Posted on 15 October 2017 by admin
राहुल गांधी एक नए अवतार में समाने आए हैं, अपनी दादी के 100वें जन्मदिन (19नवंबर) के मौके पर कांग्रेस की बागडोर पूरी तरह संभालने को वे कृतसंकल्प दिख रहे हैं, इसके साथ ही वे कांग्रेस का चेहरा मोहरा बदलने को भी उत्सुक जान पड़ते हैं। पार्टी से जमीनी कार्यकर्त्ताओं को जोड़ने की मुहिम का आगाज़ करते हुए और आसन्न विधानसभा चुनावों को मद्देनजर रखते हुए राहुल ने अपनी पहल से एआईसीसी में एक चुनाव प्राधिकरण का गठन किया है, इस प्राधिकरण का सिरमौर किसी मुल्लापुली रामचंद्र को बनाया गया है। लंबे अरसे से ठंडे बस्ते के सुपुर्द कर दिए गए मधुसूदन मिस्त्री भी इस बार जाग गए हैं और बतौर मेंबर उन्होंने इस प्राधिकरण में एंट्री मार ली है। सो, यहां भी उनका पुराना रवैया चालू हो गया है। यहां तक कि पीसीसी डेलिगेट्स के लिए भी पूजा-अर्चना स्वीकार की जा रही है, ऐसा सूत्रों का दावा है। मोतीलाल वोरा इस बात की शिकायत पहले ही राहुल से कर चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक वोरा जी को सबसे ज्यादा शिकायतें महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से मिल रही है। अब राहुल अगर कांग्रेस की पुरानी परिपाटियों पर लगाम नहीं लगा पाएंगे तो कांग्रेस का चेहरा-मोहरा क्या खाक बदल पाएंगे।
Posted on 15 October 2017 by admin
2001 से जब से गुजरात में मोदी की एंट्री हुई है, गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लगातार विवादों के घेरे में रहा और राजस्थान की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के निषाने पर भी। कांग्रेस का मानना है सन् 2001 से लेकर सन् 2014 तक लगातार राजनैतिक फायदे के लिए इस कॉरपोरेशन का दोहन हुआ, कांग्रेसी नेताओं के ये भी आरोप हैं कि इस कॉरपोरेशन के पैसों से ही कई चुनाव लड़े गए। जब दोहन की इंतहा हो गई और यह कॉरपोरेशन लगभग 20 हजार करोड़ के घाटे में आ गया तो केंद्र सरकार की पहल से इसका विलय देश की सबसे बड़ी नवरत्न कंपनियों में शुमार होने वाली ओएनजीसी में कर दिया गया। सूत्र बताते हैं कि इस दफे के गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बड़े जोर-षोर से यह मुद्दा उठाने वाली है।
Posted on 15 October 2017 by admin
समाजवादी पार्टी को नया चेहरा-मोहरा प्रदान करने की कवायद में अखिलेश कहीं शिद्दत से जुटे हैं। पिछले दिनों अखिलेश की अपने पिता से एक लंबी मुलाकात हुई और इस मुलाकात में पार्टी के भावी इंडिकेटर्स को लेकर भी गहन मंत्रणा हुई। अखिलेश ने एक तरह से मुलायम के समक्ष साफ कर दिया है कि वे शिवपाल को और ज्यादा नहीं ढो सकते। सूत्र बताते हैं कि अखिलेश ने अपने पिता के समक्ष इस बात पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई कि अब से पहले तक शिवपाल भाजपा के सीधे संपर्क में थे और जब भाजपा की ओर से उन्हें टका सा जवाब मिल गया कि वे पहले अपनी क्षेत्रीय पार्टी का गठन करें और फिर उसका विलय भाजपा में कर दें, तो लौट के बुद्दू घर को आ गए। सूत्र बताते हैं कि शिवपाल को अब अखिलेश दिल्ली की राजनीति में सक्रिय रखना चाहते हैं, सो मुमकिन है कि उन्हें किसी भांति दिल्ली का ठौर पकड़ाया जाए, जिससे कि यूपी की जमीन पर अखिलेश बेधड़क अपनी साइकिल दौड़ा सकें। सूत्रों का यह भी दावा है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में अखिलेश अपने परिवार के कम से कम तीन लोगों का टिकट काट सकते हैं, इनमें से जिन लोगों के टिकट कट सकते हैं, उनके नाम हैं स्वयं अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव, मुलायम के भतीजे व लालू के दामाद तेज प्रताप यादव और प्रोफेसर रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव।
