Posted on 07 February 2021 by admin
23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती है, इस मौके को यादगार बनाने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री कोलकाता जा रहे हैं, जहां पीएम एक बड़ी जनसभा को संबोधित करेंगे। भाजपा की योजना पीएम के इस उद्बोधन को बंगाल के गांव-गांव तक पहुंचाने की है, इसके लिए विभिन्न न्यूज चैनल पर इस भाषण का लाइव प्रसारण होगा, सोशल और डिजिटल मीडिया के माध्यम से आम जन के मोबाइल तक इस भाषण की पहुंच बनाई जाएगी, भाजपा के कार्यकर्ता और नेता गांव-चैबारों में यह सुनिश्चित करेंगे कि मोदी की बात सुनने से कोई बंगालवासी वंचित न रह जाए। स्वयं पीएम मोदी भी बंगाल चुनाव को किंचित बड़ी गंभीरता से ले रहे हैं, यहां तक कि इस दफे पीएम ने बंगाल की मुख्यमंत्री को उनके जन्मदिन के मौके पर अपना कोई बधाई संदेशा भी नहीं भेजा। वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी भी नेताजी की सवा सौवीं जयंती को यादगार बनाने के प्रयासों में जुटी हैं। ममता ने नेताजी के भतीजे सुब्रतो बोस, नोबल विजेता और बंगाल के कई नामचीन कलाकारों को लेकर एक कमेटी बनाई है, जो यह सुनिश्चित करेगी कि कैसे नेताजी के जन्म दिवस को यादगार बनाया जाए। दीदी की योजना नेताजी के नाम पर
हावर्ड की तरह एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने की है। 21 मार्च के दिन स्वयं ममता एक बड़े पैदल मार्च का नेतृत्व करेंगी, यह पैदल मार्च नेताजी के घर से निकल कर सुभाष चौक तक जाएगा। चुनावी मौसम में नेताजी की याद आनी उतनी ही लाजिमी है।
Posted on 04 January 2021 by admin
अरूणाचल प्रदेश में 7 में से 6 जदयू विधायकों ने भाजपा ज्वॉइन कर ली है, इनमें से तीन विधायक वैसे भी हैं जिन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने की वजह से नीतीश ने पहले ही कारण बताओ नोटिस जारी कर रखा था। सबसे खास बात तो यह कि आने वाले कुछ दिनों में जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी आहूत थी जिसमें इन विधायकों को भी शामिल रहना था। वैसे भी अरूणाचल में सरकार चला रही भाजपा को जदयू अपना समर्थन दे रही थी। कहते हैं नीतीश इस घटना से खासे कुपित हैं। अभी उन्हें इस बात का निर्णय लेना था कि 14 जनवरी से 31 जनवरी के बीच जो मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार होना है, नीतीश उसमें अपने कोटे के मंत्रियों को सरकार ज्वॉइन कराएंगे अथवा नहीं? वैसे भी भले ही नीतीश ने बिहार में मुख्यमंत्री पद की चाहे सातवीं बार शपथ ले ली हो पर इस बार वे दबाव में काम करते नज़र आ रहे हैं। मामला चाहे विधानसभा स्पीकर चुनने का रहा हो अथवा मंत्रिमंडल गठन का, नीतीश के ऊपर भाजपा हावी रही है। कहते हैं अब नीतीश को अपने पुराने मित्र लालू यादव के जेल से छूट कर आने का इंतजार है, इसके बाद ही वे कोई बड़ा निर्णय ले सकते हैं।
Posted on 04 January 2021 by admin
’दुलकी चाल से चला, हौंसलों का यह बुलबुला
मंसूबों के अश्वमेध पर, उम्मीदों का है फूल खिला’
