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96 करोड़ का आनंद

Posted on 28 June 2010 by admin

अगर राज्यसभा में आने की कीमत चुकाने की बात हो तो सबसे बड़ी कीमत केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा को चुकानी पड़ी, वह भी कोई 96 करोड़ रुपए। मगर कैसे? आनंद शर्मा ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के संसदीय क्षेत्र में एक ‘लैदर फैशन टैक्नोलॉजी इंस्टीटयूट’ शुरू करने की मंजूरी महज 15 दिनों के रिकार्ड टाइम में दे दी, न सिर्फ 15 दिनों में इस अहम इंस्टीटयूट की मंजूरी आ गई, बल्कि राशि आबंटन की मंजूरी भी मात्र इन्हीं 15 दिनों में आ गई। जाहिर है इसके एवज में गहलोत ने शर्मा जी के राज्यसभा में जाने का मार्ग प्रशस्त किया। सनद रहे कि शर्मा जी के मंत्रालय में ऐसे ही इंस्टीटयूट की मंजूरी के लिए पिछले चार वर्षों से पंजाब सरकार कदमताल कर रही है, पंजाब सरकार ने बकायदा आनंद शर्मा के मंत्रालय में अपनी अर्जी भी लगाई हुई है, पर उनका दिल अभी पंजाब पर पिघला नहीं है।

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मुश्किल में जिंदल

Posted on 28 June 2010 by admin

अपने तमाम कांग्रेसी कनेक्शन के बावजूद जिंदल ग्रुप के लिए यह एक बड़ा झटका है, अपने 18 जून के एक आदेश में भारत सरकार के केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्रालय ने जिंदल पावर लिमिटेड पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के दुरूपयोग के तहत कोर्ट केस फाइल करने का निर्णय लिया है। मामला छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार में लगने वाले पॉवर प्रोजेक्ट का है। 2400 मेगावाट का यह कोयला आधारित पॉवर प्रोजेक्ट तमनार के एक आदिवासी बहुल इलाकों में लगना था जिसके खिलाफ वहां की एक स्थानीय स्वयंसेवी संस्था ‘जन चेतना’ अदालत में चली गई थी, इसी के संदर्भ में कोर्ट व मंत्रालय का ताजा फैसला आया है। जयराम की जय हो!

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…और अंत में

Posted on 22 June 2010 by admin

सियासत के उस्ताद खिलाड़ी अमर सिंह का हर दांव इन दिनों उल्टा पड़ता जा रहा है, डुमरियागंज उपचुनाव में पीस पार्टी को लेकर अमर सिंह इस कदर उत्साहित थे कि उन्होंने अपने ब्लॉग से लेकर एसएमएस तक में अपने इस अतिउत्साह के दर्शन कर दिए, बाद में उन्हीं लोगों के पास पीस पार्टी का एक एसएमएस आया कि ये पीस पार्टी के वोट हैं, इससे अमर सिंह का कोई लेना-देना नहीं है, अब ठाकुर नेता को काटो तो खून नहीं।

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राम को मिली अयोध्या

Posted on 22 June 2010 by admin

आखिर किसी ाी प्रकार राम जेठमलानी ने अपनी इात बचा ही ली और वे राजस्थान से शान से राज्यसभा में आ गए। पर उन्हें कायदे से मार्क्सवादियों का दिल से शुक्रिया अदा करना चाहिए जो कि ऐन वोट के वक्त अनुपस्थित रह गए। और इसका कारण भी बेहद दिलचस्प है, कोलकाता के एक उद्योगपति संतोष बागड़ोदिया भी राजस्थान से मैदान में आ डटे थे, बागड़ोदिया की पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग के आसपास) में काफी बड़ी टी-एस्टेट है, जहां चाय मजदूरों की यूनियन काफी प्रभावशाली है, और यह यूनियन मार्क्सवादी नेताओं द्वारा ही नियंत्रित होती है। सो अपनी अनुपस्थिति दर्ज करा के मार्क्सवादियों ने पिछले दरवाजे से भाजपा उम्मीदवार की मदद कर कांग्रेस को यह संकेत देने चाहे हैं कि अब भाजपा उनके लिए पहली सी अछूत नहीं रह गई है।

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दिग्गी का दबदबा!