Posted on 15 October 2017 by admin
क्या सचिन पायलट को अभी राज्य का बागडोर संभालने के लिए थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है? नहीं तो इन दिनों राज्य के पुराने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही अपने नए लीडर राहुल गांधी के दिलो दिमाग पर छाए हुए हैं। सो, इस बात के अभी से संकेत मिल रहे हैं कि राजस्थान का अगला विधानसभा चुनाव अशोक गहलोत के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। दरअसल जब गहलोत को पंजाब का प्रभारी बनाया गया था तो किसी को शायद ही इस बात की उम्मीद थी कि कांग्रेस वहां इतना बड़ा चमत्कार कर जाएगी। हालांकि कैप्टन अमरिंदर ने पंजाब चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, इसके बाद गहलोत को गुजरात का प्रभारी बनाया गया तो वहां भी एक चमत्कार हुआ और पार्टी के कद्दावर अहमद पटेल आधे वोट से वहां से राज्यसभा का चुनाव जीत गए। गुजरात में सुप्तप्रायः कांग्रेस में हालिया दिनों में एक नई जान आ गई है तो गहलोत समर्थक इस बात के क्रेडिट में भी उनका नाम जोड़ रहे हैं। सो, फिलवक्त तो गहलोत की तो निकल पड़ी है।
Posted on 15 October 2017 by admin
अरुण जेटली भले ही गुजरात के चुनाव प्रभारी हो, पर गुजरात के भगवा चुनाव अभियान से उनका चेहरा नदारद है। यहां तक कि गुजरात के तमाम बैनर, पोस्टर व होर्डिंग्स पर सिर्फ मोदी और अमित शाह के चेहरे नज़र आ रहे हैं। जेटली का कोई छोटा-मोटा फोटो भी आपको वहां खोजने से नहीं मिलेगा। अभी हालिया दिनों में अरुण जेटली ने कई दफे गुजरात का दौरा किया है पर इसकी रिपोर्ट आपको गुजराती मीडिया में भी बमुश्किल मिलेगी।
Posted on 15 October 2017 by admin
अगर सूत्रों के दावों पर यकीन किया जाए तो गुजरात के एक प्रमुख उद्योगपति गौतम अदानी अब राहुल गांधी से मिलने का वक्त मांग रहे हैं। वक्त बदल रहा है या लोग बदलते लम्हों के साथ अपने रंग बदल रहे हैं! (एनटीआई-gossipguru.in)
Posted on 08 October 2017 by admin
गुजरात विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर हुई है, 2002 के बाद शायद पहली बार गुजरात में चुनाव प्रचार के लिए भाजपा में स्टार प्रचारकों की शिनाख्त की जा रही है। दिल्ली के कई मंत्रियों ने गांधी नगर में अपना डेरा जमा लिया है। मसलन केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा अपना हर शनिवार, रविवार गुजरात में लगा रहे हैं। केंद्रीय नेत्री सुषमा स्वराज और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कई चुनावी सभाएं गुजरात में लगाई जा रही है। नए स्टार प्रचारकों को ठोक-बजाकर परखा जा रहा है। नहीं तो 2002 से लेकर सन 2014 तक बस नमो ही पार्टी के एकमात्र स्टार प्रचारक थे, यहां तक कि पार्टी के सबसे कद्दावर लाल कृष्ण आडवानी की भी वहां चुनाव प्रचार में कोई खास भूमिका नहीं होती थी। पर इस दफे वहां 15 साल विकास का नारा कसौटी पर है, सोशल मीडिया में इसका मजाक बनाया जा रहा है, अमित शाह की गुजरात गौरव यात्रा भी वह समां नहीं बांध पा रही, चुनांचे भाजपा एक बदली रणनीति के तहत गुजरात के चुनावी रण में कुछ अलग, कुछ नए चेहरों को उतारने के लिए कृतसंकल्प जान पड़ती है।
Posted on 08 October 2017 by admin
