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… और अंत में

Posted on 28 November 2009 by admin

झारखंड में कांग्रेस और बाबूलाल मरांडी के सियासी गठबंधन से एक नया समां बंधा है और इस गठबंधन के उपरांत मरांडी की पार्टी की पतंग कुछ इस कदर बुलंद है कि पार्टी का एक टिकट पाने के लिए बेचैन अभ्यिार्थियों ने एक करोड़ तक की बोली लगा दी, बाबूलाल इन बातों से सचमुच बम-बम है।

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कुर्सी गई और गया…

Posted on 28 November 2009 by admin

कर्नाटक की पूर्व मंत्री व येदुरप्पा की करीबी शोभा करंदलजे का रोना नहीं थम रहा है जब से उन्हें मंत्री पद से हटाया गया है, पार्टी के बड़े नेताओं की बात तो दूर कोई अदना कार्र्यकत्ता भी उन्हें घास नहीं डाल रहा है। शोभा को सबसे ज्यादा गिला इस बात को लेकर है कि पार्टी ने उनसे इस्तीफा भी अखबारों के माध्यम से और कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष सदानंद गौड़ा के मार्फत मांगा, येदुरप्पा ने उनसे सीधी मुंह बात भी नहीं कि न तब और न आज, शोभा फोन करती है तो मुख्यमंत्री लाइन पर भी नहीं आते हैं-‘ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पर रोना आया…’

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संघ बनाम अडवानी

Posted on 28 November 2009 by admin

संघ ने लगता है अडवानी से आर-पार की ठान ली है, जब अडवानी की यह बात मीडिया में आई कि अगर में 83 साल का हो गया हूं तो इसमें मेरा क्या कूसूर तो फौरन इस पर संघ का पलट बयानी आ गया कि विश्व में कोई भी नेता विपक्ष 83 साल का बुजुर्ग नहीं है और कम से कम नौजवान राहुल का मुकाबला तो अडवानी कतई नहीं कर सकते।

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चिंदी-चिंदी है हिंदी

Posted on 20 October 2009 by admin

यूपीए सरकार के आंगन में बिचारी हिंदी अपेक्षाओं के लाख दंश झेलने को विवश है। एक नीतिगत निर्णय के तहत् विदेश मंत्रालय को यह कार्य सौंपा गया था कि वह संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को सातवीं आधिकारिक भाषा बनाने के लिए विश्वव्यापी लॉबिंग करे और इसके लिए सरकार ने कोई सौ करोड़ रुपयों के भारी-भरकम बजट का प्रावधान भी रखा था। इस प्रोजेक्ट के तहत विदेश मंत्रालय को कोई 50 देशों में हिंदी के लिए लॉबिंग करनी थी, पर हिंदी-प्रेमी लोग यह जानकर बेहद परेशान हैं कि इस योजना का अब तलक श्रीगणेश भी नहीं हो पाया है और न ही इस मंत्रालय के दो अहिंदी भाषी मंत्रियों की इस योजना में कोई खास दिलचस्पी है। केंद्रीय मंत्री एस.एम.कृष्णा की मातृभाषा कन्नड़ है, वे कर्नाटक से आते हैं, शशि थुरूर मलयाली हैं, केरल से आते हैं, ऐसे में बिचारी हिंदी के लिए कौन क्या लेकर आएगा? सवाल यही तो अहम है, पर इसकी शिकायत कौन लेकर जाए मैडम इतालवी के पास।

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… और अंत में

Posted on 05 October 2009 by admin

क्या भगवा पाटी और लाल पार्टी में कुछ खिचड़ी पक रही है? भाजपा को अछूत मानने वाले कॉमरेडाें के रवैए में बदलाव क्या कुछ नए राजनैतिक समीकरणों की ओर इशारा कर रहे हैं? नहीं तो जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक प्रमुख नेता गुरूदास गुप्ता जब लोकसभा में विपक्ष की उपनेता सुषमा स्वराज से मिलने उनके घर पहुंचे तो दोनों नेताओं के बीच एक घंटे तक गंभीर मंत्रणा चली। सुषमा का बाद में बयान आया कि यह मीटिंग संसद में दोनों पार्टियों के संयुक्त उपक्रम के तहत फ्लोर मैनेजमेंट को लेकर थी, जब दोनों ही पार्टियों के पांव तले से पहले से ही जमीन खिसक रही हो, तो उनके पास मैनेज करने के लिए ज्यादा बचा भी क्या है? सिवा अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के।

