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सिंहदेव भाजपा में क्यों नहीं गए

Posted on 19 June 2022 by admin

पिछले काफी समय से बीजू जनता दल के नेता और पूर्व सांसद कलिकेश नारायण सिंहदेव प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा से मिलने का समय मांग रहे थे, पर कुछ कारणों से उन्हें मिलने का समय ही नहीं मिल पा रहा था। इसके बाद उन्होंने ओडिशा के कुछ ब्यूरोक्रेट्स से संपर्क साध सरकार के नंबर दो अमित शाह से मिलने का प्रयास किया पर उन्हें यहां भी सफलता हाथ नहीं लगी। तब उनके संकटमोचक बनकर अवतरित हुए धर्मेंद्र प्रधान जिन्होंने सिंहदेव की मुलाकात अमित शाह से करवा दी। कहते हैं जब इस मुलाकात की खबर नवीन पटनायक को लगी तो वे बेतरह उखड़ गए, उन्होंने फोन पर ही सिंहदेव को हड़काते हुए कहा-’आपकी मर्जी आप जिस पार्टी में जाना चाहें आप जा सकते हैं, पर बोलांगिर में राज परिवार ने जिस तरह गरीबों की जमीनें हथिया रखी है, हमें उन गरीबों को न्याय दिलवाना ही पड़ेगा, मुमकिन हुआ तो हम भी योगी की तरह बुलडोजर का सहारा लेंगे।’ यह सुनने भर की देर थी कि सिंहदेव के कदम ठिठक गए।

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नकवी को क्यों हटना पड़ा

Posted on 19 June 2022 by admin

भाजपा की चाहतों के सफर को सुर्ख ख्वाब देने और मुकम्मल शब्दावलियों को रोशन करने में मुख्तार अब्बास नकवी की महती भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता। उनकी मीडिया फ्रेंडली शख्सियत कई-कई दफे भाजपा के काम आई है, सो जब इस दफे उन्हें राज्यसभा नहीं दी गई तो हैरतों ने जैसे आसमां सिर पर उठा लिया, 22 सीटें खाली थीं, कई ऐसे नामों की भी लॉटरी लग गई जिन्होंने ऊपरी सदन की कल्पना नहीं की थी, पर नकवी का नंबर नहीं लगा। जबकि उन्होंने अल्पसंख्यक मंत्रालय को भी इस अंदाज में चलाया कि मंत्रालय के हौसले चमक उठे। नकवी के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ’हुनर हाट’ ने सरकार की लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए। जब से ज्ञानवापी विवाद ने तूल पकड़ा है संघ और भाजपा ने एक नया ‘हिंदू नैरेटिव’ तैयार करने की कोशिश की है यानी मुस्लिम मुक्त पार्टी, संसद और सरकार। पर पार्टी में एक वर्ग ऐसा भी है जो नकवी को रामपुर उप चुनाव में उतारना चाहता था। रामपुर में 47 फीसदी हिंदू, 4 फीसदी सिख और 49 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। ओवैसी भी यहां से अपनी पार्टी का उम्मीदवार उतारने की सोच रहे हैं। अगर आजम खान की पत्नी या बेटे में से कोई मैदान में नहीं उतरता है तो वे भी जाने-अनजाने यहां भाजपा की मदद करेंगे। और यह मोदी सरकार की नाक का सवाल भी होगा सो सीएम योगी समेत पूरा प्रशासन भी यहां मुस्तैद रहेगा। पर इतने पर भी नकवी को रामपुर से मैदान में नहीं उतारा गया, भाजपा ने उनकी जगह घनश्याम लोधी को मैदान में उतारा है। क्या यह शालीन और मीडिया फ्रेंडली नकवी के लिए विदाई काल है?

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क्या संदीप सिंह से नाराज़ हैं प्रियंका?

