Posted on 11 April 2012 by admin
झारखंड के राज्यसभा चुनाव को लेकर आयोग द्वारा सीबीआई जांच कराने की बात से कई लोगों की जान हलक में अटकी है, अर्जुन मुंडा के खासमखास आर.के.अग्रवाल चिंता में हैं कि उनके भाई की इनोवा कार में से सवा दो करोड़ रुपयों की बरामदगी हुई, अर्जुन मुंडा भी संकट में हैं। छापे के दौरान अग्रवाल के अकाऊंटेंट भी मौके पर मौजूद थे। रुपयों की बरामदगी भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा सबूत है। सीबीआई डायरेक्टर ए.पी.सिंह के लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है क्योंकि वे अर्जुन मुंडा के ओएसडी रह चुके हैं। और इस सीबीआई जांच की वजह से अर्जुन मुंडा की कुर्सी भी खतरे में जान पड़ती है।
Posted on 11 April 2012 by admin
अभी साफ नहीं हो पाया है कि यूपी चुनाव में कांग्रेस की हार की समीक्षा में दो दिन लगाने के बाद भी राहुल गांधी अपने व कांग्रेस के लिए कोई बलि का बकरा ढूंढ पाए कि नहीं, दो दिनों के विचार मंथन उपक्रम के बाद अब युवराज ने अपना नया फोकस गुजरात पर कर लिया है। इस वर्ष के अंत में दिसंबर माह के आस-पास गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं और विगत कुछ वर्षों में नरेंद्र मोदी गांधी परिवार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं, सो राहुल की टीम ने अभी से गुजरात का रुख कर लिया है, जहां वे मोदी की शासकीय व राजनैतिक गलतियों को ढूंढने में जुटी है। समझा जाता है कि इसी के आधार पर देश की एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी कांग्रेस के गुजरात प्रचार अभियान का खाका तैयार करेगी। यूपी के महाभारत में राहुल के सबसे बड़े रथी दिग्विजय सिंह थे, शायद उनकी वजह से भी वहां कांग्रेस की यह दुर्गति हुई, अब राहुल अपने लिए गुजरात का रथी ढूंढ रहे हैं जिनके भरोसे व कंधे का आसरा पाकर एक बार फिर से वे अपनी राजनैतिक अस्मिता को दांव पर लगा सके। एक अप्रत्याशित नाम उभर कर सामने आ रहा है अहमद पटेल का, जिनके बारे में माना जाता है कि राहुल उन्हें पसंद नहीं करते, पर राजनीति पसंद-नापसंद के अक्सर नई परिधियां खींच दिया करती है।
Posted on 11 April 2012 by admin
नितिन गडकरी के लिए पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है, अभी पिछले दिनों गडकरी ने अपने नई दिल्ली स्थित आवास पर पार्टी महासचिवों की एक बैठक आहूत की जाहिरा तौर पर इसका उद्देश्य शिमला के राष्ट्रीय अधिवेशन की तैयारियों का जायजा लेना था, पर इस मीटिंग के बहाने गडकरी अपनी दुबारा ताजपोशी की संभावनाओं को टटोल रहे थे। सनद रहे कि अगले कुछ महीने में शिमला में पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन होना है जिसमें एक तरह से तय हो जाना है कि क्या गडकरी पुन: पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर चुने जाएंगे, उनका दुबारा मनोनयन होगा। संघ से जुड़े सूत्रों का दावा है कि गडकरी को उनकी दूसरी पारी के लिए संघ का ‘गो-अहेड’ मिल चुका है, बस पार्टी के सीनियर नेताओं मसलन अडवानी, सुषमा, जेतली, जोशी, यशवंत सिन्हा, विनय कटियार, विजय गोयल आदि के मन में गडकरी की दुबारा ताजपोशी को लेकर कई सवाल हैं, पर इनकी ओर से भी कोई सर्वसम्मत नाम उभर कर सामने नहीं आ पा रहा है, ले देकर एक नाम बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी का उभरा है, पर सब को मालूम है कि सियासी कद के मायने में वे तो गडकरी से भी उन्नीस ठहरते हैं, सो ले-देकर इस बार भी गडकरी का ही दावा सबसे मजबूत दिखता है।
Posted on 01 April 2012 by admin
भगवा राजनीति में तूफान लाने वाले अप्रवासी भारतीय उद्योगपति अंशुमान मिश्रा आखिर हैं कहां? गॉसिप गुरू को मिली जानकारी के मुताबिक अंशुमान इन दिनों इटली के लेक कोमो में छुट्टियां बिता रहे हैं। समझा जाता है कि अंशुमान एक आत्मवृतात्मक पुस्तक लिखने की योजना पर काम कर रहे हैं। उनके नजदीकी मित्र बताते हैं कि अंशुमान इस बात को लेकर किंचित परेशान हैं कि आखिरकार क्यों उन्होंने झारखंड की कमजोर पिच से अपनी सियासी पारी खेलने की भूल की है। वह भी बतौर निर्दलीय यह तो गनीमत है कि उन्होंने आखिरी समय पर रेस से अपना नाम वापिस ले लिया।
