Posted on 17 July 2017 by admin
एनडीए की ओर से उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन होगा? यह यक्ष प्रश्न अब तलक अनुत्तरित बना हुआ है। संकेत इस बात के भी मिल रहे हैं कि जिस प्रकार एनडीए में राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय हुआ था, उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चयन में भी शायद यही प्रक्रिया उभर कर सामने आए। अब सवाल उठता है कि आखिरकार रामनाथ कोविंद का नाम आया कहां से? सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार तय करने के लिए आहूत हुई भाजपा की पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग से ऐन पहले अमित शाह और अरुण जेटली की मुलाकात हुई, संघ की ओर से एक पूर्व राज्यपाल का नाम सामने आया था, जिसे लेकर ये दोनों प्रधानमंत्री के पास पहुंचे। पर मोदी ने पहले से ही कोविंद के नाम पर मन बनाया हुआ था, सो उन्होंने छूटते ही कहा-कोविंद। और इस तरह से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का नाम तय हो गया। क्या उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चयन की प्रक्रिया का प्रारूप भी यही होगा? सवाल यही सबसे बड़ा है।
Posted on 17 July 2017 by admin
भारतीय क्रिकेट को भी सियासत का रोग लग गया है। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली की तब से अनिल कुबंले की ठनी हुई थी, जब आईपीएल की बेंगलुरु टीम के कुंबले कोच थे और विराट कैप्टन। किसी बात पर दोनों में इतनी कहा सुनी हो गई कि टीम के मालिक विजय माल्या का बीच-बचाव भी काम नहीं आया। जब पिछली दफे कुंबले को इंडियन टीम का कोच बनाया जा रहा था, कहते हैं तब भी विराट ने विरोध दर्ज कराया था, पर अनुराग ठाकुर और शिर्के ने विराट की एक न सुनी। चैंपियंस ट्रॉफी में विराट व कुंबले के झगड़े की वजह से ही शायद भारत को पाकिस्तान के हाथों शर्मनाक हार का घूंट चखना पड़ा। कहते हैं कि फाइनल इलेवन के चयन में भी विराट कुंबले की एक नहीं सुनते थे, वे अपनी पसंद की टीम चाहते थे और टीम चयन से पहले सीधे बीसीसीआई के चैयरमैन से बात कर लेते थे। जब इस बार कोच चुनने की बारी आई तो विराट ने अपनी ओर से वीरेंद्र सहवाग का नाम सामने रखा था, क्योंकि इन दोनों का दिल्ली कनेशन है। पर सहवाग के नाम पर बीसीसीआई में मतभेद थे, कई पदाधिकारियों का मानना था कि सहवाग एक कोच के लिए उतने ’मेच्यौर’ नहीं हैं। ऐसे में सौरव गांगुली की उम्मीदवारी उभर कर सामने आई पर विराट और गावस्कर जैसे लोगों ने सौरव के मुकाबले रवि शास्त्री का नाम आगे कर दिया और शास्त्री की लॉटरी लग गई।
Posted on 17 July 2017 by admin
चीन और भारत के रिश्तों में आई कड़ुवाहट को दूर करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने विदेश सेवा के एक पूर्व अधिकारी जयंत प्रसाद का चयन किया है। सूत्र बताते हैं कि जयंत प्रसाद के चीन के बेहतर रिश्ते हैं और विदेश सेवा से सेवा निवृत्त होने से पहले ये अफगानिस्तान, अल्जीरिया, जेनेवा और नेपाल में भारत के राजदूत भी रह चुके हैं। ये काफी अरसे तक संयुक्त राष्ट्र में भी काम कर चुके हैं। फिलवक्त ये दिल्ली स्थित एक डिफेंस अध्ययन और रिसर्च संस्था के डायरेक्टर जनरल हैं। इनकी पत्नी भी 1976 बैच की आईएएस अफसर हैं। 1976 में विदेश सेवा में आने से पहले दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास पढ़ाते थे। जयंत के पिता प्रोफेसर विमल प्रसाद एक जाने-माने अध्येता हैं, जो कई किताबें लिख चुके हैं और जिन्होंने लंबे समय तक जेएनयू में अध्ययन कार्य किया है। विमल प्रसाद के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से बेहद करीबी रिश्ते थे और चंद्रशेखर ने विमल प्रसाद को नेपाल में भारत का राजदूत भी नियुक्त किया था।
Posted on 17 July 2017 by admin
