Posted on 12 September 2010 by admin
पूर्व कैबिनेट सचिव बी.के.चतुर्वेदी का अब भी यूपीए सरकार में डंका बज रहा है, वे खुद तो योजना आयोग में डिप्टी चैयरमैन हैं, पर उनके नाते-रिश्तेदार बड़े-बड़े पदों की शोभा बढ़ा रहे हैं, इनका भांजा इंदू चतुर्वेदी पीएस टू पीएम हैं, और इनकी पीएमओ में खासी धाक है, इनके अन्य रिश्तेदार अतुल चतुर्वेदी अभी-अभी इस्पात सचिव के पद से रिटायर हुए हैं, प्रभात चतुर्वेदी श्रम मंत्रालय में सचिव हैं तो इनके एक अन्य रिश्तेदार जी.सी.चतुर्वेदी अभी हाल-हाल तक स्पेशल सेक्रेटरी बैकिंग थे। सच है यूपीए काल में प्रभावशाली नौकरशाहों के नाते-रिश्तेदारों की पौ बारह है।
Posted on 12 September 2010 by admin
सीवीसी के नए चीफ विजिलेंस कमिश्नर पी.जे.थॉमस को लेकर भाजपा और इनकी नेत्री सुषमा स्वराज ने सरकार से पहले ही अपनी नाखुशी जाहिर कर दी थी, प्रधानमंत्री द्वारा आहूत बैठक में सुषमा को जरूर आमंत्रित किया गया था पर थॉमस के नाम पर पहले ही चाक-चौबंद मुहर लग चुकी थी। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष चाहती थी कि पैनल के अन्य नामों पर भी डिस्कशन हो, पर सरकार ने पहले से ही थॉमस के नाम पर अपना मन बना लिया था। सर्वज्ञात है कि थॉमस दस जनपथ और मुकेश अंबानी के किस कदर दुलारे हैं। इसके अलावा उनकी अन्य योग्यताएं भी दस जनपथ को लुभाने के लिए काफी थीं, मसलन थॉमस एक प्रतिबध्द सीरियन कैथोलिक हैं और उनके दोनों ही भाई बिशप हैं, बैठक में पूरे समय तक इस मामले में प्रधानमंत्री ने मुंह बंद रखा हुआ था, थॉमस के बचाव में जो भी बोल रहे थे वे पी.चिदंबरम ही थे, पार्टी व सरकार पर चर्च के प्रभाव की इससे ज्वलंत मिसाल और क्या दूजी हो सकती है?
Posted on 05 September 2010 by admin
‘एजुकेशनल ट्रिब्यूनल बिल’ का भविष्य अंधेरे में लगता है। महाराष्ट्र व दक्षिण के सांसदों की एक पूरी शिक्षा लॉबी इस बिल के खिलाफ है, क्योंकि इस बिल से प्राइवेट शिक्षा संस्थानों की मनमानी, अनियंत्रित कैपीटेशन फी पर रोक लग सकती है, इस बिल में इस पर ‘रेग्यूलेटर’ बिठाने का भी प्रस्ताव है। वहीं लालू-मुलायम जैसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में राजनीति करने वाले नेता इस बिल का मुखर समर्थन कर रहे हैं। लोकसभा में पास होने के बावजूद यह बिल राज्यसभा में लड़खड़ा गया जहां अब भी कांग्रेस नीत गठबंधन बहुमत में है। सिब्बल का यह बिल ऑस्कर फर्नांडीस की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति में गया था, 21 तारीख को ऑस्कर ने बिल पर प्रतिकूल टिप्पणियां देते हुए इसे सिब्बल को लौटाया, पर सिब्बल ने बगैर किसी फेरबदल के उस बिल को जस का तस 25 तारीख को सदन के पटल पर रख दिया। पर इससे पहले ऑस्कर और उनके आधा दर्जन वफादार सांसद पूरे सदन में घूम-घूम कर प्रचारित कर चुके थे कि इस बिल की परवाह नहीं करनी है। सुनते हैं जालंधर में एक मिठाई की दुकान से शिक्षा माफिया बने उद्योगपति ने भाजपा के तेज तर्रार जेट महासचिव को पहले ही पटा लिया था, सो राज्यसभा में बिल की यह गत हुई।
Posted on 05 September 2010 by admin
एक लंच पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी दी, भाजपा के यूपी के सांसदों को, संसद सत्र चालू होने के बावजूद पहले लंच का समय दोपहर एक बजे रखा गया था, फिर इसे बढ़ाकर 2 बजे का कर दिया गया, और जब भोजन का वक्त हुआ तो सांसदों ने देखा कि किसी लोकल ढाबे से पॉलीथिन में पैक होकर आया है खाना, कहना न होगा कि तब तक उनके मूड व स्वाद का जायका बिगड़ चुका था।
Posted on 05 September 2010 by admin
वित्त सचिव अशोक चावला जो 1973 बैच के गुजरात कैडर के आइएएस हैं, वे सेबी के चैयरमैन बनने की रेस में फिलवक्त सबसे आगे चल रहे हैं।
Posted on 29 August 2010 by admin
प्रसार भारती के सीईओ बलजीत सिंह लाली की घोर वित्तीय अनियमितताओं की फाइल अब प्रधानमंत्री के पास इस माह की चार तारीख से लंबित पड़ी है। मई 2009 में प्रसार भारती बोर्ड ने सीईओ के कामकाज में घोर वित्तीय अनियमितताएं पाई और मामले को जांच के लिए सीवीसी के सुपुर्द कर दिया गया। इसमें निम्बस को खेल अधिकार देने का मामला तथा टी-20 विश्व कप का प्रसारण दूरदर्शन द्वारा नहीं किया जाना ‘स्पोट्र्स ब्रॉडकास्टिंग एक्ट’ का खुलमखुला उल्लंघन माना गया, जिसमें कथित तौर पर चैनल ईएसपीएन को फायदा पहुंचाने का उपक्रम साधा गया था। लाली के वकील पुत्र को भी फायदा पहुंचाने का उपक्रम साधा गया। जब यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में पहुंचा तो कोर्ट ने अपने 27 जुलाई 2009 के आदेश में यह मामला सीवीसी के सुपुर्द कर दिया। लाली इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए पर उन्हें वहां से कोई राहत नहीं मिली। सीवीसी ने 16 जुलाई 2010 को अपनी रिपोर्ट दे दी, मामले को कानून मंत्रालय में भेजा गया जहां मंत्रालय ने भी रिपोर्ट से इत्तफाक जताई और 4 अगस्त 2010 से यह फाइल पीएमओ में लंबित पड़ी है। जाने क्या सोच रहे हैं प्रधानमंत्री जी?
