Archive | Main Top Left

जेपीसी बनाम पीएसी का पंगा

Posted on 01 April 2011 by admin

2जी पर गठित जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय कमेटी और पीएसी यानी पब्लिक अकाऊंट कमेटी में बकायदा ठन गई है। पीएसी ने पिछले दिनों दो पत्रकारों को तलब किया, ‘आऊट लुक’ अंग्रेजी साप्ताहिक के विनोद मेहता और ‘ओपन’ अंग्रेजी साप्ताहिक के संपादक मनु जोसेफ को। इसके बाद वीर सांघवी और बरखा दत्त का नंबर था। अभी यह नंबर लगने ही वाला था कि ये चंद पत्रकार भागे-भागे जेपीसी चेयरमैन पीसी चाको के पास जा पहुंचे और वहां जाकर अपना दुखड़ा रोया, साथ ही चाको को यह भी समझाया कि भाजपा-कांग्रेस के आपसी झगड़े में उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है। चूंकि पीएसी के चेयरमैन मुरली मनोहर जोशी एक भाजपाई है। इन पत्रकारों का यह भी तर्क था कि पीएसी सीएजी रिपोर्ट की पड़ताल करने के लिए गठिन हुई है, और सीएजी रिपोर्ट में राडिया टेप्स का कहीं कोई जिक्र नहीं है। यह अगर आता भी है तो वह जेपीसी के दायरे में आता है। अब राडिया टेप्स में तो सुहेल सेठ और रंजन भट्टाचार्य के भी नाम हैं, क्या पीएसी उन्हें भी तलब करेगी? पत्रकारों की दलीलें सुनने के बाद चाको जोशी को उनका दायरा बताने में जुट गए हैं। आने वाले दिनों में पीएसी बनाम जेपीसी का मुद्दा खासा तूल पकड़ सकता है।

Comments Off on जेपीसी बनाम पीएसी का पंगा

नाराजगी उप राष्ट्रपति की

Posted on 22 March 2011 by admin

उप राष्ट्रपति जी नाराज हैं। उनका यूं नाराज होना वाजिब भी लगता है। संसद शुरू होने से पहले, (संसद यानी ऊपरी सदन, राज्यसभा) उप राष्ट्रपति के दफ्तर में सुबह 10.40 बजे एक मीटिंग होती है जिसमें संसदीय कार्यवाही को लेकर डिस्कशन होती है, उस बैठक में अश्विनी कुमार जो कि संसदीय राज्य मंत्री हैं, शायद ही कभी पहुंच पाते हैं। क्योंकि उनका सारा ध्यान 10.50 बजे प्रधानमंत्री के यहां होने वाली मीटिंग पर टिकी होती है, काएदे से प्रधानमंत्री को ब्रीफ करने का जिम्मा केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल का है, पर प्रधानमंत्री का खास बनने-दिखने की होड़ में अश्विनी बंसल से पहले ही आकर पीएम को ब्रीफ कर देते हैं। यानी इस बिन बुलाए मेहमान से बंसल हैरत में हैं और उप राष्ट्रपति गुस्से में।

Comments Off on नाराजगी उप राष्ट्रपति की

क्या है केबल?

Posted on 22 March 2011 by admin

आखिर विकीलिक्स कैसे पहुंचा उन गुप्त केबल तक? हर दूतावास को यह छूट होती है कि वे अपने प्रोटोकॉल के तहत अपनी कूट भाषा (कोड)में अपने देश से संवाद स्थापित कर सके। इसके लिए पांच माध्यम हैं-रेगुलर फोन (इसके फोन टेपिंग का खतरा है), हॉटलाइन, इंटरनेट, सेटेलाइट फोन व वॉयरलेस। सेटेलाइट फोन को खुद अमरीका मॉनीटर करता है, चुनांचे यह भी विश्वसनीय नहीं। नेट पर भी हैकरों की मेहरबानी है। सो ले देकर एक वायरलेस मैसेज पर ही सबसे ज्यादा निर्भरता होती है। वायरलेस पर संदेश ‘इनक्रिप्शन सेंटर’ से ‘कोड’ में जाता है। और इसे प्राप्तर्िकत्ता ‘डिसाइबर’ करने के बाद मैसेज प्राप्त कर लेता है। अन्य देशों में यह प्रक्रिया मैनुअल है, पर अमरीका में यह कंप्यूटराइज्ड है। अमरीका स्टेट डिपार्टमेंट में अलग-अलग देशों के पृथक डेस्क बने हुए हैं। ये वॉयरलेस संदेश कंप्यूटर में कैद हो जाते हैं, और बाद में इसे ‘डिकोडिंग’ करके सुना जा सकता है। दरअसल विकीलिक्स ने उस कूटनीतिक भाषा तक अपनी पहुंच बना ली और विभिन्न संदेशों (केबल) को ‘डिकोड’ करना उसे आ गया, सारा मसला इसी कोड के हाईजैक होने का है।

Comments Off on क्या है केबल?

