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जगन से क्यों अलग हुई उनकी मां व बहन

Posted on 12 July 2022 by admin

पिछले कुछ समय से आंध्र में कयासों का बाजार गर्म था कि जगन मोहन रेड्डी के परिवार में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है, सोशल मीडिया पर भी जगन और उनकी बहन शर्मिला रेड्डी के बीच मनमुटाव की खबरें अक्सर बाहर आ रही थीं। जगन की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस के निर्माण में उनकी मां वाईएस विजयालक्ष्मी और बहन शर्मिला की एक महती भूमिका रही है। जगन जब जेल में थे तो मां-बेटी ने ही मिल कर पार्टी संगठन की बुनियाद रखी थी। जब शर्मिला ने देखा कि भाई की बरगद शख्सियत के आगे उनके लिए आंध्र की राजनीति में करने के लिए कुछ नहीं बचा है तो उन्होंने तेलांगना में अपनी एक नई पार्टी वाईएसआर सीपी का गठन कर लिया, जहां अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। वहीं अभी जगन की मां वाईएसआर विजयालक्ष्मी ने भी पार्टी के मानद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है और वह भी अपनी बेटी के पास तेलांगना शिफ्ट हो गई है। मां के इस्तीफे के बाद जगन का उनकी पार्टी पर पूर्णरूप से एकाधिकार और नियंत्रण हो गया है। बीते सप्ताह गुंटूर में पार्टी की दो दिवसीय बैठक में एक मसौदा तैयार किया गया है जिसके तहत जगन मोहन पार्टी के आजीवन अध्यक्ष बने रह सकते हैं। 2019 में जगन की पार्टी ने आंध्र में एक शानदार जीत अर्जित की थी, जीत इतनी बड़ी थी कि उसने प्रमुख विपक्षी दल तेलुगू देशम की संभावनाओं पर भी पूरी तरह ग्रहण लगा दिया। शायद इसीलिए मोदी ’डायनेस्टी मुक्त भारत’ के उद्घोष में लगे हैं।

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कौन बनेगा अगला उप राष्ट्रपति

Posted on 12 July 2022 by admin

सियासत जब नेपथ्य की प्रतिध्वनियों से श्रृंगार करती है तो वह कई अप्रत्याषित फैसले लेकर हमें चैंका भी सकती है। पिछले दिनों नुपुर शर्मा मामले को लेकर देश दुनिया में जो भारत का निगेटिव नैरेटिव बना है, उसमें उदयपुर और महाराष्ट्र की घटनाओं ने आग में घी डालने का काम किया है और सुप्रीम कोर्ट ने जिस शिद्दत से नुपुर शर्मा और उसके वकीलों को फटकार लगाई है वह भी लोकतंत्र के एकबाल का ऐलान ही है। सूत्र बताते हैं कि भाजपानीत एनडीए इस बात पर गंभीरता से विचार कर रहा है कि ’क्यों नहीं देश के अगले उप राष्ट्रपति के तौर पर केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के नाम को आगे किया जाए।’ हालिया रामपुर उप चुनाव में भाजपा प्रत्याशी घनश्याम लोधी को जिताने का भी कुछ हद तक सेहरा नकवी के सिर बांधा जा रहा है। कहा जा रहा है कि नकवी के प्रयासों से बड़े पैमाने पर मुसलमानों ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया, और कई मुस्लिम बहुल्य गांव जैसे लालपुर, बिजड़ा, चमरौआ व दबका आदि में भाजपा की जीत हुई। रामपुर में 55 फीसदी से ज्यादा आबादी अल्पसंख्यक समुदाय की है। अभी पिछले दिनों संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में भी सपा यहां भाजपा से काफी आगे रही थी, इन चुनावों में यहां भाजपा को 4 लाख तो सपा को लगभग साढ़े पांच लाख वोट मिले थे। पर इस उप चुनाव में यहां भाजपा ने बाजी पलट दी, सपा प्रत्याशी आसिम रज़ा को इस उप चुनाव में मात्र 3.25 लाख वोट मिल सके जबकि भाजपा प्रत्याशी घनश्याम लोधी को 3.67 लाख वोट मिले। नकवी अब से पहले भाजपा के एकमात्र ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने रामपुर लोकसभा में जीत दर्ज की है। जब पिछले साल देश कोरोना संक्रमण से जूझ रहा था और मुसलमान कोरोना का टीका लगवाने को तैयार नहीं थे, तब नकवी ने रामपुर में ’जान है तो जहान है’ मुहिम चलाई। इसका असर हुआ कि रामपुर की मस्जिदों से ऐलान किया गया कि ’मुसलमान टीका जरूर लगवाएं,’ इसके बाद कोरोना वैक्सीन लेने के लिए अस्पतालों में मुस्लिम समुदाय की भीड़ लग गई।

