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चुनाव लड़ेंगे सतपाल मलिक

Posted on 31 October 2022 by admin

अपने बागी तेवरों से भगवा खेमे को लाल-पीला करने वाले मेघालय के पूर्व गवर्नर सतपाल मलिक यूपी के मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी में अभी से जुट गए हैं। मलिक ने पहले ही अपने इरादे स्पष्ट कर दिए थे कि ’राज्यपाल पद से सेवा निवृत्ति के बाद वे किसानों के हक की लड़ाई लड़ेंगे।’ सूत्रों की मानें तो इस बारे में मलिक की अखिलेश यादव और जयंत चौधरी से भी बात हो चुकी है कि वे सपा और रालोद के समर्थन से बतौर निर्दलीय मुजफ्फरनगर सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। जबकि वे सार्वजनिक रूप से यह बयान दे रहे हैं कि ’किसी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर उनकी चुनाव लड़ने की कोई इच्छा नहीं है।’ वहीं भाजपा से जुड़े सूत्रों का दावा है कि भगवा पार्टी की सरकार भी उन्हें इतनी आसानी से छोड़ने वाली नहीं, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहते उनके तीन-चार मामलों को सरकार ने खंगाला है, अब वे संवैधानिक पद से हट गए हैं तो अगले साल तक ये मामले खुल सकते हैं।

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आपरेशन लोट्स

Posted on 31 October 2022 by admin

देवेंद्र फड़णीस इन दिनों राज्य में घूम-घूम कर भाजपा का द्वार अन्य दलों के नेताओं के लिए खोल रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पिछले दिनों भंडारा में उनकी मुलाकात कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नाना पटोले से हुई। कहते हैं इसके बाद फड़णवीस कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और कांग्रेसी नेता विजय वडेट्टीवार से भी मिले। शायद इन नेताओं को यह भी आश्वासन मिला है कि अगर एक बार इन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया तो इनके पुराने मामले भी खुद ब खुद रफा-दफा हो जाएंगे। महाराष्ट्र में ‘आपरेशन लोट्स’ चालू आहे।

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कौन है अपराजिता सारंगी?

Posted on 24 September 2022 by admin

ओडिशा से भाजपा की सांसद अपराजिता सारंगी बिहार से ताल्लुक रखने वाली एक पूर्व आईएस अफसर हैं, माना जाता है कि अपराजिता को धर्मेंद्र प्रधान ही भाजपा में लेकर आए थे। सारंगी 1994 बैच की ओडिशा कैडर की आईएएस अफसर है जो 15 सितंबर 2018 को सेवा निवृत्ति लेकर भाजपा में शामिल हुईं। समझा जाता है कि इस नेत्री की दिली इच्छा है कि भाजपा ओडिशा के आने वाले विधानसभा चुनाव में इन्हें सीएम फेस के तौर पर प्रोजेक्ट करे। जबकि इस लाइन में पहले से धर्मेंद्र प्रधान और जय पांडा भी लगे हैं। पिछले दिनों जब अमित शाह ओडिशा दौरे पर भुवनेश्वर पहुंचे तो वहां का भगवा नज़ारा कुछ बदला-बदला सा था, पूरे भुवनेश्वर में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे थे, जिस पर पीएम के साथ अपराजिता सारंगी विद्यमान थीं, बैनर-पोस्टर तक में प्रधान की तस्वीर बेहद छोटी हो गई थी। सो, जब पार्टी में इसको लेकर बवाल मचा तो सारंगी ने भी अपने पैंतरे बदल लिए। आम आदमी पार्टी से जुड़े बेहद विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि पिछले दिनों सारंगी की मुलाकात आप के कई बड़े नेताओं से हुई, सारंगी चाहती थीं कि ’अगर आप इन्हें ओडिशा में अपना सीएम फेस घोषित करे तो वह भाजपा छोड़ आप में आने को तैयार है।’ वहीं आप के इस बड़े नेता ने कथित तौर पर सारंगी से कहा कि ’अभी पार्टी का फोकस गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान है, जब ओडिशा का नंबर आएगा तब उनसे संपर्क किया जाएगा।’ वैसे भी गुजरात के नतीजे आने के बाद ही पार्टी तय करेगी कि और किन राज्यों में पार्टी का विस्तार होना है।

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हेमंत सोरेन को अभयदान कब तक?

