Posted on 08 October 2017 by admin
अब ’इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर ऑफ आर्टस’ जैसे संस्थान भी केसरिया रंग में रंगे नज़र आ रहे हैं। अभी पिछले दिनों इस संस्थान के प्रांगण में दीवाली मेले का आयोजन था, जिसका उद्घाटन संघ प्रमुख मोहन भागवत के कर कमलों से हुआ। सनद रहे कि इस संस्थान की बागडोर जब से संघ के चिंतन में डूबे वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय को मिली है, यहां अब संघियों का जमावड़ा जुटने लगा है। चुनांचे जब मोहन भागवत यहां पधारे तो उन्होंने संघ और भाजपा के छोटे-छोटे कार्यकर्त्ताओं को भी अलग से मिलने का 5 मिनट का समय दिया और प्रत्येक की बातों को ध्यानपूर्वक सुना। संघ प्रमुख को जमीनी फीड बैक मिल गया, तो कार्यकर्त्ताओं को उनका खोया हुआ सम्मान! (एनटीआई-gossipguru.in)
Posted on 05 October 2017 by admin
प्रवेश साहिब सिंह वर्मा भी इन दिनों अपनी पार्टी हाईकमान के रवैए से दुखी हैं, वे दुखी हैं कि बवाना उप चुनाव में पार्टी उम्मीदवार की हार के बाद उन्हें कायदे से डपटा गया है। दरअसल बवाना उप चुनाव का प्रभारी प्रवेश वर्मा को सिर्फ इसीलिए बनाया गया था कि बवाना एक जाट बहुल सीट है। आम आदमी पार्टी के सिटिंग विधायक वेद प्रकाश अपनी पार्टी और विधायकी से इस्तीफा देकर, भाजपा के टिकट पर वहां से चुनाव लड़ रहे थे। चुनांचे यह भाजपा और आप पार्टी के दरम्यान मूंछों की लड़ाई थी। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने भी बड़ी उम्मीदों के साथ बवाना उपचुनाव की बागडोर प्रवेश के हाथों में सौंपी थी, कहते हैं भाजपा के प्रति जाटों का गुस्सा देखते हुए चुनाव प्रभारी होने के बावजूद डेंगू होने का बहाना बना प्रवेश घर से बाहर ही नहीं निकले और इस चुनाव में भाजपा के इस अधिकृत उम्मीदवार को बड़े अंतर से मुंह की खानी पड़ी। चुनाव का रिजल्ट आने के बाद अमित शाह ने प्रवेश वर्मा और उस क्षेत्र के भाजपा सांसद उदित राज को अपने दफ्तर तलब किया। इन दोनों को बाहर बैठकर घंटों इंतजार करना पड़ा, जबकि बवाना से भाजपा के टिकट पर चुनाव हार गए वेद प्रकाश वहां देर से पहुंचे और सीधे अमित शाह के कमरे के अंदर चले गए। जहां उन्हें आश्वासन प्राप्त हुआ कि शीघ्र ही उन्हें पार्टी में एडजस्ट किया जाएगा। सूत्र बताते हैं कि इसके बाद प्रवेश और उदित राज को अंदर बुलाकर उनकी क्लास लगाई गई।
Posted on 05 October 2017 by admin
विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि तमिल सुपर स्टार रजनीकांत आने वाले चुनावों में भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए राजी हो गए हैं। सूत्रों की मानें तो रजनीकांत की पत्नी ने अपना रीयल एस्टेट बिजनेस शुरू करने के लिए इंडियन बैंक से 180 करोड़ का लोन लिया था। हालिया दिनों में जिस तरह से रीयल एस्टेट सेक्टर को भारी गिरावट का मुंह देखना पड़ा है, उससे रजनीकांत की पत्नी को भी बड़े घाटे का सामना करना पड़ा है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व चाहता था कि रजनीकांत भाजपा ज्वॉइन करें, पर अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर रजनीकांत ने ऐसा करने से मना कर दिया, पर वे भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए राजी हैं बदले में वे चाहते हैं कि बैंक के संग उनके इस लोन विवाद का आसानी से निपटारा हो जाए। उन्हें आश्वासन मिल गया है कि काम हो जाएगा, अब रजनी के समक्ष चुनौती है कि वे अपने नए डॉयलॉग को भगवा रंगों में पिरो लें।
