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अडवानी-कमला पर उम्र का असर

Posted on 16 September 2013 by admin

86 साल की उम्र में लाल कृष्ण अडवानी पर उम्र का असर दिखने लगा है। अब वे मानसिक रूप से न तो इतने चुस्त-दुरूस्त हैं और न ही पहले की तरह त्वरित रिस्पांस करते हैं, अब वे भूलने भी लगे हैं। घटनाएं, लोग और उनकी पहचान को लेकर कभी-कभार उनकी स्मृर्ति धूमिल भी पड़ने लगी है। यही हाल उनकी धर्मपत्नी कमला अडवानी का भी है, जो घर आए आगंतुकों से कम से कम दो-तीन दफे उनका नाम तो पूछ ही लिया करती हैं। उन्हें इस बात का भी इल्म नहीं रहता कि घर आए किस मेहमान को चाय-कॉफी सर्व हो चुकी है। उनकी ओर से आग्रह का यह आलम रहता है कि घर आए मेहमानों को कभी-कभी दो-तीन दफे चाय पीनी पड़ जाती है। फिर भी वे कमला जी को यह भरोसा दिलाने में नाकाम रह जाते हैं कि ‘हां, वाकई उन्हें चाय सर्व कर दी गई है।’

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जोशी ने पलटी मारी

Posted on 16 September 2013 by admin

पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने मोदी की पीएम उम्मीदवारी को लेकर जिस तरह रंग बदले उससे अडवानी खेमा एकबारगी भौच्चक रह गया। गोवा से लेकर दिल्ली तक अडवानी के बाद जोशी मोदी के कट्टर आलोचक के तौर पर उभरे थे। सूत्र बताते हैं कि जोशी ने अडवानी के समक्ष यह भी स्पष्ट कर दिया था कि शुक्रवार को आहूत होने वाली पार्टी संसदीय बोर्ड की बैठक हो या फिर उसके बाद आयोजित होने वाला मोदी का अभिनंदन समारोह वे इन दोनों कार्य क्रमों का बायकॉट करेंगे, वैसे भी उन्हें शुक्रवार को दिल्ली से बाहर सागर जाना था। अडवानी कैंप से किए वादे के मुताबिक जोशी संसदीय बोर्ड की बैठक से तो गैरहाजिर रहे, पर जैसे ही मोदी के नाम की घोषणा हुई तो मोदी को बधाई देने वालों की पांत में जोशी एक गुलदस्ता लिए सबसे आगे खड़े नार आए और जब मोदी ने झुक कर उनके चरण स्पर्श किए तो उन्होंने मोदी को गले लगा लिया, सारे गिले-शिकवे भुलाकर।

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लेट होता कोल गेट

Posted on 16 September 2013 by admin

कोल गेट मामले में कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई एक नई एफआईआर र्दा करने जा रही है। सबसे हैरत की बात तो यह कि यह एफआईआर अज्ञात लोगों के खिलाफ र्दा होने वाली है। यानी इससे इतना तो साफ हो गया है कि सीबीआई ने पीएम और पीएमओ के उन चंद अधिकारियों को भी क्लीन चिट देने की तैयारी कर ली है, कोयले की आंच जिन तक पहुंच रही थी। सूत्रों के अनुसार खानार्-पूत्ति के तौर पर एफआईआर र्दा होने के बाद पीएमओ के कुछ अधिकारियों को जवाब देने के लिए सीबीआई एक प्रश्नावली भेजने की तैयारी कर रही है, ताकि मामले को आनन-फानन में निपटाया जा सके। सीबीआई ने पीएमओ और कोल मंत्राालय से जो फाइलें मांगी थीं वे अब तक उन्हें मुहैया नहीं कराई जा सकी हैं। सीबीआई को मंत्राालय व पीएमओ की ओर से अब तक जो 793 फाइलें उपलब्ध करायी गई हैं उसका कोल गेट मामले से कोई लेना-देना ही नहीं, ये वे फाइलें बताई जाती हैं जब कोल ब्लॉक आबंटित ही नहीं हुए थे। मंत्रालय ने गुम फाइलों को ढूंढने के लिए जो कमेटी गठित की है वह भी एक तरह से हाथ पर हाथ धरे बैठी है। सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि यह कमेटी उल्टे उन तमाम फाइलों को खंगाल कर यह देखने का प्रयास कर रही है कि इसकी आंच कहीं पीएमओ तक तो नहीं पहुंच रही है? और जहां आंच सचमुच धधक कर पीएमओ की ओर लपक रही है उसे ठंडा करने के लिए मिट्टी डाली जा रही है। सुरक्षा व बचाव के तमाम उपाय किए जा रहे हैं। अगर सचमुच गुम फाइलों को नहीं ढूंढा जा सका तो आखिरकार कोल गेट के दोषियों को सिर्फ सीएजी रिपोर्ट के आधार पर तो सजा मुकर्रर हो नहीं सकती। यह बात सीबीआई भी जानती है और पीएमओ भी।

