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दीदी की हवाई चप्पल

Posted on 26 July 2014 by admin

तृणमूल सांसद और सिनेस्टार मुनमुन सेन की तबियत इन दिनों नासाज है, सूत्र बताते हैं कि उनकी खून की जांच में उनका यूरिक एसिड बहुत बढ़ी तादाद में पाया गया, यही वजह है कि इन दिनों उनके दोनों पैर भी बेतरह सूज गए हैं, पैरों में सूजन इतनी ज्यादा है कि डॉक्टरों ने उन्हें हवाई चप्पल पहनने को कहा है, सो मुनमुन सेन ने अपने ड्राईवर से बाजार से एक जोड़ी चप्पल मंगवाई, ड्राईवर अपनी पसंद का सफेद व नीली पट्टी वाली हवाई चप्पल लेकर आ गया। मुनमुन जब यह हवाई चप्पल पहन कर अपनी पार्टी की एक मीटिंग में शरीक हुई तो तृणमूल के नेता व कार्र्यकत्ता हैरत में पड़ गए और उनसे सवाल पूछा कि ‘क्या वह ममता दीदी की नकल कर रही हैं, जो हवाई चप्पल पहन कर मीटिंग में आ गई हैं, वह भी नीले व सफेद रंग का जो कि ममता दीदी का पसंदीदा कलर है,’ मुनमुन को जवाब देते नहीं बना, सो, अब वह चाह कर भी हवाई चप्पल नहीं पहन पा रही हैं, अब हर बात तो डॉक्टर नहीं समझ सकते ना!

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पीएम के विदेशी दौरे से मीडिया नदारद

Posted on 26 July 2014 by admin

पूरे चुनावी अभियान में मोदी राग अलापने वाले मीडिया में खलबली मची है, मोदी की दो विदेश यात्राएं संपन्न हो गई, पर आम तौर पर प्रधानमंत्री के विशेष विमान ए-वन में सफर करने वाले कोई 30 पत्रकारों के दल को उनके साथ जाने का मौका नहीं मिल पाया, सिर्फ समाचार एजेंसी पीटीआई, दूरदर्शन और एएनआई के कैमरा मैन को प्रधानमंत्री अपने साथ लेकर गए। प्रधानमंत्री के हालिया ब्रिक्स (ब्राजिल)दौरे में भी प्रधानमंत्री अपने साथ एक छोटा दल लेकर गए थे, जिसमें अजीत डोवाल, विक्रम मिसरी, जगदीश ठक्कर, पीएमओ और वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैय्यद अकबरूद्दीन और एक डॉक्टर साथ गए थे। अभी पिछले दिनों पीएमओ कवर करने वाले एक पत्रकार के समक्ष पीएम ने इस बाबत अपना नजरिया रखा, मोदी ने साफ किया कि उनके मन में भी मीडिया को लेकर कोई दुर्भावना नहीं है, उन्होंने इसका गहन अध्ययन किया और पाया कि पत्रकारों को साथ विदेश लेकर जाने की परंपरा लाल बहादुर शास्त्री जी के जमाने में शुरू हुई, यहां तक कि ‘मीडिया फ्रेंडली’ माने जाने वाले नेहरू भी अपने साथ पत्रकारों को विदेशी दौरे पर नहीं ले जाते थे। मोदी का मानना है कि शास्त्री जी के जमाने में उनका यह फैसला उचित था क्योंकि तब ये संचार माध्यम इतने विकसित नहीं थे,पर आज जमाना बदल गया है, यह टि्वटर, व्हॉट्सअप, गुगल प्लस, ई-मेल और फेसबुक का जमाना है। मोदी और पीएमओ अपनी बात कहने के लिए प्रचुर रूप से टि्वटर हेंडिल का सहारा लेते हैं। रही बात प्रेस-कांफ्रेंस की तो पीएम ने स्पष्ट कर दिया है कि विदेशी दौरे पर जाने से पहले और वहां से लौटने के बाद वे दिल्ली में ही एक प्रेस-कांफ्रेंस कर दिया करेंगे। वैसे भी प्रधानमंत्री के साथ जाने वाले मीडिया दल को तीसरे नंबर पर रखा जाता है, पहले पर अधिकारी गण, दूसरे पर साथ जा रहे प्रतिनिधिमंडल और अंत में मीडिया, मीडिया वालों को विदेश में एक अलग होटल में ठहराया जाता है। और प्रधानमंत्री के साथ कौन जाएगा इसका चुनाव भी आम तौर पर पीएमओ और विदेश मंत्रालय के अधिकारी करते हैं, इसमें पीएम की निजी पसंद-नापसंद का भी ध्यान रखा जाता है, यही वजह है कि अटल जी के जमाने में संघ से जुड़े प्रकाशनों का जिम्मा संभालने वाले तरुण विजय, कंचन गुप्ता और शेषाद्रिचारी सदैव उनके साथ जाते रहे थे। सो, मोदी चाहते हैं कि मीडिया में कुछ खास लोगों को उपकृत करने की परंपराओं पर लगाम कसा जाए। और फिर भी कोई मीडिया समूह प्रधानमंत्री के विदेशी दौरे को विशेष रूप से कवर करना चाहता है तो वह अपने खर्चे पर अपना रिपोर्टर या कैमरा मैन संबंधित देश में भेज सकता है, जहां पीएमओ उसे संबंधित तमाम सूचनाएं मुहैया करा देगा।