Posted on 24 September 2022 by admin

क्या हेमंत सोरेन अपने को देश के एक आदिवासी नेता के तौर पर स्थापित करने में सफल हो गए हैं? उनके मंत्रिमंडल के कई हालिया बड़े फैसले इस बात की चुगली खाते हैं। सोरेन जनता के बीच बहुत हद तक यह नैरेटिव बनाने में भी कामयाब रहे हैं कि देश को एक आदिवासी राष्ट्रपति देने के बाद भाजपा एक आदिवासी सीएम को गद्दी से उतारने के षडयंत्रों में डूबी है। अब इसे सोरेन का मैनेजमेंट कहें या उनकी सफल रणनीति कि इन दिनों भाजपा झारखंड में अपने सबसे कमजोर पिच पर है, न ही उनके पास झारखंड में कोई इतनी माकूल नीति है और न ही कोई बड़ा नेता। शायद सोरेन को भी इन्हीं परिस्थितियों का सहारा मिला हुआ है कि भाजपा चाह कर भी उनकी सरकार को अभी गिरा नहीं पा रही है। क्योंकि झारखंड का असर गुजरात के चुनावों पर भी पड़ सकता है, जहां आबादी के हिसाब से 14.9 प्रतिशत आदिवासी वोटर हैं। साथ ही छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भी आदिवासी वोटरों की एक बड़ी तादाद है। यही वजह है कि सोरेन सरकार को फिलवक्त झारखंड में अभयदान मिला हुआ है।

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ऐसे बिसरा दिए गए वासनिक

Posted on 24 September 2022 by admin

कांग्रेस के अंदर दो वरिष्ठ नेता ऐसे थे जो बढ़-चढ़ कर अपने को अध्यक्ष पद का सबसे मुफीद चेहरा घोषित करने में जुटे थे, राहुल मंडली ने इन दोनों नेताओं की उद्दात महत्वाकांक्षाओं को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया है। इन दो नामों में आप कृपया शशि थरूर या दिग्विजय सिंह का नाम न लें, क्योंकि पार्टी के अंदर इन्हें कोई भी नेता किंचित इतनी गंभीरता से नहीं लेता है। दरअसल, पिछले 25 वर्षों से लगातार कांग्रेस के किसी न किसी पद पर रहे मुकुल वासनिक और दक्षिण भारत से आने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे अपने आप को परोक्ष व अपरोक्ष तौर पर अध्यक्ष पद के मजबूत दावेदारों के तौर पर पेश कर रहे थे। मल्लिकार्जुन के बारे में लगातार यह दक्षिण के अखबार छाप रहे थे कि ’उनको अध्यक्ष बनाने से उत्तर व दक्षिण दोनों राज्यों में कांग्रेस के जनाधार बढ़ेगा।’ मुकुल वासनिक ने तो दो कदम आगे बढ़ कर 4 सितंबर को संपन्न हुई कांग्रेस की रैली के आलोक में एआईसीसी में अपना शक्ति प्रदर्शन कर दिया था। रैली में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में पार्टी नेता और कार्यकर्ता 2 दिन पहले से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार व राजस्थान से वासनिक के पक्ष में लामबंद हो रहे थे। पर मुकुल के पर कतरे जाने की पूरी रूप-रेखा कांग्रेस के चिंतन शिविर में ही तय हो गई थी। सो, अभी पिछले दिनों वासनिक से मध्य प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य का प्रभार वापिस लेकर यह जिम्मेदारी जय प्रकाश अग्रवाल को दे दी गई है। चिंतन शिविर में ही मुकुल नीत कमेटी से ही शीर्ष नेतृत्व ने चालाकी से यह प्रस्ताव पारित करवा लिया कि ’किसी भी नेता को लगातार 5 साल तक पदाधिकारी रहने के बाद उन्हें यह पद छोड़ना होगा।’ यानी एक तरह से अब तय हो गया है कि राहुल बिना किसी पद पर काबिज हुए रिमोट कंट्रोल से पार्टी चलाएंगे और पार्टी पर भी उनका ही पूरा नियंत्रण होगा।

