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परदेस में परेश

Posted on 10 December 2009 by admin

परेश बरूआ भारत के हाथ आते-आते रह गया, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई उन्हें वक्त रहते पाकिस्तान लेकर चली गई। आईएसआई की कोशिश अरविंद राजखोवा, और राजू बरूआ को भी पाकिस्तान ले जाने की थी, पर भारतीय खुफिया एजेंसियों और बांग्लादेश सरकार के मिले-जुले प्रयासों से पाकिस्तानी एजेंसी के मंसूबे कामयाब नहीं हो पाए। परेश बरूआ का कथित तौर पर ढाका में एक पंचतारा होटल है और चटगांव में एक बड़ा बिजनेस साम्राज्य, जिसे बांग्लादेश सरकार जल्द ही अपने कब्जे में लेने जा रही है।

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चावला का मामला

Posted on 10 December 2009 by admin

सीबीआई और अब आईबी की पूछताछ का निशाना बने अंकुर चावला पहले पतली गली से सिंगापुर निकल गए थे, पर उनके असरदार पिता संपादक ने कुछ ऐसा सियासी रसूख सजाया और बड़े अंबानी के मार्फत एक बड़े विधि पद पर आसीन व्यक्ति को कुछ ऐसा मैनेज किया गया कि अंकुर को भरोसा जगा है कि फिलहाल इस रिश्वत खोरी मामले में उनकी गिरफ्तारी नहीं होगी। पर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी? और अब अंकुर इस बात से साफ इंकार कर रहे हैं और कह रहे हैं कि इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं कि कंपनी सचिव बांठिया को उन्होंने ही पैसे दिए हैं। सीबीआई उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख हिंदी अखबार समूह के कंपनी सचिव को पहले ही दबोच चुकी है जिनका लिखित दस्तावेज उपलब्ध है कि उन्होंने इस केस में खर्च करने के लिए कंपनी अकाऊंट से 10 लाख रुपयों की निकासी की थी। सीबीआई के बाद आईबी के अधिकारीगण चावला का बयान दर्ज कर रहे हैं और बदली परिस्थितियों इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि इस पूरे मामले में कई बड़ी मछलियां भी फंस सकती हैं।

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नजर नहीं आते जसवंत

Posted on 03 December 2009 by admin

जब से जसवंत सिंह को लोकसभा में तीसरी पंक्ति में जगह मिली है तब से वे सदन में कहीं नजर ही नहीं आते, हां पीएसी की बैठक करते हर दिन नजर आ जाते हैं, और पीएसी भी ऐसी जिसका प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने बॉयकाट किया हुआ है।

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कुर्सी गई और गया…

Posted on 28 November 2009 by admin

कर्नाटक की पूर्व मंत्री व येदुरप्पा की करीबी शोभा करंदलजे का रोना नहीं थम रहा है जब से उन्हें मंत्री पद से हटाया गया है, पार्टी के बड़े नेताओं की बात तो दूर कोई अदना कार्र्यकत्ता भी उन्हें घास नहीं डाल रहा है। शोभा को सबसे ज्यादा गिला इस बात को लेकर है कि पार्टी ने उनसे इस्तीफा भी अखबारों के माध्यम से और कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष सदानंद गौड़ा के मार्फत मांगा, येदुरप्पा ने उनसे सीधी मुंह बात भी नहीं कि न तब और न आज, शोभा फोन करती है तो मुख्यमंत्री लाइन पर भी नहीं आते हैं-‘ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पर रोना आया…’

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स्वीडन का मन

Posted on 21 November 2009 by admin

स्वीडन के प्रधानमंत्री फ्रेड्रिक रेनफेल्ट जब अपनी चर्चित दो-दिवसीय भारत यात्रा में दिल्ली पधारे तो वे एक खास जगह जाना नहीं भूले और वह है, नई दिल्ली के पालम डाबरी रोड पर स्थित सुलभ ग्राम में। यहां स्वीडन के प्रधानमंत्री कोई डेढ़ घंटे तक रहे और उन्होंने अपना अधिकांश वक्त सुलभ पब्लिक स्कूल के स्कैवेंजर बच्चों और अलवर की पुनर्वासित महिला स्कैवेंजरों के साथ गुजारा। कुछ समय पूर्व ही सुलभ आंदोलन के प्रणेता डा. विन्देश्वर पाठक को स्वीडन की राजधानी स्कॉटहोम में ही प्रतिष्ठित ‘वॉटर लॉरिएट अवार्ड 2009’ से सम्मानित किया गया था और शायद तब से ही स्वीडन के प्रधानमंत्री के मन में भारत की इस सबसे बड़े स्वयंसेवी संस्था के कार्यकलापों को देखने-बूझने की चाह रही थी, और प्रधानमंत्री की अधिकारिक वेबसाइट पर इस यात्रा का विस्तृत और रोचक ब्यौरा उपलब्ध है।