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सुषमा का बदला रूख

Posted on 26 July 2014 by admin

सुषमा स्वराज को विदेश मंत्रालय संभाले 50 दिन से ज्यादा हो गए पर बतौर विदेश मंत्री उन्होंने किसी भी पत्र-पत्रिका या न्यूज चैनल को अपना कोई भी इंटरव्यू नहीं दिया है, इस परिप्रेक्ष्य में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैय्यद अकबरूद्दीन पिछले दिनों अपने मंत्री से मिलने पहुंचे और उन्हें बताया कि देश-विदेश के कोई 100 से ज्यादा पत्रकारों ने मंत्री साहिबा के इंटरव्यू के लिए समय मांगा है, इनमें से 35 तो प्रमुख विदेशी अखबार व चैनल से संबंधित मीडियाकर्मी है। सुषमा का जवाब था कि क्या प्रधानमंत्री जी ने अब तक कोई किसी मीडिया समूह को कोई इंटरव्यू दिया है? सो वह भी अभी छह महीने तक वह कोई इंटरव्यू नहीं देंगी, क्योंकि फिलवक्त उनका सारा ध्यान अपने मंत्रालय के काम-काज को समझने में लगा है, सुषमा ने साफ कर दिया है कि ऐसे भी किसी सरकार में विदेश नीति प्रधानमंत्री की होती है, विदेश मंत्री तो बस उन नीतियों को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है। माना यह भी जा रहा है कि इन दिनों सुषमा की नरेंद्र मोदी और अरुण जेतली के साथ संबंधों में कतिपय मधुरता आई है।

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केशरीनाथ कैसे पहुंचे बंगाल?

Posted on 26 July 2014 by admin

सियासत के माहिर खिलाड़ी और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की कई क्षेत्रीय सूरमाओं से गहरी छनती है, उनमें से एक ममता बनर्जी भी हैं, गाहे-बगाहे राजनाथ ने कई मौकों पर उनकी कई तरह से मदद भी की है। जब पश्चिम बंगाल के लिए राज्यपाल का नाम तय हो रहा था तो राजनाथ ने अपनी ओर से विजय कुमार मल्होत्रा का नाम सोच रखा था, वैसे राज्यपाल की नियुक्ति में संवैधानिक तौर पर संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से मंजूरी लेना जरूरी नहीं, उन्हें बस इत्तला भर भेजनी होती है। सो, जब उस रोज राजनाथ ने ममता दीदी से बात करनी चाही तो वह छुट्टी पर थीं, दीदी के ऑफिस में कई बार मैसेज छोड़ा गया, पर वहां से कोई जवाब नहीं आया। और दीदी की एक आदत है कि वह बेहद जल्दी-जल्दी अपना मोबाइल नंबर बदल लेती हैं, फिर ममता के दिल्ली में एक बेहद करीबी व्यक्ति से संपर्क साधा गया और उन्होंने दीदी से राजनाथ को कॉल-बैक कराया, दीदी ने छूटते ही पूछा कि ‘क्या मल्होत्रा जी का नाम फाइनल हो गया है?’ राजनाथ ने किंचित कोमलता जताते हुए कहा कि ‘अगर फाइनल ही हो जाता तो आपसे पूछते क्यों?’ दीदी ने कहा-‘आपके पास और भी कोई नाम है?’ तब राजनाथ ने केशरीनाथ त्रिपाठी का नाम आगे बढ़ाया, साथ ही यह भी कहा-‘बहुत ही काबिल व्यक्ति हैं, संविधान मर्मज्ञ हैं, स्पीकर रह चुके हैं, कई किताबें भी लिख चुके हैं।’ दीदी ने कहा-‘दस मिनट दीजिए सोच कर बताती हूं,’ दीदी ने अपने सूत्रों से पता किया, सूत्रों ने बताया कि अब त्रिपाठी गोपाल गांधी तो नहीं हो सकते, पर ठीक हैं। और दीदी की हामी आ गई।