सूत्र बताते हैं कि अंशुमान ने अडवानी, सुषमा यहां तक कि यशवंत सिन्हा के बारे में अपनी सोच व रवैए को बदल लिया है। उन्हें कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि गडकरी व जेटली सरीखे उनके तब के शुभचिंतकों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत उन्हें एक नए सियासी खेल में उलझा दिया। खासकर गडकरी की भाव-भंगिमाओं से भी उन्हें ऐसा लगता रहा है कि वे भाजपा के विधायकों को उन्हें समर्थन देने के लिए लामबध्द कर रहे हैं। जबकि उनकी असल की योजना कुछ और थी, ऐन वक्त सुनियोजित तरीके से आइना दिखा दिया गया। अंशुमान के नजदीकी सूत्र दावा करते हैं कि आज उन्हें कहीं न कहीं इस बात का इल्म हो गया है कि वे एक सियासी साजिश के शिकार हुए हैं, अगर वास्तव में नितिन गडकरी उन्हें राज्यसभा में लाने के इच्छुक थे तो उन्हें उनके लिए झारखंड के बजाए किसी सुरक्षित सीट का चुनाव करना चाहिए था जैसाकि गडकरी ने अजय संचेती के केस में किया था और उनके नाम पर बकायदा पार्टी के संसदीय बोर्ड की मुहर लगवानी चाहिए थी। आज अंशुमान इस बात पर अफसोस जाहिर कर रहे हैं कि उन्होंने खासकर यशवंत सिन्हा की बातों को अन्यथा लिया। अंशुमान को ऐसा लग रहा है कि संसद की ठौर पकड़ने के लिए धन के इस्तेमाल का रास्ता अपनाना ही सर्वथा अनुचित है।
Posted on 01 April 2012 by admin
रक्षा मंत्री ए.के.एंटनी अपनी ईमानदार छवि के बलबूते अब तलक राजनीति में बहुत कुछ हासिल कर पाए हैं, पर इस दफे उनका वास्ता उनके ही मुकाबले के एक ईमानदार जनरल से पड़ गया है। सो उन्हें सरकार व पब्लिक में जवाब देते नहीं बन रहा है। नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में जनरल सिंह व मंत्री एंटनी के एक ही फ्लोर पर दफ्तर हैं, पर जब से लेटर लीक हुआ है, दोनों के बीच दुआ-सलाम भी बमुश्किल हुई है। 3-4 दिन पहले जब प्रधानमंत्री को जनरल का पत्र लीक हो जाने के बाद एंटनी पार्लियामेंट व प्रेस में सफाई दे रहे थे तो जनरल अपने पहले के तयशुदा आधिकारिक प्रोग्राम के तहत जम्मू कश्मीर में थे। जनरल के ऑफिस की जरा फुर्ती देखिए अभी रक्षा मंत्री की प्रेस-कांफ्रेंस होने ही वाली थी कि जनरल के ऑफिस से पत्र लीक मामले में खंडन पहले ही जारी हो गया। सबको मालूम है कि एंटनी गर्दन में दर्द (स्पोंडिलाइटिस से पीड़ित हैं) पर उन्हें इन दिनों डॉक्टर के पास तक जाने की फुरसत नहीं। वे शायद भली-भांति जानते हैं कि दरअसल इन दिनों उनके लिए ‘पेन इन द् नेक’ क्या है और जब तक दो महीनों के बाद जनरल अपने पद से रिटायर नहीं हो जाते हैं, या उन्हें छुट्टी पर नहीं भेज दिया जाता है तब तक एंटनी के गर्दन का दर्द जाने वाला नहीं।
Posted on 01 April 2012 by admin
क्या होगा अगर जनरल व सरकार के बीच सब कुछ ठीक नहीं हो पाता और दोनों के संबंध नाजुक ढलान पर पहुंच जाते हैं? बीते कुछ दिनों में जनरल की पत्नी और उनकी पुत्री का नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज से एक नहीं, कई-कई दफे जाकर मिलना चंद सियासी कयासों को जन्म दे रहा है। समझा जाता है कि जनरल के श्वसुर जब हरियाणा विधानसभा में डिप्टी स्पीकर थे तो उस वक्त सुषमा देवीलाल सरकार में मंत्री थीं, तब से इन दोनों परिवारों के बीच गहरे ताल्लुकात हैं। सो, सियासी हलकों में लगातार इन अफवाहों को बल मिल रहा है कि जनरल की लोगों में लोकप्रियता को देखते हुए भाजपा उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा के भिवानी संसदीय क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बना सकती है।
Posted on 25 March 2012 by admin