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संजय नाम की गफलत में गहलोत

Posted on 24 September 2022 by admin

गुलाम नबी आजाद ने जब कांग्रेस से इस्तीफा देते हुए अपना एक पांच पन्नों का पत्र जारी किया था, तब उस पर राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक चौंकाने वाला बयान दिया था, बकौल गहलोत-’आज की 80 फीसदी कांग्रेस संजय गांधी द्वारा तैयार किए गए नेताओं की है, जिनमें से एक मैं भी हूं। भले ही राजनीति में मैं संजय गांधी की वजह से आया पर उनसे मेरे विचार मेल नहीं खाते थे।’ शाम को गहलोत को उनके कुछ मुंहलगे पत्रकारों ने घेर लिया। उनमें से एक ने उनसे पूछा-’आप संजय गांधी की उपज हैं, पर उनसे आपके विचार मेल नहीं खाते थे आपका यह बयान क्या कुछ अटपटा नहीं है।’ इस पर गहलोत ने उस पत्रकार को चुप कराते हुए कहा-’भाई अब इस बयान पर मिट्टी डालो, मुझे अंदाजा नहीं था कि लोगों को यह बात इतनी चुभेगी, कोई भी राज्य नहीं बचा है जहां से मेरे इस बयान के विरोध में फोन न आया हो। पर आप मेरी मजबूरी समझ सकते हैं, मैं कांग्रेस आलाकमान को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकता।’ बात पत्रकारों को समझ में आ गई।

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चौटाला की द्विविधा

Posted on 24 September 2022 by admin

इंडियन नेशनल लोकदल के महासचिव अभय चौटाला और उनके पिता ओम प्रकाश चौटाला आगामी 25 सितंबर को ताऊ देवीलाल की जयंती पर फतेहाबाद में एक बड़ी रैली कर रहे हैं, ‘सम्मान दिवस’ नामक इस रैली में विपक्षी एकता का उद्घोष भी छिपा है। इस रैली में बड़े विपक्षी सूरमाओं के शामिल होने की संभावना है, फेहरिस्त लंबी है, मसलन शरद पवार, अखिलेश यादव, नीतीश कुमार, एचडी देवेगौड़ा, तेजस्वी यादव, प्रकाश सिंह बादल और मेघालय के गवर्नर सतपाल मलिक इस रैली के कुछ चमकते चेहरे हो सकते हैं। अभय चौटाला ने तेलांगना के मुख्यमंत्री केसीआर से फोन कर उनसे रैली में शामिल होने का अनुरोध किया। केसीआर ने तपाक से कहा कि ’वे जननायक जनता पार्टी की रैली में जरूर शामिल होंगे।’ इस पर अभय चौटाला ने उन्हें टोकते हुए कहा कि ’जननायक पार्टी तो हमारे भतीजे दुष्यंत की पार्टी है, हमारी पार्टी तो इनेलोद है, जो ताऊ देवीलाल के आदर्शों को समर्पित है।’ फिर अभय चौटाला ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को फोन किया और उन्हें रैली में आने का आमंत्रण दिया। ममता ने भी लगभग वही सवाल पूछा कि ’क्या आप लोग अब भी हरियाणा के भाजपा सरकार के पार्टनर हैं?’ अभय ने कहा-’नहीं-नहीं वह तो मेरा भतीजा दुष्यंत चौटाला है।’

