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राजनाथ का तीर निशाने पर

Posted on 20 July 2014 by admin

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह एम्स में अपनी गर्दन का इलाज करवा रहे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत को देखने जब अस्पताल पहुंचे तो दोनों नेताओं के बीच एक घंटे से भी ज्यादा वक्त तक अकेले में बात हुई। कयासों के बााार गर्म है कि आखिर राजनाथ व रावत के बीच ऐसी क्या गुप्त वार्ता हुई है, सूत्र बताते हैं कि राजनाथ ने अपने बड़े पुत्र पंकज के साले निशानेबाज जसपाल राणा के राजनैतिक भविष्य को लेकर रावत से बात की, सनद रहे कि राणा ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस ज्वॉइन कर ली थी। समझा जाता है कि रावत भी राणा को प्रमोट करने के लिए तैयार हो गए हैं। उन्हें कांग्रेस की ओर से ऊपरी सदन यानी राज्यसभा में भेजा जा सकता है।

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मुख्यमंत्री का फुटबॉल प्रेम

Posted on 20 July 2014 by admin

पिछले कई दिनों से मेघालय के मुख्यमंत्री डा. मुकुल संगमा अपने दल बल के साथ ब्राजील में विश्व कप फुटबॉल मैचों का आनंद उठा रहे थे, उनकी अनुपस्थिति में उनका सारा काम-धाम असम कैडर के 1979 बैच के आईएएस और उनके सचिव विनयशील ओबराय देख रहे थे, जिन्हें डेपुटेशन पर दिल्ली आना था, इनकी बहाली मेनका गांधी के मंत्रालय महिला व बाल कल्याण में बतौर सचिव हो गई है, मेनका के मंत्रालय के सचिव शंकर अग्रवाल का तबादला वेंकैया के नगर विकास मंत्रालय में हो चुका है। अग्रवाल से मेनका गांधी के रिश्ते कतिपय मधुर नहीं रहे, इसी वजह से जल्दी-जल्दी में उनकी रूखसती की इबारत लिखी गई। अब वर्ल्ड कप समाप्त हो चुका है सो अगर अब मुकुल संगमा अपने सचिव को पद मुक्त करें तो वह भी दिल्ली की ठौर पकड़ सकें।

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दो दोस्तों ने दिल्ली छोड़ी

Posted on 12 July 2014 by admin

जरा पहचानिए तो ये कौन हैं दो दक्षिण भारतीय राजनीतिज्ञ, एक महिला, एक पुरुष, दोनों तमिलनाडु की राजनीति से निकले साथ-साथ और चैन्नई से दिल्ली एक्सप्रेस पकड़ ली, लंबे समय तक केंद्र में मंत्री रहे, दोनों ही पेशे से वकील और दोनों की दोस्ती ऐसी कि कांग्रेस की राजनीति में इसकी मिसालें दी जाती रही थीं, फिर न जाने क्या हुआ कि इन दोनों में जर्बदस्त झगड़ा हुआ, झगड़ा ऐसा कि फिर सुलह-सफाई की गुंजाईश ही न बची, दिल्ली के निजाम से कांग्रेस का झंडा क्या उतरा ये दोनों साथ-साथ चैन्नई लौट गए हैं, पी.चिदंबरम और जयंती नटराजन ये दोनों ही अब तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं, चिदंबरम की नजर अम्मा की कुर्सी पर है, जिसे वह इतनी आसानी से छोड़ने वाली नहीं। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट में चिदंबरम एक-दो बार नजर जरूर आए हैं, पर दिल्ली की एक प्रतिष्ठित लॉ-फर्म ने जब उनकी सेवाएं लेनी चाही तो चिदंबरम ने एक स्वर से मना कर दिया। सूत्र बताते हैं कि ऐसे भी कई दक्षिण भारतीय राज्यों में चिदंबरम का जमा-जमाया बिजनेस हैं, जिसे उनके पुत्र कार्तिक देखते हैं, सूत्रों का दावा है कि न्यूयॉर्क के एक प्रमुख होटल में चिदंबरम परिवार की हिस्सेदारी है, कुर्ग में 500 एकड़ में फैला एक कॉफी प्लांटेशन है, वहीं एक आलीशान रिसार्ट भी है, दांत और आंख का चेन चलाने वाली एक मेडिकल कंपनी में भी उनकी हिस्सेदारी है, यानी चिदंबरम के लिए अभी करने के लिए बहुत कुछ है।

