‘जियो’ तो ऐसे जीओ

September 04 2016


जियो मोबइल के विज्ञापन में पीएम के चेहरे के इस्तेमाल को लेकर सोशल मीडिया पर भले ही विवाद गहराता जा रहा हो, पर एक सुलझे हुये रणनीतिकार के तौर पर मुकेश अंबानी की दाद देनी ही होगी, क्योंकि मौकों और चेहरों के इस्तेमाल में उनका कोई सानी नहीं। मुकेश अपनी आक्रामक व्यापार नीति को अपने इरादों व मीडिया के अचूक इस्तेमाल से धार देने का काम पहले भी करते रहे हैं। कहते हैं अकेले हिन्दुस्तान में 200 से ज्यादा टीवी चौनलों में उनकी हिस्सेदारी है, बड़े पत्रकारों को उपकृत करने के लिहाज से ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ कहीं पहले से काम कर रहा है, तो वैश्विक स्तर पर बोद्धिक सोच को प्रभावित करने के लिए उनका उपक्रम ‘इनोवेशन काउंसिल’ भी चर्चा में है, कहते हैं इस काउंसिल में मुकेश ने 7-8 नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों को भी जगह दी है। अपने उत्पादों को वैज्ञानिक सम्मत और बाजार की जरूरतों के मुताबिक ढालने के लिये मुकेश सोची-समझी रणनीति बुनते हैं और उस पर अमल करते हैं, ‘जियो’ इसका एक नायाब उदाहरण है। जिसमें भारत में जमे जमाये दूरसंचार कंपनियों के लिए खतरे की घंटी बजायी है। सूत्र बताते हैं कि जियो के खतरे को भांपते हुये देश में टेलीकॉम की अग्रणी कंबनी भारती ने अपने ज्यादातर शेयर सिंगापुर टेलीफोंस को बेच दिये हैं। आइडिया इस झटके से उबर नहीं पा रहा है, और वोडाफोन आनन-फानन में अपने लिए आक्रामक बाजार नीति तैयार करने जुटा है।

 
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