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अडवानी की 15 सितंबर की अकोला रैली पर टिकी हैं मोदी कैंप की निगाहें

Posted on 12 September 2013 by admin

भाजपा के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण अडवानी की बदली भाव-भंगिमाओं ने मोदी कैंप व संघ की नींद उड़ा दी है। पार्टी का अडवानी विरोधी खेमा इस बात को लेकर किंचित परेशान है कि क्या अडवानी फतेहपुर सीकरी की अकोला रैली में संघ व पार्टी नेतृत्व के बारे में अपना असंतोष जाहिर करते हैं? क्योंकि बुधवार को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से हुई अपनी बातचीत में अडवानी ने साफ कर दिया है कि अगर पार्टी उनके दिए गए सुझावों पर कान नहीं धरेगी उसकी अनदेखी करेगी तो वे सार्वजनिक रूप से अपनी बात लोगों के सामने रख सकते हैं। भाजपा से जुड़े विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि अडवानी को मोदी पक्ष में रजामंद करने की नीयत से ही राजनाथ अडवानी के घर पहुंचे थे। राजनाथ को भरोसा था कि वे अडवानी को मोदी के पक्ष में मना लेंगे पर उनका बावस्ता एक बदले हुए अडवानी से हो गया। अडवानी ने राजनाथ की अध्यक्षीय शैली पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए और उन्होंने बेहद साफगोई से राजनाथ से कहा कि ‘वे भी चार दफे पार्टी अध्यक्ष रह चुके हैं सो, वे अच्छी तरह जानते हैं कि एक राष्टï्रीय अध्यक्ष का पार्टी के प्रति क्या दायित्व होता है। पार्टी जनों से उनकी भावनाएं किस तरह जुड़ी होती हैं और वह एक व्यक्ति विशेष (नरेंद्र मोदी) के हक में अपने झुकाव को सार्वजनिक नहीं कर सकता।’ अडवानी ने राजनाथ से यह भी कहा कि ‘यह उनकी निजी लड़ाई नहीं है, बल्कि वे नैतिकता की लड़ाई लड़ रहे हैं, पार्टी को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। और यह सिर्फ उनका मामला नहीं बल्कि पार्टी के कई वरिष्ठï नेता इस तरह मोदी को पार्टी की ओर से पीएम उम्मीदवार घोषित किए जाने के हक में नहीं हैं।’ अडवानी ने मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार व नितिन गडकरी के नाम लिए जो मोदी के नाम की आनन-फानन घोषणा किए जाने के खिलाफ हैं। अडवानी ने राजनाथ से यह भी कहा कि ‘आज देश में भाजपा के पक्ष में एक बेहद सकारात्मक माहौल है, ऐसे में हम मोदी का नाम आगे कर अगली सरकार थाली में परोस कर कांग्रेस को देना चाहते हैं।’ सूत्र बताते हैं कि जब राजनाथ ने अडवानी को यह समझाना चाहा कि अभी मोदी के पक्ष में देश का जनमानस है और संघ की भी यही इच्छा है कि लोकसभा का अगला चुनाव मोदी के नेतृत्व में और उनके नाम पर लड़ा जाए, तो अडवानी ने राजनाथ से प्रश्न किया कि अगर संघ सचमुच में ऐसा चाहता है तो मोदी के नाम का निर्णय को उसने हमारे उपर क्यो छोड़ा है? वह निर्णय लेकर हमें इससे अवगत करा सकता था। एक तरह से अडवानी ने साफ कर दिया है कि वे मोदी की पीएम पद की उम्मीदवारी को लेकर अब भी विरोध में हैं। अगर पार्टी 5 राज्यों के हालिया विधानसभा चुनावों के बाद इस बारे में विचार करने को तैयार है तो वे भी इस बारे में कुछ सोच सकते हैं।
राजनाथ ने अडवानी से मिलने के बाद उनकी भावनाओं से नरेंद्र मोदी और संघ नेतृत्व को अवगत करा दिया है। मोदी खेमा इस बात को लेकर फिलवक्त काफी बैचेन नजर आता है कि अडवानी ने जो बातें राजनाथ से कही हैं क्या वे सर्वजनिक रूप से यह बातें अपनी अकोला रैली में भी कह सकते हैं? भाजपा महासचिव वरूण गांधी ने 15 सितंबर को अकोला में रैली आहूत की है। संघ और मोदी खेमे की फिलहाल यही मंशा है कि घर की बात घर में ही रह जाए और पार्टी के वयोवृद्ध नेता अडवानी पार्टी के द्वारा तय की गई लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन न करें, वरना सुलह-सफाई के तमाम रास्ते बंद हो सकते हैं।

