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वृंदा की कांग्रेसी वंदना

Posted on 05 October 2009 by admin

माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात के कांग्रेसी कनेक्शन का अब बकायदा खुलासा होने लगा है। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास का कार्यकाल अब बस खत्म होने वाला है और वृंदा की नजर इस अहम कुर्सी पर है। इससे पहले वृंदा ने कोशिश की थी कि कांग्रेस के सहयोग से उन्हें लोकसभा का स्पीकर बना दिया जाए, पर कांग्रेस ने वृंदा की इस मंशा को किंचित गंभीरता से नहीं लिया। हालांकि अब कई अहम कांग्रेसी नेत्रियों की नजर महिला आयोग की अध्यक्षीय कुर्सी पर टिकी है बावजूद इसके आयोग की निवर्तमान अध्यक्ष गिरिजा व्यास और केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ अपने आपसी मतभेदों को भुला कर इन प्रयासों में जुटी हैं कि कैसे करात का कार्य सफलतापूर्वक निष्पादन हो सके। यानी उन्हें राष्ट्रीय महिला आयोग का अध्यक्ष कैसे बनाया जाए।

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प्रफुल्लित नहीं है प्रफुल्ल

Posted on 05 October 2009 by admin

क्या प्रफुल्ल पटेल का मंत्रालय बदला जा सकता है? बताया जाता है कि पटेल के मंत्रालय चलाने के अंदाज से प्रधानमंत्री खुश नहीं हैं। पहले जेट एयरवेज के पायलेटों की हड़ताल हुई फिर एयर इंडिया के पायलेट भी जेट के नक्शे कदम पर चले, पीएमओ का मानना है कि पटेल ने पूरे हालात का ठीक से नियंत्रण नहीं किया वरना बात इतनी नहीं बढ़ती। पीएमओ प्रफुल्ल के इस रोने-धोने से भी खुश नहीं कि गाहे-बगाहे वे यह स्यापा अलापते हैं कि अब उनके लिए मंत्रालय में करने को कुछ खास बचा नहीं है। क्योंकि यूपीए के प्रथम शासनकाल में प्रफुल्ल ने अपने मंत्रालय के कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को सिरे से चढ़ाया था, जिसमें एयरपोर्ट के निजीकरण से लेकर विमानों की खरीद तक की बात शामिल है। सो पीएमओ ने प्रफुल्ल को चेता दिया है या तो वे अपने काम-काज का अंदाज बदले या नहीं तो फिर उनका मंत्रालय बदल दिया जाएगा।

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भागलपुर के भाग्य से

Posted on 19 September 2009 by admin

भागलपुर के भगवा सांसद शाहनवाज हुसैन की चिंताएं इस बात को लेकर बढ़ गई हैं कि गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दुबे का अक्सर भागलपुर आना-जाना लगा रहता है, मियां शाहनवाज इसे अपने संसदीय क्षेत्र में एक बाहरी व्यक्ति का अतिक्रमण मानते हैं। अब दुबे की मुसीबत यह है कि उनका पैतृक निवास स्थल भागलपुर संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कहलगांव में पड़ता है, और दुबे जी का संसदीय क्षेत्र भी पीरपैंती विधानसभा से लगा हुआ है। सो गोड्डा के रास्ते में भागलपुर आ जाना उनके लिए स्वाभाविक ही है। दुबे भी विक्रमशिला की खुदाई को लेकर पिछले काफी समय से प्रत्यनशील हैं, कई महीनों पहले निशिकांत दो चार्टर्ड विमानों की सेवाएं जापान के 20 सदस्यीय एक प्रतिनिधिमंडल को विक्रमशिला पहुंचे थे जिसकी अगुवाई जापान के प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार सीमादाहारू कर रहे थे। विक्रमशीला की खुदाई को लेकर धरने पर बैठे कांग्रेसी नेता सदानंद सिंह और वरिष्ठ नेता अंबिका प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से निशिकांत की तारीफ में कसीदे पढ़ दिए कि निशिकांत ही इस क्षेत्र का सच्चा बेटा है जो यहां के विकास को लेकर कुछ कर सकता है, यही बात शायद शाहनवाज को नागवार गुजर रही है।

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जेएम कैसे बने सीएम?