Posted on 19 June 2022 by admin

पिछले दिनों प्रियंका गांधी दो दिनों के दौरे पर लखनऊ आई थी, जहां उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं की एक अहम मीटिंग लेनी थी। तयशुदा स्थान पर एंट्री से पहले हर कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता से आग्रह किया गया कि वे अपने फोन बाहर रिसेप्शन पर जमा कर दें फिर सभागार में दाखिल हों। सभागार में भी उम्मीद से कम पार्टी कार्यकर्ता जुटे। कार्यकर्ताओं की अपनी प्रियंका दीदी से शिकायत थी कि यूपी चुनाव के बाद उन्होंने कार्यकर्ताओं की सुध लेना जरूरी नहीं समझा। कुछ लोग अपनी नाराज़गी दिखाने के लिए मीटिंग छोड़ कर जाने लगे तो प्रियंका ने भी आवेश में आकर कह दिया-’वैसे भी बहुत लोग पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं, आप लोग भी जाना चाहें तो जा सकते हैं।’ इसके बाद उन्नाव से आए पार्टी कार्यकर्ताओं ने प्रियंका से अनुरोध किया कि वे 2024 का चुनाव रायबरेली से लड़ने की न सोचें, चूंकि उनका जिला रायबरेली से लगता है इसीलिए वे वहां के लोगों का मिजाज बता सकते हैं। इस पर वहां मौजूद संदीप सिंह जो प्रियंका के सचिव हैं, उन्होंने उन्नाव के कार्यकर्ताओं को डपटते हुए कहा कि ’आप सभी शांत होकर बैठ जाइए।’ इस पर कुछ पार्टी कार्यकर्ता उखड़ गए और उन्होंने संदीप को आड़े हाथों लेते हुए प्रियंका से कहा-’दीदी ये जो हमें चुप करा रहे हैं, इन्होंने ही राज्य में सबसे ज्यादा पार्टी का भट्टा बिठाया है। इनसे पूछो इन्होंने इतना पैसा अचानक से कहां से कमा लिया?’ इसके बाद प्रियंका ने कहा इस बार प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव गुप्त वोटिंग से किया जाएगा, पर कार्यकर्ताओं की इस बात में अब कम ही दिलचस्पी बची थी। प्रियंका ने भी मीटिंग के बाद संदीप सिंह को खूब खरी-खोटी सुनाई और जहां उन्हें दो दिन लखनऊ रूकना था, एक दिन में ही दिल्ली वापिस लौट आईं।

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गांगुली पर भगवा दांव क्यों नहीं है मामूली

Posted on 19 June 2022 by admin

’आसमां से कुछ तूने भी तो मांगा होगा
यूं ही चांद उतर नहीं आया है तेरे रुखसार पर’

चूंकि भाजपा के लिए बंगाल में अपनी उपस्थिति बनाए रखना बेहद जरूरी है, सो उसे सौरव गांगुली जैसे एक जीवित बंगाली प्रतिमान को गहरे भगवा रंग में रंगने की आवश्यकता आन पड़ी, ममता बनर्जी के उस चैलेंज को भी भाजपा किंचित गंभीरता से ले रही है जब दीदी ने खुल्लम खुल्ला भाजपा को ललकारा है कि ’अब बीजेपी के लिए बंगाल में ‘नो एंट्री’ है’ सो भाजपा के लिए गांगुली एक तुरुप का इक्का साबित हो सकते हैं।’ भाजपा भले ही उन्हें राज्यसभा में मनोनीत कोटे से ला रही हो पर गांगुली व भाजपा में कोई खिचड़ी पक चुकी है इसका खुलासा इस क्रिकेटर के उस हालिया ट्वीट से सामने आता है जिसमें उन्होंने इशारों-इशारों में कह दिया है ’वह कुछ नया करने की योजना बना रहे हैं’ पिछले दिनों जब गृह मंत्री अमित शाह बंगाल के दौरे पर थे तो बकायदा उन्हें पूरे दल-बल के साथ बंगाल टाईगर के नाम से मशहूर गांगुली ने उन्हें अपने घर खाने पर न्यौता था। दरअसल, गांगुली के पीछे कई वर्षों से भाजपा हाथ धोकर पीछे पड़ी थी कि वे पार्टी में शामिल हो जाएं, पर गांगुली टस से मस नहीं हो रहे थे। इस बार गांगुली की बदली भाव-भंगिमाओं के पीछे उनकी मजबूरियां ज्यादा दिख रही हैं। गांगुली का बीसीसीआई का अध्यक्षीय कार्यकाल इस 27 जुलाई को खत्म हो रहा है। बीसीसीआई यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का अध्यक्ष बनने से पहले वे ‘कैब’ यानी क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल के अध्यक्ष थे, फिर उन्होंने 2019 में बीसीसीआई का कार्यभार संभाला। लोधा कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक किसी भी शख्स को लगातार छह साल अध्यक्ष रहने के बाद 3 साल का अनिवार्य ब्रेक लेना ही होगा। गांगुली ने 3 साल कैब फिर 3 साल निरंतर बीसीसीआई का अध्यक्ष पद संभाला है पर इस बार गांगुली के लिए 3 साल के ’कूलिंग पीरियड’ को ’वेव ऑफ’ करने के लिए बीसीसीआई कोर्ट चली गई है। बीसीसीआई का कहना है कि गांगुली इतना बड़ा नाम है कि उन्हें इस नियम के एक अपवाद के तौर पर देखा जाना चाहिए, यह मामला कोर्ट में लंबित है। बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव आदित्य वर्मा जो इस पूरे मामले को कोर्ट में लेकर गए थे, उन्होंने भी अब गांगुली के समर्थन में अपने रंग बदल लिए हैं, उन्होंने भी कुछ नामों पर कंप्रोमाइज करने की कोर्ट में दलील दी है। अपने अनिश्चित भविष्य को देखते हुए गांगुली भी भगवा होने को राजी हो गए हैं, भाजपा की असली दिक्कत 2024 के आम चुनावों में अपनी मौजूदा 18 सीटों को बचाए रखने की है, गांगुली अगर फ्रंट पर आकर खेलें तो यकीनन राज्य में भगवा संभावनाओं को वृहतर आयाम मिलेगा।

