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वी. जार्ज की वापसी

Posted on 06 August 2022 by admin

उप राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस की ओर से मारग्रेट अल्वा का नाम तय करवाने में राजीव गांधी जमाने के वफादार वी.जार्ज की एक महती भूमिका मानी जा रही है। सूत्र बताते हैं कि आर.माधवन के ऊपर जब से रेप के आरोप लगे हैं दस जनपथ ने उन्हें किंचित दरकिनार कर दिया है। इसके बाद एक बार फिर से पहले से दरकिनार हुए वी.जार्ज की 10 जनपथ में सक्रिय वापसी हो गई है। यह भी कहा जाता है कि कई दशक पूर्व राजीव गांधी से वी.जार्ज को मिलवाने वाली मारग्रेट अल्वा ही थीं। पर कहते हैं बाद में दोनों के रिश्ते में तब खटास आ गई, जब सोनिया गांधी ने राज्यसभा में भेजने के लिए वी जॉर्ज का नाम तत्कालीन पीएम नरसिंहा राव को भेजा था, पर राव ने 1993 में जॉर्ज की जगह अल्वा को ऊपरी सदन भेज दिया। इस बात का जिक्र अल्वा ने अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘करेज एंड कमिटमेंट’में भी किया है कि कैसे जब नरसिंहा राव ने जॉर्ज की जगह उन्हें राज्यसभा भेज दिया तो सोनिया गांधी इस बात को भूली नहीं। सो, जब 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार बनी तो उसमें मंत्री पद के लिए मारग्रेट अल्वा के नाम पर विचार भी नहीं किया गया। इस के बाद जब सोनिया नरम पड़ीं तो 2009 में उन्हें गवर्नरी दे दी गई।

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सिंहदेव के विद्रोह के पीछे कौन

Posted on 06 August 2022 by admin

छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार भी अब भाजपा के निशाने पर आ गई है। अब से कोई सवा साल बाद छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसमें बघेल अपने कार्यों के दम पर सत्ता में पुनर्वापसी के सपने संजो रहे हैं। पर उनकी सरकार को अस्थिर करने में उनके पुराने दोस्त ही शामिल हैं। कभी बघेल और सिंहदेव की जोड़ी को छत्तीसगढ़ में ’जय-वीरू’ की जोड़ी कहा जाता था। कोई पौने चार वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार सत्ता में आई तो टीएस सिंहदेव और भूपेश बघेल के बीच ढाई-ढाई साल के सीएम पद पर सहमति बनी। पर जब सिंहदेव की बारी आई तो सियासी परिस्थितियों ने उनके हाथ से यह मौका छीन लिया। नाराज़ सिंहदेव ने एक चार पेज की चिट्ठी जारी कर अपना मंत्री पद छोड़ने का ऐलान कर दिया है। बघेल का दावा था कि इस राष्ट्रपति चुनाव में छत्तीसगढ़ कांग्रेस का कोई भी विधायक क्रॉस वोटिंग नहीं करेगा, पर द्रौपदी मुर्मू के समर्थन में उनके छह विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी, जो कहीं न कहीं सिंहदेव के नेतृत्व में बगावत का आगाज़ है। मौके की नजाकत को भांपते भाजपा बघेल सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई है, जिस पर 27 जुलाई को चर्चा होनी है। छत्तीसगढ़ की मौजूदा विधानसभा में कांग्रेस के 71, भाजपा के 14, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के 3 और बसपा के 2 विधायक हैं। इस लिहाज से भी बघेल की कुर्सी को फिलवक्त कोई खतरा नहीं दिखता।

