Posted on 15 May 2011 by admin
कांग्रेस के लिए असम में दिग्विजय सिंह और परवेज हाशमी की जोड़ी लकी साबित हुई, जहां दिग्विजय मुसलमानों के नए रहनुमा बनकर उभरे हैं, वहीं हाशमी की छवि एक अपेक्षाकृत उदारवादी नेता की रही है, खासकर वे हिंदू वोटरों में ज्यादा लोकप्रिय रहे हैं, हाशमी की पत्नी भी हिंदू ब्राह्मण परिवार से हैं। हाशमी को राजनीति में आगे बढ़ाने का श्रेय कांग्रेस के सर्वशक्तिमान अहमद पटेल को जाता है, जबकि पटेल व दिग्विजय में छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। ऐसे में हाशमी सियासत के दो परस्पर विरोधी धु्रवों के बीच संतुलन साधने की बाजीगरी में अब तक कामयाब रहे हैं, वे अहमद व दिग्विजय को करीब लाने में भी बहुत हद तक सफल रहे हैं। हाशमी-दिग्विजय की यह जोड़ी राहुल गांधी के बेहद करीबियों में शुमार है, और वे राहुल के ‘यूपी मिशन 2012’ को आगे बढ़ाने की होड़ में जुटे हैं, देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या यह जोड़ी यूपी में असम का चमत्कार दुहरा पाएगी?
Posted on 15 May 2011 by admin
असम में आम मान्यताओं के अनुरूप कांग्रेस प्रवासियों की पार्टी मानी जाती रही है, तो अगप-भाजपा लोकल की। पर इस चुनाव में जिस कदर एआइडीयूएफ का अभ्युदय हुआ (भाजपा ने कथित तौर पर इस पार्टी की पैसों से खूब मदद की) उसे लोकल हिंदू या असमिया मुस्लिम लोगों ने ज्यादा बड़े खतरे के तौर पर देखा और वे ऐन वक्त कांग्रेस के पाले में चले गए। उल्फा के अरविंद राजखोवा खेमे ने भी खुलकर कांग्रेस की मदद की, इस खेमे को ऐसा लगा कि कांग्रेस सरकार ने उनके नेता राजखोवा को रिहा कर अपना वादा पूरा किया। भाजपा की दुर्गति प्रभारियों की भरमार को लेकर भी थी। वरुण गांधी को चुनाव प्रचार के लिए तो खूब दौड़ाया गया पर टिकट बंटवारे में उनकी एक न चली। जिनकी चली, उनकी मतदाताओं के आगे चल नहीं पायी।
Posted on 15 May 2011 by admin
पाकिस्तान के पंजाबी कवि उस्ताद दामन की अर्जे बयानी देखिए- ‘लाली अख्खां दी एहो पई दस्स दी ए रोए तुसीं वी हो, रोए असी वी हां’ यानी आंखों की लालिमा बताती है कि रोए तुम भी हो और रोए हम भी हैं, असम के चुनाव परिणाम सामने आते ही भाजपा व अगप की कहानी भी बस यही थी, अगप को 10 सीटें, भाजपा की 5। कहां भाजपा अध्यक्ष बढ़-चढ़ कर दावे कर रहे थे कि इस दफे असम में तो अगप-भाजपा की ही सरकार बनेगी। प्रफुल्ल महंत व पटवारी की आपस में गुत्थम-गुत्था किस कदर थी कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा, दोनों ही नेता मतदाताओं में जाने की बजाए भाजपा के केंद्रीय नेताओं को पटाने में ज्यादा वक्त जाया कर रहे थे कि भाजपा सीएम के लिए ‘इनका’ नाम ले, भाजपा के एक केंद्रीय नेता ने भी अगप के साथ एक अजीब सा अंदरूनी समझौता किया हुआ था, ‘फ्रेंडली फाइट’ के तुर्रे ने तो रही-सही कसर भी पूरी कर दी। जहां कथित तौर पर भाजपा का दावा मजबूत था, वहां अगप ने कमजोर उम्मीदवार उतारे, भाजपा ने भी अगप के साथ ऐसा ही किया, इसका फायदा कांग्रेस उठा ले गई।
Posted on 08 May 2011 by admin
दिल्ली में भाजपा की कोर ग्रुप की बैठक आहूत थी और उसमें विषय कर्नाटक में उपजे संकट को लेकर येदुरप्पा को बदले जाने की संभावनाओं से जुड़ा था, बात यूपी को लेकर भी होनी थी, पर तब तक लादेन कांड हो गया और पूरी बैठक में बस लादेन का ही मुद्दा छाया रहा।