विदेशी निवेश में कमी

Posted on 15 March 2011 by admin

2जी स्पेक्ट्रम का ग्रहण भारत में हो रहे विदेशी निवेश पर लग सकता है। जर्मनी ने तो बकायदा एक एडवाइजरी जारी कर दी है जर्मन उद्योगपतियों के लिए कि वे भारत में अपना पैसा सोच-समझकर निवेश करें। मिडिल ईस्ट की एक बड़ी टेलीकॉम कंपनी ‘एटीसेलेट’ और एक स्वीडिश कंपनी ‘टेलिमोर’ जिन्होंने भारत में 2जी लाइसेंस खरीदा है, वह भी इन सरकारी धमकियों से कुपित है कि सरकार 2जी लाइसेंस रद्द कर सकती है। ये कंपनियां पूछ रही है कि ‘हमारा क्या कसूर हमने तो बाजार भाव पर लाइसेंस खरीदा है, पकड़ना है तो उनको पकड़ो जिन्होंने कौड़ियों के भाव 2जी लाइसेंस लेकर हमें मुंहमांगी कीमतों पर बेच दिया है।’ यानी ऐसे में अंबानी, टाटा, यूनिटेक सब पर खतरा मंडरा सकता है। सो कॉरपोरेट इंडिया में मौजूदा सरकार को लेकर नाराजगियां बढ़ी हैं, वह चाहती है कि मनमोहन सरकार जाए। द्रमुक संकट भी इसी बात का आगाज था, संकट को बढ़ाने में कॉरपोरेट घराने दोनों हाथों से करुणानिधि की मदद कर रहे थे। कहते हैं 2जी में टाटा ने भी 1600 करोड़ का लाइसेंस 12 हजार करोड़ में बेचकर दोनों हाथों से मुनाफा कमाया है। पर उनका कोई बाल बांका नहीं हो रहा है।

Comments Off on विदेशी निवेश में कमी

हसन अली आजाद है कि मुल्क आजाद है

Posted on 15 March 2011 by admin

हसन अली आजाद है, आजाद मुल्क हिंदुस्तान में। जाहिर है हर आजादी की अपनी एक कीमत होती है। आखिर अली ने हवाला के माध्यम से विदेशी बैंकों में कितनी रकम रखी हुई, इसको लेकर हमारी जांच एजेंसियां एकमत नहीं। पर शायद मीडिया में जितनी रकम का खुलासा हो रहा है, उतनी रकम न भी हो तो भी यह गड़बड़झाला तो काफी बड़ा है। सूत्र बताते हैं कि अली ने ज्यादातर पैसे निजाम हैदराबाद की चल-अचल संपत्ति बेचकर कमाए हैं, निजाम अब आस्ट्रेलिया में बस गए हैं, सो भारत में उनकी अकूत धन-संपत्ति को बेचकर इससे मिले धन को सुरक्षित बाहर पहुंचाने में हसन की बड़ी भूमिका रही है और इसमें कमीशन के तौर पर उन्हें काफी धन मिला है। जांच एजेंसियां उनके ऊपर मामला इतना कमजोर क्यों बना रही हैं, यह तो कोई छुपी बात नहीं रह गई है, सब सियासी सरपरस्ती का मामला है।

Comments Off on हसन अली आजाद है कि मुल्क आजाद है

जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ेगी

Posted on 08 March 2011 by admin

कैबिनेट से स्वीकृति मिलने के बाद सरकार हाई कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट की उम्र 62 से 65 वर्ष करने हेतु विधेयक लेकर आई है, यह 114वां संविधान संशोधन है। सरकार का मानना है कि ऐसा करने से कम से कम तीन साल तो नए जजों की नियुक्ति की जरूरत नहीं रह जाएगी और पेंडिंग केसों के निपटारों में भी तेजी आ जाएगी क्योंकि जो मुकदमा जिस जज के पास है उस पर फैसला सुनाने के लिए उन्हें वक्त मिल जाएगा। पर समझा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के इस निर्णय से इत्तफाक नहीं रखता है, क्योंकि वर्तमान परिपाटी में हाई कोर्ट के जो जज बेहतर काम कर होते हैं उन्हें पारितोषिक के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में ले आया जाता है। पर इस नई व्यवस्था के बाद हाई कोर्ट के कम जज ही सुप्रीम कोर्ट आना चाहेंगे, क्योंकि ऐसे में वे फिर सुप्रीम कोर्ट में रिटायरमेंट के बाद वकालत नहीं कर पाएंगे, क्योंकि हमारी न्यायिक व्यवस्था के मुताबिक जो जज जिस कोर्ट में रहते हैं, या फिर वहां से रिटायर होते हैं उस कोर्ट में फिर वे प्रैक्टिस नहीं कर सकते।