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सोरेन की गद्दी कब तक सलामत

Posted on 06 August 2022 by admin

राष्ट्रपति चुनाव में इस दफे झारखंड के 17 कांग्रेसी विधायकों में से 10 ने पार्टी लाइन से इतर एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की है। मरांडी की पार्टी छोड़ कांग्रेस में आए कांग्रेस के 18वें विधायक प्रदीप यादव को अबतलक स्पीकर की ओर से मान्यता नहीं मिली है। फिर भी दलबदल कर नई पार्टी बनाने के लिए बागी कांग्रेस विधायकों को अपने लिए कम से कम कांग्रेसी कोटे से दो विधायक और जुटाने होंगे तब ही उनके दलबदल को कानूनी मान्यता मिल पाएगी। वैसे भी जब से हेमंत करीबियों पर केंद्रीय जांच एजेंसियों का शिकंजा कसा है, कहते हैं हेमंत सोरेन ने भाजपा नेतृत्व के समक्ष घुटने टेक दिए हैं, सवाल उठता है कि क्या वे कांग्रेस को स्वयं ही अलविदा कह भाजपा के साथ मिल कर झारखंड में सरकार बनाने को राजी हो जाएंगे और क्या भाजपा उनके साथ मिल कर सरकार बनाने को राजी होगी? सवाल यह है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा का आदिवासी प्रेम उस वक्त कहां गया था जब अतीत में झामुमो ने राष्ट्रपति पद के आदिवासी उम्मीदवार पीए संगमा के बजाए प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था?

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क्या है दिल्ली में भाजपा का ’मास्टर स्ट्रोक’

Posted on 17 July 2022 by admin

’बात इतनी सी थी मगर बता नहीं पाए
गैरों के आगे तुझे गले लगा नहीं पाए
शहर में इन दिनों काफिरों की आवाज़ाही है बहुत
क्यों तुम्हें खुदा अपना बना नहीं पाए’

सवाल यह लाख टके का है कि क्या केजरीवाल की दिल्ली उनकी मुट्ठियों से रेत के मानिंद सरक रही है, आहिस्ता-आहिस्ता, धीरे-धीरे। भगवा सियासी पेचोंखम की चमक क्या दिल्ली में आप सियासत की आंखों को चौंधिया रही है? पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली के लिए एक परिसीमन आयोग का गठन कर दिया है। दरअसल दिल्ली नगर निगम के वार्डों के परिसीमन के लिए केंद्र सरकार ने एक 3 सदस्यीय कमेटी गठित की है, इस कमेटी को चार महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट देनी है, इसके बाद ही निगम के चुनाव संभावित हैं। पर इसमें दिक्कत यह है कि अभी तक वार्डों के परिसीमन का फार्मूला ही तय नहीं हुआ है। सूत्रों की मानें तो केंद्रनीत भाजपा दिल्ली की आप सरकार को जोर का झटका धीरे से देना चाहती है। इसी कड़ी में पिछले वर्ष ’गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली एक्ट’ पास हुआ था, इस एक्ट के तहत दिल्ली के उप राज्यपाल के अधिकारों का दायरा काफी बढ़ा दिया गया था, सूत्रों की मानें तो अपने इस महत्वाकांक्षी कदम से केंद्र सरकार दिल्ली में 1993 से पूर्व वाली स्थिति लाना चाहती है। याद कीजिए तब दिल्ली के पास न अपनी विधानसभा थी, न ही सरकार, ना ही मंत्री या मुख्यमंत्री यानी तब दिल्ली को महज़ एक केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा हासिल था। अब एक ऐसी दिल्ली बनाने की तैयारी है, जहां दिल्ली के पास अपना मेयर तो होगा, पर उप राज्यपाल के पास असीमित अधिकार होंगे, जो केंद्र सरकार की नुमाइंदगी करेंगे। 1956 में जब दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया था, तब दिल्ली विधानसभा और मंत्रिमंडल के प्रावधान को खत्म कर दिया गया था। सूत्रों की मानें तो परिसीमन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद विभिन्न वार्डों में चुने हुए सदस्यों के अलावा मनोनीत सदस्यों की संख्या में भी बढ़ोतरी की जा सकती है। अगर भाजपा अपनी इस परिकल्पना को मूर्त रूप देने में कामयाब हो जाती है तो फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लग सकता है।