दिल्ली में लालू प्रसाद के सबसे विश्वस्त सहयोगी और केंद्र के एक पूर्व मंत्री लगातार अरुण जेटली को फोन कर उनसे मिलने का समय मांग रहे थे, और अपने राज्यसभा के दिनों की दोस्ती का वास्ता दे रहे थे। बड़ी मुश्किल से उन्हें जेटली से मिलने का समय मिला। सूत्र बताते हैं कि जेटली से मिलकर उन्होंने गुहार लगाई कि ’इस मुसीबत से छुटकारा दिला दो, मैं कुछ भी करने को तैयार हूं, आप कहो तो राजनीति भी छोड़ दूं।’ पर जेटली की ओर से उन्हें कोई ठोस आश्वासन प्राप्त नहीं हुआ। वे ना उम्मीद होकर वापिस लौटे तो ईडी की टीम पहले से उनके दरवाजे पर बैठी थी, कहते हैं कि अब उन्होंने तय किया कि वे अपनी ओर से जांच एजेंसियों का पूरा सहयोग करेंगे। अब यह तो जांच एजेंसियों के ऊपर है कि वे उनके पेट से और कितनी बातें निकाल पाते हैं।
Posted on 17 July 2017 by admin
मोदी सरकार अंग्रेजी की जगह हिंदी और भाषायी समाचार पत्र-पत्रिकाओं को ज्यादा तरजीह दे रही है। अपनी 3 साल की उपलब्धियों का बखान करने के लिए केंद्र सरकार ने जो विज्ञापन जारी किए उसमें हिंदी समेत क्षेत्रीय भाषाओं के प्रकाशन को प्रमुखता मिली। 2019 के आम चुनाव के लिए भी मोदी की यही राजनीति परवान चढ़ेगी, ज्यादा से ज्यादा भाषायी मीडिया को सरकार अपने साथ जोड़ेगी और इसी के कंधे पर सवार होकर आम लोगों तक पहुंचेगी। मोदी सरकार के रणनीतिकार अंग्रेजी मीडिया को ज्यादा भाव दिए जाने के पक्षधर नहीं। (एनटीआई-gossipguru.in)
Posted on 10 July 2017 by admin
पीएमओ से जुड़े विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री के बेहद दुलारे मनोज सिन्हा को पिछले दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय की डांट सुननी पड़ गई। हुआ दरअसल यह कि सिन्हा से उनके दफ्तर में बीएचयू के जमाने के उनके एक मित्र अपने पुत्र के साथ मिलने आए थे। उस व्यक्ति का पुत्र दरअसल टेलीकॉम कंपनी ’जियो’ में नौकरी चाहता था। सूत्र बताते हैं कि सिन्हा ने भी आव देखा न ताव झट से ’जियो’ के स्वामी मुकेश अंबानी को फोन लगा दिया। जब अंबानी लाइन पर आए तो सिन्हा ने उन्हें अपना मंतव्य समझाया। जाने कैसे यह बात पीएमओ में लीक हो गई। सो, पीएमओ ने सिन्हा को डपटा कि ’यह तीसरी बार है जब आपने किसी उद्योगपति को सीधे फोन किया है, एक मंत्री को यह शोभा नहीं देता। ऐसे कार्यों या पैरवी की भी एक प्रक्रिया है। आपका दफ्तर इस आशय का पत्र लिख सकता है, निवेदन कर सकता है।’ सिन्हा असमंजस में हैं, नहीं तो अब से पहले उन्हें पीएम की ओर से खुला आश्वासन प्राप्त हुआ था कि मंत्रिमंडल के अगले फेरबदल में उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलेगा और एक अहम मंत्रालय भी। पर अब क्या मिलेगा यह तो सिर्फ मोदी ही जानते हैं।
Posted on 10 July 2017 by admin
असम के सीएम सर्वानंद सोनोवाल और वहां के सुपर सीएम हेमंतो बिस्वा शर्मा में बुरी तरह से ठन गई है। दरअसल, पिछले दिनों असम में बड़े पैमाने पर अधिकारियों के तबादले होने थे, इस क्रम में हेमंतो अपनी एक लिस्ट के साथ सीएम से मिले। इस लिस्ट में लगभग 75 फीसदी ऐसे अधिकारी थे जिन्हें बिस्वा अपनी पसंद की जगह भेजना चाहते थे। सोनोवाल ने साफ मना कर दिया, बोले- ’ये संभव नहीं होगा, आप चाहे तो अपने संसदीय क्षेत्र के अधिकारियों की सूची आप मुझे सौंप सकते हैं।’ बिस्वा बगैर कुछ बोले वहां से चले गए। सूत्र बताते हैं कि अगले दो रोज में दिल्ली से अध्यक्ष जी के ऑफिस से सीएम को एक फैक्स आया जो अधिकारियों की लिस्ट थी और यह लिस्ट हुबहू वही थी जो बिस्वा सीएम के पास दो दिन पूर्व लेकर आए थे। सोनोवाल को सारा माजरा समझ में आ गया। वे भागे-भागे दिल्ली पहुंचे, पीएम से मिले, अध्यक्ष जी की परिक्रमा की। अध्यक्ष जी ने समझाया आपको राजकाज का अनुभव कम है, बिस्वा जी का बेस है और आपका फेस है। हम इसी को लेकर 19 के चुनाव में जाएंगे। सोनोवाल कहते रहे कि ’अपर असम’ में उनका बेस है, बिस्वा का वहां कुछ नहीं है। पर उनकी बात सुनकर भी अनसुनी कर दी गई।