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अब क्या होगा यशवंत का

Posted on 12 July 2022 by admin

राष्ट्रपति चुनाव में संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा की हालत खासी पतली नज़र आ रही है। वैसे भी इतिहास गवाह रहा है कि राष्ट्रपति पद के विपक्षी उम्मीदवारों ने अब तलक 30-32 फीसदी वोट जुटा ही लिए हैं, एपीजे अब्दुल कलाम के वक्त चूंकि उन्हें 90 फीसदी वोट मिल गए थे तो विपक्षी उम्मीदवार लक्ष्मी सहगल की उम्मीदवारी बेमतलब रह गई थी। यही हाल इस बार यशवंत सिन्हा का लग रहा है, उनकी प्रस्तावक ममता बनर्जी तक ने कह दिया कि ’अगर उन्हें पहले से पता होता कि एनडीए एक आदिवासी महिला उम्मीदवार उतार रहा है तो वह उन्हीं का समर्थन करतीं।’ यहां तक कि यशवंत के पुराने मित्र सोरेन परिवार, देवेगौड़ा परिवार, मायावती, अकाली ये सभी द्रौपदी मुर्मू का समर्थन कर रहे हैं। शिवसेना के भी 40 विधायक टूट कर एनडीए के साथ चले गए हैं, सो वहां भी यशवंत के वोट कम हो गए हैं। पर तेलांगना के मुख्यमंत्री केसीआर यशवंत के समर्थन में अडिग खड़े हैं वे देशभर में घूम-घूम कर समर्थन जुटाने के लिए यशवंत के लिए जहाज भी मुहैया करा रहे हैं। अभी 2-3 जुलाई को भाजपा की दो दिवसीय कार्यकारिणी तेलांगना में आहूत थी, पूरे तेलांगना में भाजपा की सौजन्य से पोस्टर लगे थे-’डायनेस्टी मुक्त भारत’। वैसे भी तेलांगना में केसीआर का मुख्य मुकाबला भाजपा से ही है। नायडू की पार्टी लगातार नेपथ्य में जा रही है। ओवैसी की वजह से भी लगातार यहां भाजपा का उदय हो रहा है। 18 साल बाद भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हैदराबाद में हो रही है। यहां अगले साल चुनाव है, पिछले चुनाव में यहां की 119 सीटों में से केसीआर की टीआरएस को 88 और भाजपा को महज़ 1 सीट, कांग्रेस को 19, तेदेपा को 2 और ओवैसी की पार्टी को 7 सीटें मिली थीं। भाजपा हैदराबाद का नाम बदल कर भाग्य नगर रखने को कृतसंकल्प जान पड़ती है। सो केसीआर की पूरी कोशिश है कि यशवंत 2024 के चुनाव में विपक्षी एका के सूत्रधार बन कर उभरे, राष्ट्रपति चुनाव की सारी कवायद भी तो बस इसके लिए ही जान पड़ती है।

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अध्यक्ष बनने से क्यों इंकार कर रहे हैं राहुल?

