को लाना चाहते हैं, मनोहर पर्रिकर का चुनाव सिर्फ व सिर्फ मोदी का था। सो गडकरी ने काफी पहले से अपना ध्यान शिपिंग व परिवहन पर टिका लिया था, ग्रामीण विकास मंत्रालय में वे कम ही दिलचस्पी दिखा रहे थे। सो गडकरी का इन दिनों सारा ध्यान सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट पर टिक आया है। एक लाख करोड़ से भी ज्यादा रकम वाले इस प्रोजेक्ट को हवा देकर गडकरी ने पार्टी में भी अपने लिए कुछ नए विरोधी तैयार कर लिए हैं, जिनका साफ तौर पर मानना है कि यह प्रोजेक्ट पर्यावरण के लिए खतरा साबित हो सकता है और अगर मालवाहक जहाजों के आवागमन के लिए वैकल्पिक मार्ग को और चौड़ा बनाने की चेष्टा हुई तो इससे श्रीलंका के समुद्र में समाने का खतरा बढ़ सकता है। जबकि गडकरी जोर देकर कह रहे हैं कि ‘वे एक ऐसा मार्ग तैयार करवाएंगे जिससे सेतु समुद्रम के मौजूदा स्वरूप को कोई खतरा नहीं होगा, राम सेतु जस का तस बना रहेगा।’ सनद रहे कि भारत व श्रीलंका के बीच इस प्रोजेक्ट को 2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने शुरू किया था, तमाम सियासी हंगामों के बीच 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी, यूपीए सरकार इसे 30 मीटर चौड़ा, 12 मीटर गहरा, तथा 167 किलोमीटर लंबा बनाने का प्रस्ताव लेकर आई थी, जिसका भाजपा समेत अनेक पर्यावरणविदों ने जमकर विरोध किया था और कहा था इस प्रोजेक्ट से समुद्री जीवन और पड़ोसी मुल्क श्रीलंका को खतरा है। गडकरी जैसे राजनेताओं से यह उम्मीद करनी चाहिए कि वे अतीत की गलतियों से जरूर सबक लेंगे।
Posted on 10 November 2014 by admin
अमित शाह के रूप में भाजपा को एक ऐसा अध्यक्ष मिला है, जिन्हें अंग्रेजीदां व हाई-फ्लाई लोगों की जगह जमीन से जुड़े लोग पसंद है। शाह को निजी रूप से न तो फाईव स्टार कल्चर पसंद है और न ही फाईव स्टार होटलों में रूकना। पर वे खाने-पीने के बहुत शौकीन है, बंगाली मार्केट के गोल गप्पे खास तौर पर उन्हें बहुत पसंद है। दिल्ली के गोल गप्पों के स्वाद तब से उनकी जुबान पर चढ़ गया है जब अपने मुश्किल दिनों में गुजरात निकाला के दौर में वे कानूनी सलाहों के लिए भूपेंद्र यादव के सेंट्रल दिल्ली स्थित दफ्तर जाया करते थे, वहां से ये दोनों फिर चाट व गोल गप्पों के लिए बंगाली मार्किट निकल जाया करते थे। पर अमित शाह के परिवार को दिल्ली के बजाए गुजरात ज्यादा भाता है। पर उनकी पत्नी सोनल और बेटे जय को फिल्मों का बहुत शौक है, मां-बेटे फर्स्ट-डे, फर्स्ट-शो देखने में पारंगत है। जय स्टॉक ब्रोकर हैं और अपने पुश्तैनी कारोबार को संभालते हैं। अहमदाबाद में 10 फरवरी को जय की शादी आहूत है, इस विवाह की तैयारियों में पूरा शाह परिवार जुटा है, अपनी तमाम राजनैतिक व्यस्तताओं में से समय निकालकर अमित शाह गाहे बगाहे जय की शादी की तैयारियों का जायजा लेना नहीं भूलते।
Posted on 10 November 2014 by admin
