Archive | विशेष

…और अंत में

Posted on 26 April 2015 by admin

बिहार के ये आसन्न विधानसभा चुनाव मोदी-शाह जोड़ी के लिए अग्नि परीक्षा के सदृस हैं। भाजपा के अंदरूनी सर्वेक्षण में पसंदीदा नेताओं की सूची में सुशील मोदी रैंकिंग में बेतरह लुढ़क गए हैं। पर भाजपा के एक प्रमुख केंद्रीय नेता जिन्हें मोदी का सबसे ज्यादा विश्वास पात्र माना जाता है, वे लगातार मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए सुशील मोदी के नाम की परैवी कर रहे हैं। वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन और रवि शंकर प्रसाद इन दिनों मोदी के सबसे विश्वास पात्रों के तौर पर उभर कर सामने आए हैं, राधामोहन सिंह को कभी राजनाथ सिंह कैंप का एक मजबूत स्तंभ माना जाता था, पर सियासत में निष्ठा अक्सर समय सापेक्ष हुआ करती है, चुनांचे पिछले दिनों मोदी ने जिस तरह से राधामोहन सिंह की जी खोलकर तारीफ की उससे यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि बिहार चुनाव के संदर्भ में राधामोहन भी भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं, अगर एनडीए वहां बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े को छू पाता है।

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ब्रांड मोदी की चमक फीकी

Posted on 18 April 2015 by admin

ऐसे वक्त में जबकि ब्रांड मोदी की चमक किंचित फीकी पड़ी है, बिहार का आसन्न विधानसभा चुनाव टीम शाह के लिए नाक का सवाल बन गया है। भले ही लालू व नीतीश के दरम्यान तलवारें अब भी तनी हों, पर जाहिर तौर पर ये दोनों ही राग-एका गा रहे हैं। भाजपा ने बिहार में अभी अपना एक जनमत सर्वेक्षण करवाया है और अगर इन सर्वेक्षण के नतीजों पर गौर किया जाए तो लोकसभा चुनावों के वक्त बिहार में मोदी की लोकप्रियता का आंकड़ा कोई 82 फीसदी था, दस-ग्यारह महीनों के अंतराल में अब यह घटकर मात्र 64 फीसदी रह गया है। बिहार के जातीय व सामाजिक समीकरण फिलवक्त जनता परिवार के पक्ष में जाते दिख रहे हैं। राज्य के यादव, मुस्लिम, कुर्मी, महादलित और कुछ अगड़े वोटों का रूझान नीतीश-लालू की तरफ है और ये आंकड़े अकेले 50 फीसदी वोटों से ज्यादा के हैं। भाजपा में अंदरूनी खींचतान व घमासान ऊफान पर है और अगर अभी चुनाव हुए तो भाजपा को राज्य की 243 में से महज 96 सीटों पर ही संतोष करना पड़ सकता है।

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आनंद में सदानंद

Posted on 18 April 2015 by admin

जब से कार्य कुशलता और प्रबंधकीय कौशल को आधार बनाकर कर्नाटक के भगवा नेता सदानंद गौड़ा से रेल मंत्रालय लेकर उन्हें कानून की शरण में भेज दिया गया है, तब से मंत्री के तौर पर यकबयक गौड़ा साहब बेहद सक्रिय हो गए हैं। हालिया दिनों में उन्होंने सरकार और न्यायपालिका के बीच अच्छे संबंध बनाने की दिशा में महती पहल की है। वे नियमित तौर पर माननीय न्यायाधीशों का खैर मकदम कर रहे हैं, सरकार की ओर से संवाद सेतु बना रहे हैं, सूत्र बताते हैं कि जब इस दफे गुड फ्राइडे के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के तकरीबन 8 जजों ने प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित डिनर में जाने में अनिच्छा जताई तो गौड़ा अपनी निजी पहल से इनमें से छह को मनाने में कामयाब हो गए।