Posted on 08 May 2011 by admin
जगन मोहन की तरह रजनीकांत भी भाजपा नेताओं पर लाल पीले हो रहे हैं, जब पिछले दिनों रजनी के स्वास्थ्य का हाल-चाल पूछने एस.गुरुमूर्ति उनसे मिले तो यकबयक भाजपा के एक शीर्ष नेता के प्रति दक्षिण के इस सुपरस्टार का गुस्सा फूट पड़ा, बोले-‘ये (भाजपा वाले) मेरे नाम का क्यों बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं, अगर मुझे जाना ही था तो देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी से पहले ही मेरे पास ऑफर आ चुका था। भाजपा वालों के तो मैं फोन भी लेना पसंद नहीं करता।’ उल्टे पांव लौट आए गुरुमूर्ति अपनी मांद में।
Posted on 08 May 2011 by admin
राज्य की खुफिया विभाग से मिल रही रिपोर्टों ने मायावती की पेशानी पर बल ला दिए हैं, कोई चार महीने पहले राज्य खुफिया विभाग ने एक राज्यव्यापी सर्वेक्षण करवाया था। सूत्र बताते हैं कि उस रिपोर्ट के मुताबिक माया की बसपा को 164 सीटें मिलने की बात कही गई थी, उस वक्त तक माया 2011 के अक्तूबर-नवंबर तक राज्य में चुनाव करवाना चाहती थीं, माया का इरादा जुलाई में विधानसभा भंग करने का था। उन्होंने अपने खुफिया अफसरों से दो महीने ठहर कर फिर ऐसा ही सर्वेक्षण करवाने को कहा, दो महीने बाद हुए सर्वेक्षण में माया की 18 सीटें और कम हो गईं। मुख्यमंत्री माया ने फैसला किया कि यूपी में चुनाव अपने तयशुदा समय पर ही होंगे, माया अगले साल मई-जून का समय माकूल मान रही है, तब यूपी की झुलसा देने वाली गर्मी में बसपा का कैडर वोटर तो वोट डालने की खातिर बाहर आएगा, पर बाबू लोग इस झुलसाती गर्मी में कैसे निकलेंगे घर से बाहर। माया की असली चिंता राज्य में सपा के बढ़ते ग्राफ को लेकर है। और अंदर खाने में जिस तरह कांग्रेसी व सपा की बीच दोस्ती के नए अंकुर फूट रहे हैं, माया इस गठजोड़ को भी खतरनाक मान रही हैं।
Posted on 08 May 2011 by admin
अरुणाचल के हेलिकॉप्टर दुर्घटना में देश ने एक उदीयमान शासक खो दिया तो कांग्रेस ने वहां अपना भविष्य। दुर्घटना के कारणों की पड़ताल हो रही है और प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि यह नेविगेशन सिस्टम की फेल्योर की वजह से हुआ। सो केंद्र सरकार गंभीरता से इस बारे में विचार कर रही है कि उत्तर-पूर्व की उड़ानों के तमाम नेविगेशन प्रणाली का जिम्मा गृह मंत्रालय के अधीनस्थ कर दिया जाए। हेलिकॉप्टर के लिए एक सख्त व सामान्य नियम है कि उसे हमेशा बादलों के नीचे उड़ना चाहिए, मगर बादल पहाड़ पर जमे हों तो? ऐसे में पायलट कोशिश करता है कि वह उसे बादलों के ऊपर से उड़ाए, मानव चूक हो सकती है, ऊंचाई मापने में गलती हो गई हो। एक सर्वप्रमुख रहस्योद्धाटन हुआ है कि नार्थ-ईस्ट की कई पहाड़ियों का मैगनेटिक फील्ड बहुत ही सशक्त है, जैसे हॉफलांग का जटिंगा, उसके ऊपर से (एक खास एरिया में) अगर कोई पंछी भी उड़ान भरता है तो वह धम्म से नीचे आ गिरता है, दोरजी खांडू के सिंगल इंजिन हेलिकॉप्टर मामले में भी इन्हीं संभावनाओं को टटोला जा रहा है।
Posted on 08 May 2011 by admin