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…और अंत में

Posted on 26 July 2014 by admin

भगवा पाठशाला के नए हेड मास्टर अमित शाह खुद ही अपने लिए नए सबक सीखने में जुटे हैं। सूत्र बताते हैं कि शाह इन दिनों दो भाषाएं सीख रहे हैं-बांग्ला और तमिल। इन दोनों ही राज्यों में आने वाले दो वर्षों में चुनाव होने हैं। बांग्ला सीखने में शाह खास रूचि दिखा रहे हैं और इन दिनों वे विद्यासागर वर्ण परिचय किताब को कंठस्थ करने में जुटे हैं, शाह इस बात को लेकर भी परेशान हैं कि उनका बांग्ला टीचर अभी एक सप्ताह की छुट्टी लेकर कोलकाता गए थे, पर दस दिन हो गए अब वे तक लौटे नहीं हैं।

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राजनाथ से नाराज ममता

Posted on 26 July 2014 by admin

अब सवाल उठता है कि दीदी ने अपने प्रिय राजनाथ के फोन-कॉल्स का जवाब देना जरूरी क्यों नहीं समझा? दीदी से जुड़े सूत्रों का दावा है कि दीदी इन दिनों राजनाथ से नाराज चल रही थीं, दरअसल बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राहुल सिन्हा ने राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था पर चिंता जाहिर करते हुए राज्यपाल को एक ज्ञापन सौंपा था और बतौर गृह मंत्री सक्रियता दिखाते हुए राजनाथ ने बंगाल की दीदी सरकार से इस पर जवाब मांग लिया था। सो दीदी इस पर बेतरह उखड़ गईं, जबकि स्वयं एनडीए सरकार का रूख दीदी को लेकर किंचित नरम नहीं है, क्योंकि स्वयं प्रधानमंत्री मोदी राज्य के बहुचर्चित चिटफंड सारदा घोटाले की जांच सीबीआई से करवाना चाहते हैं, जिसकी आंच दीदी और उनके कई करीबियों तक पहुंच सकती है। फिलहाल राजनाथ ने दीदी से दोस्ती दिखाते हुए इस फाइल को ठंडे बस्ते में डाल रखा है, पर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी?

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मोदी के आर्थिक सलाहकार क्यों नहीं?

