Posted on 25 January 2016 by admin
मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद जम्मू-कश्मीर की राजनीति अजीब पेंचोखम में फंस गई है, महबूबा मुफ्ती की भाजपा से पुराना खटराग है, भाजपा के लोगों को भी महबूबा फूटी आंख नहीं सुहाती। सूत्र बताते हैं कि पिछले दिनों महबूबा की मुलाकात कांग्रेस के कुछ शीर्ष नेताओं से हुई, कांग्रेस चाहती है कि बिहार की तर्ज पर जम्मू-कश्मीर में भी एंटी बीजेपी फ्रंट बने और इस कड़ी में पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस व कांग्रेस मिल कर वहां सरकार बना ले, पर इस पूरे मामले में एक पेंच है, और वह पेंच यह है कि पूरे जम्मू क्षेत्र में भाजपा का कब्जा है, जहां से भाजपा के विधायक चुनकर आए हैं, चुनांचे भाजपा को बाहर रखकर अगर वहां किसी सरकार का गठन होता है तो पूरे जम्मू क्षेत्र की अनदेखी हो जाएगी और श्रीनगर के लिए ऐसी कोई सरकार चला पाना आसान नहीं होगा। जम्मू-कश्मीर को लेकर भाजपा की रणनीति बेहद साफ है, वह चाहती है कि राष्ट्रपति शासन को यहां लंबा खींचा जाए और इसके बाद राज्य में फ्रेश चुनाव करा दिए जाए। वैसे भी गवर्नर वोरा इन दिनों भगवा राग गाने में पारंगत हो गए हैं, सो भाजपा को राष्ट्रपति शासन से कोई गुरेज नहीं। भाजपा यह भी जानती है कि स्वयं पीडीपी के अंदर महबूबा का काफी विरोध है, जैसे-जैसे वक्त गुजरेगा पीडीपी में बगावत के आसार तेज होने की उम्मीद है, अगर ऐसा होता है तो फिर महबूबा आसानी से घुटनों पर आ सकती हैं और भगवा महत्त्वाकांक्षाओं के समक्ष आत्म समर्पण कर सकती हैं।
Posted on 25 January 2016 by admin
राहुल बाबा इन दिनों एक बदले-बदले अवतार में नजर आते हैं। कल तक जो राहुल गांधी पुराने व वरिष्ठ नेताओं को पार्टी पर बोझ समझते थे और सवा सौ साल पुरानी पार्टी का चेहरा-मोहरा बदलने के लिए पूरी तरह से कृत संकल्प जान पड़ते थे, अब उन्होंने किंचित अपने विचार बदल लिए हैं, अब उन्हें लगने लगा है कि वरिष्ठ नेताओं के अनुभवों की भी कांग्रेस पार्टी को उतनी ही जरूरत है। सो, अब वे पार्टी के सीनियर नेताओं से न सिर्फ हर मुद्दे पर राय-विचार कर रहे हैं, अपितु उन्हें साथ लेकर चलने का उपक्रम भी साध रहे हैं। अपनी युवा मंडली को भी राहुल इन दिनों यही राय दे रहे हैं कि वे पार्टी के सीनियर नेताओं का उचित सम्मान करें। सूत्र बताते हैं कि चंद सीनियर नेताओं के समझाने पर ही राहुल ने इन दिनों अपने दिल और घर के दरवाजे पार्टी के आम कार्यकर्त्ताओं के लिए खोल दिए हैं, अब वे थोकभाव में हर रोज पार्टी कार्यकर्त्ताओं और आम लोगों से मिल रहे हैं, उनकी समस्याएं सुन रहे हैं और उस पर फौरी अमल की कोशिश भी कर रहे हैं, छोटे-बड़े मुद्दों को एड्रेस करने के लिए आनन-फानन में वे बाहर का दौरा भी बना रहे हैं, चुनांचे मुंबई हो या हैदराबाद लोगों ने जन सरोकारों से जुड़ें मुद्दों पर राहुल की सक्रियता के दीदार किए हैं।
Posted on 25 January 2016 by admin
कभी सपा के लोग साइकिल की सवारी गांठने में सिद्धहस्त माने जाते थे, और पार्टी के बड़े नेताओं का जुड़ाव भी सीधे जमीन से था। नेताजी के मुख्यमंत्रित्व काल में भी अमर सिंह ही सपा के बॉलीवुड कनेक्शन हुआ करते थे, चुनांचे नेताजी को फिल्मी सितारों से मिलवाना हो, उनसे सपा के पक्ष में चुनाव प्रचार करवाना हो या सैफई में उन्हें नचवाना हो, इसकी पूरी बागडोर अमर सिंह के हाथों में हुआ करती थी। अब वक्त बदल गया है, प्रदेश की कमान अखिलेश के पास है, बॉलीवुड को लेकर अखिलेश के मन में एक अतिरेक स्नेह का भाव शुरू से लहराता रहा है, सो अब बॉलीवुड सितारों की प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री तक सीधी पहुंच है, जो भी सितारा जब भी चाहे यूपी के सीएम से सीधी बात कर सकता है। इस बार सैफई महोत्सव में हर छोटे-बड़े सितारों के साथ यादव परिवार को सेल्फी लेते देखा गया, अपनी कुछ पसंदीदा अदाकाराओं को सीएम के साथ न सिर्फ सेल्फी लेते देखा गया, बल्कि अकेले में अंतरंगता से बतियाते भी देखा गया।