Comments Off on जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ेगी

…और अंत में

Posted on 27 February 2011 by admin

यूनिटेक के संजय चंद्रा के संबंध देश के सबसे बड़े राजनैतिक परिवार के एक खास रिश्तेदार से हैं। शायद यही कारण है कि इस केस में उन्हें ‘अप्रूवर’ बनाने की बात चल रही है, उनकी गिरफ्तारी महज रस्म-अदायगी के लिए हो सकती है। उसी तरह इस मामले में रुईया घराने का भी बाल-बांका नहीं हो पाएगा। भगवा सांसद निशि कांत चाहें तो चैन की सांस ले सकते हैं।

Comments Off on …और अंत में

जानिए बड़े खिलाड़ियों को

Posted on 27 February 2011 by admin

2जी मामले के अन्य खिलाड़ियों जैसे विनोद गोयनका जिनकी बारामती डेयरी है (बारामती पवार का संसदीय क्षेत्र है) या डीबी रियलिटी के शाहिद बल्वा (यह भी पवार के ही खास माने जाते हैं) से भी सीबीआई ने बहुत हल्के लहजे में पूछताछ की, यह पूछताछ की अवधि आधे घंटे से भी कम रही। अब तक यही ढूंढा जाता रहा था कि डीबी रियलिटी आखिर किसकी है? डी से डायनामिक्स, बी से बलवा यानी डायनामिक्स बलवा रियलिटी। महाराष्ट्र सरकार के तमाम बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स यही कंपनी हैंडिल कर रही है। बलवा जिम और कसरत के भी खूब शौकीन हैं, चुनांचे सीबीआई हेडक्वाट्र्स में भी उन्हें कसरत करते और सीबीआई अधिकारियों को कसरत करवाते देखा जा सकता है। बलवा के पीयूष गोयल के मार्फत भाजपा में भी काफी रसूख हैं और कहा जाता है कि मुंबई का मेरेडियन होटल भी इन्हीं का है।

Comments Off on जानिए बड़े खिलाड़ियों को

सियासत रंगों की

Posted on 27 February 2011 by admin

कम लोगों को मालूम होगा कि ममता एक अच्छी पेंटर भी हैं, लिहाजा जब शुक्रवार को वह स्पीकर के चैंबर में पहुंची तो बातों-बातों में स्पीकर ने सुझाव दिया कि पार्लियामेंट एनेक्सी में वह अपनी एक कला प्रदर्शनी क्यों नहीं लगातीं? ममता मान गई हैं और अब तो उन्होंने अपनी प्रदर्शनी के लिए विषय का भी चयन कर लिया है-‘हिंसा या शांति’ इस प्रदर्शनी से ममता न केवल अपने राजनैतिक विरोधियों को शांति का पाठ पढ़ाना चाहती हैं, अपितु वह जानती है कि यह विषय ही वामपंथियों पर सीधा कटाक्ष होगा। वैसे भी तृणमूल अपने नववर्ष के ग्रीटिंग्स कार्ड में ममता की पेंटिंग्स या उनके किसी रेखा चित्र का ही इस्तेमाल करता है। आमतौर पर जब ममता कोलकाता-दिल्ली की फ्लाइट में होती हैं तो पूरे समय रेखाचित्र बनाने में ही तल्लीन रहती हैं, उनके पर्स में आप हमेशा एक नोट पैड और कलर स्कैच पेन पा सकते हैं। यानी बंगाल के सियासी कैनवस को अपनी कल्पनाओं के नए रंग से रंगना चाहती हैं दीदी!

Comments Off on सियासत रंगों की

कौन किधर है?

Posted on 23 February 2011 by admin

सरकार के मंत्रियों में जहां पहले ज्यादातर की निष्ठा दस जनपथ के साथ हुआ करती थी, अब उनकी निष्ठाएं भी राजनीति के बदलते रंग के मानिंद बदलने लगी हैं। ताजा उदाहरण पी.चिदंबरम का ही लें, पहले वे दोनों तरफ चलते थे, यानी सोनिया के वफादार होने का दिखावा भी करते थे और पीएम की कोटरी में भी हुआ करते थे। अब वे विशुध्द रूप से पीएम खेमे में आ गए हैं। आएं भी क्यों नहीं, पीएम की दिली इच्छा है कि बजट सत्र के बाद मंत्रिमंडल फेरबदल में उन्हें फिर से वित्त मंत्रालय सौंपा जाए। क्योंकि अर्थशास्त्री मनमोहन का दिल ही वित्त मंत्रालय में बसता है और प्रणब दा हैं कि उनसे मंत्रालय की बाबत सलाह लेना भी गवारा नहीं करते।

Comments Off on कौन किधर है?

Download
GossipGuru App
Now!!