लादेन पर अमरीकी कार्यवाही को सरंजाम देने वाले नेवी सील कमांडरों की भी एक अनोखी दास्तां है, पूरी अमरीकी फौज में इसकी संख्या मात्र 2,500 से 3,000 के आसपास है। ‘सील’ में बने रहने की उनकी अधिकतम उम्र ही 29 साल है। रिकार्ड बताते हैं कि इनका एक भी मिशन कभी फेल नहीं हुआ है। सबसे दिलचस्प तो यह कि इस विंग में शामिल किसी भी कमांडर का न तो कोई नाम होता है न ही कोई चेहरा। चुनांचे इसमें से कोई कभी क्लेम ही नहीं कर सकता कि फलां ऑपरेशन में वह भी शामिल था। यह अपने सिर पर जो हेलमेट पहनते हैं पूरा ट्रांसमिशन सिस्टम इसी से जुड़ा होता है, जो आम तौर पर ऊपर उड़ रहे हेलिकॉप्टर से संचालित होता है। सो, अब वक्त आ गया है कि भारत दाउद या सईद के लिए महज खटराग न अलापे, ‘सील’ की तर्ज पर अपने यहां भी कोई ऐसा विंग गठित करे।
Posted on 08 May 2011 by admin
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमण सिंह काएदे के डॉक्टर हैं, सियासी नब्ज बूझना उन्हें बखूबी आता है, रफ्ता-रफ्ता अपना सियासी सफर तय करते हुए रमण बगैर किसी शोर-शराबे के भगवा पार्टी के कद्दावर नेताओं में शुमार हो गए हैं, और अब तो दबे-छुपे तौर पर उनके प्रशंसक उन्हें भी 2014 में प्रधानमंत्री पद का दावेदार बता रहे हैं। ठकुर सुहाती के भावों से ओत-प्रोत वे राजनाथ को तो पहले ही पटा चुके हैं, अब बारी गडकरी की है, रमण के दिल्ली में मीडिया एडवाइजर राजकुमार शर्मा छत्तीसगढ़ भवन के बजाए पार्टी अध्यक्ष के 13 तीन मूर्ति आवास से ही अपना दफ्तर चला रहे हैं, कहने को तो वे गडकरी का मीडिया मैनेज कर रहे हैं, पर किंचित चतुराई से वे गडकरी को ज्यादा मैनेज कर रहे हैं। संघ नेतृत्व भी हालिया दिनों में डॉ. रमण की बदली भाव-भंगिमाओं से सकते में है, पूरा छत्तीसगढ़ बस रमणमय है, भगवा राज कहीं नेपथ्य में चला गया है। स्थानीय मीडिया इस कदर रमणर्-कीत्तन में लीन है कि कभी-कभी भाजपा नेतृत्व भ्रम में पड़ जाता है कि क्या इस छोटे-से प्रदेश में उनकी सरकार चल रही है?
Posted on 08 May 2011 by admin
चिंतन बैठकों से बाहर निकल समय, काल व बदलते हालात से समन्वय बिठाने के लिए संघ का शीर्ष नेतृत्व चिंतित है, उसकी असली चिंता इस बात को लेकर है कि नई सोच की नई पीढ़ी के लिए संघ और गैर-प्रसांगिक क्यों होता जा रहा है? पिछले दिनों अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को जिस तरह युवा भारत का समर्थन हासिल हुआ उसके परिप्रेक्ष्य में संघ ने अपने अनुषांगिक संगठनों से कहा है कि संघ से जुड़े लोग व संस्थाएं ज्यादा से ज्यादा तादाद में अन्ना की मुहिम में कदम से कदम मिलाए और यहां आकर अहम दायित्वों का निर्वहन भी करें। संघ को लगता है कि अगर दक्षिणपंथी ताकतें ऐसा करने में विफल रहीं तो नक्सली आंदोलनों से सुहानुभूति रखने वाले स्वामी अग्निवेश या मेधा पाटेकर जैसे लोग इसे अतिक्रमित कर लेंगे या फिर कांग्रेस से जुड़े हर्ष मंदर या अरुणा रॉय जैसे लोग इसका फायदा उठा लेंगे यानी संघ विरोधी लोगों के हाथों की कठपुतली बन सकते हैं अन्ना, और वैसे भी अन्ना इन दिनों गोविंदाचार्य, बाबा रामदेव जैसे हिंदुत्ववादी विचारधारा के पोषक लोगों से पर्याप्त दूरी बनाने की रणनीति बुनने में जुटे हैं। अन्ना ने यह भी साफ कर दिया है कि रामदेव के प्रस्तावित अनशन से उनका कोई लेना-देना नहीं। यानी साफ है कि रामदेव सरीखे लोगों की लोकप्रियता का फायदा उठाने से अन्ना को गुरेज नहीं, पर वे किसी भी कीमत पर खुद को इस्तेमाल नहीं होने देंगे। अन्ना से बड़ा राजनैतिज्ञ कौन है?