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मित्तल की मुरली

Posted on 08 September 2013 by admin

कभी प्रमोद महाजन, बाद में सुषमा स्वराज व राजनाथ सिंह के करीबियों में शुमार होने वाले भाजपा नेता सुधांशु मित्तल ने मुरली मनोहर जोशी के रूप में अपना एक नया तारणहार ढूंढ लिया है। अभी पिछले दिनों जोशी की एक करीबी के घर पर मित्तल ने कई प्रमुख भाजपा नेताओं की एक बैठक बुलाई। इस बैठक में यशवंत सिन्हा और शत्रुध्न सिन्हा जैसे नेता भी पहुंचे। समझा जाता हे कि सियासी चाणक्य माने जाने वाले मित्तल का नया एजेंडा मुरली मनोहर जोशी को देश के भावी प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करना हैं।

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दिल्ली चाहती क्या है

Posted on 08 September 2013 by admin

चूंकि चुनाव पास हैं तो स्टिंग आपरेशंस के लिए भी यह एक मौजूं वक्त है। दिल्ली के कर्णधारों के इशारे पर अभी मोदी और उनके करीबियों से जुड़े दो और स्टिंग बाहर आने हैं और इसी सितंबर माह में आ सकते हैं। वैसे भी दिल्ली ने भुपिंदर यादव की सीडी के आधार पर सीबीआई डायरेक्टर को साफ-साफ निर्देश भेज दिए हैं कि सीबीआई कोर्ट में अमित शाह की जमानत खारिज करने वाली अर्जी तैयार कर ले। दिल्ली से जुड़े विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि इस बारे में सीबीआई का होमवर्क पूरा हो चुका है और सितंबर माह के आखिर में कभी भी शाह की जमानत को रद्द करने की अर्जी कोर्ट में लगाई जा सकती है। अमित शाह के एक बार फिर से जेल जाने का अर्थ होगा कि मोदी की तमाम उद्दात सियासी महत्वाकांक्षाओं को एक बारगी सींखचों के पीछे खड़ा कर देना।

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फिर आएंगी चिठ्ठियाँ

Posted on 08 September 2013 by admin

जैसे-जैसे देश में लोकसभा चुनाव की बेला करीब आ रही है कांग्रेस मोदी को घेरने की हर मुमकिन कोशिश करने में जुटी है। डीसीपी वंजारा की दस पेजी चिठ्ठियाँ तो महज़ एक आगाज़ है, आने वाले दिनों में दो और ऐसी ही चिठ्ठियाँ लाने की तैयारी है। दूसरी चिठ्ठियाँ गुजरात के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस पी.पी. पांडे या आईपीएस जी.एल.सिंघल की हो सकती है। और इन तमाम ख़्ातों का मज़मून यही होगा कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह को सब पता था। सनद रहे कि मोदी विरोध की अलख जगाने वाले इन तमाम ऑपरेशंस की धुरी दिल्ली में है। और कुछ लोग दिन-रात इस काम को परवान देने में जुटे हैं।

