Posted on 27 November 2011 by admin
नीरा राडिया कीे वैष्णवी कम्यूनिकेशंस पर भले ही आधिकारिक तौर पर ताला जड़ गया हो पर सुनने में आ रहा है कि इस कंपनी को मुकेश अंबानी ने खरीद लिया है। इसमें काम कर रहे ज्यादातर लोग मुकेश के साथ चले गए हैं। देश के कई नामधन्य बड़े टीवी पत्रकार जो इस कंपनी से उपकृत होते रहे हैं अब वे भी बड़े अंबानी से उपकृत होने को तैयार हैं।
Posted on 27 November 2011 by admin
देश के एक तेज-तर्रार अंग्रेजी दैनिक के संपादक वर् कत्तार्-धत्ता ने हालिया दिनों में लंदन के एक सबसे महंगे इलाके पार्क लेन में एक आलीशान अपार्टमेंट खरीदा है। समझा जाता है कि दूसरों की पोल खोलने में माहिर इस संपादक महोदय ने यह महंगा अपार्टमेंट लंदन में रह रहे अपने बेटे को ‘बर्थ डे’ के उपहार के तौर पर दिया है। सुना तो यह भी जा रहा है कि इस अपार्टमेंट की पेमेंट देश के एक शीर्ष औद्योगिक घराने के सौजन्य से हुई है।
Posted on 27 November 2011 by admin
अडवानी के लाडले सुधीन्द्र कुलकर्णी कैश फॉर वोट मामले में जेल से पहले ही आजाद हो चुके हैं, अब उनके लिए उनकी सियासी वर्जनाओं से आजाद होने का वक्त आ गया है। यूं तो कुलकर्णी महाराष्ट्र- कर्नाटक के सीमावर्ती इलाके से आते हैं, पर महाराष्ट्र से उनका रिश्ता कहीं गहरा है। उनकी डाक्टर पत्नी और उनका परिवार अब भी मुंबई में रहता है। सो, कुलकर्णी इस बात को लेकर इन दिनों खासे उत्साहित हैं कि उन्हें भाजपा ने राज्यसभा में लाने का पूरा मन बना लिया है, वह भी महाराष्ट्र से। इसके लिए कुलकर्णी को अडवानी व गडकरी दोनों का ही शुक्रगुजार होना चाहिए।
Posted on 27 November 2011 by admin
2002 गुजरात दंगों की जांच कर रहे जस्टिस नानावटी के बेटे मौलिक नानावटी की तो बस चांदी ही चांदी है। गुजरात सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपीयर होने के लिए उन्हें 2 लाख रुपए रोज के मिलते हैं, सप्ताह में कम से कम दो दिन तो सुनवाई होती ही है। सो, महीने के इनके करीब 15-20 लाख रुपए बन ही जाते हैं। और यह सिलसिला कई सालों से चल रहा है। यानी एक जूनियर वकील को गुजरात सरकार कोई पौने दो करोड़ रुपए सालाना दे रही है। मगर क्यों यह भी कोई पूछने की बात है?