उत्तराखंड के कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत सियासत के माहिर खिलाड़ी बनकर उभरे हैं, एक अनार, सौ बीमार की तर्ज पर जब उत्तराखंड से एक मात्र राज्यसभा सीट का नंबर आया तो इसको लेकर पार्टी नेताओं में घमासान मच गया, रावत यूं तो यह सीट अपनी पत्नी रेणुका रावत को देना चाहते थे, पर जब उन्होंने देखा कि इस सीट को लेकर पार्टी के बड़े नेताओं में इस कदर खींचतान मची है तो उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए। इस सीट पर राजीव शुक्ला, राज बब्बर, रीता बहुगुणा जोशी, विजय बहुगुणा जैसे नेताओं की नारें टिकी थीं। रावत करीबी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय भी इसके लिए अपना दावा पेश कर रहे थे। पर हरीश रावत ने अपनी वफादार मनोरमा शर्मा उर्फ मनोरमा डोबरियाल का नाम आगे लाकर सारे पांसे पलट दिए। मनोरमा 10 साल से रावत की वफादार बनी हुई हैं। दो बार मेयर और जिला परिषद की अध्यक्षा रह चुकी हैं। पौढ़ी की हैं, ब्राह्मण हैं, महिला हैं, विजय बहुगुणा विरोधी हैं। मनोरमा को आगे कर रावत ने रीता बहुगुणा जोशी की राजनीति की हवा निकाल दी, जो खुद ब्राह्मण हैं, पौढ़ी की रहने वाली हैं। यह दांव चलकर रावत ने लगे हाथ सतपाल महाराज को निपटाने की भी कोशिश की, जो ऐन वक्त कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में चले गए थे। मनोरमा के नाम पर सोनिया गांधी को तैयार करने के लिए रावत ने एक बड़ा दांव चला, जब इस 4 नवंबर को वे उत्तराखंड के जिला परिषद के अध्यक्षों को सोनिया से मिलवाने दिल्ली ले गए, तब ही उन्होंने जिला परिषद के कई अध्यक्षों से सोनिया के समक्ष मनोरमा का नाम रखवा दिया, कहना न होगा कि उनका यह दांव सफल भी रहा।
Posted on 10 November 2014 by admin
मोदी के स्वच्छता अभियान में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के चक्कर में दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय ने अपनी खासी किरकिरी करा ली, वह भी ऐसे वक्त में जबकि दिल्ली में चुनाव होने हैं। सूत्रों की माने तो नई दिल्ली स्थित इंडिया इस्लामिक सेंटर के बाहर झाड़ू लगाने का मूल आइडिया दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग का था, नजीब मुसलमानों के नए रहनुमा बनकर उभरना चाहते हैं, इस ड्राईव के लिए उन्होंने सबसे पहले इंडिया इस्लामिक सेंटर के अध्यक्ष सिराजुद्दीन कुरैशी से बात की जो भारत के एक बड़े मीट एक्सपोर्टर हैं और भाजपा की ओर झुकाव रखने वाले भी। माना जाता है कि फिर जंग व कुरैशी ने मिलकर ‘आप’ नेता शाजिया इल्मी को सतीश उपाध्याय के साथ मिलकर झाड़ू लगाने को तैयार किया, पर प्रकारांतर में जो घटित हुआ उससे इन महानुभावों की मंशाओं पर झाड़ू फिर गया लगता है।
Posted on 02 November 2014 by admin