Posted on 20 July 2014 by admin

नरेंद्र मोदी भले ही दिल्ली के निााम पर काबिज हो गए हों, पर अपने कई मित्र अर्थशास्त्रियों की आकांक्षाओं को वेर् मूत्त रूप नहीं दे पाए हैं, न तो स्वयं प्रधानमंत्री ने और न ही उनके काबिल दोस्त अरुण जेतली ने ही किसी अर्थशास्त्री को अपने सलाहकारों की औपचारिक सूची में शुमार किया है, नतीजन मोदी के अर्थ-दर्शन को अभिप्रेरित करने वाले देश के दो प्रमुख अर्थशास्त्री जगदीश एन.भगवती और अरविन्द पानागढ़िया नई सरकार से अपनी नाराागी नहीं छुपा पा रहे हैं, सनद रहे कि गुजरात में मोदी की अर्थनीति को परवान चढ़ाने में जगदीश भगवती की एक महती भूमिका रही थी, भगवती को मोदी का ‘इकोनोमिक फिलॉस्पर'(आर्थिक चिंतक) माना जाता था, ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली की यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों को एक सक्षम प्रारूप देने में अमर्त्य सेन की एक महती भूमिका रही थी। वैसे भी भगवती और अमर्त्य सेन दो अलग ‘स्कूल ऑफ थॉट्स’ के जनक हैं, जहां सेन की नीति ‘गरीब केंद्रित’ है यानी ज्यादा से ज्यादा गरीबों में बांटों यानी यूपीए सरकार की सब्सिडी आधारित अर्थनीति वहीं से अभिप्रेरित है, जिसकी परिणति ‘भोजन का अधिकार बिल’ के तौर पर देखा जा सकता है, वहीं भगवती देश की आर्थिक विकास दर को बढ़ाने के पक्षधर हैं, वे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देकर हर हाथ को काम देने की बात करते हैं ताकि सरकार अनुदान, सब्सिडी व सहायता के तरकीबों में ही न उलझ कर रह जाए। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अरविन्द पानागढ़िया ने भी मोदी के चुनावी अभियान से लेकर उनके पीएम बनने तक के सफर में जमकर उनका साथ दिया, पर मोदी सरकार ने उन्हें भी अपना इकोनॉमिक एडवाइजर बनाने की दिशा में कोई पहल नहीं की है, निराश होकर पानागढ़िया ने इस बजट से पहले एक अंग्रेजी समाचार पत्रिका में लंबा लेख लिखा कि सरकार को अपने बजट में क्या सुधारवादी कदम उठाने की जरूरत है, कहना न होगा कि वित्त मंत्री ने उनके कई सुझावों पर अपने बजट में अमल करने की कोशिश भी की है। पर इनके मंसूबों को परवान चढ़ाने के लिए मोदी सरकार का इतना उपक्रम काफी नहीं है।

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जेतली के पास अपने लिए वक्त नहीं

Posted on 20 July 2014 by admin

अरुण जेतली मोदी सरकार को अपना जितना वक्त दे रहे हैं, अपने लिए वह वक्त नहीं निकाल पा रहे, जेतली के निजी डॉक्टरों की सलाह है कि वे नियमित रूप से ‘मॉर्निंग वॉक’ पर जाएं, अब जेतली के अपने निजी आवास कैलाश हिल्स में इतनी जगह नहीं जहां वे ‘वॉक’ कर सकें। सो, जेतली जब तक विपक्ष में थे वे नियमित रूप से नई दिल्ली के लोदी गार्डन में ‘मॉर्निंग वॉक’ के लिए जाया करते थे, जहां उनके दोस्तों की एक बड़ी मंडली उनके साथ सुबह के सैर का लुत्फ उठाती थी, जेतली की इस मंडली में राजनेताओं के अलावा उनके पत्रकार मित्रों की भी एक लंबी फेहरिस्त थी। आव-भगत के शौकीन जेतली अक्सर अपनी मंडली के दोस्तों के लिए ब्रेकफास्ट की टोकरी भी वहीं लोदी गार्डन में मंगा लिया करते थे। जब से मोदी सरकार आई है और उसमें जेतली का रूतबा इस कदर बढ़ा है तो सुरक्षा की दृष्टि से उनका लोदी गार्डन में टहलना मना हो गया है, सो जेतली ने बहुत सोच-समझकर अपने लिए लूटियंस जोन में 2 कृष्ण मेनन मार्ग स्थित उस सरकारी घर को आवंटित कराया है जिसमें कभी मनमोहन सिंह के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे रहा करते थे, उस बंगले की खासियत यह है कि उसके अंदर बकायदा एक ‘जागिंग ट्रेक’ भी बना हुआ है। पर यह नव-आवंटित बंगला भी जेतली की मुसीबतों का निदान नहीं ढूंढ़ पाया है, क्योंकि इन दिनों लूटियंस जोंस में खासकर कृष्ण मेनन मार्ग पर बंदरों ने आतंक मचा रखा है, शिंदे के जमाने में तो बंदरों को भगाने के लिए लंगूर की मदद ले ली जाती थी, पर कोर्ट के एक ताजा आदेश के बाद लंगूर रखने पर पाबंदी लगा दी गई है, सो अब इन बंदरों को समझाए कौन कि वे मोदी सरकार के सबसे सर्वशक्तिमान से पंगा ले रहे हैं।

