Archive | विशेष

…और अंत में

Posted on 07 June 2015 by admin

भारतीय सियासत को अबूझ रणनीति का नया ककहरा सिखाने वाले अमित शाह जनता परिवार के विलय के खिलाफ हैं, वे यह भी नहीं चाहते कि आने वाले बिहार चुनाव में लालू-नीतीश-कांग्रेस व वामदलों का कोई महागठबंधन बने। सूत्र बताते हैं कि लालू के बेहद भरोसेमंद और राज्यसभा सांसद प्रेम गुप्ता और अमित शाह के बीच हालिया दिनों में एक गुप्त मुलाकात हुई है, सपा के एक अन्य प्रमुख नेता नरेश अग्रवाल भी शाह के संपर्क में बताए जाते हैं, कुछ नीतीश करीबियों का दावा है कि प्रेम गुप्ता और नरेश अग्रवाल नहीं चाहते कि नीतीश और लालू मिल कर चुनाव लड़ें। हालिया दिनों में लालू के कुछ अप्रिय बयानों को इसी कड़ी से जोड़ कर देखा जा सकता है।

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खबरों की मुरम्मत

Posted on 26 May 2015 by admin

दिल्ली का मतलब सिर्फ दर्प, विजय व आत्ममुग्धता की खुली मुनादी नहीं, बल्कि इस किले के परकोटे से नन्हीं चिड़िया को खुले आकाश में फुर्र से उड़ने की आजादी भी होनी चाहिए। देश के सबसे बड़े मीडिया समूह के मालिकों ने अपने संपादक मंडल की एक अहम बैठक बुलाई और उसमें ऐलान किया कि आने वाले दो महीनों में मोदी सरकार के खिलाफ ‘निगेटिव’ कुछ भी नहीं छपेगा। इसका बैठक में मौजूद पत्रकारों ने विरोध किया और कहा कि इससे लोगों के बीच उनके अखबार की विश्वसनीयता क्या रह जाएगी? वैसे भी अखबार की छवि कॉरपोरेट परस्त है, तब दोनों मालिकों में से एक ने बीच का रास्ता निकाला और कहा- ‘चलिए कम से कम ‘हेडलाइंस’ और ‘इंट्रो’ निगेटिव न हो, खबर आप अपने हिसाब से लिख लीजिए।’ इन दिनों यह अखबार ऐसा ही दिखने लगा है, खबरों पर हेडलाइंस अलग से चस्पां कर दी जा रही हैं।

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हम भी बनेंगे सीएम

Posted on 26 May 2015 by admin

बिहार में ज्यों-ज्यों चुनाव की घड़ी करीब आ रही, भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की लिस्ट निरंतर लंबी हुई जा रही है, इस सूची में एक अदद सुशील मोदी के अलावा नंदकिशोर यादव, रामकृपाल यादव, शाहनवाज हुसैन, राधामोहन सिंह, रविशंकर प्रसाद, राजीव प्रताप रूढ़ी जैसों के नाम शामिल हैं। संघ ने तय किया है कि अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख और संघ प्रचारक स्वांत रंजन बिहार चुनाव के संपन्न होने तक नागपुर के बजाए पटना में ही जमे रहेंगे, आश्चर्यजनक तौर पर स्वांत रंजन अपनी ओर से रूढ़ी का नाम आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं नरेंद्र मोदी की निजी पसंद के तौर पर राधामोहन सिंह और रविशंकर प्रसाद तेजी से उभरे हैं।

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…और अंत में

Posted on 26 May 2015 by admin

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.सथाशिवम केंद्रनीत मोदी सरकार की मेहरबानियों से भले ही केरल के गवर्नर बना दिए गए हों, पर उनकी उदात्त महत्त्वाकांक्षाओं का उफान अब नए हिलौरे मार रहा है, अब उनकी निगाह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष पद पर टिक आई है, और उनकी महत्त्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ाने में जुटे हैं स्वयं भाजपाध्यक्ष अमित शाह।