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अच्छे लीडर भी हैं स्पीकर

Posted on 17 July 2022 by admin

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला अक्सर अतिरेक उत्साह की लहरों पर सवार रहते हैं, पिछले दिनों जब बतौर स्पीकर उनके तीन साल पूरे हुए तो इस मौके को खास बनाने के लिए उन्होंने दनादन थोकभाव में मीडिया वाले को कई इंटरव्यू दिए। एक सप्ताह तक चले उनके इस इंटरव्यू श्रृंखला से न सिर्फ पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बावास्ता हुआ बल्कि आम जनता में भी यह संदेश गया कि वे कितने ’प्रो-एक्टिव’ स्पीकर हैं, उनकी इस चाह को एक मुकम्मल आसमां मुहैया कराने के लिए लोकसभा सचिवालय ने पार्लियामेंट एनेक्स में एक नहीं बल्कि तीन स्टूडियो की व्यवस्था की हुई थी, जहां भारत के तिरंगे से इसका बैकड्रॉप तैयार किया गया था। स्पीकर महोदय ने भी बगैर मिनट गंवाए बारी-बारी से हर स्टूडियो में इंटरव्यू दिए, इस बात का भी खास ख्याल रखा कि हर इंटरव्यू के दौरान कम से कम वे अपना जैकेट तो बदल लें। उनकी इस मासूम अदा का हर जर्नलिस्ट दीवाना हो गया जब इंटरव्यू समाप्त करने के बाद वे तिरंगे की बैकग्राउंड में इंटरव्यूकर्ता जर्नलिस्ट से अपने साथ एक अदद फोटो खिंचाने का आग्रह करते। पर सूत्रों की मानें तो दरअसल ओम बिरला की निगाहें राजस्थान के अगले सीएम की कुर्सी पर टिकी है, उन्हें उम्मीद है कि उनका नंबर जरूर लगेगा। वैसे भी वे अपने संसदीय क्षेत्र कोटा में खासे लोकप्रिय हैं, वे नियम से हर शनिवार व रविवार अपने संसदीय क्षेत्र में ही होते हैं और क्षेत्र की जनता से घुलते-मिलते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ सकती है

Posted on 17 July 2022 by admin

बेहद विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि संसद के इस मानसून सत्र जो 18 जुलाई से आहूत है, केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के जजों की सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाने का प्रस्ताव ला सकती है। अभी तक की परंपराओं के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के जज अपने 65वें जन्मदिन पर रिटायर होते हैं, सरकार इनकी रिटायरमेंट की उम्र दो साल आगे बढ़ाने पर विचार कर रही है यानी अब जज महोदय 65 के बजाए 67 की उम्र में रिटायर होंगे। सनद रहे कि देश के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना ने अप्रैल माह में आयोजित एक वेबिनार में रिटायरमेंट की आयु बढ़ाने की पैरवी की थी। चीफ जस्टिस रमन्ना अगले माह 16 अगस्त को रिटायर होने वाले हैं। कई राज्यों के लॉ-कमीशन ने भी जजों की रिटायरमेंट की उम्र 65 से बढ़ा कर 67 करने की वकालत की है। अभी तक तो यही तय है कि जस्टिस रमन्ना की जगह जस्टिस यूयू ललित ले सकते हैं, जिन्हें बस 8 नवंबर तक अपने पद पर बने रहना है। उनके बाद जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की बारी आएगी जो 2 वर्षों के लिए चीफ जस्टिस रहेंगे। जस्टिस ललित का वो हालिया बयान काफी चर्चित हुआ जब उन्होंने कोर्ट के वर्किंग ऑवर को बढ़ाने की पैरवी करते हुए कहा था कि ’अगर हमारे बच्चे सुबह 7 बजे स्कूल जा सकते हैं तो हम जज और वकील 9 बजे कोर्ट क्यों नहीं जा सकते?’ अगर संसद में सुप्रीम कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट उम्र दो वर्ष आगे बढ़ाने का प्रस्ताव पारित हो जाता है तो जस्टिस ललित दो और वर्षों के लिए देष के चीफ जस्टिस बने रह सकते हैं यानी वैसी सूरत में जस्टिस चंद्रचूड़ को अपनी बारी के लिए दो वर्ष और इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसी सुगबुगाहटों ने देश के हाई कोर्ट के जजों के मन में भी आशा की नई ज्योति का संचार कर दिया है जो महज़ 62 वर्ष की उम्र में ही रिटायर हो जाते हैं।