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…और अंत में

Posted on 18 April 2015 by admin

हर शै मोदी के रंग में रंगी और घुली-मिली भगवा राजनीति में इसे एक नई प्रस्फुटन की आहट मानी जा सकती है, पार्टी में मोदी विरोध की धुरी माने जाने वाले पार्टी के दो दिग्गज नेताओं लाल कृष्ण अडवानी और मुरली मनोहर जोशी को पुरस्कृत करने की तैयारी है। सूत्र बताते हैं कि मोदी ने स्वयं अडवानी को यह संप्रेषित किया है कि 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में वे एनडीए के उम्मीदवार होंगे, और अगर एक बार एनडीए अडवानी को अपना उम्मीदवार घोषित करता है तो यह रायसीना हिल्स पर लौह पुरुष के कब्जे का ऐलान माना जा सकता है। वहीं मोदी पार्टी के वरिष्ठ नेता जोशी को उप राष्ट्रपति के तौर पर पेश करना चाहते हैं, सनद रहे कि उप राष्ट्रपति पद का चुनाव भी 2017 में ही होना है, पर जोशी के लिए यह राह इतनी आसान नहीं होगी, क्योंकि गिनती बल में एनडीए को अभी विपक्षी दलों से रार लेनी होगी।

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लैंड बिल क्यों है जरूरी?

Posted on 12 April 2015 by admin

‘लैंड बिल’ मोदी सरकार के लिए उनकी नाक का सवाल बन गया है। सरकार के नियंताओं को निरंतर यह भय सता रहा है कि अगर भूमि अधिग्रहण बिल कानून की शक्ल अख्तियार नहीं कर पाया तो निवेशक बिदक जाएंगे। अगर बड़े और विदेशी निवेशकों की बात छोड़ भी दें तो जब से लैंड बिल पर पहली बार ऑर्डिनेंस आया उसके बाद से अभी तक बड़े सरकारी महकमों, रेलवे और डिफेंस ने भी किसी प्रकार की जमीन का अधिग्रहण नहीं किया है, बड़ी पॉवर कंपनियों और यहां तक कि राज्य सरकारें भी जमीनों के अधिग्रहण से बच रही है, ऑर्डिनेंस को लेकर उनका भरोसा नहीं जम रहा, इनकी चिंता है कि अगर यह ऑर्डिनेंस कानून की शक्ल अख्तियार नहीं कर पाया तो फिर उन्हें कई कानूनी पचड़ों से दो-चार होना पड़ सकता है। चुनांचे मोदी सरकार के लिए 20 अप्रैल से आरंभ हो रहे आगामी संसद सत्र में इसे पास कराना एक महती चुनौती साबित हो रही है।

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मौके नहीं देंगे मोदी

Posted on 12 April 2015 by admin

इस दफे ‘सिटी ऑफ लाईट्स’ यानी पेरिस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जोरदार स्वागत हुआ। प्रेसिडेंट ओलंदे की योजना मोदी को अपने साथ सीन नदी में नौका विहार करवाने की थी और उनके सम्मान में राजभवन में एक भव्य भोज देने की थी। वहीं पेरिस के मेयर एफिल टॉवर की सबसे ऊपरी मंजिल पर मोदी के सम्मान में एक भव्य डिनर देना चाहते थे, पर भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने मोदी के व्यस्त कार्यक्रमों का हवाला देते हुए ऐसे कार्यक्रमों में मोदी के शामिल होने की संभावनाओं पर विराम लगा दिया। दस लाख के सूट प्रकरण के बाद अब मोदी की इमेज को लेकर उनकी कोर टीम कहीं ज्यादा सचेत और सशंकित रहती है, इसीलिए पेरिस स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारियों को बेहद सख्त हिदायत दी गई थी वे मोदी के यूनेस्को वाले प्रोग्राम पर ज्यादा फोकस करे, जहां उन्हें श्री अरविन्द के बारे में बोलना था, इसके अलावा प्रधानमंत्री को शहीद भारतीय सैनिकों के उन स्मारकों पर भी जाना था जो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वीर गति को प्राप्त हुए थे।

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नहीं चला रावत का दांव

Posted on 15 March 2015 by admin

उत्तराखंड की एक राज्यसभा सीट कांग्रेस नेत्री मनोरमा शर्मा के आकस्मिक निधन से खाली हुई थी, मनोरमा शर्मा को राज्यसभा से लाने में हरीश रावत की एक महती भूमिका रही थी। जब यह सीट खाली हुई तो रावत यह सीट अपनी पत्नी को दिलवाना चाहते थे। सो, वे दिल्ली आकर सोनिया से मिले और उन्हें तर्क दिया कि चूंकि यह सीट एक महिला के निधन से रिक्त हुई है, सो यह किसी महिला को ही जानी चाहिए, पर राहुल व सोनिया की राय थी कि इस सीट से राज बब्बर को लाया जाना चाहिए, क्योंकि उनका पार्टी को काफी योगदान है। ऐसे में चाहकर भी रावत दिल की बात जुबां पर नहीं ला पाए और पार्टी के वफादार सिपाही की मानिंद राज बब्बर के राजदार हो गए।