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अपने तीन सीएम बदल सकती है भाजपा

Posted on 19 June 2022 by admin

जीत की आंधियों पर सवार भगवा उम्मीदों ने इस जश्न के माहौल में भी अपने होशो-हवास नहीं खोए हैं। 2024 के आगामी आम चुनावों को केंद्र में रख कर भाजपा में गहन विमर्श मंथन के दौर अभी से जारी है। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो पिछले कुछ दिनों में पार्टी की टॉप लीडरशिप की कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं। इन हाई प्रोफाइल बैठकों में पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने हिस्सा लिया। इस बैठक में तय हुआ है कि ’भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों की बकायदा रिपोर्ट कार्ड को मद्देनजर रखते उनके भविष्य के बारे में फैसला लिया जाएगा।’ यह भी संकेत मिले हैं कि आने वाले दिनों में कम से कम तीन भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बदला जा सकता है। हालांकि इस बारे में कोई आधिकारिक खुलासा नहीं हुआ है पर सूत्र बताते हैं कि मध्य प्रदेश, हिमाचल और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों पर हाईकमान की यह तलवार लटक रही है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को एक बार फिर से अभयदान मिल सकता है। भाजपा नेतृत्व इस बात का पक्षधर बताया जा रहा है कि ऐसे सीएम बनाए जाने चाहिए जो अपने दम पर चुनाव में जीत दिलवा सकें। सूत्र बताते हैं कि इस हाई प्रोफाइल मीटिंग में उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी और केशव प्रसाद मौर्य के चुनावी हार की भी गंभीर समीक्षा हुई, बैठक में यह निष्कर्ष निकाला गया कि धामी के पास अपने को साबित करने के लिए बहुत कम समय था, जबकि मौर्य को बतौर उप मुख्यमंत्री पूरे पांच साल मिले थे, फिर भी वे चुनाव हार गए। ‘मोदी मैजिक’ से भले ही यूपी और उत्तराखंड में भाजपा की वापसी हो गई हो पर पार्टी की सीटें कम हो गई। 2024 के चुनाव में इस सबक को ठीक से कंठस्थ करने का संकल्प लिया गया है।

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वंशवाद के खिलाफ मुखर होता संघ