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फोटो पत्रकारों पर गाज

Posted on 17 July 2022 by admin

हर तस्वीर कोई न कोई कहानी बयां करती है और यह अपने पहलू में उस दौर का इतिहास भी छुपाए रखती है। पर लगता है भारत में फोटो जर्नलिज्म की समृद्ध परंपरा को किसी की बुरी नज़र लग गई है, अब अखबारों और एजेंसियों में फोटो जर्नलिस्ट की नौकरियों का टोटा पड़ने लगा है, इनकी डिमांड कम हो गई है। अगर राष्ट्रपति भवन की ही बात करें तो पिछले 5 सालों में यहां विजुअल मीडिया की एंट्री को एक तरह से अघोषित ‘ना’ ही है। एक-दो अपवादों को छोड़ कर जैसे जब कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष अपने भारत दौरे के दरम्यान राष्ट्रपति भवन पधारते हैं और जब उन्हें ’गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया जाता है या हैदराबाद हाउस में इनके सम्मान में कोई लंच या डिनर रखा जाता है तो वहां विजुअल मीडिया की एंट्री हो जाती है। वैसे भी पिछले कुछ सालों में व्यक्तिगत फोटोग्राफर रखने की परंपरा ने ज्यादा जोर मारा है। देष के राश्ट्रपति हों या प्रधानमंत्री उनके निजी फोटोग्राफर हैं, भाजपाध्यक्ष तक ने अपना निजी फोटोग्राफर रखा हुआ है। यहां तक कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के भी अपने निजी फोटोग्राफर हैं। सभी मंत्रियों के अपने फोटोग्राफर हैं। सो अब ’केंडीड’ या ’ऑफ बीट’ फोटो कहां नज़र आती हैं। कान में फुसफुसाते हुये या हंस कर बतकहियां करने वाले फोटो के दौर भी नहीं रहे, उदयपुर में तीन दिनों तक कांग्रेस की चिंतन बैठक चली, पर फोटोग्राफरों की एंट्री वहां भी बैन रही। सो, अब महज़ वही फोटो सामने आते हैं जैसा राजनेता खुद को दिखाना चाहते हैं या दिखने का स्वांग रचते हैं।

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पवार का चाणक्य कैसे चूक गया?

Posted on 17 July 2022 by admin

इस बार महाराष्ट्र की महाअघाड़ी सरकार को बचाने में, उसे उबारने में कैसे सियासत के चाणक्य माने जाने वाले शरद पवार चूक गए? उनसे गलती आखिर कहां हुई? उनकी पार्टी के पास ही महाअघाड़ी सरकार में गृह मंत्रालय था, खुफिया सूचनाएं थीं, पर उन्हें भगवा एकनाथ इरादों की समय पर सूंघ नहीं लग पाई? विश्वस्त सूत्रों की मानें तो महाराष्ट्र में भगवा खेला से कुछ रोज पूर्व दिल्ली में पवार पीएम से आकर मिले थे, बाद में भाजपा के कुछ शीर्ष नेताओं से महाराष्ट्र में भाजपा के साथ नई सरकार की गठन को लेकर उनकी गंभीर मंत्रणा हुई। पर इस पूरे मामले में बस एक पेंच फंस गया, वह यह कि पवार इस बात पर अड़ गए थे कि नई गठबंधन सरकार की सीएम उनकी पुत्री सुप्रिया सुले ही होंगी, वहीं जबकि भाजपा पवार पुत्री को डिप्टी सीएम बनाने को राजी थी। पवार नहीं माने तो भाजपा को लगा कि फिर एकनाथ शिंदे क्या बुरे हैं, कम से कम उनके कंट्रोल में तो रहेंगे। और बाजी यहीं पलट गई।

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शिंदे की राह क्यों आसान नहीं

Posted on 12 July 2022 by admin

’इन चुप्पियों के हाथ कैसे रंगे हैं खून से
क्षत-विक्षत शब्द पड़े हैं जो हर तरफ मौन से’