Posted on 12 July 2022 by admin

’सिर्फ इसीलिए आंधियों ने हर मुमकिन तुझे डराया होगा
एक दीया रौशन जो तेरी आंखों में उसे नज़र आया होगा’

राहुल गांधी सुप्त प्रायः कांग्रेस में एक नई जान फूंकने की मशक्कत में जुटे हैं, ड्राईंग रूम से निकल कर कांग्रेसी नेतागण सड़क पर उतरने की हिम्मत दिखा रहे हैं, पर बावजूद इसके राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष पद का कांटों भरा ताज अपने सिर पर रखने को तैयार नहीं। गांधी परिवार से जुड़े सूत्र खुलासा करते हैं कि राहुल ने अपनी ओर से अध्यक्ष पद के लिए दो नाम सामने रखे हैं, इनमें से एक नाम राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का है, दूसरा नाम उन्होंने अपनी बहन प्रियंका का आगे किया है। अशोक गहलोत राजस्थान छोड़ना नहीं चाहते, वे जानते हैं कि एक बार जो उन्होंने गद्दी खाली की तो सचिन पायलट की उड़ान को फिर कोई रोक नहीं सकता, सो गहलोत भी इस बात की वकालत में जुटे हैं कि अध्यक्ष तो राहुल को ही होना चाहिए, अगर वे इसके लिए एकदम तैयार नहीं हैं तो फिर यह बागडोर प्रियंका को सौंपी जा सकती है। लेकिन सोनिया गांधी की राय इस मामले में थोड़ी अलग दिख रही है, सोनिया की अंत तक कोशिश यही रहेगी कि राहुल पार्टी संभाले बतौर अध्यक्ष, अगर राहुल इस पर नहीं मानते हैं तो ऐसी सूरत में सोनिया गांधी इस जिम्मेदारी की निरंतरता को धार दे सकती हैं यानी फिलहाल अध्यक्षीय कुर्सी वह अपने पास ही रख सकती हैं। राहुल अध्यक्षीय जिम्मा लेने से हिचकिचा रहे हैं तो उन्हें जानने वाले इसकी दो मुख्य वजह बता रहे हैं, एक तो उन्हें लगता है कि नेशनल हेराल्ड मामले में कभी भी चार्जशीट आ सकती है और ईडी उन्हें गिरफ्तार करने की हद तक जा सकती है। उनकी दूसरी चिंता कांग्रेस के अपने चुनाव विश्लेषक सुनील कानूगोलू की वह रिपोर्ट है जिसमें वे हालिया विधानसभा चुनावों और 2024 के आम चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर सवाल उठा रहे हैं। जो भी हो इस मामले में आखिरी फैसला तो राहुल का ही होगा जो भारतीय सियासत की गंभीरता को किंचित अब समझने लगे हैं।

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ईडी की पूछताछ में मज़े में हैं राहुल

Posted on 12 July 2022 by admin

राहुल गांधी ईडी की पूछताछ में बेहद संयत और षांत नज़र आ रहे हैं। उस कमरे में जहां नेशनल हेराल्ड के मामले में राहुल से पूछताछ होती है, इस काम को ईडी के तीन अफसर अंजाम देते हैं। राहुल गांधी कुछ इतने इत्मीनान से सवालों के जवाब देते हैं कि ’अक्सर सवाल पूछने वाले अफसर थक जाते हैं, पर राहुल के लबों पर मुस्कान बनी रहती है। अधिकारी स्वयं अपनी सुविधा के लिए पूछताछ के बीच एक-एक कर ब्रेक ले लेते हैं।’ यह बात पूछताछ के तीसरे दिन की है, राहुल ने अभी-अभी अपना लंच खत्म किया है और उन्होंने अफसरों से इजाजत मांगी कि उन्हें बाथरूम जाना है। इस पर एक अफसर ने मुस्कुराते हुए राहुल से जानना चाहा कि ’वे पिछले कुछ समय से गौर कर रहे हैं कि खाना खाने के तुरंत बाद वे बाथरूम चले जाते हैं और वहां आधा घंटा लगा देते हैं,’ उस अफसर ने हंसते हुए राहुल से पूछा कि ’क्या आप वहां सिगरेट पीने जाते हैं?’ इस सवाल का जवाब भी राहुल ने मुस्कुराते हुए दिया-’हां, लंच-डिनर के बाद एक सिगरेट सुलगा लेता हूं, इससे मेरा स्ट्रेस कम होता है।’ यह तो हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली बात हो गई।

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पवार किधर हैं?