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काएदा-कानून

Posted on 09 May 2015 by admin

जब केंद्र में मोदी युग का आगाज हुआ तो मोदी के रणनीतिकारों ने एक अहम फैसला लिया कि यूपीए शासनकाल में जो नौकरशाह अहम पदों पर रहे हैं, मंत्रालयों में सचिव या मंत्रियों के पीएस रहे हैं, उन्हें अन्यत्र यानी कम महत्त्व के पदों पर भेजा जाएगा। पर कुछ नौकरशाहों ने मोदी सरकार से भी अपने तार भिड़ा लिए, जैसे 89 बैच के कर्नाटक कैडर के आईएएस राकेश कुमार सिंह की ही मिसाल ले लें, अभी इनके पास बतौर जे एस-यूटी का प्रभार है। सिंह इससे पहले आंतरिक सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण पद पर थे। जबकि सिंह यूपीए शासनकाल में वीरप्पा मोइली व मुनियप्पा जैसे महत्त्वपूर्ण मंत्रियों के पीएस रह चुके थे। सनद रहे कि मोदी सरकार ने आईएएस चहल को इसीलिए बाहर का रास्ता दिखा दिया था चूंकि वे सुशील कुमार शिंदे के ओएसडी रहे थे।

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मोदी-दीदी की नई दोस्ती

Posted on 08 May 2015 by admin

ममता और मोदी में रिश्तों की नई बानगी को परवान चढ़ाने में दीदी के खास सिपहसालार डेरेक ओ-ब्रायन की एक महती भूमिका रही है। जिन्होंने अरुण जेतली के साथ मुलाकात कर कई अप्रिय मसलों, मसलन सीबीआई और सारदा प्रकरण को सुलझाने की पहल की, इसके बाद ही लोकसभा और राज्यसभा में रणनैतिक तौर पर तृणमूल ने अपना रुख बदल लिया। गाहे-बगाहे दीदी और मोदी के बीच फोन पर बातें होने लगी, केंद्रीय खजाने का मुंह बंगाल के लिए खोल दिया गया। और अपनी चीन यात्रा से पूर्व मोदी ने दीदी को भरोसे में लिया जिससे कि बांग्लादेश के साथ जमीन की अदला बदली और तीस्ता जल विवाद जैसे विवादास्पद मुद्दों पर 10 वर्षों में जो समझौता कांग्रेस नहीं कर पाई, वह मोदी सरकार ने कर दिखाया। लैंड बिल को लेकर भी दीदी का रुख नरम पड़ चुका है। पीएम के कोलकाता दौरे में दीदी उन्हें रिसीव करने वाली हैं और कम से कम दो कार्यक्रमों में ये दोनों नेता मंच साझा करने वाले हैं। आंखों में सजता है, कानों में बजता है, यह सियासत ही तो है जो वक्त के कंगूरे पर मुर्गे-सा बांग देता है।

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बिहार के साथ बंगाल में चुनाव

Posted on 08 May 2015 by admin

वक्त की दरजीदारी ही सही, अवसर यहां सबसे बड़ा सच है। दीदी भी इसे शायद सबसे बड़ा मौका मान रही हों, बंगाल के निकाय चुनावों में अपने अश्वमेध घोड़े को सरपट भागता देख वह गदगद हैं और बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए उन्हें अब एक साल का इंतजार नहीं चाहिए। दीदी ने मोदी के संग अपनी बातचीत में इशारों-इशाराें में उन्हें बता दिया है कि वह चाहती हैं कि बंगाल में भी चुनाव अपने नियत समय से पूर्व बिहार चुनाव के साथ हो जाएं। सियासी नेपथ्य की आहटों को समझने में सिद्दहस्त दीदी जानती हैं कि सीताराम येचुरी की ताजा ताजपोशी के बाद से लगातार सीपीएम बंगाल बनाम केरल के घरेलू झगड़े से जूझ रही है। कांग्रेस नेतृत्व विहीन है और मोदी-मैजिक बंगाल में कहीं दिखाई नहीं दे रहा, चुनांचे दीदी इसे चुनाव का सबसे उपयुक्त वक्त मानती हैं, रायटर्स बिल्डिंग पर अपनी एक और ताजपोशी के लिए।