एकनाथ शिंदे के सिर अभी-अभी तो सिरमौर का ताज सजा है, गाजे-बाजों का शोर भी हर ओर गुंजायमान है, फिर भी क्या बात है कि चुप सन्नाटों की बतकहियां उन्हें इस हद तक परेशान कर रही हैं। आखिर क्यों वे बीएमसी चुनावों तक अपने मंत्रिमंडल का विस्तार टाले रखना चाहते हैं, क्यों अभी से उन्हें अपनों की नाराज़गियों का डर खाए जा रहा है? सूत्र बताते हैं कि भाजपा व शिंदे के दरम्यान जो सहमति बनी है उसके अंतर्गत शिंदे कैबिनेट में कुल 45 मंत्री शामिल किए जा सकते हैं, जिसमें 25 मंत्री भाजपा के कोटे से होंगे, 13 शिंदे के कोटे से और 7 निर्दलीय विधायकों को मंत्री बनाया जा सकता है। यानी भाजपा के हर 4 विधायकों में से एक और शिंदे गुट के हर 3 में से एक मंत्री होगा, वहीं निर्दलियों की तो पौ बारह रहने वाली है, उसके हर सवा दो विधायकों में से एक मंत्री होगा। पर जरा सोचिए उन 10 निर्दलीय विधायकों का क्या होगा जो मंत्री नहीं बन पाएंगे? क्या वे फिर भी शिंदे सरकार को अपना समर्थन देना जारी रखेंगे? वहीं उद्धव सरकार से टूट कर आए 8 मंत्री भी फिर से मंत्री बने रहना चाहेंगे। अभी पिछले दिनों दिल्ली में शिंदे ने पीएम और अमित शाह से मुलाकात की, उनसे कहा गया है कि वे पहले अपनी उपयोगिता साबित करें यानी पिछले 25 सालों से जिस तरह से शिवसेना बीएमसी पर कुंडली मारे बैठी है, उसे वह ‘सेना मुक्त’ कर दिखाएं। अभी शिंदे और ठाकरे गुट में झगड़ा पार्टी के चुनाव चिन्ह तीर-कमान को लेकर गहरा गया है, मामला चुनाव आयोग के पास है। अगर चुनाव आयोग इस चुनाव चिन्ह को ही ‘फ्रीज’ कर देता है तो यह उद्धव कैंप के लिए एक बड़ा झटका होगा। भाजपा बृहन मुंबई नगरपालिका चुनावों की आड़ में अपने 2024 के एजेंडे को भी धार देना चाहती है, चूंकि मुंबई महानगर क्षेत्र की सात नगरपालिकाओं के अंतर्गत आने वाली 10 लोकसभा और 60 विधानसभा सीटें महाराष्ट्र का ट्रेंड सेट करने में एक महती भूमिका निभाती है। यानी महाराष्ट्र में सियासी सर्कस चालू आहे।

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क्या होगा वेंकैया का?

Posted on 12 July 2022 by admin

देश के मौजूदा उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू माऊंट कारमल की ‘प्लेटिनम जुबली’ समारोह में हिस्सा लेने इस शनिवार को जब बेंगलुरू पहुंचे तो यह देख कर हैरत में पड़ गए कि एयरपोर्ट पर उनकी अगवानी के लिए बोम्मई सरकार का कोई भी मंत्री हाजिर नहीं था। हां, राज्यपाल उन्हें जरूर रिसीव करने एयरपोर्ट तक आए। इसके बाद जब वेंकैया समारोह स्थल पर पहुंचे तो वहां राज्य के हायर एजुकेशन मिनिस्टर को भी उपस्थित रहना था। चूंकि उस समारोह में उप राष्ट्रपति को ‘चीफ गेस्ट’ बनाया गया था और राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री को ‘गेस्ट ऑफ ऑनर’ से नवाजा गया था। पर मंत्री जी ने उस समारोह में आने की जुर्रत तक नहीं उठाई। क्या यह वेंकैया नायडू के आने वाले भविष्य का कोई संकेत है?

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