Posted on 12 July 2022 by admin

महाराष्ट्र में महाअघाड़ी गठबंधन की सरकार बनवाने में एनसीपी नेता शरद पवार की एक महती भूमिका रही है, पर ताजा महाराष्ट्र संकट के दौरान पवार की निष्क्रियता संदेह पैदा करने वाली है। जैसे ही उद्धव सरकार के समक्ष संकट पैदा हुआ तो पत्रकारों ने पवार से पूछा कि ’इस संकट को मद्देनज़र रखते वे उद्धव से कब मिलेंगे,’ तो पवार का जवाब था कि ’अभी वे राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष का उम्मीदवार तय करने में व्यस्त हैं,’ फिर उन्होंने आगे कहा कि ’उद्धव अगर समय देंगे तो मिल लूंगा’, पर उन्होंने अपनी बातों में एक बात और जोड़ दी कि ‘यह शिवसेना का अंदरूनी मामला है।’ दिलचस्प तो यह है कि जब तक उद्धव ने अपना आधिकारिक सीएम आवास ’वर्षा’ छोड़ नहीं दिया तब तक पवार अपने ‘कुकुन’ से बाहर नहीं निकले। सूत्रों की मानें तो इस पूरे घटनाक्रम में पवार की चिंता अपनी पार्टी को लेकर थी, उन्हें सूचना मिल चुकी थी कि भाजपा की नज़र एनसीपी में भी दोफाड़ पर है, सो पवार पूरा समय अपने कुनबे को बचाए रखने की जुगत भिड़ाते रहे।

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जो सवाल वरुण ने उठाए, देश से मिला जवाब

Posted on 19 June 2022 by admin

’यह एक चिराग भी आंधियों के खिलाफ ऐलान हो सकता है
सोई कौमें जाग जाएं तो हर बच्चा हिंदुस्तान हो सकता है’

भाजपा के अपने ही सांसद वरुण गांधी ने जब देश के करोड़ों बेरोजगार युवकों के हक की लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठाया तो कम ही लोगों को इस बात का इल्म रहा होगा कि इसकी परिणति ’अग्निपथ’ की आग हो सकती है। आज से कोई महीने भर पहले ही वरुण ने ट्वीट कर इसकी अलख जगाई, इस युवा सांसद ने कहा-’बिना कारण रिक्त पड़े पद, लीक होते पेपर, सिस्टम पर हावी होता शिक्षा माफिया, कोर्ट-कचहरी और टूटती उम्मीदें। छात्र अब प्रशासनिक अक्षमता की कीमत भी स्वयं चुका रहा है। चयन सेवा आयोग कैसे बेहतर हो, परीक्षाएं कैसे पारदर्शी एवं समय पर हो, इस पर आज और अभी से काम करना होगा। कहीं देर ना हो जाए।’ इस ट्वीट के एक सप्ताह बाद वरुण एक ट्वीट और करते हैं और कहते हैं-’जब बेरोजगारी 3 दशकों के सर्वोच्च स्तर पर है तब यह आंकड़े चौंकाने वाले हैं। जहां भर्तियां न आने से करोड़ों युवा हताश और निराश हैं, वहीं सरकारी आंकड़ो की ही मानें तो देश में 60 लाख स्वीकृत पद खाली हैं। कहां गया वो बजट जो इन पदों के लिए आबंटित था? यह जानना हर नौजवान का हक है।’ इसके साथ वरुण ने केंद्र व राज्य सरकारों के विभाग और संस्थानों में रिक्त पड़े 60 लाख पदों का एक ब्यौरा पेश किया है। वरुण ने बीपीएससी में हुई धांधली को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी एक पत्र लिखा। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को आरआरबी व एनटीपीसी परीक्षाओं को लेकर भी चिट्ठी लिखी। इसी बीच सत्ता शीर्ष की ओर से 10 लाख नौकरियां देने का ऐलान आया और उसके पीछे दबे पांव चलती ’अग्निपथ स्कीम’ भी अपने जामे से बाहर आई। इसको लेकर वरुण ने देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिख कर कहा-’अग्निपथ योजना को लेकर देश के युवाओं के मन में कई सवाल हैं। युवाओं को असमंजस की स्थिति से बाहर निकालने के लिए सरकार अति शीघ्र योजना से जुड़े नीतिगत तथ्यों को सामने रख कर अपना पक्ष साफ करे। जिससे देश की युवा ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग सही दिशा में हो सके।’ पर तब तक अग्निपथ योजना का विरोध हरियाणा, यूपी, बिहार, महाराष्ट्र समेत 16 राज्यों में फैल चुका था, युवा आक्रोश धू-धू कर जलने लगा था, हिंसा पर उतारू युवाओं से शांति की अपील करते वरुण ने अभी अपना एक ताजा वीडियो जारी कर उनसे शांत रहने की अपील की है, पर वरुण ने केंद्र सरकार की पेशानियों पर बल तो ला ही दिए हैं।