Posted on 19 June 2022 by admin

इस 19 मई को संघ के थिंक टैंक में शुमार होने वाले रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी ने नई दिल्ली के नेहरू मेमोरियल सभागार में एक सेमिनार का आयोजन किया, जिसका विषय था कि ’वंशवाद से निकले राजनैतिक दल लोकतांत्रिक शासन के लिए कैसे खतरा है’, सेमिनार का उद्घाटन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने किया, इसकी अध्यक्षता महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने की, सेमिनार की अवधारणा भाजपा के राज्यसभा सांसद और इस प्रबोधिनी के उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्दे की थी। इस कार्यक्रम में सबसे हैरतअंगेज उपस्थिति तो केंद्रीय इस्पात मंत्री और जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह की रही, जिनकी राज्यसभा की सदस्यता भाजपा से उनकी नजदीकियों की वजह से खतरे में पड़ गई है, नीतीश उनके इस बदले स्वांग को पचा नहीं पा रहे। पर इस सेमिनार में उस वक्त हंगामा बरप गया जब पोस्ट लंच सेशन में बोलने के लिए जेएनयू के दक्षिणपंथी विचारक डॉ. आनंद रंगनाथन बोलने को आमंत्रित किया गया। आनंद रंगनाथन को अपने उद्बोधन में उस ‘रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क’ की बात करनी थी जो वंशवादी पार्टियों पर नकेल कस सके। जेएनयू के इस यंग प्रोफेसर की विद्वता का सब लोहा मानते हैं और वे संघ के एक प्रमुख थिंक टैंक में शुमार होते हैं, ये दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पढ़े-लिखे हैं और जेएनयू में ‘मोल्युकुलर मेडिसिन’ पढ़ाते हैं। ये तीन किताबें भी लिख चुके हैं। जब प्रोफेसर साहब ने बोलना षुरू किया तो वंशवाद पर अन्य राजनैतिक दलों के साथ उन्होंने भाजपा पर भी हल्ला बोल दिया। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि आज भी भाजपा के 43 से ज्यादा सांसद और सवा सौ से ज्यादा विधायक वंशवाद की राजनीति की उपज है। प्रोफेसर साहब अपनी रौ में बोलते गए और सभागार में सन्नाटा छा गया, बाद में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से प्रोफेसर रंगनाथन के इस धुआंधार भाशण के वीडियो डिलीट कर दिए गए, बस अब उस उद्बोधन की स्मृति शेष है।

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क्या चौटाला परिवार एक होगा?

Posted on 19 June 2022 by admin

आय से अधिक संपत्ति मामले में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला को सजा सुनाए जाने से करीब यह एक सप्ताह पहले की बात है। कहते हैं चौटाला ने अपने पूरे परिवार को बुलाया और उनसे कहा कि ’अगर वाकई उन्हें अपने गृह राज्य में कांग्रेस-बीजेपी से लड़ना है तो परिवार को एक होना होगा।’ चौटाला ने कहा उनके पास अब ज्यादा समय नहीं है, वे अपनी आंखों के आगे अपने परिवार को एक होता देखना चाहते हैं और उनकी सोच है कि चौधरी देवीलाल की पार्टी और उनके चुनाव चिन्ह पर ही सब मिल कर लड़ें। सूत्र बताते हैं कि चौटाला ने इस मीटिंग में शामिल होने के लिए अपने छोटे भाई और राज्य के बिजली व जेल मंत्री रणजीत सिंह चौटाला को भी बुलाया था, पर वे नहीं आए। जबकि कहा जाता है कि ओम प्रकाश चौटाला से समझौता कर ही उन्होंने इस दफे के चुनाव में बतौर निर्दलीय जीत हासिल की थी और खट्टर सरकार में दो अहम मंत्रालय भी पा गए। पर रणजीत सिंह ने बैठक में न आकर अपने बड़े भाई को यह संकेत दे दिया कि वे निर्दलीय ही ठीक हैं। पर इस मीटिंग में भी पारिवारिक तनाव बिखर कर सामने आने लगा, जब जजपा के महासचिव दिग्विजय सिंह चौटाला ने अपने दादा से कहा ’उन्हें इस बात से खुशी मिलेगी कि उनका परिवार एक हो जाए, पर वे यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि परिवार की इस नवगठित पार्टी के अध्यक्ष या तो वे होंगे या उनके पिता अजय सिंह चौटाला।’ जब परिवार की इस एकजुटता की कवायद की खबर प्रदेश के मुख्यमंत्री खट्टर को लगी तो ओम प्रकाश चौटाला पर कानूनी शिकंजा और कस दिया गया। वहीं चौटाला परिवार को लगता है कि बड़े चौटाला को फिर से जेल भेजने से प्रदेश के जाटों की सहानुभूति चौटाला परिवार से मुखातिब होगी जिसका नुकसान आखिरकार भाजपा को उठाना पड़ सकता है।

