दलित व आदिवासियों की चिंता में संघ के नियंता

March 06 2018


संघ का नया दलित प्रेम हिलौरे मार रहा है, इसकी झलक पिछले दिनों मेरठ में संपन्न हुए ’राष्ट्रोदय समागम’ में देखने को मिली। शहर भर में लगे होर्डिंग्स में दलित चेतना को उभारने की कोशिश हो रही थी, अपने चाल, चरित्र से दीगर संघ दलित प्रेम का एक नया राग अलाप रहा था, होर्डिंग्स की भाषा पर एक विहंगम दृष्टि डालिए और संघ के मन में क्या है, जान जाइए-’ हिंदू धर्म की जैसी प्रतिष्ठा वशिष्ठ जैसे ब्राह्मण, कृष्ण जैसे क्षत्रिय, हर्ष जैसे वैश्य और तुकाराम जैसे शुद्र ने की है, वैसे ही वाल्मिकी, चोखमेला और रविदास जैसे अस्पृश्यों ने भी की है।’ इस दलित प्रेम के पीछे संघ की असली चिंता धर्मांतरण को लेकर है, क्योंकि बीते कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में दलित, जाटव और अहिरवार बौद्ध धर्म अपना रहे हैं। संघ के इस समागम में पश्चिमी यूपी के 14 जिलों से एक लाख से ज्यादा संघ के कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। संघ की परंपरा में एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ है कि संघ के कार्यकर्ता ज्यादा से ज्यादा संख्या में दलित के साथ भोजन करें, स्वयं संघ प्रमुख मोहन भागवत इस आशय का श्रीगणेश कर चुके हैं। संघ की एक और चिंता आदिवासियों को लेकर भी है जो एक बार पुनः कांग्रेस की ओर रुख कर रहे हैं। 2008 से पहले आदिवासी वोटरों का झुकाव कांग्रेस की ओर था, नई उम्मीद को टकटकी लगाए फिर उन्होंने भाजपा की ओर कदम बढ़ाए, वहां से निराश होने के बाद उनका झुकाव एक बार फिर से कांग्रेस व क्षेत्रीय दलों की तरफ हो रहा है। हालिया दिनों में संपन्न हुए गोंडवाना सम्मेलन में 50 हजार से ज्यादा आदिवासियों की भीड़ जुटी, जिसके तुरंत बाद मोहन भागवत का एक अहम बयान सामने आया कि क्षेत्रीय दलों से सावधान रहने की जरूरत है।

 
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