Posted on 19 January 2016 by admin
बहुजन समाज पार्टी चुनाव में जाने के परंपरागत तरीकों को तिलांजलि देकर वक्त के साथ चलना सीख रही है, यही वजह है कि यूपी के 2017 के आसन्न विधानसभा चुनाव के लिए बसपा के रणनीतिकारों ने भी हाईटेक कैंपेन को अंजाम देना शुरू कर दिया है, अपने चाल, चरित्र व चेहरा बदलने की कवायद में बसपा ने यूपी में एक नामचीन एजेंसी से बड़ा जनमत सर्वेक्षण करवाया है, इस सर्वेक्षण नतीजों से बहिनजी के हौंसले बम-बम हैं, यह सर्वेक्षण 167 सीटों पर बसपा को नंबर एक की पोजीशन पर दिखा रहा है, 70 से 90 सीटें ऐसी हैं जहां बसपा उम्मीदवार अपने निटकतम प्रतिद्वंदी सपा उम्मीदवारों से 5 फीसदी से भी कम अंतर पर मात खा रहे हैं और इनमें से भी 50 सीटें ऐसी हैं जो आरक्षित सीटें हैं। यानी बसपा के दलित उम्मीदवार अपने कैडर वोटरों के अलावे अन्य वोटरों को लुभाने में उस कदर कामयाब नहीं हो पा रहे हैं, चुनांचे मायावती के नेतृत्व में बसपा की कोर कमेटी ने तय किया है कि ब्राह्मण, मुसलमान व अति पिछड़े वोटरों को लुभाने के लिए बसपा कार्यकर्त्ता गांव-गांव जाकर ऐसे समुदायों के बीच मित्र मंडली गठित करेंगे। इसके अलावा बसपा की शीर्ष समिति ने एक और अहम फैसला लिया है कि आने वाले चुनाव में पहली दफा आर्थिक रूप से कमजोर उम्मीदवारों को पार्टी फंड करेगी और उन्हें चुनाव लड़ने के लिए पार्टी फंड से आर्थिक मदद दी जाएगी, ऐसे उम्मीदवारों की शिनाख्त का काम भी पूरा हो चुका है, इसमें से ज्यादातर दलित उम्मीदवार हैं।
Posted on 19 January 2016 by admin
बसपा ने अभी तीन रोज पूर्व अपने 14 कोऑर्डिनेटर की अहम बैठक बुलाई और इन सभी कोऑर्डिनेटर ने अपने-अपने संबंधित जोन की रिपोर्ट पार्टी हाईकमान को सौंपी है। सबसे हैरत की बात तो यह कि एक स्वर में ये सारे कोऑर्डिनेटर अपने-अपने संबंधित जोन में बसपा की सीधी लड़ाई सपा से बता रहे हैं, भाजपा और कांग्रेस को यह मुख्य लड़ाई में शामिल नहीं मान रहे। हैरत की बात है कि आज से छह महीने पूर्व जब इन सभी कोऑर्डिनेटर ने पार्टी हाईकमान को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी तो इनमें से 10 कोऑर्डिनेटर ने अपनी सीधी लड़ाई भाजपा के साथ बताई थी और 4 ने अपनी सीधी लड़ाई सपा के साथ। बसपा रणनीतिकार खुद हैरत में हैं कि क्या वाकई इन छह महीनों में यूपी में भाजपा का ग्राफ इतनी तेजी से गिरा है कि वह मुख्य चुनावी लड़ाई से ही बाहर होती जा रही है? बसपा की रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि भाजपा का जनाधार अब सिर्फ शहरों तक में ही सिमट कर रह गया है, ग्रामीण मतदाताओं में इसका असर तेजी से घटा है।
Posted on 19 January 2016 by admin