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जयंत को ऐसे मिली राज्यसभा

Posted on 19 June 2022 by admin

अखिलेश यादव ने सपा की ओर से राज्यसभा की तीसरी सीट के लिए अपनी पत्नी डिंपल यादव का नाम लगभग फाइनल कर दिया था, और वे इस आशय की औपचारिक घोषणा करने ही वाले थे कि डिंपल यादव के फोन पर जयंत की पत्नी चारू सिंह का फोन आ धमका, चारू ने डिंपल से लगभग चिरौरी करने के अंदाज में कहा-’आपका कद बहुत बड़ा है, आप तो आजमगढ़ से लोकसभा का चुनाव भी जीत जाएंगी, पर प्लीज आप जयंत के बारे में सोचे जो पिछले आठ वर्षों से लगभग राजनैतिक निर्वासन की पीड़ा झेल रहे हैं, आपका यह अहसान हमेशा हमारे ऊपर रहेगा।’ डिंपल ने यह बात अखिलेश को बताई, अखिलेश ने डिंपल से कहा वे जयंत से कहें कि वे मुझसे बात करें। अखिलेश पिछले तीन बार से जयंत का फोन नहीं ले रहे थे। फिर अगली सुबह जयंत का फोन अखिलेश के मोबाइल पर आया, जयंत ने भी अखिलेश से वही बातें दुहराई जो उनकी पत्नी पहले ही डिंपल से कह चुकी थीं। इसके बाद अखिलेश ने राज्यसभा के लिए जयंत की उम्मीदवारी की घोषणा कर दी। पर इसके बाद कहते हैं जयंत ने अखिलेश के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को फोन करके कहा-’वैसे तो मुझे भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राज्यसभा देने को तैयार थे, पर मैं भाई साहब (अखिलेश) को छोड़ना नहीं चाहता था।’ धर्मेंद्र ने जब यह बात अखिलेश को बताई तो वे बस एक ठंडी आह भर कर रह गए।

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चिकन सैंडविच, राहुल और हार्दिक

Posted on 19 June 2022 by admin

’अगर तू मुझसे खफ़ा न होता, तेरे अफ़सानों में जिक्र मेरा न होता
तेरे आइने में कैद मेरा भी एक चेहरा था, अगर यूं टूटा न होता’