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शाह की वाह

Posted on 12 July 2014 by admin

महाराष्ट्र की भाजपा यूनिट अमित शाह के अध्यक्ष बनने की दोहरी खुशी मना रही है, क्योंकि शाह की जन्मस्थली मुंबई ही है। वे दक्षिण मुंबई के भुलेश्वर में पैदा हुए हैं, उनकी पत्नी भी कोल्हापुर की है, इस नाते शाह महाराष्ट्र के दामाद भी कहे जाते हैं। महाराष्ट्र भाजपा को उम्मीद है कि शाह ने जिस तरह उत्तर प्रदेश में अपने सोशल इंजीनियरिंग का जादू बिखेरा था, वे चाहे तो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी यह करिश्मा दोहरा सकते हैं, क्योंकि शाह महाराष्ट्र की जातीय राजनीति को भी बखूबी समझते हैं, हाल के दिनों में कांग्रेस-एनसीपी वाली राज्य सरकार ने वहां मराठों को 16 फीसदी व मुस्लिम को 5 फीसदी नौकरी व शिक्षा में आरक्षण देकर एक बड़ा दांव खेला है, शाह को इसकी काट भी ढूंढ़नी है, वहीं गोपीनाथ मुंडे के आकस्मिक निधन से भाजपा की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है, सो महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं को ऐसा लगता है कि अगर आने वाले चुनाव में शाह का चेहरा सामने रखा जाए तो भाजपा अपने दम पर सभी 288 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।

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‘साध्वी वचन’

Posted on 12 July 2014 by admin

गंगा मंथन पर अभी हाल में ही केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने अपने मंत्रालय में अधिकारियों की एक अहम बैठक बुलाई थी, उन्होंने अपने अधिकारियों से आह्वान किया कि वे चाहे तो गंगा शुद्धि मुहिम को लेकर अपने नायाब आइडिया दे सकते हैं, फिर भी जब अधिकारियों के बीच खामोशी व्याप्त रही तो उमा भारती ने चुटकी लेते हुए कहा कि ‘आप अपनी सलाहें जरूरी है मंत्रालय में काम करने के दौरान ही दें, तब आपको अपनी रिटायरमेंट के बाद अलग से किताब लिखने की जरूरत नहीं पड़ेगी’, दरअसल उमा का इशारा कोल मंत्रालय के तत्कालीन सचिव पी.सी.परख की पुस्तक ‘क्रूसेडर और कंसप्रेटर’ की ओर था जो उन्होंने कोयला घोटाले को बेनकाब करने के इरादे से लिखी थी। पर यह कहते हुए उमा जी शायद यह भूल गईं कि परख ने कोयला सचिव रहते हुए अपनी सलाहों से कोल मंत्री व प्रधानमंत्री को अवगत करा दिया था। यह और बात है कि तब उन राजनेताओं ने उनकी बात पर कान नहीं धरे थे।

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राहुल हैं कि सुधरते नहीं

Posted on 12 July 2014 by admin

कांग्रेस भले ही इस दफे का लोकसभा चुनाव बुरी तरीके से हार गई हो, पर कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी की भाव-भंगिमाओं, उनकी राजनैतिक शैली और राजनैतिक निर्णयों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि जैसे वह अपनी पार्टी की हार से सबक लेने को तैयार हैं, महाराष्ट्र के प्रभारी के तौर पर मोहन प्रकाश की नियुक्ति को लेकर पार्टी में भयंकर मतभेद थे, स्वयं सोनिया गांधी भी राहुल की इस राय से पूरी तरह इत्तफाक नहीं रखती थीं, उसी प्रकार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी)में फेरबदल को लेकर पिछले काफी समय से उपक्रम साधा जा रहा है, पर राहुल हैं कि वे अब तक किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचे नहीं हैं, पार्टी में ‘प्रियंका लाओ’ का खटराग अलापने वाले और इसे मौन स्वीकृति देने वाले नेता गण भी चुप हैं कि हार की समीक्षा बैठक में जब कुछ कांग्रेसी नेताओं ने राहुल की जगह प्रियंका को नेतृत्व सौंपने की बात उठाई थी तो बैठक में मौजूद प्रियंका गांधी बुरी तरह से बिफर गई थीं और उन्होंने ऐसी मांग उठाने वाले कांग्रेसी नेताओं को बुरी तरह डांट लगाते हुए कहा था कि ‘वह अब भी मजबूती से अपने भाई के पीछे खड़ी हैं और चाहती हैं कि राहुल ही पार्टी का नेतृत्व करें।’ प्रियंका के इस बदले रूख को देखते हुए बदलाव की चाहत रखने वाले नेताओं ने चुप्पी साध लेने में ही भलाई समझी है। सदन में भी कमोबेश राहुल का यही हाल है, एक तो वे सदन आते बहुत कम हैं, आते हैं तब जब सदन शुरू हो चुकी होती है और बीच में ही उठ कर चले जाते हैं ताकि लोगों से मिलना-जुलना और उनके सवाल जवाब कम हो सके, सदन में राहुल ने एक झपकी मार ली तो इतना बड़ा हंगामा खड़ा हो गया, पर ऊंघती हुई कांग्रेस को कौन जगाएगा यानी बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा? सवाल यही तो सबसे बड़ा है।