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आजमगढ़ में सपा की सीट बचाने की मशक्कत

Posted on 19 June 2022 by admin

अखिलेश यादव ने जिन लम्हों में अपना आजमगढ़ लोकसभा सीट छोड़ने का फैसला लिया होगा उन्हें शायद ही इस बात का इल्म कहीं शिद्दत से हुआ होगा कि भाजपा आजमगढ़ की लड़ाई को उनके लिए इस कदर मुश्किल बना देगी। आजमगढ़ जिले की दस की दस सीटें सपा के कब्जे में हैं जहां उसके अपने एमएलए हैं बावजूद इसके इस सीट को बचाने के लिए सपा को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। सपा का पहला दांव ही डगमगाने वाला है, स्थानीय कार्यकर्ता चाहते थे कि यहां से पार्टी रमाकांत यादव को मैदान में उतारे जो कि एक स्थानीय नेता हैं। पर अखिलेश ने अपने परिवार से धर्मेंद्र यादव को मैदान में उतार दिया है। वहीं बीएसपी ने सपा का खेल बिगाड़ने के लिए एक बिल्डर शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को मैदान में उतार दिया है जो मुसलमानों के बीच एक लोकप्रिय चेहरा हैं, अगर वे ठीक-ठाक मुस्लिम वोट काटने में सफल हो जाते हैं तो सपा की साइकिल यहां डगमगा सकती है। पर प्रारंभिक रुझानों से पता चलता है कि इस बार मुसलमान भी हाथी के साथ जाने से हिचक रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि बहिनजी पर्दे के पीछे से भाजपा के लिए ही खेलती हैं। नूपुर शर्मा के बयान पर इस शुक्रवार को जुम्मे की नमाज के बाद जिस तरह मुस्लिम समुदाय ने उग्र प्रतिक्रिया दी है उससे नहीं लगता कि वे जाने-अनजाने कोई भी ऐसा कदम उठाएंगे जिससे भाजपा को फायदा मिले। पर लगता है दिनेष लाल निरहुआ अपने सजातीय यादव वोटरों को तोड़ने में जरूर कुछ हद तक कामयाब हो सकते हैं। अखिलेश की मासूम नादानियों ने आजमगढ़ के उप चुनाव को यकीनन दिलचस्प बना दिया है।

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क्या फिर से टल गई है राहुल की ताजपोशी?

Posted on 19 June 2022 by admin

’तेरी चाहतों का इस कदर असर है, तेरे सिवा कोई और नहीं जहां तक ये सहर है
ज़िद है कि तेरे लिए फलक से चांद तोड़ लाऊं, जमीं से आसमां का जो ये सफर है’