Posted on 05 October 2017 by admin
भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियों को जिस प्रकार पार्टी के वयोवृद्ध नेता यशवंत सिन्हा ने सवालों के घेरे में खड़ा किया और उसके अगले ही रोज यशवंत के दावों की हवा निकालने के लिए भाजपा की ओर से इसकी बागडोर उनके पुत्र जयंत सिन्हा को सौंपी गई और जिन्होंने जीएसटी, नोटबंदी और जीडीपी को लेकर जिस तरह मोदी सरकार की तारीफों के कसीदे पढ़े उससे इस बात के संकेत तो मिलते ही हैं कि पार्टी व सरकार में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। नहीं तो क्या वजह है कि इतने काबिल वित्त मंत्री के होते प्रधानमंत्री ने अपनी अलग इकॉनोमिक एडवाइज़री काऊंसिल बनाई है और विवेक दिओबराय को इसका चैयरमेन बनाया है। सूत्र बताते हैं कि जीडीपी के लड़खड़ाने से स्वयं पीएम चिंता में हैं और भाजपा नेतृत्व में भी यह अहसास गहराने लगा है कि आर्थिक मसलों पर पेशेवर लोगों यानी घुटे हुए अर्थशास्त्रियों की राय लेनी जरूरी है। वैसे भी मोदी अब तक हार्वर्ड की बजाए हार्डवर्क पर ज्यादा भरोसा कर रहे थे, पर कहीं न कहीं उनका भरोसा डगमगाता दिख रहा है।
Posted on 05 October 2017 by admin
हालिया दिनों में बीएचयू यानी बनारस हिंदू युनिवर्सिटी में जो कुछ घटित हुआ, इसका ठीकरा केंद्र योगी के सिर पर फोड़ इस मामले से पल्ला झाड़ लेना चाहता है, पर सच्चाई की बात यह है कि बीएचयू एक सेंट्रल युनिवर्सिटी है जिसकी फंडिंग भी न सिर्फ केंद्र द्वारा होती है, अपितु इसके उप कुलपति की नियुक्ति में भी पूरी तरह केंद्र का हाथ होता है। बीएचयू मामले के बाद भाजपा शीर्ष नेतृत्व की ओर से न सिर्फ योगी को झाड़ पिलाई गई बल्कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को यह अहम जिम्मा भी सौंपा गया कि वे मीडिया को वह लाइन दें जिसमें बीएचयू बवाल के लिए योगी सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा सके। भाजपा शीर्ष नेतृत्व के मन में जो कुछ चल रहा है उसे योगी के लिए कतई एक शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है।
Posted on 05 October 2017 by admin
योगी सरकार में रघुराज प्रताप सिंह ऊर्फ राजा भैया की तूती बोल रही है, योगी सरकार में राजा भैया की पैरवी अचूक साबित हो रही है, तभी तो राजा भैया के खास लोगों को न सिर्फ बेधड़क सरकारी ठेके मिल रहे हैं, अपितु राजा भैया के करीबी लोग यूपी में मलाईदार पदों पर आसीन भी हो रहे हैं।
Posted on 05 October 2017 by admin
सूरत के कपड़ा व्यापारियों ने भाजपा सरकार पर अपना गुस्सा निकालने का एक नया जरिया ढूंढ़ निकाला है, अब बकायदा वे अपने डिब्बों पर प्रिंट करा रहे हैं-’ कमल का फूल, हमारी भूल।’ (एनटीआई-gossipguru.in)
Posted on 25 September 2017 by admin
झारखंड में जहां एक ओर वहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास अपनी सरकार के 1000 दिन पूरा होने का जश्न मनाने में जुटे हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा पार्टी द्वारा अपनी उपेक्षाओं के गम से उबर नहीं पा रहे हैं। अपनी निरंतर उपेक्षा से आहत मुंडा ने पिछले दिनों रांची में अपने समर्थक विधायकों को रात के भोजन पर आमंत्रित किया, सूत्र बताते हैं कि इस डिनर में भाजपा के आठ से ज्यादा विधायक शामिल हुए। सूत्रों की मानें तो इस डिनर में मुंडा ने व्यथित भाव से अपने समर्थक विधायकों से कहा कि ’आज प्रतिकूल हालात हैं, उनके