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संकट मोचक गडकरी

Posted on 12 July 2014 by admin

अमित शाह को अध्यक्ष बनाने का अडवानी खेमा पुरकश विरोध कर रहा था, अडवानी अपनी ओर से यशवंत सिन्हा का नाम आगे कर रहे थे, पर जब संघ और मोदी ने मजबूती से शाह के नाम को आगे बढ़ाया और पार्टी में इस पर सर्वानुमति बनाने का जिम्मा नितिन गडकरी को सौंपा गया, तब अडवानी खेमे ने भी सक्रिय होकर यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश व राजस्थान के कई सांसदों से संपर्क साध लिए थे, गडकरी ने मैराथन उपक्रम साध न सिर्फ अडवानी खेमे के नेताओं को मनाया, बल्कि कई उग्र तेवर वाले सांसदों से स्वयं बात भी की और उन्हें शाह के संगठन क्षमता से अवगत कराया। तब कहीं जाकर अमित शाह के नाम का औपचारिक ऐलान संभव हो पाया। गडकरी मोदी के नए संकट मोचक बनकर उभरे हैं।

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गैर जाट नेता पर भाजपा का दांव

Posted on 12 July 2014 by admin

भाजपा हरियाणा विधानसभा चुनाव में किसी गैर जाट को अपना मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर सकती है। हरियाणा में पिछले डेढ़ दशक से जाटों का शासन रहा है यानी चौटाला के 5 साल के बाद हुड्डा के 10 साल, गैर जाटों को कहीं न कहीं यह बात नागवार गुजर रही है, सो सीएम पद के दावेदारों में से एक सुभाष खट्टर ने तो बकायदा इस बाबत पोस्टर भी लगवा दिए, पर भाजपा गंभीरता से जिन दो नामों पर विचार कर रही है वह है राव इंद्रजीत सिंह और कृष्णपाल गुर्जर, सुषमा स्वराज स्वयं जाट के खिलाफ किसी गुर्जर को चुनावी मैदान में उतारने की पक्षधर हैं, भले ही कृष्णपाल अभी केंद्र में राज्य मंत्री हों, पर वे भी राज्य की राजनीति में सक्रिय होने का इरादा रखते हैं, वे प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और नेता विपक्ष की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं और उन्हें मैडम स्वराज का वरदहस्त भी प्राप्त है। वहीं पार्टी राव इंद्रजीत सिंह के नाम पर भी गंभीरता से विचार कर रही है, राव साहब भी केद्र में मंत्री हैं, वे सुषमा के साथ राजनाथ सिंह की भी पसंद हैं।

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…और अंत में

Posted on 12 July 2014 by admin

एंटोनी कमेटी को स्वयं उत्साही कांग्रेसियों ने एक नया नाम दिया है ‘अंतहीन कमेटी’।

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तीन हिस्सों में इराक?

Posted on 05 July 2014 by admin

रमाान के पवित्र महीने के बाद इराक संकट और भड़कने के आसार हैं। खुफिया सूत्र बताते हैं कि आने वाले दिनों में इराक में ‘सिविल वॉर’ बदस्तूर जारी रह सकती है और अगर वहां स्थितियां इतनी ही विस्फोटक बनी रही तो मुमकिन है इराक तीन अलग-अलग मुल्कों में बंट जाए-सुन्नीस्तान, शियास्तान और कुर्दिस्तान। जब तक इराक में सद्दाम हुसैन का शासन था यानी 2003 तक सत्ता के केंद्र में सुन्नी थे। 2006 में अमरीका ने अपने दखल से इराक का प्रधानमंत्री नूरो-अल-मलिकी को बना दिया जो एक शिया थे। उसी वक्त से इराक संकट गहराने लगा, बगदाद और उसके दक्षिण में शियाओं का वर्चस्व है, उत्तर में सुन्नी बहुमत में हैं, और उत्तर-पूर्व में कुर्द। अमरीकी उप राष्ट्रपति जो बिदेन, जो 2006 में अमरीकी सीनेट में एक सीनेटर भर थे तब उन्होंने ही पहली बार इराक को तीन अलग मुल्कों में बांटने का प्रस्ताव रखा था। वैसे भी इराक में अभी जिस तरह गृह युध्द की स्थिति बनी हुई है उसको लेकर अलग-अलग देशों के रूख भी अलग हैं। जैसे इस पूरी लड़ाई में शिया कौम की मदद ईरान कर रहा है, सुन्नियों की मदद सऊदी अरब जैसे राष्ट्र कर रहे हैं, इजराइल की दिलचस्पी कुर्द यानी मात्र कुर्दिस्तान तक सीमित है। वहीं रूस पूरी तरह सुन्नियों की खिलाफत में हैं। मलिकी इराक के नेता की जगह शियाओं के नेता बन गए हैं। वैसे भी सुन्नी समर्थक आतंकवादी संगठन आईएसआईएस विश्व का सबसे अमीर आतंकवादी संगठन बन कर उभरा है।

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