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होश में आए दिनेश

Posted on 15 March 2015 by admin

पूर्व रेल मंत्री और पश्चिम बंगाल से तृणमूल सांसद दिनेश त्रिवेदी के भाजपा में शामिल होने की अटकलों पर विराम लग गया लगता है, त्रिवेदी से जुड़े सूत्र खुलासा करते हैं कि पिछले दिनों दिनेश त्रिवेदी ने अपने संसदीय क्षेत्र बैरकपुर में एक जनमत सर्वेक्षण करवाया कि अगर वे तृणमूल से इस्तीफा देकर भाजपा के टिकट पर बैरकपुर से पुन: लोकसभा का चुनाव लड़ते हैं तो उनका राजनैतिक भविष्य क्या होगा? जब इस सर्वेक्षण के नतीजे आए तो त्रिवेदी भौंचक रह गए, क्योंकि इन सर्वेक्षण नतीजों में उन्हें भाजपा के टिकट पर ढाई लाख मतों से चुनाव हारता हुआ दिखाया गया था। और यह भी स्पष्ट हुआ कि आज के हालात में भी पश्चिम बंगाल में ग्रामीण और मुस्लिम मतदाता एकजुटता के साथ ममता के साथ बने हुए हैं, कहना न होगा कि दिनेश त्रिवेदी को भी वस्तु स्थिति समझ में आ गई है।

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मंझधार में मांझी

Posted on 15 March 2015 by admin

बिहार में घटक दलों की बेजा मांगों से भाजपा की पेशानियों पर बल पड़ गए हैं, मोदी-शाह के टूटते तिलिस्म को आधार बना कर भाजपा के सहयोगी दलों ने अपनी मांगों की फेहरिस्त कहीं लंबी कर दी है, अकेले रामविलास पासवान अपनी पार्टी लोक जनशक्ति के लिए 40 सीटों से कम पर तैयार नहीं। उपेंद्र कुशवाहा भी दो कदम आगे बढ़कर 20 सीटों की मांग कर रहे हैं, वहीं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी अपने नवगठित पार्टी हिंदुस्तानी आवामी मोर्चा के लिए 35 सीटें मांग रहे हैं। भाजपा चाहती है कि मांझी अपने समर्थकों के साथ भगवा पार्टी में शामिल हो जाएं, पर इसके लिए मांझी तैयार नहीं, उनका कहना है कि वे उस सूरत में भाजपा में शामिल हो सकते हैं अगर पार्टी उन्हें अपने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करें। जाहिर है भाजपा इसके लिए कतई तैयार नहीं, सूत्र बताते हैं कि भाजपा की ओर से मांझी को संदेशा भिजवाया गया है कि उनकी पार्टी के लिए गठबंधन धर्म के तहत 15 सीटें छोड़ी जा सकती है, मांझी का इस पर कोई जवाब नहीं आया है।

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इल्मी का इल्म

Posted on 08 March 2015 by admin

जिन लोगों को ऐसा लगता है कि ऐन वक्त अरविन्द केजरीवाल का साथ छोड़कर और भाजपा का दामन थामकर शाजिया इल्मी ने बहुत बड़ी गलती की है, तो वे गफलत में है। मोदी सरकार में शाजिया का सिक्का खूब चल रहा है। सूत्र बताते हैं कि पिछले दिनों एक पार्टी में एक प्रमुख उद्योगपति ने शाजिया से कहा कि-‘अरविन्द का साथ छोड़कर आपने बड़ी गलती की, देखिए वे कहां से कहां पहुंच गए?’ इस पर शाजिया का जवाब था-‘नहीं, यहां मैं आराम से हूं, मेरा कोई काम नहीं रूक रहा, आपका भी कोई काम हो तो बताइए?’

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