Posted on 18 September 2009 by admin

लगता है जगनमोहन रेड्डी इस दफे आंध्र में अपने दिवंगत पिता की गद्दी पाने से चूक जाएंगे, जगनमोहन को सीएम बनाने की इतनी उग्र मुहिम दस जनपथ को रास नहीं आई है, शायद इसीलिए मैडम सोनिया ने आंध्र में किसी ऐसे नेता को बतौर अगला सीएम बनाने की बात कही है जिनकी न सिर्फ जनता में स्वीकार्यता हो बल्कि वह दिवंगत राजशेखर रेड्डी के कद-काठी और जूते में भी फिट आ सके। जगनमोहन के बारे में वरिष्ठ कांग्रेसियों की राय बनी है कि वे राजनीति में अभी बहुत जूनियर है और अपनी राजनैतिक यात्रा में उन्हें कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी से सियासत का नया ककहरा सीखना चाहिए, तो क्या कार्यवाहक मुख्यमंत्री के. रोसैया की संभावनाएं ही कहीं बेहतर हैं?

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अडवानी पर लिब्रहान का ग्रहण

Posted on 18 September 2009 by admin

संसद के आने वाले सत्र में लिब्रहान आयोग का मुद्दा छाया रह सकता है। एटीआर (एक्शन टेकन रिपोर्ट) तैयार है और वह भी आशा के विपरीत, पहले यह कयास लगाया जा रहा था कि एटीआर अडवानी के प्रति लचीला और नरम रहेगी, पर बदले सियासी हालात में रिपोर्ट की मंशा व धार दोनों ही बदल गई हैं, अडवानी के बजाए अब जोशी के प्रति एटीआर का रुख नरम रह सकता है, अडवानी के प्रति रिपोर्ट के तेवर सख्त रहने के आसार हैं। सूत्र बताते हैं कि विहिप और बजरंग दल जैसे उग्र हिंदूवादी संगठनों को घेरने के लिए पर्याप्त सबूत जुटा लिए गए हैं, कांग्रेस की मंशा इन दोनों संगठनों को प्रतिबंधित करने की है, जिससे कि देश के अल्पसंख्यकों को खुश किया जा सके। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति भी कांग्रेसी रूख में किंचित बदलाव आया है, केंद्रनीत सरकार का इरादा संघ पर नजर रखने का है और यकीनन इन बातों की झलक एटीआर में मिल सकती है। अडवानी, विनय कटियार, उमा भारती, कल्याण सिंह सरीखे नेताओं को विवादित ढांचे के विध्वंस का दोषी ठहराया जा सकता है, उन्हें षडयंत्र रचने का दोषी भी करार दिया जा सकता है। यानी एटीआर में आर-पार का ढेरो मसाला है।

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थरुर पर नहीं गुरूर

Posted on 18 September 2009 by admin

कभी थरूर पर कांग्रेसियों को था बड़ा गुरूर, क्योंकि महाशय दस जनपथ की आंखों के तारे थे, पर बदले सियासी परिदृश्य में जबसे शशि थरूर बड़े बेआबरू होकर दिल्ली के एक पंचतारा होटल से बाहर निकले हैं, राजनैतिक फलक पर उनका सितारा मध्दिम हुआ है। अभी-अभी भारतीय खुफिया विभाग ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को सूचित किया है कि मंत्री महोदय की कनाडियन धर्मपत्नी वहां की एक महत्वपूर्ण राजनयिक हैं, यानी यह मामला ‘कॉनफिलिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ का भी बनता है, यानी थरूर की धर्मपत्नी किसी और देश के विदेश सेवा में कार्यरत हैं और मंत्री जी यहां विदेश मंत्रालय में बतौर जूनियर जिम्मा संभाल रहे हैं। इनकी धर्मपत्नी क्रिस्टा गाइल्स का अमरीका, कनाडा, दुबई और केरल में अकेले 214.5 मिलियन का निवेश है। मंत्री जी के होटल बिल का भुगतान भी ‘अल्फास’ नामक एक कंपनी ने किया है। प्रधानमंत्री स्वयं इस पूरे मामले को किंचित गंभीरता से ले रहे हैं। सो आने वाले दिनों में या तो थरूर को अपना पद छोड़ना पड़ सकता है या उनका विभाग बदला जा सकता है।