धैर्य की परीक्षा ली जा रही है, यहां तक कि उनका राजनैतिक अस्तित्व भी संकट में पड़ता जा रहा है, ऐसे में उनके पास विकल्प भी कम होते जा रहे हैं। कहते हैं मुंडा ने अपने विधायकों को पूछा कि अगर वे कोई बड़ा फैसला लेते हैं तो यहां मौजूद कितने लोग उनका साथ देंगे। सभी 8 विधायकों ने अपने हाथ खड़े कर दिए, भावुक हो आए मुंडा ने उन विधायकों से कहा कि वे जल्द बताएंगे कि उनका अगला बड़ा कदम क्या होगा। डिनर समाप्त हुआ, पर इसकी आग जलती रही। खबर रघुवर दास को भी लग गई, कहते हैं उन्होंने फौरन अमित शाह को फोन कर उन्हें पूरे हालात की जानकारी दी। जो मुंडा पिछले तीन साल से मोदी व शाह से मिलने को तरस गए थे, उन्हें दिल्ली तलब किया गया। दोनों धुरंधरों ने यानी पहले शाह और फिर मोदी ने मुंडा की दुख तकलीफें सुनी, उन्हें आश्वासन मिला कि उन्हें पहले राज्यसभा में लिया जाएगा, फिर संगठन में कोई महत्वपूर्ण पद दिया जाएगा। कम से कम फिलवक्त तो अर्जुन मुंडा पार्टी तोड़ने की तो नहीं सोच रहे।
Posted on 25 September 2017 by admin
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया भाजपा में अपने आगे की राजनीति को लेकर किंचित ऊहापोह में है। वह दिल्ली के निज़ाम की भंगिमाओं को पढ़ने व समझने की लगातार मशक्कत कर रही हैं। सूत्र बताते हैं कि इस बार केंद्रीय मंत्रिमंडल के फेरबदल से ठीक एक रोज पहले वह प्रधानमंत्री से मिली थीं, और कहते हैं कई नामों को लेकर मोदी ने उनसे राय विचार भी किया था। इनमें से एक नाम राज्यवर्द्धन सिंह राठौर का भी था। राजवर्द्धन को लेकर राजस्थान की महारानी की अपनी कुछ सोच थीं, कुछ आशंकाएं थीं और उन्हें लगता था कि राठौर अवसरवादी राजनीति की उपज हैं, चुनांचे वसुंधरा ने राठौर को लेकर अपनी तमाम आपत्तियां मोदी दरबार में दर्ज करा दी थीं। वह वापिस जयपुर लौट गईं। जब अगले रोज मंत्रिमंडल फेरबदल हुआ तो मोदी सरकार में राठौर को दंड के बजाए, पारितोषिक दिया गया। हैरान परेशान वसुंधरा बस यही सोच रही थीं कि काश उन्होंने अपने मन की बात मन में ही रखी होती।
Posted on 25 September 2017 by admin
निर्मला सीतारमण को उनकी चुप्पी और वफादारी का ईनाम मिला है। दरअसल केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस हालिया फेरबदल से पहले जिन मंत्रियों को इस्तीफा देने को कहा गया था उनमें से एक नाम निर्मला का भी था। इसके बाद शाह की कोर टीम ने इस बात का जायजा लिया कि मंत्रिपद से हटाए जाने के बाद किस नेता की क्या प्रतिक्रिया रही। सूत्र बताते हैं कि सबसे असहज प्रतिक्रियाएं राजीव प्रताप रूढ़ी और फग्गन सिंह कुलस्ते की थीं। टीम शाह ने पाया कि रूढ़ी न केवल बेहद आक्रोशित थे, बल्कि उन्होंने कई अनर्गल प्रलाप भी किए। मसलन रूढ़ी का यह कहना था कि अगर परफॉरमेंस को आधार बनाकर मंत्रिमंडल से उनकी छुट्टी की गई है तो उन्हें अपनी बात कहने का मौका क्यों नहीं मिला? सूत्रों की मानें तो वे पिछले आठ महीनों से लगातार पीएम से अलग से मिलने का समय मांग रहे थे, पर उन्हें पीएमओ की ओर से यह समय ही नहीं दिया गया। यहां तक कि मंत्रालय के काम-काज की भी जब समीक्षा की बारी आती थी तो पीएमओ सिर्फ मंत्रालय के सचिव को तलब कर उनका प्रेजेंटेशन ले लेता था, ऐसे में मंत्री की जवाबदेही कब तय हुई और कब उन्हें अपनी बात कहने का मौका मिला? यह बात चाहे सोलहो आने सही हो पर रूढ़ी जैसे राजनेताओं को यह भूलना नहीं चाहिए कि सत्ता की शीर्ष के कान हमेशा छोटे होते हैं और नाक लंबी!