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योगी भी कम नहीं

Posted on 04 September 2022 by admin

यूपी में पिछले दिनों बड़े पैमाने पर टॉप नौकरशाही में फेरबदल देखा गया। इस बड़े फेरबदल की जद में था योगी के बेहद दुलारे अपर मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी को सेवा विस्तार न मिलना। योगी ने अवस्थी को सेवा विस्तार दिलवाने में अपना सारा जोर लगा दिया, पर बात बनी नहीं। दरअसल, सेवा विस्तार की फाइल अनुमोदन के लिए राज्य सरकार इसे केंद्र सरकार के पास भेजती है, यानी केंद्र की ’हां’ सेवा विस्तार देने के लिए निहायत जरूरी है। पर अवस्थी को लेकर केंद्र सरकार का जवाब आया कि ‘अवस्थी अगर चीफ सेक्रेटरी होते तो 3 महीने का एक्सटेंशन दिया जा सकता था, पर एडिशनल को सेवा विस्तार देने की कभी परंपरा नहीं रही है।’ सो, जब अवस्थी एक्सटेंशन नहीं पा सके तो योगी की नाराज़गी की गाज तुरंत वैसे अधिकारियों पर गिरी जो केंद्र के नजदीक समझे जाते थे। इस क्रम में नवनीत सहगल का कद भी छोटा हो गया। वे अहम सूचना विभाग के अपर मुख्य सचिव के पद पर तैनात थे, वहां से उनका तबादला खेल-कूद विभाग में कर दिया गया। यूपी में चाहे मायावती की सरकार रही या अखिलेश की या फिर योगी की सहगल का रुतबा हमेशा सिर चढ़ कर बोला है, पहली बार है जो उनका एक तरह से ‘डिमोशन’ हो गया है। प्रदेश के दोनों उप मुख्यमंत्रियों के सचिवों का भी तबादला हो गया है। ब्रजेश पाठक के विवादों में रहे मुख्य सचिव अमित मोहन प्रसाद की जगह पार्थसारथि सेन शर्मा को लाया गया है। ये पिछले चार साल से ’इंतजार’ में थे, क्योंकि अखिलेश के प्रिंसिपल सेक्रेटरी रहते हुए सेन साहब ने अखिलेश व डिंपल की प्रेम कहानी को बयां करने के लिए एक किताब लिख दी थी। केशव प्रसाद मौर्या के साथ रहने वाले सोशल और अल्पसंख्यक कल्याण के प्रिंसिपल सेक्रेटरी हिमांशु कुमार को भी तबादले की मार झेलनी पड़ी है। केंद्र ने एक किया तो योगी ने चार, यह बताने के लिए कि वे किसी से डरते नहीं।

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कौन हैं ये न्यूज चैनल के मालिक?

Posted on 04 September 2022 by admin

पिछले दिनों लखनऊ की कुछ कंपनियों पर इंकम टैक्स के ताबड़तोड़ छापे पड़े, छापों में जब्त अहम दस्तावेजों में यूपी के कुछ बड़े ब्यूरोक्रेट के नाम भी मिले हैं। ऐसी ही एक कंपनी में बतौर निदेशक नवनीत सहगल का नाम भी शामिल था। इस पर सहगल ने अपनी ओर से सफाई पेश करते हुए कहा कि ’उन्होंने बहुत पहले ही इस कंपनी के डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया था।’ दरअसल यह कंपनी भगवा सत्ता शीर्ष के एक बेहद करीबी माने जाने वाले पत्रकार की है, जिनकी बेटी सहगल के बेटे के साथ कंपनी में साझीदार है। यह पत्रकार एक बड़े न्यूज चैनल के मालिक भी हैं, जिनका चैनल इन दिनों टीआरपी की खूब चांदी कूट रहा है। अभी इस शनिवार को इस पत्रकार महोदय के निजी संस्मरणों पर आधारित एक पुस्तक का विमोचन हुआ है, जिस विमोचन समारोह में राजनाथ सिंह, दत्तात्रेय होसाबोले से लेकर केरल के गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

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समय से पहले बिहार में चुनाव?

Posted on 04 September 2022 by admin

भाजपा की मंषाओं से तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार को अवगत कराते हुए कहा कि ’अभी भाजपा बिहार में काफी ‘अनपॉपुलर’ है, सो यह सही वक्त है विधानसभा भंग कर चुनावों में जाने का। सीटें हमारी भी बढ़ेगी और आपकी भी।’ इस पर नीतीश का कहना था कि ’हमने युवाओं से जो दस लाख नौकरियां देने का वादा किया है, फिर उसका क्या होगा? लोग हमसे सवाल पूछेंगे, युवा शक्ति को नाराज़ कर हम इस वक्त चुनावों में नहीं जा सकते। पहले नई नौकरियों के लिए ‘नोटिफिकेशन’ जारी हों फिर हम फ्रेश चुनाव की सोच सकते हैं। आप चाहें तो पहले अपने विधायकों से भी बात कर लें कि तीन साल पहले कौन चुनाव में जाना चाहेगा?’ नीतीश की दूर दृष्टि के कायल हो गए तेजस्वी।

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