अभी पिछले दिनों नरेंद्र मोदी के एक पुराने मित्र उनसे मिलने सात रेस कोर्स पहुंचे, तो उन्होंने छूटते ही अपने मित्र प्रधानमंत्री से पहला सवाल किया कि ‘गुजरात की तुलना में आप यहां (दिल्ली में) कितना वर्क-प्रेशर (काम के बोझ) झेल रहे हैं?’ मोदी मुस्कुराए और बोले-‘यहां तो कोई काम का बोझ ही नहीं है, मैं तनाव मुक्त होकर काम कर रहा हूं।’ कारण पूछे जाने पर मोदी ने बताया कि ‘जब वे गुजरात में बतौर मुख्यमंत्री काम कर रहे थे तो वे चौतरफा दबावों से घिरे थे, केंद्रनीत यूपीए सरकार का सौतेला रवैया था, तो उन्हें अपनी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व खासकर अडवानी गुट को भी बैलेंस करके चलना पड़ता था, वहीं कांग्रेस के उकसावे पर मीडिया भी उनके प्रति सदैव हमलावर रहती थी।’ फिर मोदी ने अपने अंदाज में कहा-‘यहां(दिल्ली) आकर सब ठीक हो गया है, पार्टी-सरकार में अभूतपूर्व सामंजस्य है, और मीडिया का भी मुझे पूरा साथ मिल रहा है।’ अपने मित्र द्वारा यह पूछे जाने पर कि ‘क्या दिल्ली आकर उनकी दिनचर्या में बदलाव आया है?’ मोदी का कहना था कि वे बहुत स्ट्रांग कैरेक्टर के व्यक्ति हैं, समय व काल न तो उनके निर्णयों को प्रभावित करते हैं और न ही उनकी दिनचर्या को। मोदी को बेहद करीब से जानने वाले उनके एक सहयोगी बताते हैं कि अब भी वे सुबह 5 बजे उठ जाते हैं, दैनंदिन की क्रियाओं से निवृत्त होकर सबसे पहले वे कुछ जरूरी और पर्सनल मेल के जवाब देते हैं, फिर अपने दिनभर के प्रोग्राम का मुआयना करते हैं और उनसे जुड़े जरूरी नोट्स बनाते हैं, क्योंकि उन्हें धाराप्रवाह बोलना पसंद हैं, चुनांचे ऐसे नोट्स से उन्हें मदद मिल जाती है। इसके बाद वे कोई 30 मिनट तक योग करते हैं और साढ़े सात बजे तक तैयार होकर लॉन में बैठ जाते हैं। अकेले, हिंदी-अंग्रेजी अखबारों पर एक सरसरी निगाह डालते हैं, कोई हल्का-फुल्का नाश्ता करते हैं, और अपनी नियत मुलाकातों के लिए निकल पड़ते हैं। उनके एक निकटस्थ सहयोगी बताते हैं कि बॉस को अकेले खाना पसंद है, उन्हें डिनर टेबुल पर भी किसी की मौजूदगी पसंद नहीं। न उन्हें खाने में किसी तरह की मनुहार ही पसंद है, सादा भोजन उन्हें भाता है, गुजराती स्टाइल का, बीच-बीच में वे अन्न का त्याग कर देते हैं और केवल फल सब्जी व दूध का सेवन करते हैं। टीवी भी उन्हें अकेले देखना पसंद है। जब वे कहीं जाने के लिए गाड़ी में बैठ रहे होते हैं तो ‘ओपी’ यानी ओम प्रकाश उनकी गाड़ी में रोज की अखबारों की जरूरी ‘क्लिपिंग्स’ रख देते हैं। मुलाकातियों को समय देने का काम संजय बलसावड़ का है। जब भी प्रधानमंत्री घर से बाहर निकलते हैं तो तन्मय, दिनेश या ओपी में से एक व्यक्ति जरूर उनके साथ होता है। यानी गुजरात से दिल्ली आकर चाहे नरेंद्र मोदी का आभा मंडल एक वृहतर फलक पा गया हो, पर यहां आकर भी न उनकी आदतें बदली हैं और न ही उनके इर्द-गिर्द रहने वाले लोग ही।
Posted on 02 November 2014 by admin
मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा को उनकी पूर्व की अमरीका यात्रा से भी ज्यादा वृहद और व्यापक बनाने की तमाम तैयारियों को पंख लग गए हैं। मोदी जी-20 समिट में हिस्सा लेने के लिए चार दिनों के लिए आस्ट्रेलिया जा रहे हैं। मोदी की इस पूरी यात्रा को एक ‘पॉवर पैक’ इवेंट में तब्दील करने की पूरी योजना है, आस्ट्रेलिया के चार बड़े शहर यानी सिडनी, मेलबर्न, ब्रिसबेन और कैनबरा में चार बड़े कार्यक्रम रखे गए हैं। सिडनी