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मुश्किल घड़ी गडकरी

Posted on 21 November 2009 by admin

पूरा संघ नितिन गडकरी को अगला भाजपा अध्यक्ष बनाने के लिए कृतसंकल्प दिखता है। गडकरी हैं कौन? उनमें आखिर ऐसा क्या देख रहा है संघ? संघ का नजरिया साफ है, अब वह भाजपा की डोर पूरी तरह से अपनी हाथों में रखना चाहता है, डोर तो राजनाथ के राज में भी कमोबेश संघियों के हाथों में ही है, पर गाहे-बगाहे राजनाथ की ढुल-मुल नीतियों से संघ को परेशानियां झेलनी पड़ी है। संघ एक बार गलती कर चुका है और अब उस गलती को वह दुहराना नहीं चाहता, जब अटल बिहारी वाजपेयी जैसा व्यक्तित्व खड़ा कर संघ उनके समक्ष स्वयं बौना पड़ गया था, सो गडकरी भाजपा की वह लजीली बिटिया हैं जो घर से बाहर कम निकली है, यूपी, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों को तो शायद उन्होंने ठीक से देखा भी नहीं है, गडकरी की यही अदा तो संघ को भा गई है, बिटिया को घर से पांव बाहर निकालने में संकोच होता है सो निश्चय ही वह मर्यादित और नैतिक है। क्या ऐसे ही बदलेगा भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा!

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…और अंत में

Posted on 21 November 2009 by admin

अडवानी अपने सियासी जीवन की आखिरी निर्णायक पारी खेलने को इस कदर बेकरार हैं कि वे अपने जनजागरण अभियान के लिए भारत भ्रमण करने का इरादा रखते हैं, पर पार्टी में कोई भी उनकी इस इच्छा का सम्मान करने वाला नहीं बचा है, सो मन मार कर अडवानी ने एक रोज छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह को सीधे फोन लगा दिया कि ‘अपनी स्टेट में मेरी मीटिंग रखवाओ।’ रमण सिंह ने यह बात रामलाल से कह दी और रामलाल ने यह बात भाजपा में फैला दी कि ‘मीटिंग तो संगठन तय करता है, सीएम नहीं।’ सो अंत में रमण सिंह को फोन कर अडवानी को इत्तला भेजनी पड़ी कि ‘सर आपकी मीटिंग लेने के लिए फिलहाल कोई तैयार नहीं।’ नतीजन यह जन जागरण अभियान कैंसिल हो गया है। चुनांचे यह जन जागरण अभियान अडवानी के लाख चाहने के बावजूद सिरे नहीं चढ़ पाया है, क्योंकि भाजपा में फिलवक्त जन जागरण नहीं अपितु मन जागरण की ज्यादा जरूरत है।

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…और अंत में

Posted on 14 November 2009 by admin

अगर दिल्ली की भगवा चौकड़ी में से कोई नहीं होगा अगला अध्यक्ष तो फिर किसका लगेगा नंबर, नितिन गडकरी? मनोहर परिक्कर? या फिर उन्हीं बाल आप्टे का जिनके बारे में कभी भाजपा के भीष्म पितामह अटल ने फौरी टिप्पणी की थी कि…फिर तो हमें अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष का परिचय भी लोगों से कराना होगा। पर संघ के मुखिया भागवत के मूड और मूंछों को भांपने वाले करीबी सूत्र बस बाल की खाल निकालने की बात कह रहे हैं। यानी अगर सिर्फ और सिर्फ भागवत की चली तो बाल आप्टे ही होंगे अगले भाजपा अध्यक्ष।

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क्या पटेंगे पटनायक?

Posted on 14 November 2009 by admin

क्या नवीन पटनायक के लिए भाजपा ने अब भी अपना दिल और दरवाजा खुला रखा हुआ है? नहीं तो पिछले दिनों नई दिल्ली के चितरंजन पार्क इलाके में रहने वाले भाजपा के एक करीबी बंगाली पत्रकार (जो कभी अडवानी के खास हुआ करते थे, इन दिनों वे अरुण जेतली के काफी करीबी हैं) के घर डिनर पर नवीन घंटों रहे, इस डिनर में नवीन की एक करीबी महिला पत्रकार शामिल भी थीं जो आर्क्सफोर्ड के दिनों से ही नवीन की करीबी दोस्त हैं। अगर नवीन की किसी से नाराजगी है तो वह एक अन्य पत्रकार टर्न राजनेता चंदन मित्रा से है। शायद इस बात को भाजपा आलाकमान भांप गया है और उन्होंने ‘नवीन-मुहिम’ की कमान अपने एक अन्य बंगाली योध्दा को सौंप दी है।

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…और अंत में

Posted on 01 November 2009 by admin

शिवराज पाटिल, संतोष मोहन देव और अर्जुन सिंह सरीखे वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के राजनैतिक वनवास के दिन शीघ्र समाप्त हो सकते हैं और इन्हें गवर्नरी सौंपी जा सकती है।

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