Posted on 27 November 2011 by admin
यूपी में भाजपा प्रत्याशियों की लिस्ट घोषित होने में देरी से भले ही पार्टी के अंदर असंतोष कुलबुला रहा हो, पार्टी के दिग्गज नेता राजनाथ सिंह का साफ मानना है कि उम्मीदवारों की लिस्ट 10 जनवरी से पहले घोषित न की जाए। राजनाथ 25 दिसंबर को अटल जी के जन्मदिन के मौके पर लखनऊ में भाजपा की एक बड़ी रैली आयोजित कर रहे हैं जिसमें पार्टी के तमाम कद्दावर नेता हिस्सा लेंगे। सो, राजनाथ का मानना है कि अगर इससे पहले उम्मीदवारों की घोषणा हो जाएगी तो ये सभी उम्मीदवार अपने संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों में जुट जाएंगे तो फिर रैली के लिए भीड़ कौन जुटाएगा? और जिन लोगों को पार्टी का टिकट नहीं मिलेगा वे रैली की जड़ में मट्ठा डालने में जुट जाएंगे। गडकरी व संघ भी राजनाथ की दलीलों से सहमत हैं और जो नहीं सहमत हैं वे ठहरे पार्टी के मामूली से कार्र्यकत्ता उनके मंसूबों से किसी का बाल बांका हुआ है कभी।
Posted on 27 November 2011 by admin
यूपी भाजपा के एक दबंग नेता रमाकांत यादव अपने 9 लोगों की लिस्ट लेकर पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से मिलने पहुंचे तो गडकरी ने उन्हें अपने मानव कंप्यूटर अरूण नरेंद्रनाथ के पास भेज दिया। नरेंद्रनाथ के लेपटॉप में बटन दबाओ और इच्छुक निर्वाचन क्षेत्र की 5 टर्म की कुंडली पेश हो जाती है। निर्वाचन क्षेत्र का डेमोग्राफिक चार्ट, वहां के जातिगत समीकरण, इच्छुक उम्मीदवारों की लंबी-चौड़ी सूची, उम्मीदवारों का विवरण, मतों का गणित आदि-आदि। सो, जब नरेंद्रनाथ यादव जी को समझाने लगे कि फलां सीट पर यादव उम्मीदवार देना संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि वहीं भूमिहारों-ब्राह्मणों का वर्चस्व है तो वे उखड़ गए और पांव पटकते हुए वापिस आ गए। रमाकांत यादव ने पार्टी हाईकमान से साफ कर दिया है कि उनके इलाके में कंप्यूटर से चुनाव नहीं लड़ा जाता और जिससे लड़ा जाता है उसे ‘डंडा’ कहते हैं।
Posted on 27 November 2011 by admin
भगवा राजनीति में कॉरपोरेट शैली के प्र्रवत्तक राजनेता गडकरी सातवें आसमान पर हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने की अपनी इच्छा को सार्वजनिक कर भाजपा की अंदरूनी सियासत में तूफान ला दिया है। अब सवाल सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि वे अगला लोकसभा चुनाव नागपुर से लड़ेंगे या वर्धा से। नागपुर उनकी कर्मस्थली रही है। परचूनी के धंधे से लेकर पोस्टर चिपकाने का उपक्रम उन्होंने वहीं साधा है। गोया कि संघ का मुख्यालय भले ही नागपुर में रहा हो पर भाजपा कभी भी यहां से (1996 को छोड़कर) लोकसभा चुनावों जीत दर्ज नहीं करा पाई है। सो, राजनीति के चतुर सुजान गडकरी जानते हैं कि अगर उन्हें नागपुर से लड़ना है तो उन्हें कांग्रेसी दांव-पेंच आजमाने ही होंगे। यूं भी नागपुर से चुनाव लड़ना खासा महंगा उपक्रम है। आमजौर पर यहां प्रति चुनाव 6 से 7 करोड़ रुपए खर्च होते आए हैं लिहाजा सटोरियों ने अभी से इस बात पर सट्टा लगाना शुरू कर दिया है कि अगर गडकरी यहां से चुनाव लड़ते हैं तो थैली का मुंह और कितना खुलेगा? क्योंकि गडकरी थैली की बोली को समझते हैं और इसके प्रबंधन में भी उन्हें महारथ हासिल है। गडकरी जब भाजपा-शिवसेना की महाराष्ट्र सरकार में लोक निर्माण मंत्री थे तो इंफ्रास्ट्रक्चर की कई बड़ी योजनाएं लेकर नागपुर आए थे। पर नागपुर में गडकरी को मंझे कांग्रेसी नेता विलास मुत्तेमवार का सामना करना पड़ सकता है। लिहाजा उनकी नजर पास की वर्धा सीट पर भी है। जहां पिछले चुनाव में भाजपा