के ओलंपिक पार्क में मोदी वहां रहने वाले भारतीय समुदाय से रूबरू होंगे। इस कार्यक्रम में 21 हजार से ज्यादा भारतवंशियों के मौजूद रहने की संभावना जताई जा रही है और कई मायनों में इस कार्यक्रम की रूपरेखा अमरीका के ‘मेडीसन स्वॉयर’ के कार्यक्रम से भी बड़ी रखने की चेष्टा हुई है। राम माधव और उनकी टीम मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा को बहुत पहले से ही ऐतिहासिक बनाने की कोशिशों में जुटी है, इसके लिए वहां विशेष रूप से ‘इंडो-ऑस्ट्रेलिया कम्यूनिटी फाऊंडेशन’ का गठन हुआ है, जो लोगों को सिडनी सुपरडोन कार्यक्रम के लिए पिछले कई दिनों से पंजीकृत करने में जुटा है। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टॉनी एबॉट मोदी का स्वागत कैनबरा के अलावा मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में भी करेंगे, जहां 500 विशिष्ट अतिथियों को मोदी के सम्मान में दिए गए डिनर में बुलाया गया है। कैनबरा में मोदी ऑस्ट्रेलियाई संसद को भी संबोधित करेंगे, यह पहला मौका है जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री को ऐसा अवसर प्राप्त हुआ है। कोई 28 वर्ष पूर्व जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी अपने ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर गए थे, तब तस्वीर कुछ और थी। वैसे भी ऑस्ट्रेलिया को अपने लिए भारत के रूप में एशियाई उप महाद्वीप में एक दोस्त की तलाश है, जो वहां की अर्थव्यवस्था को ड्रैगन (चीन) के चंगुल से आजादी दिला सके। वहीं ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीयों को भी लंबे समय से मोदी जैसे किसी तारणहार की आवश्यकता थी, जो उन्हें वहां के नस्ली-भेदभाव से मुक्ति दिला सके।
Posted on 02 November 2014 by admin
नरेंद्र मोदी को करीब से जानने वाले लोगों को बखूबी मालूम है कि उनकी जिंदगी कैसे अलग-अलग कंपार्टमेंट में बंटी है और कहीं न कहीं उन्हें ऐसे कंपार्टमेंट में जीना भी पसंद है। सो, मोदी के लिए हर रिश्ता, हर व्यक्ति खास तरह से चिह्नित होता है। सो, भले ही केजी बेसन में गैस के बढ़े दामों पर वे मुकेश अंबानी या कांग्रेस से सहमति नहीं रखते हों, पर अंबानी परिवार से अपने निजी रिश्तों को सार्वजनिक करने से गुरो भी नहीं करते। प्रधानमंत्री मोदी जब रिलायंस फाउंडेशन के अस्पताल के उद्धाटन के मौके पर मुंबई पहुंचे तो इस कार्यक्रम में कोई ढाई घंटे तक बने रहे। अंबानी दरबार में पहली दफा कांग्रेसी नेताओं की उपस्थिति इतनी कम दिखी, ले देकर मुरली देवड़ा और राजीव शुक्ला ही सपत्नीक नजर आए। नहीं तो बीजेपी नेताओं का अच्छा खासा मजमा जुटा। पीयूष गोयल सपत्नीक दिखे, तो देवेंद्र फड़नवीस, विनोद तावड़े भी वहां मौजूद थे। बड़े उद्योगपतियों में आनंद महिंद्रा, सुभाष चंद्र, अजय पिरामल। तो वहीं पत्रकारों की जमात का एकमात्र प्रतिनिधित्व ‘टाइम्स नाऊ’ के अर्णब गोस्वामी कर रहे थे, जिन्हें एक कोने में हिंदुजा और रिलायंस फाऊंडेशन के सलाहकार अंशुमान मिश्र के साथ बतियाते देखा जा सकता था।