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ना मानें अडवानी

Posted on 05 October 2009 by admin

अडवानी ने संघ से साफ-साफ कह दिया है कि चाहे संघ नेतृत्व कुछ भी कह ले अपनी उम्र के इस पड़ाव पर वे कतई गद्दी नहीं छोड़ेंगे। अडवानी ने संघ से साफ कह दिया है ‘मैं 82 साल का हो गया हूं, मेरे अनुभवों की आज मेरी पार्टी को सख्त जरूरत है सो मेरा इरादा अपने पद से इस्तीफा देने का नहीं है। पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए मैं देश भर का भ्रमण करूंगा।’ अडवानी की इस दलील पर संघ भौंचक है। सो, पार्टी के अगले अध्यक्ष के तौर पर संघ जिस नाम पर विचार कर रहा है वह हैं गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पारिक्कर जो आईआईटी ग्रेजुएट हैं। पारिक्कर का एक मसालेदार बयान अभी मीडिया में आया है-‘अचार एक साल तक ठीक रहता है, उसके बाद सड़ जाता है।’ तो क्या माना जाए अडवानी जी सचमुच सड़ चुके हैं ?

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मणि का मंतर

Posted on 05 October 2009 by admin

मणिशंकर अय्यर भले ही पिछला लोकसभा चुनाव हार गए हों, पर दिल नहीं हारे हैं। हिम्मत की दाद दीजिए उनकी गांधी परिवार के महिमामंडन का कोई भी मौका वे अपने हाथों से जाने नहीं देना चाहते। कांग्रेस पार्टी के अग्रणी परिवार से अपने पुराने रिश्तों की बानगी पर वे संभावनाओं का नया प्रस्फुटन चाहते हैं। अभी हालिया दिनों में उन्होंने राहुल गांधी के एक करीबी मित्र को यह संदेशा भिजवाया कि दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित और पुराने कनॉट प्लेस का राजीव चौक नामकरण करने का आइडिया उनका ही था, अय्यर तो जोश-जोश में यहां तक कह जाते हैं कि आज के दिन जो भी लोग राजीव चौक को कनॉट प्लेस के नाम से पुकार रहे हैं वे देशद्रोही हैं, जब से राजनीति का स्वरूप जनवादी से व्यक्तिवादी हुआ है चापलूसों की ऐसी दुकानें तो चल ही निकली हैं।

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मुखी हुए मुखर

Posted on 05 October 2009 by admin

दिल्ली विधानसभा के विपक्ष के पूर्व नेता प्रोफेसर जगदीश मुखी के दिन क्या फिर सकते हैं? सबसे पहले तो दिल्ली विधानसभा से उनकी छुट्टी हो गई और उनसे नेता प्रतिपक्ष की गद्दी एक और प्रोफेसर साहब विजय कुमार मल्होत्रा ने हथिया ली। खैर, इसके बाद इस लोकसभा चुनाव में पार्टी ने मुखी को पश्चिमी दिल्ली संसदीय सीट से अपना उम्मीदवार बना लिया, पर उन्हें कांग्रेस के महाबल मिश्रा ने जमीन सुंघा दी। महाबल मिश्रा के इस्तीफे के बाद रिक्त हुई द्वारका विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए तो मुखी ने अपने खासमखास प्रद्युम्न राजपूत के लिए पैरवी की जबकि पार्टी का एक मजबूत धड़ा दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक पूर्व अध्यक्ष आशीष सूद के नाम की पैरवी कर रहा था। पर मुखी राजपूत को टिकट दिलवाने में कामयाब रहे और राजपूत द्वारका सीट जीतने में। सो जब से मुखी ने अपनी नाक बचा ली है तब से वे इस बात के लिए मुखर हैं कि पार्टी उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपे।

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…और अंत में

Posted on 19 September 2009 by admin

अब हरियाणा में इस बात को लेकर लड़ाई खत्म हो चुकी है कि वहां अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? तीनों प्रमुख विपक्षी दल ने जैसे इस बारे में हथियार डाल दिए हों और हुड्डा का खूंटा सलामत रखने की जैसे वे भी दुआ मांग रहे हों। बात बस इतने पर फंसी है कि हरियाणा में अगला नेता प्रति पक्ष कौन बनेगा-कुलदीप? चौटाला? या कृष्णपाल के भाग्य से छींका टूटेगा?

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मत और दस्तखत

Posted on 19 September 2009 by admin

इस बार बहिन जी फूंक-फूंककर कदम रख रही हैं, ताज कॉरीडोर की जली माया अब हर फाइल को दस्तखत के लिए सीधे कैबिनेट सचिव को भेजती हैं यानी निर्णय तो बहिन जी के होते हैं पर हस्ताक्षर कैबिनेट सेके्रटरी साहब के, यानी तलवार तो अफसरशाही पर ही लटक रही है।

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