बिहार कांग्रेस के नए अध्यक्ष को लेकर धकमपेल मची है। बिहार के कांग्रेस प्रभारी सीपी जोशी एक ऐसे नाम की पैरवी कर रहे हैं जिसको लेकर राहुल गांधी खुश नहीं बताए जाते हैं। सीपी जोशी अखिलेश सिंह की पैरवी कर रहे हैं, जो भूमिहार जाति से ताल्लुक रखते हैं, अखिलेश सिंह 2004 के लालू लहर में लोकसभा का चुनाव जीत गए थे और लालू की कृपा से वे यूपीए-I सरकार में मंत्री भी बन गए थे। पर अखिलेश ने 2009 में लालू का साथ छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया। इसके बाद हुए जितने भी चुनाव में उन्होंने हिस्सा लिया, वे कोई भी चुनाव जीत नहीं पाए, यहां तक कि इस बार का विधानसभा चुनाव भी वे हार गए। अब इनके विरोधी कह रहे हैं कि एक हारा हुआ नेता कैसे पार्टी को राज्य में जीत का स्वाद चखा सकता है। दूसरा नाम श्याम सुंदर सिंह धीरज का चल रहा है, जो 17 साल तक यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और कभी सीताराम केसरी के खासमखास में शुमार होते थे, केसरी के जमाने में ही इन्होंने सोनिया को पार्टी अध्यक्ष बनाने की वकालत कर दी थी, नाराज़ होकर केसरी ने इन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया था। यह पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं, राहुल भी इनके नाम को आगे बढ़ाने के पक्षधर दिखते हैं। एक और नाम प्रेमचंद्र मिश्र का है जो छात्र राजनीति से आगे आए हैं, पर चुनाव जीतने के मामले में इनका रिकार्ड भी सिफर है। एक और नाम मदन मोहन झा का चल रहा है जो इस बार का चुनाव जीते हैं। बिहार में कांग्रेस के लिए संभावनाओं की जमीन काफी ऊर्वरा है, क्योंकि फिलवक्त लालू कमजोर विकेट पर खेल रहे हैं, कांग्रेस को इस बात का फायदा मिल सकता है।
Posted on 08 October 2017 by admin
मीडिया में इस बात की पड़ताल शुरू हो गई है कि आखिरकार मोदी सरकार के सर्वशक्तिमान अरुण जेटली की इस्तीफे की अफवाह उड़ी कैसे? कांग्रेस परस्त एक अखबार ने तो बकायदा इसकी ख़बर छाप भी दी थी। विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि जीएसटी काऊंसिल की बैठक से पूर्व 2 अक्टूबर की शाम को इस पर ब्रीफिंग के लिए प्रधानमंत्री ने अमित शाह और अरुण जेटली को अपने पास तलब किया था। जिसमें सरकार का पक्ष जेटली रख रहे थे तो पार्टी व जनता का पक्ष सामने रखने की जिम्मेदारी शाह को सौंपी गई थी। शाह के बेहद भरोसेमंद भूपेंद्र यादव पिछले काफी समय से छोटे व्यापारियों से मिलकर जीएसटी पर उनकी परेशानियां जान रहे थे। भूपेंद्र यादव की मदद से शाह ने जीएसटी को लेकर छोटे व्यापारियों की चिंताए और उनकी अपेक्षाओं को लेकर एक डॉसियर तैयार किया था, जिसे लेकर वे पीएम के पास गए थे। ऐसे में किसी ने अफवाह उड़ा दी कि पीएम जेटली से इस्तीफा ले रहे हैं। यह ख़बर तेजी से फैली, उस रोज राजनाथ सिंह लखनऊ में थे, जहां उनके कई कार्यक्रम लगे थे। सूत्र बताते हैं कि राजनाथ ने भी अपने तमाम पूर्व निर्धारित कार्यक्रम रद्द कर दिए और किसी अनहोनी की आशंका से भागे-भागे दिल्ली आ पहुंचे। सोशल मीडिया पर इस्तीफे की ख़बर छाई हुई थी और पीएम से मीटिंग के बाद निर्विकार भाव से जेटली व शाह उनके घर से बाहर निकल रहे थे।
Posted on 08 October 2017 by admin
विजय वडेट्टीवार का नाम ध्यान होगा आपको, जनाब शिवसेना छोड़ कर कांग्रेस में आए हैं। पर जब इस दफे राष्ट्रपति पद के चुनाव में वोटिंग हुई तो विपक्षी उम्मीदवार मीरा कुमार ने बकायदा शिकायत दर्ज कराई थी कि वडेट्टीवार ने 10 वोटों के साथ एनडीए उम्मीदवार कोंविद के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की है। पर वडेट्टीवार की सफलताओं का कारवां बस आगे बढ़ता गया। पहले वे महाराष्ट्र में विपक्ष के डिप्टी लीडर बनाए गए, हालांकि यह कोई संवैधानिक पद नहीं है, बावजूद इसके इन्हें राज्य मंत्री का दर्जा दे दिया गया। शायद इस पद पर रह कर राज्य मंत्री का दर्जा हासिल करने वाले ये देश के पहले नेता होंगे। ये मोहन प्रकाश के खासमखास में शुमार होते हैं। पर जब से सिंचाई घोटाले में इनका नाम आया है, जांच एजेंसियों, खासकर वे ईडी के निशाने पर आ गए हैं। पर वडेट्टीवार को अपनी पार्टी लाइन से इतर रिश्तों पर खूब भरोसा है कि कोई उनका बाल बांका नहीं कर सकता।