बसपा कोऑर्डिनेटरों की रिपोर्ट इस मायने में भी चौंकाने वाली है कि पिछले कुछ समय में अखिलेश सरकार का ग्राफ यूपी में कहीं बेहतर हुआ है, मुस्लिम और यादव वोट सपा के साथ एकजुट दिखते हैं। अति पिछड़ी जातियों में कई जातियां ऐसी है जिनका प्रदेश के यादवों के साथ सीधा तकरार रहा है, मसलन मौर्य, कुर्मी, कोयरी, लोध, सैनी जैसी जातियां जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में खुलकर मोदी का समर्थन किया था और इनके वोट थोकभाव में उन चुनावों में भाजपा को मिले थे, आज ये जातियां भाजपा से नाराज़ जान पड़ती हैं, सपा के साथ इन्हें जाना नहीं है, कांग्रेस इनकी स्वभाविक च्वॉइस नहीं, चुनांचे बसपा के लिए ये जातियां आसान शिकार हो सकती हैं, चुनांचे ऐसी जातियों के प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं की मायावती दरबार में इन दिनों पूछ बढ़ गई है।
Posted on 19 January 2016 by admin
सिर्फ भाजपा ही क्यों कांग्रेस जैसी सवा सौ साल पुरानी पार्टी का भी यूपी से बोरिया-बिस्तर सिमट रहा है। शायद यही वजह है कि यूपी में पार्टी की डूबती नैया को किनारे लगा सकने वाला कोई खेवनहार नहीं मिल रहा है, सूत्र बताते हैं कि पिछले कुछ समय में राहुल गांधी के ऑफिस ने यूपी से कांग्रेस का सिरमौर बनाने के लिए कम से कम चार बड़े नेताओं से संपर्क साधा है, पर ये नेतागण कोई न कोई बहाना कर यूपी में कांग्रेस की सरपरस्ती से कन्नी काट रहे हैं। कांग्रेस से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि सबसे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री आर पी एन सिंह से संपर्क साधा गया पर उन्होंने प्रदेश की कमान संभालने में असमर्थता जता दी, पार्टी ने इसके बाद प्रदीप जैन आदित्य, जफर अली नकवी और रीता बहुगुणा जोशी से बात की, पर इन तीनों की ओर से भी कोई उत्साहवर्द्धक संदेश नहीं आया। ले देकर सिर्फ एक जितिन प्रसाद ही बचते थे जिन्होंने स्वयं राहुल से मिलकर यूपी की बागडोर थामने की इच्छा जताई, पर राहुल की ओर से उन्हें कोई उचित आश्वासन प्राप्त नहीं हुआ है। सूत्र इसकी वजह बताते हैं कि जब 14 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी गत हुई तो जितिन गुपचुप रूप से अमित शाह से मिलने जा पहुंचे और उनसे राज्यसभा की मांग कर डाली, जब वहां उनकी दाल नहीं गली तो वे एक बार सपा का आंगन भी झांक आए, इस बात को राहुल अब भी पचा नहीं पा रहे हैं।
Posted on 19 January 2016 by admin
केंद्रीय मंत्रिमंडल के अगले फेरबदल में केंद्रीय पेट्रोलियम राज्य मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की उम्मीदों में पलीता लग सकता है। सूत्र बताते हैं कि देश के एक शीर्ष औद्योगिक घराने को नाराज करने की कीमत प्रधान को चुकानी पड़ सकती है और उन्हें एकबारगी फिर से सरकार के बजाए संगठन की सेवा में लगाया जा सकता है। विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि इस शीर्ष उद्योगपति के प्रतिनिधि जब प्रधान से मिलने उनके दफ्तर पहुंचे तो कथित तौर पर प्रधान ने असम चुनाव में पार्टी की मदद करने को कहा, तो इन प्रतिनिधियों ने जवाब दिया कि ’उन्हें भाजपा के पार्टी फंड के मद में जो करनी होती है वे सीधे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के मार्फत कर दी जाती है।’ इस बात से प्रधान किंचित नाराज़ हुए, जब अगली बार इस शीर्ष उद्योगपति के प्रतिनिधिगण प्रधान से मिलने पहुंचे तो कहते हैं कि प्रधान ने इन्हें घंटे भर से ज्यादा का इंतजार करवा दिया, ये तीनों प्रतिनिधिगण प्रधान से मिले बगैर सीधे शाह के पास जा धमके और उनके समक्ष अपना दुखड़ा रोया, शाह ने यह बात मोदी तक पहुंचा दी और मोदी ने प्रधान के खिलाफ पहले की कई और शिकायतों का बकायदा संज्ञान ले लिया।
Posted on 19 January 2016 by admin