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…और अंत में

Posted on 08 May 2015 by admin

मोदी सरकार के अहम फैसलों में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का भी खासा दखल रहता है, इसकी अनुगूंज गुजरात कैडर के 87 बैच के आईपीएस ए.के.शर्मा यानी अरुण कुमार शर्मा की नियुक्ति में सुनाई दे गई, जब तमाम बड़े दावेदारों की दावेदारियों को धत्ता बताते हुए शर्मा की नियुक्ति सीबीआई में बतौर ज्वांइट डायरेक्टर हो गई। जबकि इसी पद पर 84 बैच के गुजरात कैडर के आईपीएस राकेश अस्थाना की भी नजर थी। अस्थाना फिलवक्त सूरत के पुलिस कमिश्नर हैं और मोदी के खास विश्वासपात्रों में शुमार होते हैं, वहीं ए.के.शर्मा को अमित शाह का वरदहस्त प्राप्त बताया जाता है, हाल तक ए.के.शर्मा डिटेक्शन ऑफ क्रांइम ब्रांच, अहमदाबाद में स्पेशल कमिश्नर के तौर पर तैनात थे और यह पद भी खास तौर पर इनके लिए सृजित किया गया था।

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मोदी का मीडिया मैनेजमेंट

Posted on 26 April 2015 by admin

मोदी विरोध की अलख जगाने वाले देश के एक सबसे बड़े मीडिया समूह के मालिक प्रधानमंत्री से मिलने पहुंचे, इनके ‘नेशन वांट्स टू नो’ खटराग अलापने वाले चैनल प्रमुख का कार्यकाल इस नवंबर में रिन्यू होना है, सूत्र बताते हैं कि इन देसी मीडिया मुगल से मोदी ने निहायत साफगोई और तल्खी से कहा कि आपका चैनल और प्रकाशन समूह मेरी सरकार की इमेज प्रो-पूंजीवादी प्रोजेक्ट कर रहा है, यह कोई अच्छी बात नहीं है, आपको तो मालूम है कि मेरा एप्रोच हमेशा से ‘प्रो-पीपल’ रहा है। देसी मीडिया मुगलों ने प्रधानमंत्री के समक्ष हाथियार डालते हुए कहा- ‘हम अपने न्यूज चैनल या अखबार में अपना रोजाना हस्तक्षेप नहीं रखते हैं, बेहतर यह रहेगा कि आप हमारे न्यूज चैनल व अखबार में सीनियर पोजिशन के लिए अपने कुछ लोग सजेस्ट कर दीजिए जो सरकार का नजरिया ठीक से सामने रख सके, हम उन्हें नौकरी पर रख लेंगे।’ प्रस्ताव अच्छा था, अब यह आकार लेने लगा है।

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आप तो ऐसे ना थे!

Posted on 26 April 2015 by admin

आम आदमी पार्टी की जंतर मंतर रैली में आत्महत्या करने वाले दौसा, राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह की मौत की गुत्थी लगातार उलझती जा रही है। इस बात पर भी सियासी धुंध छाई है कि गजेंद्र सिंह को क्या सचमुच मनीष सिसौदिया ने फोन करके दिल्ली बुलाया था? वैसे भी गजेंद्र उन किसानों में शामिल नहीं था जिसकी पूरी की पूरी फसल बर्बाद हो गई हो। उनके पास 15 बीघा जमीन थी। उनके गांव में उनका पैतृक 4 कमरों का पक्का मकान था, उनका पगड़ी बांधने का भी कार्य था वे बिल क्लिंटन से लेकर अटल बिहारी को पगड़ी बांध चुके थे, सूत्र बताते हैं कि शादी-ब्याह में भी वे पगड़ी बांधने का काम करते थे और एक पगड़ी बांधने के एवज में 500 रुपए तक लेते थे। वे सपा, कांग्रेस, भाजपा जैसी राजनैतिक पार्टियों में रह चुके थे, और कोई 10 वर्ष पहले वे सपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके थे। सूत्र बताते हैं कि एक वर्ष पहले ही वे आप के संपर्क में आए थे और उन्होंने तय किया था कि वे आप ज्वॉइन करेंगे। सूत्रों की मानें तो आप नेताओं को पेड़ पर चढ़ने के उनके फितूर के बारे में पता था, ये सभी मात्र उनका एक पब्लिसिटी स्टंट मान रहे थे। गजेंद्र ने जब गले में गमछा लपेटा तो उस वक्त उनका दूसरा पैर अपेक्षाकृत एक छोटी शाखा पर टिका था, जो फिसल गया और गले का गमछा उनके लिए मौत का फांस बन गया।

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