Posted on 29 August 2010 by admin
सिर्फ कांग्रेस संगठन में ही नहीं अपितु केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी फेरबदल की तैयारी है, जिन मंत्रियों के खिलाफ लगातार शिकायतें आ रही है, प्रधानमंत्री उन मंत्रियों के विभाग बदलने के इच्छुक हैं। कयास लगाया जा रहा है कि सलमान खुर्शीद को कंपनी अफेयर से प्रवासी भारतीय मंत्रालय में भेजा जा सकता है और वहां से आकर व्यालार रवि कंपनी अफेयर संभाल लेंगे। यानी यह एक तरह से विभागों की अदला-बदली कही जा सकती है। राजीव शुक्ला की संसद में बढ़ती सक्रियता तथा विरोधी दलों से उनके बेहतर तालमेल के लिए उन्हें पुरस्कृत किया जा सकता है और उन्हें पृथ्वीराज चौहान की जगह संसदीय कार्य राज्य मंत्री बनाया जा सकता है और उनके ऊपर यह महती जिम्मेदारी डाली जा सकती है कि वे राज्यसभा को बेहतर चलाने में अपनी कार्यकुशलता प्रदर्शित करे।
Posted on 22 August 2010 by admin
ब्रह्मदत्त को भूतल परिवहन विभाग का सचिव बनवाने के लिए विभाग के मंत्री कमलनाथ ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था, पैरवी-लॉबिंग में कोई भी कमी नहीं रखी, पर जब यह फाइल मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री के पास पहुंची तो प्रधानमंत्री ने अपनी आदतों के विपरीत एक झटके में इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। मगर क्यों? क्या यह भी अब समझने-समझाने की बात है।
Posted on 15 August 2010 by admin
जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाए जाने को लेकर यूपीए सरकार और इसके कानून मंत्री वीरप्पा मोइली सबसे ज्यादा सक्रिय थे। मोइली संसद के इसी सत्र में एक बिल लाना चाहते थे, इस बिल में सुप्रीम कोर्ट के जज की रिटायरमेंट उम्र 65 से बढ़ाकर 68 वर्ष, हाईकोर्ट जज की 62 से बढ़ाकर 65 वर्ष तथा डिस्ट्रिक्ट जज की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करने का प्रस्ताव था। मोइली चाहते थे कि यह प्रस्ताव संसद की स्थायी समिति को भेजे बगैर सीधे पार्लियामेंट से पास करा इसे राज्यों में पास कराने के लिए भेज दिया जाए, पर प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने कांग्रेसी इरादों में पलीता लगा दिया है, भाजपा ने साफ कर दिया है कि वह इस विधेयक के पक्ष में नहीं है, चुनांचे ऐसे में अगर यह बिल संसद-पटल पर आता भी है तो इसके लुढ़कने का खतरा है, सो यूपीए सरकार ने फिलहाल इस बिल को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला लिया है।
Posted on 10 August 2010 by admin
60 वर्षों में चाहे ओड़िसा के हालात न बदले हों पर वहां के हुक्मरानों ने प्रदेश का नाम बदलने की ठान ली है, सरकार इस बाबत वाकई गंभीर है सो ‘नाम बदल’ का एक बिल लेकर आ रही है, जिसमें ओड़िसा के नाम में से ‘आर’ वर्ण को निकाल कर वहां ‘डी’ जोड़ दिया जाएगा, बिल में ओडिसा का जो नाम आया है उसके अंत में ‘एसएचए’ यानी ओडिशा हो गया है। अब ओड़िया सांसद कह रहे हैं कि ओड़िशा नहीं ओडीसा ‘एसएसए’ होना चाहिए। किसी ने कहा नाम पर इतनी बहस है तो क्यों न नवीन पटनायक से ही सही उच्चारण पूछ लिया जाए, नवीन की पार्टी के ही एक सांसद ने फौरन आपत्ति दर्ज करवाई-‘वे सीएम जरूर हैं, पर उनका ओड़िया-ज्ञान बहुत सीमित है, सो बेहतर होगा कि इस बारे में विद्वानों की एक समिति बना दी जाए, जो नाम का निर्धारण कर सके।’ बिल का भाग्य चाहे जो हो इस बाबत विद्वानों की एक समिति की गठन की प्रक्रिया जरूर शुरू हो गई है।