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खेवनहार बनाम डूबनहार

Posted on 14 September 2009 by admin

भाजपा की असल चिंता पब्लिक में पार्टी की इमेज को लेकर है। 2004 के पिछले लोकसभा चुनाव में जब पार्टी की हार हुई थी तो तब प्रमोद महाजन थे जिन्होंने इस पराजय की नैतिक जिम्मेदारी दन्न से अपने ऊपर ले ली थी, एक अटल बिहारी वाजपेयी थे जिन्होंने नेता विपक्ष बनना भी गवारा नहीं किया, तब महाजन को वाजपेयी का खेवनहार कहा गया था। भाजपा की 2009 के चुनावों में हार एक अनाथ हार है, जिसका कोई स्वीकारर्-कत्ता नहीं। अडवानी के डूबनहार ने भी हार के महज दो दिन बाद एक अंग्रेजी दैनिक में एक लेख लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली कि ‘हम क्यों हारे?Ó उन्होंने इसे मध्यमार्गियों की जीत बताया। यानी इशारा साफ था कि संघ के मोहपाश से निकले बगैर पार्टी का भला नहीं होने वाला। उनकी इसी धारा को उनके अन्य मित्रों स्वप्नदास गुप्ता और सुधींद्र कुलकर्णी ने भी अपने लेखों में आगे बढ़ाया। यानी संघ पर हमला साफ था, ना नीयत दोयम थी, न विचार।

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शह-मात की बिसात

Posted on 14 September 2009 by admin

संघ प्रमुख का शुक्रवार को अटल बिहारी वाजपेयी से मिलना सिर्फ उनका खैरमकदम पूछना भर नहीं था अपितु भाजपा में बचे-खुंचे अटल वफादारों को यह संदेश भी देनाा था कि पार्टी में अब अडवानी युग के अवसान गीत गाने का समय आ गया है। सो, संघ ने फिर से अडवानी पर हल्ला बोल दिया है और उनसे कहा है कि पहले वे अपना नेता प्रतिपक्ष पद छोड़ें तब ही भाजपा को नया अध्यक्ष मिलेगा। और अडवानी ने अब भी लगातार यही हठ लगा रखी है कि पहले भाजपा को नया अध्यक्ष मिले तब ही वे अपना पद छोड़ेंगे। अडवानी-संघ की इस आपसी खींचतान से राजनाथ की बल्ले-बल्ले है, यानी जब तक भाजपा को नया अध्यक्ष नहीं मिलता है उनका कार्यकाल तो बस आगे खिंचता जाएगा…शायद तीन-चार महीने और…।

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एका की एकांकी

Posted on 14 September 2009 by admin

प्रख्यात नाटककार जॉर्ज बर्नड शॉ ने एक दफे कहा था- ‘मैंने अपने प्रीमियर की दो टिकटें तुम्हारे लिए रिजर्व रखी हुई हैं, अपने किसी मित्र के साथ आ जाना, वाकई अगर तुम्हारा कोई मित्र है।’ मंगलवार की दोपहर संघ ने ऐसा ही कुछ आह्वान राजनाथ से करवाया, संघ की मंशा, निमित्त बने राजनाथ और सूत्रधार रामलाल। सुषमा, जेतली और वेंकैया जरूर साथ आए राजनाथ के घर दोपहर के भोजन पर, पर उनके अंदर का मित्र कहीं पीछे छूट गया था। संघ ‘पोस्ट अडवानी जेनरेशन’ के इन नेताओं के बीच एका चाहता है, संघ की माने तो एक ‘फ्रेंडली जेस्चर’ पर खाने की टेबुल पर जो कुछ घटित हुआ उससे संघ की पेशानियों पर और भी बल पड़ गए।

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राहुल से मिले रामदेव

Posted on 05 September 2009 by admin

अपनी विदेश यात्रा से दो दिन पूर्व योग गुरू बाबा रामदेव राहुल गांधी से मिलने जा पहुंचे और दोनों में बातों का सिलसिला कुछ यूं चला कि देखते-देखते एक घंटा गुजर गया। अब राहुल की चौंकने की बारी थी, अतिशय विनम्रता का परिचय देते हुए उन्होंने बाबा के आने का मर्म जानना चाहा और यह भी जानना चाहा कि क्या वे उत्तराखंड में कहीं से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं? बाबा को युवा गांधी की यह पेशकश ज्यादा रास नहीं आई, बोले फिलहाल वे राजनीति से दूर रहना चाहते हैं। वह तो बाद में बाबा के एक चेले ने राहुल को समझाया कि आखिर बाबा चाहते क्या थे? क्या राज्यसभा में मनोनयन? यह तो राहुल जाने या फिर बाबा!

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