के सुरेश वाघमारे दत्ता मेघे के हाथों चित हो गए थे। वैसे भी वाघमारे की गडकरी से कभी पटी नहीं और कांग्रेसी दत्ता मेघे गडकरी के अभिन्न मित्रों में से रहे हैं। और अभी हाल ही में दत्ता मेघे ने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। जानने वाले जानते हैं कि दत्ता ने यह कदम आखिरकार उठाया क्यों? सो, अगला लोकसभा चुनाव गडकरी के लिए एक निर्णायक पेनेल्टी किक के मानिंद है। उनका रूख, बॉडी लैंग्वेज भले ही नागपुर की ओर हो पार्टी में अपने चिरंतन विरोधियों को चकमा देते हुए दरअसल वे अपनी जीत का निर्णायक गोल तो वर्धा में ही दाग सकते हैं। यह उनकी अदा भी है और सियासी मजबूरी भी।
Posted on 27 November 2011 by admin
जब से लोकसभा व राज्यसभा टीवी का प्रादुर्भाव हुआ है, सदन की तस्वीर जस की तस लोगों के सामने है। सो, ऐसे में अपने मेगा धारावाहिकों का मोह छोड़कर फिल्म व्यवसाय के क्षेत्र में ‘रागिनी एमएमएस’ और ‘डर्टी’ पिक्चर जैसी कथित साफ्ट पॉर्न फिल्में लेकर मैदान में उतरीं एकता कपूर को एक नायाब आइडिया आया। उन्होंने अपने ‘डर्टी’ पिक्चर के हीरो इमरान हाशमी को प्रचार व पब्लिसिटी के लिए सीधे पार्लियामेंट हाउस ही भेज दिया। वह तो शुक्र मनाइए भाजपा नेता स्मृति इरानी का जिनके जोरदार विरोध के बाद ‘किसिंग हीरो’ के नाम से ख्यात हाशमी को उल्टे पांव लौटना पड़ा नहीं तो वे अपने ‘डर्टी इरादों’ की झलक पार्लियामेंट में दिखा ही जाते।
Posted on 27 November 2011 by admin
इस लिस्ट पर भले ही इतने सौदे-मसौदों का बाजार लग चुका है, पर सरकार इन 792 भारतीयों का नाम सार्वजनिक करने से कतरा रही है। कारण चाहे जो भी हो। पर इस बारे में सरकारी बहाने निहायत ही बचकाने हैं। भारत सरकार कहती है कि फ्रांस और भारत के बीच डबल टैक्सेशन ट्रीटी है, लिहाजा हम इन भारतीयों के नाम सार्वजनिक नहीं कर सकते। पर किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के इन पैसों को डबल टैक्सेशन सिस्टम से क्या लेना-देना, क्योंकि अव्वल न तो यह पैसे बिजनेस कर फ्रांस में कमाए गए हैं और न ही इन 792 भारतीयों का फ्रांस के साथ कोई व्यापारिक लेन-देन का कारोबार है। यह पैसा तो शुध्द रूप से भारत का है जो टैक्स बचाने की खातिर विदेशी बैंकों में जमा है। भारत सरकार का तर्क है कि डबल टैक्सेशन ट्रीटी में आरोपियों के नाम उसी सूरते हाल में सामने लाए जा सकते हैं जब उन्हें दंडित किया जा रहा हो, अब यह तो मनमोहन सरकार ही जाने कि ब्लैक मनी के आरोपियों को बचाने में उसकी इतनी दिलचस्पी क्यों है?
Posted on 27 November 2011 by admin
सूची प्राप्त होते ही वित्त मंत्रालय हरकत में आ गया। आनन-फानन में एक टीम गठित की गई, वित्त मंत्रालय में पदस्थ एडवाइजर स्तर के एक उच्च पदस्थ अधिकारी को इस पूरे ऑपरेशन की बागडोर सौंपी गई। इस टीम ने इस लिस्ट को आधार बनाकर देशव्यापी छापे डाले। सबसे ज्यादा छापे मुंबई और गुजरात में डाले गए। गुजरात के कई डायमंड मचर्ेंट इन छापों की जद में आ गए। अब दिल्ली की बारी है। पकड़े जा रहे लोगों से कहा जा रहा है कि वह 35 फीसदी की दर से रिवाइज्ड रिटर्न फाइल करें अन्यथा उन्हें फेमा, प्रिवेंशन ऑफ मनी लांडरिंग एक्ट एवं इंकम टैक्स एक्ट के तहत बुक किया जा सकता है। इसमें महज रिवाइज्ड रिटर्न फाइल कर देने से ही काम नहीं चल रहा है, कथित तौर पर अधिकारियों की जेबें भी गर्म हो रही हैं। पर कुछ के वकीलों ने पंगा खड़ा कर दिया है कि कहीं कुछ भी टैक्स जमा कराने की जरूरत नहीं है, आखिर इस लिस्ट की विश्वसनीयता क्या है? पर ऐसे लोगों पर सरकार सख्ती बरतने का मूड बना चुकी है।