भाजपा ने लगभग तय कर दिया है कि अब कर्नाटक में बी एस येदुरप्पा ही भाजपा के चेहरा होंगे। और कर्नाटक में इस दफे के एम एल सी चुनाव में बकायदा भगवा पार्टी ने इस बात की मुनादी करवा दी, पर जब अनंत कुमार, सदानंद गौड़ा और ईश्वरप्पा की तिकड़ी ने अपना खेल दिखाया तो येदुरप्पा अपने क्षेत्र में भी पिट गए। इसके बाद येदुरप्पा इन तीनों पार्टी नेताओं की शिकायत लेकर अमित शाह और मोदी से मिले। सूत्र बताते हैं कि येदुरप्पा ने मोदी से कहा कि अनंत हों, सदानंद गौड़ा या फिर ईश्वरप्पा ये तीनों नेता उनके तैयार किए हुए हैं, और आज ये तीनों मिलकर न सिर्फ उनके यानी येदुरप्पा के खिलाफ काम कर रहे हैं अपितु कर्नाटक में भाजपा की जड़ों में भी मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि मोदी ने अनंत और सदानंद गौड़ा दोनों को एक साथ बुलाया और साफ लहजों में उन्हें ताकीद कर दी है कि अगली बार कोई ऐसी शिकायत मिली तो उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है।
Posted on 13 January 2016 by admin
अगर सब कुछ मोदी-शाह द्वय के प्लॉन के मुताबिक चला तो आने वाले 20-23 जनवरी के बीच अमित शाह 3 वर्षों के लिए भाजपा के फिर से अध्यक्ष हो जाएंगे। सूत्र बताते हैं कि नरेंद्र मोदी के निरंतर प्रयासों और संघ के शीर्ष नेतृत्व से उनके सीधे संवादों के बाद अब संघ नेतृत्व ने भी यह खटराग अलापना छोड़ दिया है कि भगवा पार्टी का सिरमौर और देश के नेतृत्वकर्त्ता को एक ही राज्य गुजरात से नहीं होना चाहिए। संघ की मूक सहमति हासिल करने के बाद ही भाजपा ने अपने देशव्यापी संगठनात्मक चुनाव की रफ्तार और तेज कर दी है, और तकरीबन 20 राज्यों में यह प्रक्रिया पूरी होने को है। 14 जनवरी के बाद संघ और भाजपा की समन्वय समिति की बैठक में जब केंद्रनीत मोदी सरकार के काम-काज की समीक्षा होगी, तो उस बैठक में भाजपा के अगले अध्यक्ष के तौर पर अमित शाह के नाम पर रज़ामंदी की मुहर भी लग सकती है। सूत्र बताते हैं कि संघ में शाह के लिए माहौल बनाने में संघ के एक प्रमुख नेता दत्तात्रेय होसबोले की एक महती भूमिका रही। होसबोले के प्रधानमंत्री से भी बेहद आत्मीय ताल्लुकात है। जब जुलाई 2014 में शाह ने राजनाथ सिंह के बचे हुए अध्यक्षीय काल को पूरा करने का बीड़ा उठाया तो उन्होंने अपने शुरूआती दिनों में भाजपा को कई तोहफे भी दिए। महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू- कश्मीर में भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों का गठन हुआ। और शाह के नेतृत्व में भाजपा की सदस्यता अभियान नई परवान चढ़ती हुई साढ़े 10 करोड़ का रिकार्ड सदस्य बनाने में कामयाब रही। पर शाह के ऊपर सबसे बड़ा आरोप पार्टी में एक नई पंचतारा संस्कृति को पालने-पोसने का है। पार्टी के आम कार्यकर्त्ताओं की उन तक पहुंच नहीं है और वे सिर्फ गिनती के चंद लोगों से ही घिरे रहते हैं। बिहार की हालिया चुनावी पराजय को शाह -मोदी को सबक सिखाने का ही एक उपक्रम माना जाता है। चुनांचे अगर 20 या 23 तारीख को जब बतौर अध्यक्ष शाह की पुनर्ताजपोशी होती है तो उन्हें एक बदली भाव-भंगिमाओं के साथ पार्टी चलानी होगी, क्योंकि उनके समक्ष आगे की राहें किंचित ज्यादा मुश्किल है। असम, बंगाल, केरल, यूपी, पंजाब जैसे राज्यों में अभी चुनाव होने हैं जहां भाजपा की ज़मीन पहले से खिसकी हुई है। सो, शाह को अपने नए कार्यकाल में अपनी नई टीम और नसीहतों का नया पिटारा लेकर फूंक-फूंक कर आगे की यात्रा तय करनी होगी।