पीएम मोदी हमेशा वक्त से आगे की सोचते हैं, शायद इसीलिए अदालती रोक की परवाह किए बगैर उन्होंने नई दिल्ली में नए संसद भवन का भूमि पूजन भी कर दिया और भगवा ललाट पर भविष्य की नई उम्मीदों का तिलक भी कर दिया है। जरा सोचिए तब क्या होगा जब देश में लोकसभा की सीटों को नई परिसीमन का आकार मिलेगा और आबादी के हिसाब से राज्यों को सीटों का प्रतिनिधित्व मिलेगा, तब बिहार की 40 लोकसभा सीटें नए परिसीमन में 70 का आंकड़ा छू सकती हैं और मध्य प्रदेश की मौजूदा 29 सीटें बढ़ कर 50 का आंकड़ा पार कर सकती हैं। वैसे भी मौजूदा दौर में आबादी के हिसाब से लोकसभा सीटों का असंतुलन बना हुआ है, आखिरी बार जब सातवें दशक में सीटों की संख्या तय की गई थी तब सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व देने के सिद्धांत के तहत सीटों का आंबटन हुआ था। पर इसके बाद बढ़ती आबादी की रफ्तार ने यह संतुलन बिगाड़ कर रख दिया, जैसे उत्तर और पूर्वी राज्यों की आबादी सबसे तेजी से बढ़ी, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों में आबादी बढ़ने की दर स्थिर रही। यही वजह है कि तमिलनाडु की कुल आबादी सात करोड़ से भी कम है और यहां से लोकसभा के 39 सांसद हैं, वहीं मध्य प्रदेश की आबादी साढ़े सात करोड़ से ज्यादा है और यहां सिर्फ 29 सीटें हैं। यूपी में 80 सीटें हैं जबकि यह सबसे ज्यादा आबादी वाला प्रदेश है, अनुमान लगाएं तो यूपी में 30 लाख की आबादी पर एक सांसद है, वहीं तमिलनाडु में 16-17 लाख की आबादी पर एक लोकसभा सीट। अगर इस 16-17 लाख की आबादी को पैमाना माने तो फिर अकेले यूपी में 150 सीटें बनानी होंगी। राजस्थान जैसे प्रदेश को भी कम से कम 50 सीटें देनी होंगी। इसका एक तरीका यह भी हो सकता है कि ज्यादा आबादी वाले राज्यों का बंटवारा हो, जैसा बीजेपी यूपी के संदर्भ में सोच रही है। नया संसद भवन जो अक्टूबर 2022 तक बन कर तैयार हो सकता है, उसमें लोकसभा के कुल 880 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था होगी, जिसे बढ़ा कर 1224 तक किया जा सकता है, वर्तमान संसद भवन में यह क्षमता मात्र 550 सदस्यों के बैठने की है। मौजूदा राज्यसभा में 250 सांसदों के बैठने की व्यवस्था है, नए संसद भवन में राज्यसभा के 332 लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई है। हालांकि संसद में सीटों की संख्या बढ़ाने पर 2026 तक रोक लगी हुई है, पर बहुमत की सरकार जब चाहे इस फैसले को बदल सकती है, आबादी और लोकसभा सीटों की संख्या को आधार बना कर मोदी सरकार नया परिसीमन कानून बना सकती है। वरिष्ठ पत्रकार और संपादक अजित द्विवेदी कहते हैं कि कायदे से 2021 की जनगणना को आधार बना कर यह किया जा सकता था, पर कोरोना की वजह से 21 की जनसंख्या ही शुरू नहीं हो पाई है, पर सरकार चाहे तो एक साल की देरी से भी यह मुकम्मल कर सकती है। यानी 2024 के चुनाव नए परिसीमन वाले सीटों के आधार पर हो सकते हैं, तब दक्षिण की सीटें चाहे उतनी ही रह जाएं, पर उत्तर और पूरब की सीटों में खासा इजाफा हो सकता है और भाजपा के लिए सबसे मुफीद भी शायद यही है।