Posted on 10 July 2017 by admin
एक पिछड़े राज्य के दबे-कुचले लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले केंद्रीय मंत्री ने गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिक्कर को फोन करके कहा कि उनका साला और भतीजा उनसे मिलने गोवा आना चाहते हैं। पर्रिक्कर ने साला-भतीजा द्वय को मिलने का समय दे दिया। जब ये दोनों पर्रिक्कर से मिले तो ’नो नानसेंस पर्रिक्कर’ ने जानना चाहा कि ’बताइए काम क्या है?’ दोनों ने समवेत स्वरों में कहा कि ’गोवा में किसी अच्छे ’बीच’ के पास एक बंगला बनाने के लिए जमीन दे दीजिए।’ पर्रिक्कर एकदम से उखड़ गए और उन्होंने मंत्री जी के साले-भतीजे को एकदम से ’गेटआउट’ कर दिया। फिर केंद्रीय मंत्री को फोन लगाया और उनसे कहा-’मैं सीएम हूं या प्रापर्टी डीलर जो तुम्हारे बंगले के लिए जमीन ढूंढू। अध्यक्ष जी गोवा आने वाले हैं, इस बारे में उनसे बात करूंगा।’ मंत्री जी ने फौरन स्थिति संभाली, बोले-’इन दोनों ने मुझे इस बारे में अंधेरे में रखा था, आने दो इनकी खबर लेता हूं। पर प्लीज आप इस बात का अध्यक्ष जी से जिक्र मत करना।’ मंत्री जी इतना रिरिया गए कि पर्रिक्कर का दिल भी मनोहर हो आया। और उन्होंने अध्यक्ष जी से इस बारे में वाकई कोई चर्चा नहीं की।
Posted on 10 July 2017 by admin
जब से कोलकाता के एक उद्योगपति ने जिनका झारखंड में बड़ा कारोबार है, बाबूलाल मरांडी को भाजपाध्यक्ष अमित शाह से मिलवाया है, सूत्र बताते हैं कि तब से मरांडी अध्यक्ष जी के सीधे संपर्क में है। पिछले दिनों मरांडी ने अध्यक्ष जी से मिलने का समय मांगा। समय मिल भी गया। मरांडी ने दिल्ली की उड़ान भी पकड़ ली। पर सूत्र बताते हैं कि ऐन वक्त मरांडी अध्यक्ष जी से मिलने से चूक गए। पर अध्यक्ष जी का संदेशा वह भी बेहद साफ-साफ मरांडी को मिल गया है कि अगर मरांडी अपनी पार्टी का विलय (जिसके ज्यादातर विधायक इधर-उधर छिटक चुके हैं) भाजपा में कर दें तो उन्हें राज्यसभा मिल सकती है। 2019 का चुनाव उन्हें पार्टी अपने सिंबल पर लड़वाएगी और जीत कर आए तो केंद्र में मंत्री बनाए जाएंगे। पर बाबूलाल को नजदीक से जानने वाले उनके लोग बताते हैं कि वे राज्यसभा में आने के साथ ही निवर्तमान मोदी सरकार में झटपट मंत्री भी बनना चाहते हैं, भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इसके लिए किंचित तैयार नहीं जान पड़ता है चुनांचे मरांडी की घर वापसी का पेंच फिलवक्त फंसा ही है।
(एनटीआई-gossipguru.in)
Posted on 26 June 2017 by admin
आईटी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनियों में शुमार होने वाली इंफोसिस और इसके को-फाउंडर नारायण मूर्ति के लिए रामनाथ कोविंद की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी उन्हें हैरान करने वाली साबित हुई है। उच्च पदस्थ सूत्रों के दावों पर अगर यकीन किया जाए तो नारायण मूर्ति भी अब से पहले राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल थे। यह भी माना जाता है कि उन्हें स्वयं प्रधानमंत्री की ओर से यह आश्वासन प्राप्त हुआ था कि उनके राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। समझा जाता है कि इसके बाद से ही नारायण मूर्ति कंपनी में अपनी भूमिका को और भी संक्षिप्त करने में जुट गए थे। हालांकि बाजार में खबरें कंपनी के सीईओ विशाल सिक्का और उनके बीच मनमुटाव की आईं कि इसी वजह से नारायण मूर्ति और उनके सह संस्थापक मित्र अपने प्रमोटर शेयर्स बेचना चाहते हैं, पर सूत्रों का दावा है कि एक तरह से मूर्ति स्वयं को राष्ट्रपति पद की दावेदारी के लिए कंपनी से अपने तमाम जुड़ाव से मुक्त होना चाहते थे। वह तो ऐन वक्त संघ ने दुलकी चाल भरी और उसके गर्दो-गुबार में रतन टाटा, मूर्ति, बिग बी जैसे नाम हवा में उड़ गए और कोविंद जैसे जमीनी व्यक्ति रायसिना हिल्स पर काबिज होने के लिए आगे बढ़ गए।