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दूबे गए चौबे बनने…

Posted on 06 October 2010 by admin

अभी जर्मनी के व्यापार मंत्री भारत के दौरे पर थे तो उन्हें राज्यसभा व लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष से भी मिलना था। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेतली, प्रणब मुखर्जी की मौजूदगी में यह देख कर हैरान रह गए कि नेता प्रतिपक्ष लोकसभा वहां खुद नहीं आकर अपने प्रतिनिधि के तौर पर गोड्डा के फर्स्ट टाइमर एमपी निशिकांत दूबे को भेज दिया है जो पूर्व में एक औद्योगिक समूह में बतौर डायरेक्टर कार्यरत थे, जेतली निशिकांत की मौजदूगी में सहज नहीं हो पा रहे थे, यहां तक कि वे निशिकांत को जर्मन मंत्री से मिलवाने की जरूरी औपचारिकता का निर्वहन भी नहीं कर पाए, मामला बिगड़ता देख प्रणबदा ने स्थिति संभाली और उन्होंने ही इस भगवा सांसद का परिचय विदेशी मंत्री से करवाया। बाद में पता चला कि सुषमा सिर्फ इस वजह से उस मीटिंग में नहीं आ पाई क्योंकि उनका कॉल-ऑन प्रधानमंत्री से था। आने वाले दिनों में यह मामला भगवा सियासत में तूफान ला सकता है क्योंकि दूबे गए थे चौबे बनने छब्बे बनकर आए।

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प्रफुल्ल की भूल

Posted on 06 October 2010 by admin

प्रफुल्ल पटेल अमरीकी शहर शिकागो के एयरपोर्ट पर धर लिए गए, वह भी भूल वश और उनसे घंटों कड़ी-पूछताछ हुई, बाद में भारतीय दूतावास के हस्तक्षेप के बाद ही उन्हें छोड़ा गया। दरअसल, लंदन में रहने वाला एक और अप्रवासी भारतीय प्रफुल्ल पटेल होने के शक पर उन्हें धर लिया गया था, वह प्रफुल्ल पटेल सत्ता का एक बड़ा सौदागर है और इत्तफाक से दोनों पटेलों की जन्मतिथि भी एक है। अब जाकर खुलासा हुआ है कि अपने मंत्री महोदय पटेल दरअसल डिप्लोमेटिक पासपोर्ट रखते ही नहीं, उसकी जगह वे नीले रंग वाले आम भारतीय पासपोर्ट पर सफर करते हैं, अगर डिप्लोमेटिक लाल पासपोर्ट होता तो शायद पटेल साहब की इस कदर धर पकड़ नहीं होती। यहां तक कि पटेल न तो अपने साथ सरकारी सुरक्षा रखते हैं और न ही कभी भारत के किसी शहर में लालबत्ती वाली गाड़ी में ही सफर करते हैं। यानी पटेल साहब देश-विदेश की अपनी हर यात्रा को प्राइवेट रखना चाहते हैं और गुप्त भी, मगर क्यों? भई मंत्री से पहले वे एक बड़े व्यापारी हैं, सो मामला बिजनेस के लेनदेन का भी हो सकता है, आकर्षक-स्मार्ट तो हैं ही, सो बात आगे भी बढ़ सकती है।

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गम है कि गृह मंत्री हैं चिदंबरम

Posted on 06 October 2010 by admin

‘चौदहवें चांद को फिर आग लगी है, देखो फिर बहुत देर तलक आज उजाला होगा …राख हो जाएगा तो कल फिर से अमावस होगी (गुलजार)’ क्यों खेलते हैं सियासतदां ऐसे खेल? क्यों भड़काते हैं जन भावनाएं…और आम जनता के लरजते दर्दों-गम पर सेंकते हैं अपनी सत्ता की रोटियां? इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का इतना बड़ा फैसला आया, और लोगों ने इसे सिर-माथे लगाया, पर मुलायम, लालू, कोई रिटायर्ड जज सच्चर, कोई कांग्रेस प्रायोजित न्यूज चैनल और यहां तक कि देश के गृह मंत्री भी इन शांत लहरों में पत्थर उछाल रहे हैं। चिदंबरम कहते हैं ‘यह निर्णय नहीं एक ‘रेफरेंस’ भर है, तीन महीने बाद सुप्रीम कोर्ट स्टे दे देगा और फिर मामला सालों यूं ही कानूनी दांव-पेंच में उलझा रहेगा।’ क्यों स्टे देगा सुप्रीम कोर्ट वकील मंत्री जी? इस फैसले में शामिल सुधीर अग्रवाल युवा सोच के युवा जज हैं, जिनका आज तक कोई भी फैसला सुप्रीम कोर्ट में कभी ‘रिवर्ट’ नहीं हुआ है, वे साइंस के स्टूडेंट रहे हैं सो, उनकी सोच भी उतनी ही लॉजिकल और मॉडर्न है और अंग्रेजी भी वे चिदंबरम से कहीं ज्यादा जानते हैं। जस्टिस खान भी साइंस के स्टूडेंट रहे हैं, और उनकी इतिहास में गहरी अभिरूचि रही है, उन्होंने कई किताबें भी लिखी है, लिहाजा उन्होंने अपने निर्णय में चार्ल्स डार्विन का भी उल्लेख किया है। जस्टिस शर्मा का व्यक्तित्व तो सबसे निराला है, वे आस्तिक हैं, बैचलर हैं, और इन सबसे दीगर एक जाने-माने ‘फिलॉनथ्रॉफिस्ट’ हैं, यानी वे अपना नाम गुप्त रख कर अपनी सारी कमाई सामाजिक कार्यों में लगा देते हैं, उन्हें हिंदी बोलना और जमीनी लोग पसंद हैं, और उनके कई निर्णय कालांतर में मील का पत्थर साबित हुए हैं, सो, माननीय गृह मंत्री जी कुछ बोलने से पहले सोचिए और यह भी सोचिए कि जिस कुर्सी पर आप विराजमान हैं, वह सियासी राग-द्वेष से इतर है, सो आपकी भावनाएं भी उसी अनुरूप होनी चाहिए।