Posted on 04 January 2021 by admin
क्या केंद्र सरकार किसान आंदोलन की गंभीरता और तीव्रता को मद्देनज़र रखते उसके अनुरूप ही आचरण कर रही है? मामला अदालत में है और सुप्रीम कोर्ट कमेटी बनाने की बात कर रहा है, सरकार को भी अब कोर्ट से ही अपेक्षा है। यह पूछे जाने पर कि किसान रास्ते क्यों बंद कर रहे हैं, किसानों का कहना है कि वे तो प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान और जंतर मंतर आना चाहते थे, पर पुलिस ने उन्हें बार्डर पर ही रोक दिया। सरकार से 5 बार की वार्ता क्यों भंग हुई? किसानों का कहना साफ है कि इस कृषि कानून का मसौदा बनने से पहले उन्हें क्यों नहीं दिखाया गया उनसे राय-मशविरा क्यों नहीं ली गई और किस किसान संगठन ने उनसे ऐसा कानून बनाने की मांग की थी। सूत्र बताते हैं कि सरकार भी अब बीच का रास्ता निकालने को तैयार हो गई है, कृषि बिल में संशोधन कर इसे लागू करने का अधिकार राज्यों के जिम्मे सौंप दिया जाएगा, अब यह मर्जी होगी राज्यों की कि इसे वे लागू करते हैं या फिर पंजाब-हरियाणा सरकारों की तरह इसे ठंडे बस्ते में डालना चाहते हैं। यानी इससे सरकार की नाक भी रह जाएगी और पंजाब-हरियाणा के किसानों का गुस्सा भी ठंडा हो जाएगा। अब इस मुद्दे पर केजरीवाल जैसे नेता बुरे फंसे हैं, पहले तो उनकी आप सरकार ने इस नए कृषि बिल को जल्दबाजी में ‘नोटिफाई’ कर दिया, अब दिखाने के लिए और अपनी साख बचाने के लिए केजरीवाल बिल को फाड़ रहे हैं, क्योंकि आम आदमी पार्टी को आने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेना है।
Posted on 13 December 2020 by admin
’जब तक बोते रहे उम्मीदें, फसलें खुशनुमा मौसम की तरह लहलहाईं
पर तुम हुए अब इतने बेबस कि जमीं भी फूट कर खून के आंसू रोई’
अन्नदाताओं के जोष और जज्बे ने सत्ताशीर्ष को सुनने की आदत डाल दी है, चूंकि संवाद बना हुआ है सो, किसान और सरकार दोनों ही एक-दूसरे की सुन रहे हैं। सरकार को उम्मीद है कि कुछ रोज में किसान मान जाएंगे, क्योंकि किसानों की 15 में से 12 मांगें मानने को सरकार तैयार है, इसके लिए एक संशोधन विधेयक भी लाया जा सकता है, पर किसान चाहते हैं कि इस कृषि बिल को ही नेस्तनाबूद कर दिया जाए, दूसरी ओर सरकार संकेत देना चाहती है कि ’न तुम जीते, न हम हारे’। राकेश टिकैत जैसे नेता सरकार और किसान में संवाद सेतु का काम कर रहे हैं, तभी तो शुक्रवार को टिकैत एक ट्वीट करते हैं-’थोड़ा किसान पीछे हटे, थोड़ी सरकार पीछे हटे।’ पर किसान आंदोलन की बुनियादी रूप रेखा तैयार करने वाला संगठन ’आल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति’ टिकैत की राय से इत्तफाक नहीं रखता। दुर्भाग्यवश किसानों के तीन बड़े नेता डॉ. सुनीलम, राजू शेट्टी और वी एम सिंह कोरोना पॉजिटिव हो गए थे। सो, टिकैत और योगेंद्र यादव जैसे मीडिया फ्रेंडली नेतागण फिलहाल मंच लूट रहे हैं, पर दूर-सुदूर पंजाब, बिहार, यूपी, तेलांगना, मध्य प्रदेश व हरियाणा के गांवों से किसानों के आने का तांता लगातार बना हुआ है। किसानों की नाराज़गी के केंद्र में अडानी