Posted on 22 June 2010 by admin

कांग्रेसी महासचिव दिग्विजय सिंह दिल्ली से चाहे कितनी दूर चले जाएं उनके लिए दिल्ली कभी दूर नहीं होती, कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी के वे एक लंबे समय से आंख-नाक-कान बने हुए हैं और कांग्रेसी सियासत में सदैव सब पर भारी साबित होते आए हैं। वे फिलवक्त अमरीका में बैठे हैं, जहां वे अपनी बीमार पत्नी का इलाज करवा रहे हैं, पर वहीं अमरीका में बैठे-बैठे ही वे अपने एक चहेते अविनाश पांडे को राज्यसभा में लेकर आ गए। अपने एक अन्य चहेते परवेज हाशमी को वे पहले ही राज्यसभा में लेकर आ गए थे, किसी को सियासत की बारीकियां सीखनी हों तो वे इसे दिग्गी राजा से सीखें।

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वृंदा बिंदी कारत

Posted on 28 May 2010 by admin

माकपा नेत्री वृंदा कारत के उग्र तेवरों से उनकी पार्टी वाले ही खासे हैरान हैं, और येचुरी खेमे ने तो वृंदा को एक नया नाम ही दे डाला है वह है सीपीएम की उमा भारती, अब इतनी भी झगड़ालू नहीं है वृंदा कारत।

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सबके अपने दांव

Posted on 28 May 2010 by admin

नारायण दत्त तिवारी चाहे कितने भी सियासी संकटों से जूझ रहे हों उनके गवर्नर काल में उनके ओएसडी रहे आरेंद्र शर्मा ने अपने लिए एक नया रास्ता चुन लिया है, वे बीएसपी की मदद से यूपी से राज्यसभा में आने की जुगत भिड़ा रहे हैं, चाहे इसकी उन्हें कितनी भी मोटी कीमत चुकानी पड़े।

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नेत्री से दूर होते चौधरी

Posted on 28 May 2010 by admin

चौधरी अजीत सिंह बदल गए हैं और पिछले एक वर्ष में तो बहुत बदल गए हैं जब से उनके पुत्र जयंत राजनीति में सक्रिय रहते हुए सांसद बने हैं और बढ़-चढ़कर पार्टी और संसदीय प्रक्रियाओं में हिस्सा ले रहे हैं। मजाल क्या जो पार्टी की नेत्री अकेले में चौधरी साहब से मिल ले, इनमें चाहे उनकी कल की कोई कितनी भी प्यारी क्यों न हो। पार्टी की तमाम नेत्रियों को यह सख्त ताकीद दी गई है चाहे इनमें से जिनको भी बड़े चौधरी से मिलना हो वे किसी पुरुष के साथ अवश्य जाएं।

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रघुवर की रीत

Posted on 26 May 2010 by admin

झारखंड में भाजपा का मुख्यमंत्री कौन हो इसको लेकर कॉरपोरेट वॉर की स्थिति पैदा हो गई है। इस पूरे मामले में सोरेन सरकार में उप मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे रघुवरदास सबसे बड़े खिलाड़ी बन कर उभरे हैं, उन्हें देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बैक कर रहा है, मुकेश अंबानी के खासमखास व राज्यसभा सांसद परिमल नैथाणी ने रघुवरदास के पक्ष में माहौल बनाने के लिए एड़ी-चोटी को जोर लगा दिया, दास को भाजपा की बनिया लॉबी का भी पुरकश समर्थन हासिल हुआ जिसकी अगुवाई रामलाल कर रहे थे। यहां तक कि अध्यक्ष जी व अनंत कुमार का झुकाव भी दास की ओर था, वहीं अकेले अडवानी यशवंत सिन्हा का समर्थन कर रहे थे, तो राजनाथ सिंह एंड पार्टी ने मजबूती से अर्जुन मुंडा की पक्ष में मोर्चा खोला हुआ था। शायद इसीलिए राजनाथ सिंह का सारा जोर विधायकों की रायशुमारी को लेकर था, ठाकुर नेता जानते थे कि झारखंड के 18 में से 14 भगवा विधायक मुंडा के पक्षधर हैं और भाजपा का सहयोगी दल जद(यू)भी खुल्लम खुल्ला राग मुंडा अलाप रहा है।

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एक अनार सौ बीमार

Posted on 19 May 2010 by admin

झारखंड में भाजपा का मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गया, दरअसल भाजपा नेताओं में किसी एक नाम पर सहमति बन ही नहीं पा रही थी, जितने कैंप, उतनी कैप यानी जहां राजनाथ सिंह खुलकर अर्जुन मुंडा की नाम की पैरवी कर रहे थे, तो भाजपा की पूरी बनिया लॉबी मजबूती से रघुवर दास के पीछे डटी थी, ऐसे में पद के सबसे प्रबल दावेदार यशवंत सिन्हा का कोई नामलेवा ही नहीं था सिवा अडवानी के, जिन्होंने मजबूती से सिन्हा का साथ दिया, अपनी सरकार, अपना मुख्यमंत्री का सूत्र वाक्य देने वाले यशवंत सिन्हा ही अंत-अंत तक ‘सरकार नहीं बनाने’ पर अड़ गए उनका कहना था कि यह एक भ्रष्ट सरकार होगी और भाजपा की इमेज भी इससे खराब होगी और इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि झामुमो वाले हमें आखिर कब तक सपोर्ट करे…सो बंदरों के झगड़े में सोरेन की सियासी बिल्ली मौका ले ही उड़ी।

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