हालिया युध्दविराम के बाद लगता है लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार और नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज में फिर से ठन गई है। वाकया था राष्ट्रपति के अभिभाषण पर नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज के धन्यवाद भाषण का। एनसीटीसी पर भी वह संशोधन प्रस्तावित था कि जब तक राज्यों की सहमति न हो तब तक यह लागू नहीं होना चाहिए। नेता प्रतिपक्ष के 10 मिनट के भाषण में 6 बार टोका-टोकी हुई, ऐसा सुषमा के साथ उनके तेलांगना मुद्दे पर बोलते हुए पहले भी हो चुका था। ााहिर है इससे भाजपा के लोकसभा सांसद मीरा कुमार के रवैए से किंचित नाराज जान पड़ते हैं।
Posted on 25 March 2012 by admin
विगत कुछ दिनों से भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण अडवनी पार्टी में अपने को कुछ अलग-थलग महसूस कर रहे हैं। अंशुमान मिश्र ने जिस तरह अडवानी एंड कंपनी को उम्र के इस पड़ाव पर राजनीति से संन्यास लेने की नसीहत दी, माना जाता है कि भगवा राजनीति में अपेक्षाकृत एक नए चेहरे अंशुमान की इस मुहिम को भीतरखाने से पार्टी के कई बड़े नेताओं का समर्थन प्राप्त था। अंशुमान का मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा पर सीधे हमले को इस कड़ी से जोड़ कर देखा जा सकता है। इस दफे के राज्यसभा चुनावों में भी अडवानी की ज्यादा नहीं चली और न ही उनसे टिकटों के बंटवारे की बाबत ही कुछ पूछा गया। बस गडकरी ने अडवानी के कहने पर नजमा हेपतुल्लाह को जरूर टिकट दे दिया। सो इन दिनों अडवानी का बस एक ही रोना है कि पार्टी में सारे फैसले तो बस गडकरी लेते हैं, बाकी संसदीय बोर्ड या चुनाव समिति तो बस उस पर सहमति की मुहर भर लगाती है।
Posted on 18 March 2012 by admin
उत्तराखंड में विजय बहुगुणा अपनी सरकार बनाने व बचाने का हरसंभव दांव चल रहे हैं, उन्हें उनके इस मुहिम में एक बड़ी कॉरपोरेट का हरसंभव समर्थन प्राप्त हैं, जिस कंपनी में उनके पुत्र डायरेक्टर हैं। इस कंपनी को दस जनपथ का करीबी भी माना जाता है, यह भी समझा जाता है कि सोनिया व राहुल गांधी इसी कंपनी से प्रदत्त निजी एयरक्राप्ट में उड़ान भरते हैं। समझा जाता है कि उत्तराखंड के प्रत्येक विधायक को समर्थन के एवज में दस करोड़ का ऑफर हो चुका है, फिर भी कुछ बात है हरीश रावत में कि उन्होंने अभी भी अपने 18 समर्थक विधायकों को अंडर ग्राउंड किया हुआ है। रावत जानते हैं कि उत्तराखंड में सारा खेल पॉवर प्रोजेक्ट्स को लेकर है, जहां अभी 3200 करोड़ के नए पॉवर प्रोजेक्ट्स आने हैं। रावत इस पूरे प्रकरण में गुलामनबी आजाद, अहमद पटेल, चौधरी बीरेंद्र सिंह की भूमिका को लेकर भी नाराज हैं, जिसने विधायकों की संख्या को लेकर सोनिया गांधी को गुमराह किया। बाद में भंवर जितेंद्र सिंह की रिपोर्ट से सारी पोल खुली। ऐसे में रावत ने भी अपने सारे विकल्प खुले रखे हुए हैं।
Posted on 18 March 2012 by admin
रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के प्रकरण में कुछ भी नया नहीं है। यह तो त्रिवेदी और दीदी दोनों ने पहले से तय कर रखा था कि रेल बजट के बाद वे एक-दूसरे को अलविदा कह देंगे, क्योंकि दोनों के बीच तनातनी इस कदर बढ़ चुकी थी कि संबंधों को टूटने से बचाया नहीं जा सकता था। वैसे भी विगत दिनों में त्रिवेदी अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस के ज्यादा करीब आ गए हैं और कांग्रेस की ओर से उन्हें राज्यसभा का आश्वासन पहले ही मिल चुका था। त्रिवेदी ने साफ कह दिया था कि वे रेल बजट पेश करने के बाद ही इस्तीफा देंगे, सो इस कड़ी में त्रिवेदी ने कई चर्चित जुमले उछाले, मसलन ‘रेल मंत्रालय रायटर्स बिल्डिंग से नहीं चलता’, वे सिर्फ अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं…आदि-आदि। वैसे भी कांग्रेस ने त्रिवेदी को एक महत्वपूर्ण जिम्मा सौंपा हुआ है कि वे तृणमूल में दो फाड़ करवा दे, इसके लिए त्रिवेदी को कम से कम 7 तृणमूल सांसद जुटाने होंगे। वैसे भी त्रिवेदी नाराज सांसदों जैसे कबीर सुमन, सुब्रतो मुखर्जी के लगातार संपर्क में है। कांग्रेस ने तो अपना विभीषण चुन लिया है, बस दीदी को अपने लिए एक राम की तलाश है।