आज की दौर की सियासत ने नायक और प्रतिनायक के महीन फासले को कम कर दिया है, नायक के चारण गान की परिपाटी भले ही एक दल विशेष की धाती हो, पर कांग्रेस में यह परिपाटी टूटी है। सूत्रों के हवाले से मालूम चला है कि उदयपुर चिंतन शिविर में शामिल होने से पहले जब राहुल गांधी गुजरात गए थे, तो अहमदाबाद स्थित उनके शानदार होटल में मिलने पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल पहुंचे थे। कहते हैं पटेल राहुल के लिए अपने घर में तैयार हुआ खास गुजराती व्यंजन साथ लेकर गए थे, जो जाहिर तौर पर शाकाहारी था। पर हार्दिक की संगत में भी राहुल ने गुजराती व्यंजन की जगह होटल के रेस्टोरेंट से आर्डर कर चिकन सैंडविच का लुत्फ उठाना ज्यादा मुनासिब समझा। हार्दिक को इस बात का बुरा लगा। इसके बाद हार्दिक ने उन सौ-सवा सौ प्रभावशाली गुजराती लोगों की लिस्ट राहुल को सौंपी जिनसे वे उनको मिलवाना चाहते थे। पर राहुल ने इन लोगों से मिलने में अनिच्छा जताते हुए कहा कि ’वे अभी आराम के मूड में हैं और कल ही उन्हें वापिस दिल्ली लौट आना है, सो इस बार इन लोगों से मुलाकात संभव नहीं हो पाएगी। अगर आपको इन लोगों से मिलवाना ही है तो आप इन्हें दिल्ली लेकर आ जाओ।’ हार्दिक को यह बात नागवार गुजरी, होटल के कमरे से बाहर निकल कर उन्होंने गुस्से में अपने कुछ भरोसेमंदों से कह दिया-’अगर हमारा नेता जिम और मसाजरूम से बाहर ही नहीं निकलना चाहता तो कांग्रेस को बस भगवान ही बचा सकता है।’ हार्दिक की यह तल्ख टिप्पणी उड़ते-उड़ाते राहुल के कानों तक जा पहुंची। वे तमतमा गए। दिल्ली पहुंच कर उन्होंने अपनी मां से हार्दिक की शिकायत लगाते हुए कहा-’ये बंदा बहुत बदतमीज है, इसे हम उदयपुर नहीं बुलाएंगे।’ सोनिया ने राहुल को समझाना चाहा कि ’कोई भी पार्टी उसके संविधान के हिसाब से चलती है, हम इसमें मनमाने फैसले नहीं ले सकते।’ पर जब सोनिया के समझाने पर भी राहुल अडिग रहे तो आनन-फानन में यह फैसला लिया गया कि उदयपुर चिंतन शिवर में किसी भी कार्यकारी अध्यक्ष को नहीं बुलाया जाएगा। पर हाईकमान के इस फैसले की सर्वत्र आलोचना होनी शुरू हो गई। पार्टी में बढ़ते असंतोष को देखते हुए सोनिया गांधी ने अब फैसला लिया है कि ’बहुत जल्द पार्टी का मिनी चिंतन शिविर लगाया जाएगा, जिसमें कांग्रेस शासित प्रदेशों राजस्थान व छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र व झारखंड से भी राज्य सरकार के मंत्रियों, पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गण, कार्यकारी अध्यक्षों समेत 120 नेताओं को इस मिनी शिविर में आमंत्रित किया जाएगा।’ चलो, देर आए दुरूस्त आए।

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प्रमोद कृष्णम से नाराज़ प्रियंका

Posted on 19 June 2022 by admin

कांग्रेस के उदयपुर चिंतन शिविर में तब एक बार सबको सन्निपात मार गश, जब यूं अचानक यूपी के कांग्रेसी नेता प्रमोद कृष्णम ने बुलंद आवाज में प्रियंका गांधी को पार्टी का नया अध्यक्ष बनाने की मांग कर दी। यह मांग इतनी असहज करने वाली थी कि प्रियंका ने फौरन अपने बगलगीर दीपेंद्र हुड्डा को आंखों से इशारा कर दिया। दीपेंद्र ने आचार्य प्रमोद को चुप कराते हुए कहा कि ’हम लोग कोई नहीं होते पार्टी के अध्यक्ष का नाम तय करने वाले, यह फैसला आप पार्टी और परिवार पर छोड़ दीजिए।’ इसके बाद आचार्य प्रमोद को डपटने की बारी मल्लिकार्जुन खड़गे की थी, जिन्होंने किंचित ऊंची आवाज में आचार्य को डांट लगाते हुए कहा-’आप चुप रहिए, यह तय करना आपका काम नहीं और ना ही यह ऐसा कोई मुद्दा उठाने वाला फोरम है।’ मीटिंग खत्म होने के बाद आचार्य प्रमोद सचिन पायलट को साथ लेकर प्रियंका से मिलने पहुंचे, आचार्य प्रमोद को सामने पाकर प्रिंयका अपने आवेश पर काबू नहीं रख पाईं, उन्होंने आचार्य को डपटते हुए तेज लहजे में कहा-’आप अपने को सुधार लीजिए और आप परिवार में झगड़ा लगाने की कोशिश भी न करें।’ इसके बाद प्रियंका के गुस्से का गुबार और तेजी से फूट पड़ा, उन्होंने सख्त लहजे में कहा-’आप बाहर यह प्रचारित करने की कोशिश करते हैं कि आप मेरे राजनैतिक सलाहकार हैं, आज आप बताइए कि मैं आपके कितने मैसेज का जवाब देती हूं?’ आचार्य प्रमोद कृष्णम को तो जैसे सांप ही सूंघ गया हो, सचिन पायलट ने किसी भांति प्रियंका के गुस्से को ठंडा करवाया।

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