और अंबानी जैसे शीर्ष उद्योगपति भी बने हुए हैं। किसानों के सवाल हैं कि कृषि कानून संसद में 2020 में पारित हुए, पर 2018 में ही अडानी ने इन कार्यों के लिए 12 कंपनियां और कई साइलोज (जहां अन्न का भंडारण होता है) बना लिए, किसान पूछते हैं कि क्या इन उद्योगपतियों को पहले से पता था कि कोई ऐसा कृषि कानून आने वाला है? एफसीआई के बड़े-बड़े गोदाम अडानी ने पहले ही लीज पर ले लिए, मगर कैसे? मीडिया का एक वर्ग प्रचार कर रहा है कि किसानों के इस आंदोलन को अतिवादी नेताओं का समर्थन हासिल है, मोदी सरकार के एक मंत्री तो इससे भी दो कदम आगे बढ़ का दावा करते हैं कि किसानों के आंदोलन को चीन और पाकिस्तान से मदद मिल रही है।
Posted on 13 December 2020 by admin
जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और किसान संगठनों में बातचीत के बाद सहमति नहीं बन पाई तो सरकार के कुछ मंत्रिगण सख्त कदम उठाए जाने की वकालत करने लगे। सूत्र बताते हैं कि कई मंत्री इस राय के भी थे कि क्यों नहीं शाहीन बाग मॉडल को फॉलो कर किसानों को दिल्ली से दूर खदेड़ दिया जाए, पैरा मिलिट्री फोर्सेस की मदद लेकर। सूत्र बताते हैं कि इस बारे में खुफिया एजेंसियों का इनपुट भी मांगा गया। एजेंसियों ने सरकार को सतर्क करते हुए कहा कि ऐसे सख्त कदम उठाने का समय चला गया है, इससे माहौल अस्थिर होगा और हिंसा फैल सकती है। वैसे भी रोज-ब-रोज किसान बड़ी संख्या में दिल्ली की ओर कूच रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि जब केंद्र सरकार और किसान संगठन में बात नहीं बन रही थी तो सरकार की ओर से उन्हें ऐसे भी संकेत दिए गए कि अगर किसान टस से
मस नहीं हुए तो कृषि बिल का यह मामला अदालत में भी जा सकता है, जहां इसके निपटारे में वर्षों लग सकते हैं। सो, अब तो सरकार भी यह मान कर चल रही है कि रास्ता सिर्फ बातचीत से ही निकल सकता है, लिहाजा सरकार अब अपनी ओर से फराखदिली भी दिखाना चाहती है और यह भी बताना चाहती है कि वह किसानों की कितनी बड़ी हितैषी है। संघ भी सरकार के कंधें से कंधा मिला कर इस आंदोलन की धार कुंद करने में जुटा है। पहले संघ ने अपने दोनों आनुषांगिक संगठनों पर दबाव डाल कर उन्हें कृषि बिल पर सरकार के पक्ष से रू-ब-रू कराया, साथ एक नए किसान संगठन की नींव भी डाल दी गई है, इस संगठन को शुरू करने वाला संघ का एक पुराना स्वयंसेवक है, जो संघ के एक प्रमुख नेता डॉ. कृष्ण गोपाल के बेहद करीबी बताया जाता है, अब यह नया संगठन संघ के
आनुषांगिक अंग भारतीय किसान संघ के समक्ष एक महती चुनौती उपस्थित कर सकता है।
Posted on 13 December 2020 by admin
भले ही कयासों का बाजार कितना भी गर्म हो कि अपने 80वें जन्मदिवस पर तोहफे के तौर पर एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार को यूपीए के मुखिया की कुर्सी मिलने वाली है, पर सब जानते हैं कि सोनिया गांधी सिर्फ अपनी अस्थमा की वजह से गोवा गई है। यूपीए प्रमुख की चेयर छोड़ने का उनका कोई इरादा नहीं है। हालांकि कांग्रेस और एनसीपी दोनों ही पार्टियां यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि ऐसी बातें सिर्फ किसान आंदोलन से ध्यान भटकाने के लिए उछाली जा रही है। सूत्र बताते हैं कि
राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवा कर सोनिया यूपीए चेयरपर्सन का जिम्मा अपने पास ही रखना चाहेंगी। हालांकि महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के बीच सब अच्छा नहीं चल रहा है और न ही कांग्रेस शिवसेना और एनसीपी के इस गठजोड़ से खुश बताई जाती है, जिसमें दोनों पार्टियां सामूहिक रूप से कांग्रेस पर निशाना साधती है। शिवसेना नेता संजय राउत का भी वह बयान पवार की राय को ही मजबूती देने के लिए है कि ‘कांग्रेस फिलहाल कमजोर हो गई है।’ आने वाले कुछ रोज में शरद पवार 80 साल के हो जाएंगे, उनके लिए एनसीपी राष्ट्रीय राजनीति में किसी बड़ी भूमिका की तलाश में है, पर यह कांग्रेस की कीमत पर मुमकिन नहीं है।
Posted on 09 November 2020 by admin
ऐसा होना क्या महज़ इत्तफाक है कि जब भी कोई महत्वपूर्ण चुनाव हो रहा होता है तो कांग्रेस के किसी बड़े नेता का बेतूका बयान चुनाव की धारा बदल देता है, गुजरात विधानसभा चुनाव में भी तब तक भाजपा की हालत पतली थी जब तक कि मणिशंकर अय्यर का वह बेतुका बयान सामने नहीं आया था, 2014 के आम चुनावों में भी अय्यर और जयराम रमेश ने मिल कर यही काम किया था। अब जबकि बिहार में सुप्तप्रायः कांग्रेस को तेजस्वी का साथ पाकर एक नया जीवन मिला है, गांधी परिवार के वफादार पी चिदंबरम बिहार चुनाव के ऐन दौर में अपना मुंह खोल देते हैं और कहते हैं कि ’जम्मू-कश्मीर में धारा 370 की पुनर्बहाली हो।’ यह एक आत्मघाती बयान है, जिसका सीधा कनेक्शन हिंदू भावनाओं से जुड़ा है। सनद रहे कि ये वही चिदंबरम हैं जो रामसेतु मुद्दे पर हिंदू आस्था के प्रतीक भगवान राम को एक काल्पनिक चरित्र बता गए थे। अब खुलासा हो रहा है कि चिदंबरम ने जांच एजंसियों के दबाव में आकर ऐसा भड़काऊ बयान दिया है। वैसे भी चिदंबरम की कुछ अहम फाईलों पर सीबीआई, ईडी और आईबी कुंडली मार कर बैठीं हैं, शायद इसीलिए चिदंबरम भगवा आकांक्षाओं के हाथों में खेल रहे हैं।
Posted on 09 November 2020 by admin
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले सप्ताह 95 वर्ष का हो गया है, पर उसकी उम्मीदें, चेहरा-मोहरा इतना जवान कभी नहीं दिखा। आप यूं भी कह सकते हैं कि संघ का यह स्वर्णिम काल है। इसकी स्थापना 1925 के दशहरा में, नागपुर की धरती पर एक पूर्व कांग्रेसी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने किया था। आज संघ दुनिया के सबसे बड़े स्वैच्छिक संगठनों में शुमार हो गया है, क्योंकि आज की तारीख में इसके सदस्यों की संख्या 80 लाख से ज्यादा बताई जाती है, देश और देश से बाहर लगने वाली इसकी शाखाओं की संख्या 60 हजार पार कर गई है। इसके आनुशांगिक संगठनों की संख्या भी 30 है, इसका एक अंग विद्या भारती भी देश में 14 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, वहीं सरस्वती शिशु मंदिर के अंतर्गत 25 हजार से ज्यादा स्कूल चलते हैं, संघ एक