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लाल का मलाल

Posted on 20 July 2014 by admin

कई मोदी वफादारों के लिए अच्छे दिन अभी आए नहीं हैं, जैसे मोदी के आंख-नाक-कान माने जाने वाले नई दिल्ली गुजरात भवन के रेजीडेंट कमिश्नर भरत लाल यूं अनायास ही पीएमओ में कार्यरत आईएएस, आईपीएस और आईएफएस लॉबी की निशाने पर आ गए हैं। मूल रूप से यूपी से ताल्लुक रखने वाले भरत लाल का मोदी से दशकों पुराना रिश्ता है, और इस पूरे चुनावी अभियान के दौरान जब मोदी अपनी चुनावी सभाओं में व्यस्त थे तो लाल दिल्ली में रहकर विदेशी पत्रकारों और दिल्ली स्थित तमाम विदेशी दूतावासों से संपर्क साध एक ‘प्रो-मोदी’ फिाा बनाने में जुटे थे, यही वजह थी कि पहले यूरोपियन यूनियन के देश, फिर अमरीका जैसे देशों ने भी मोदी के लिए अपने स्वर बदल लिए। जब केंद्र में मोदी सरकार आई तो यह माना जाने लगा कि भरत विक्रम मिसरी और राजीव टपलू के साथ प्रधानमंत्री के निजी सचिवों की सूची में शुमार हो जाएंगे। सबसे हैरत की बात तो यह है कि पीएम के कमरे के साथ के एक कमरे में भरत लाल की नेम प्लेट भी लगा दी गई, पर अगले ही रोज उस नेम प्लेट को हटा दिया गया, दबे स्वरों में तर्क दिया गया कि चूंकि भरत फॉरेस्ट सर्विस से आते हैं इसीलिए पीएमओ में उनका एडजस्टमेंट मुश्किल होगा, क्योंकि प्रधानमंत्री के अन्य दोनों पीएस विक्रम मिसरी आईएफएस हैं, राजीव टकरू आईएएस हैं, विक्रम मिसरी को अपनी कुर्सी खाली करनी पड़ सकती है, क्योंकि वे स्पेन में भारत के राजदूत नियुक्त हो गए हैं, सो उन्हें जल्दी ही स्पेन की ठौर पकड़नी पड़ सकती है, एक प्रमुख कांग्रेसी नेता से राजीव टकरू की निकटता पीएम मोदी को रास नहीं आई है, सो उन्होंने टकरू को ठंडे बस्ते में डालने का पुख्ता इरादा बना लिया है। यहां तक कि भरत लाल के सहयोगी नीलेश को भी पीएमओ के सूचना अधिकारी जगदीश भाई ठक्कर के साथ लगा दिया गया, पर भरत लाल के लिए लालबत्ती ही रही, वे अब भी गुजरात भवन में बैठने को मजबूर हैं।

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लाल व शर्मा में छत्तीस का आंकड़ा

Posted on 20 July 2014 by admin

समझा जाता है कि गुजरात की मुख्यमंत्री और मोदी की बेहद भरोसेमंद आनंदीबेन पटेल ने नमो को यह सलाह दी थी कि मोदी ने जिस ‘गुजरात मॉडल’ का बार-बार हवाला देकर दिल्ली की गद्दी का रास्ता तय किया है, उस राज्य के विकास का पहिया थमना नहीं चाहिए, सो जो अफसर गुजरात में अच्छा काम कर रहे हैं उन्हें पीएमओ में ले जाने के बजाए उनके पुराने काम में ही लगाए रखना चाहिए, इसी फार्मूले की वजह से मोदी के बेहद दुलारे कैलाश नाथन को भी गांधी नगर में ही रूक जाना पड़ा, मोदी के पुराने अधिकारियों में बस एक ए.के.शर्मा ही दिल्ली की ठौर पकड़ पाए, माना तो यह भी जाता है कि ए.के.शर्मा और भरत लाल में आपस में बिल्कुल नहीं पटती है, ए.के.शर्मा भी लाल की तरह यूपी से ताल्लुक रखते हैं, चूंकि शर्मा पहले ही पीएमओ में आ गए हैं सो, लाल के लिए पीएमओ के दरवाजे बंद हो गए।

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