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शाह को घेरने की तैयारी

Posted on 08 September 2013 by admin

भाजपा महासचिव व यूपी के प्रभारी अमित शाह इन दिनों कांग्रेस के दुश्मन नंबर वन बन चुके हैं। दरअसल, कांग्रेस सीधे मोदी पर हमला नहीं साधकर शाह पर निशाना साधना चाहती है ताकि इसकी आंच मोदी तक पहुंचे। फिलहाल शाह सोहराबुद्दीन मामले में जमानत पर हैं। पर सितंबर के आखिर में सीबीआई कोर्ट में उनकी जमानत को खारिज करने की अर्जी लगाने वाली है। दरअसल, शाह अपने ही बुने कानूनी जाल में उलझ गए लगते हैं। उनकी गिरफतारी सोहराबुद्दीन व कौसर बी के मामले में हुई थी, उसके बाद तुलसी प्रजापति का केस सामने आया तब तक शाह को कोर्ट से जमानत मिल चुकी थी। सो, जब उन्हें लगा कि प्रजापति मामले में वे फिर से जेल जा सकते हैं तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई कि सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसी प्रजापति यह सब एक-दूसरे से जुड़े केस हैं। इसमें अलग से एफआइआर दर्ज करने की क्या जरूरत है? यानी प्रजापति मामले में शाह दुबारा बेल के लिए एप्लाई नहीं करना चाहते थे। चुनांचे कोर्ट ने उनकी बात मान ली और इन तीनों केस को ‘क्लब’ कर दिया। पर अब उसमें नया पेंच यह आ गया है कि इन तीनों केस के एक होते ही इसमें अधिकतम सजा मृत्युदंड का प्राधान समाहित हो गया और अब सीबीआई कोर्ट में यही बात दुहरा सकती है। सो, ऐन लोकसभा चुनाव की पूर्व बेला में अगर कोर्ट ने शाह की जमानत कैंसिल कर दी तो मोदी को यूपी के लिए एक नया चेहरा ढूंढना पड़ सकता है।

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गोयल को दो टूक

Posted on 31 August 2013 by admin

भाजपा के पार्लियामेंट्री बोर्ड और कोर कमेटी की बैठक में एक प्रकार से तय हो गया कि विजय गोयल को पार्टी दिल्ली में सीएम कैंडीडेट के तौर पर प्रोजेक्ट नहीं करेगी। गोयल भी दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के आधे दर्जन दावेदारों में से बस एक दावेदार बन कर रहेंगे। पर पार्टी ने जो अभी दिल्ली में अपना जनमत सर्वेक्षण करवाया है वे पार्टी के मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के लिए अच्छी खबर नहीं है। हर्षवध्दन कृष्णा नगर में तीन फीसदी वोट से पिट रहे हैं, आरती मेहरा मालवीय नगर में 6 फीसदी वोटों से, हरशरण सिंह बल्ली से 4 फीसदी से,तो विजय गोयल मॉडल टाऊन में 5 फीसदी वोटों से पीछे चल रहे हैं। सो, जब पिछले दिनों गोयल हर्षवध्दन की शिकायत लेकर गडकरी के पास पहुंचे कि ‘डाक्टर साहब, तो फिर से हार रहे हैं।’ तो गडकरी ने छूटते ही गोयल से कहा, ‘आपकी सीट की रिपोर्ट तो इससे भी बदतर है।’

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आप से बात करेंगी मेनका

Posted on 31 August 2013 by admin

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा अरविंद केजरीवाल और उनकी ‘आप’ के बढ़ते प्रभाव को लेकर खासा चिंतित है। दिल्ली भाजपा के हैड नितिन गडकरी चाहते हैं कि आप और भाजपा के बीच कोई फ्रेंडली फाइट या सुलह का रास्ता निकले पर केजरीवाल स्वयं गडकरी के बड़े आलोचकों में शुमार होते हैं। सो, गडकरी ने बहुत सोच-विचार के बाद केजरीवाल से बात करने का जिम्मा भाजपा नेत्री मेनका गांधी को सौंपा है। पिछले दिनों गडकरी ने मेनका से अपने तीनर् मूत्ति आवास पर मृुलाकात की और उन्हें यह समझाने में कामयाब रहे कि केजरीवाल से सिर्फ और सिर्फ वही बात कर सकती हैं। गडकरी का कहना था कि कम से कम केजरीवाल के चार भाषणों में उन्होंने स्वयं आप प्रमुख के मुंह से मेनका गांधी की तारीफ सुनी है कि अगर सचमुच कोई दूसरे की सेवा करने वाली लीडर है तो वह मेनका गांधी है।

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