कहां तो तय था कि 22 अगस्त को राहुल गांधी बतौर अध्यक्ष कांग्रेस पार्टी की कमान संभाल लेंगे, गांधी परिवार के वफादारों ने इस बात की पुख्ता व्यवस्था की हुई थी कि कैसे पार्टी की संवैधानिक मान्यताओं की परिपाटी पर चलते हुए राहुल को पार्टी का निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित करवा लिया जाएगा। विरोध के बागी स्वरों को पहले ही सोनिया गांधी ने पार्टी के विभिन्न फोरम पर ‘एडजस्ट‘ करना शुरू कर दिया है। पर अभी-अभी गुजरात और हिमाचल की विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टी के लिए एक एजेंसी ने जो जनमत सर्वेक्षण करवाए हैं उसके नतीजों ने गांधी परिवार की मंशाओं को झकझोर दिया है। इस जनमत सर्वेक्षण के प्रारंभिक रुझानों में कांग्रेस इन दोनों प्रदेशों में बेतरह पिछड़ती नज़र आ रही है। सूत्र बताते हैं कि इस बात का सबसे पहले सोनिया गांधी ने संज्ञान लिया है, वह नहीं चाहती कि राहुल अगस्त में पार्टी की कमान संभाले और दिसंबर माह में हो रहे चुनावों की हार का ठीकरा उनके मत्थे फोड़ दिया जाए, सो सोनिया का आग्रह है कि राहुल कर्नाटक चुनाव से पहले पार्टी की बागडोर संभालें, कर्नाटक में पार्टी को उम्मीद है कि कांग्रेस भाजपा से बेहतर प्रदर्शन करेगी, सो इसका श्रेय राहुल के उत्साही नेतृत्व को दिया जा सकेगा। दूसरी ओर प्रियंका गांधी हैं, जिनकी सोच है कि दिसंबर के विधानसभा चुनावों में तमाम पोस्टर से लेकर परचमों तक राहुल होंगे, कांग्रेस की सोच, उनकी नीतियों और रैलियों के केंद्र में राहुल ही होंगे, सो राहुल चाहे पार्टी के अध्यक्ष हों या ना हों इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, हार-जीत का सेहरा उन्हें ही लेना होगा, तो फिर अध्यक्ष बन कर क्यों न इस चुनौती को स्वीकार किया जाए। प्रियंका ने पार्टी फोरम पर भी जोर देकर कहा है कि कांग्रेस को अध्यक्षीय चुनाव नहीं टालने चाहिए, इस बारे में अंतिम कॉल राहुल को ही लेना है।

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मंत्री जी को इंटरव्यू देना महंगा पड़ा

Posted on 19 June 2022 by admin

पिछले दिनों केंद्रीय विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने एक अंतरराष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका को अपना लंबा इंटरव्यू दिया, जो भारत की विदेश नीति खास कर क्वाड और यूक्रेन मुद्दे को लेकर था। कहते हैं जैसे यह इंटरव्यू पीएमओ की संज्ञान में आया, उन्हें तलब कर कहा गया कि ’भले ही आप विदेश मंत्री हों पर भारत की आधिकारिक विदेशी नीति पर बोलने या इंटरव्यू देने से पहले आपको पीएमओ की मंजूरी लेनी चाहिए थी, क्योंकि यह पीएम का विशेषाधिकार है।’ विदेश मंत्री को हिदायत दी गई कि वे फौरन अपना इंटरव्यू छपने से पहले उसे कैंसिल करें। हैरान मंत्री ने फौरन उस साप्ताहिक पत्रिका के इंडिया हेड से बात की, पर पत्रिका वह इंटरव्यू रोकने के लिए तैयार नहीं हुई। तो फिर न्यूयॉर्क स्थित काउंसलेट जनरल को आगे आना पड़ा वे भागे-भागे पत्रिका के दफ्तर में पहुंचे और उसके एडिटर इन चीफ से मान मुनौव्वल की। बड़ी मुश्किल से उन्होंने पत्रिका के प्रधान संपादक को इस इंटरव्यू के प्रकाशित होने से रोकने के लिए मनाया। फिर नाराज़ संपादक ने कहा वे भले ही इंटरव्यू रोक रहे हैं, पर कोई उन्हें यह ट्वीट करने से नहीं रोके कि इस मामले में भारत और चीन की नीतियों में कोई फर्क नहीं है।

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