नई परिकल्पना ’एकल विद्यालय’ के साथ सामने आया था, जिसमें एक अकेला शिक्षक ऐसे स्कूलों को चलाता है, देश भर में एकल विद्यालय की संख्या 1 लाख के आंकड़े को पार कर गई है। असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में भाजपा की जड़ें जमाने में संघ का एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। इस वक्त संघ के कई प्रचारक मुख्यमंत्री और विभिन्न राज्यों के राज्यपालों की गद्दी पर काबिज हैं, स्वयं प्रधानमंत्री मोदी संघ के पुराने प्रचारकों में शुमार होते हैं। कहा जाता है कि इस दफे के बिहार विधानसभा चुनाव में दर्जनों भाजपा प्रत्याशियों को संघ की अनुशंसा पर टिकट मिले हैं। भाजपा के हालिया सांगठनिक फेरबदल में नए पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा की टीम बनाने में संघ प्रचारक और पार्टी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष की सबसे अहम भूमिका मानी जा रही है। पश्चिम बंगाल के आसन्न विधानसभा चुनाव को देखते हुए संघ का कैडर वहां वर्षों पहले से सक्रिय हो गया था, शायद इसीलिए संघ से बाहर के लोगों के लिए भाजपा में टिके रहना इतना आसान नहीं।
Posted on 09 November 2020 by admin
’तपती धूप में, भूखे अपने घरों के लिए जब वे मीलों चले होंगे
तब मन की आग भभकी होगी, संकल्प नए इरादों में ढले होंगे’
जम्हूरियत का अंदाजे़बयां भी निराला है, दोस्त कब दुश्मन बन जाए, दुश्मनों से कब हाथ मिलाने पड़ जाए, कुछ मालूम नहीं। 2010 की एक जनसभा में नीतीश कुमार कहते हैं ’जब बिहार में सुशील मोदी हैं तो यहां किसी दूसरे मोदी की जरूरत नहीं है।’ यहां तक कि अपनी मेहमानवाजी में होने वाले एनडीए के डिनर को भी उन्होंने पटना में सिर्फ इसीलिए रद्द कर दिया था क्योंकि उसमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल होने वाले थे। जब भाजपा ने 2013 में नरेंद्र मोदी को अपना पीएम फेस घोषित किया तो नीतीश ने भाजपा से अपने सारे रिश्ते-नाते तोड़ लिए। पर अब वही सुशासन बाबू न केवल मोदी के साथ स्टेज शेयर कर रहे हैं बल्कि मोदी की मौजूदगी वाली रैलियों में खुलेआम कह रह हैं कि ’यदि एनडीए दोबारा सत्ता में आती है तो मोदी यह सुनिश्चित करेंगे कि बिहार विकसित राज्य बने।’ भाजपा को भी कहीं गहरे यह अहसास है कि इस बार नीतीश के नेतृत्व में एनडीए के लिए बिहार की राह आसान नहीं, चुनांचे इसीलिए भाजपा रणनीतिकारों ने अभी से ’प्लॉन बी’ पर काम करना शुरू कर दिया है, इसका तात्पर्य यह है कि बिहार में एनडीए हारे या जीते पर नीतीश कुमार बिहार के सीएम नहीं होंगे। लेकिन भाजपा नीतीश को ठंडे बस्ते में भी नहीं डालना चाहती, क्योंकि उसे इस बात का भी इल्म है कि नीतीश के बगैर बिहार में 2024 का चुनाव आसान नहीं होगा। भाजपा से जुड़े विश्वस्त सूत्र खुलासा करते हैं कि बिहार चुनाव का अंजाम चाहे कुछ भी हो, पर नीतीश का केंद्रनीत सरकार में मंत्री बनना तय है, और उन्हें रेल जैसे किसी महत्वपूर्ण मंत्रालय से नावाजा जा सकता है जिससे वे एनडीए छोड़ कर कहीं तेजस्वी से गलबहियां न कर बैठें।