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खतरे में शीला की गद्दी

Posted on 19 September 2010 by admin

कॉमनवेल्थ खेल के खत्म होने के तुरंत बाद देश में जांच एजेंसियों का खेल शुरू होने वाला है, दनादन चार्जशीट तैयार होने वाली है और जितने भी लोग गेम्स के भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगा रहे हैं, सीबीआई की सब पर नजर है। खबर तो सबसे बड़ी यह सुनी जा रही है कि गेम्स के तुरंत बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी चलता किया जा सकता है। दामन जब सबके दागदार हों तो ऐसे में कौन वह राजदार होगा दस जनपथ जिसे दिल्ली की गद्दी सौंपना चाहेगा? सवाल यही तो सबसे बड़ा है।

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पराजय गोयल

Posted on 19 September 2010 by admin

असम में अपनी खासी किरकिरी करा चुके विजय गोयल ने पार्टी हाईकमान से गुहार लगाई है कि उन्हें असम के बजाए किसी अन्य प्रमुख राज्य का प्रभार दिया जाए। सूत्र बताते हैं कि गोयल की नजर में वैसे भी असम एक ‘ड्राई-स्टेट’ है, सो उनकी नजर एक मलाईदार स्टेट उत्तराखंड पर टिकी है, जहां भाजपा की सरकार है सो, बड़े सौदे-मसौदों के लिए वहां स्कोप भी ज्यादा है, और स्कूप कम हैं। कहते हैं गोयल की असम के चुनाव प्रभारी वरुण गांधी से नहीं पटी, सनद रहे कि जब ये दोनों नेता प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में हिस्सा लेने गुवाहाटी पहुंचे साथ-साथ, तो एयरपोर्ट पर एकत्रित तमाम भीड़, वाहन व समर्थक भाजपा के युवा गांधी बटोर ले गए और वहां एयरपोर्ट पर गोयल को रिसीव करने को भी कोई नहीं बचा, बाद में गोयल एक नैनो कार की सवारी कर मीटिंग-स्थल पर पहुंचे और उन्हें नैनो कार वाले को बकायदा पैसे चुकाने पड़े। यही तो सियासत है गोयल साहब, जहां नेता-जनता का फर्क बड़ा है, नेता रबड़ी-जलेबी से पट जाते हैं, पर जनता को युवा गांधी जैसा जुझारूपन चाहिए होता है।

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रेड्डियों पर फिल्म का सियासी इल्म

Posted on 19 September 2010 by admin

कर्नाटक को लेकर भाजपा की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही, प्रदेश के भगवा मुख्यमंत्री येदुरप्पा की अपनी ही सरकार के दो मंत्रियों से तनी हुई है, ये दोनों बेल्लारी के चर्चित रेड्डी बंधु है जो अक्सरां सुर्खियों में बने रहते हैं। येदुरप्पा की एक करीबी और पूर्व में सरकार में मंत्री रह चुकी शोभा को लगता है रेड्डी बंधुओं की वजह से ही उन्हें कालांतर में मंत्री पद छोड़ना पड़ा था, सो वो भी रेड्डी बंधुओं को ठिकाने लगाने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहतीं, चुनांचे उन्होंने मुख्यमंत्री के कथित इशारे पर दिल्ली के एक चर्चित बंगाली पत्रकार को एक मोटी रकम देकर रेड्डी बंधुओं के खिलाफ एक फिल्म बनवाई है। यह फिल्म नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर या इंडिया हैबिटेट के ऑडिटोरियम में जल्द ही दिखाई जाने वाली है। क्या कर्नाटक की फिल्म का पहला शो दिल्ली में महज इसीलिए रखा गया है कि येदुरप्पा भाजपा के ही केंद्रीय नेतृत्व को आइना दिखाना चाहते हैं, पर कम से कम रेड्डी बंधु तो पीठ दिखाने वालों में से नहीं, जाहिर है वे भी अपने मुख्यमंत्री पर पलटवार के लिए एकदम तैयार बैठे हैं।

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जेतली के चाहने वाले

Posted on 12 September 2010 by admin

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेतली अपने शारीरिक व सियासी स्वास्थ्य को लेकर खासा सजग रहते हैं, लोदी गार्डन में उन्हें नियम से सुबह-शाम की सैर करते देखा जा सकता है, जेतली अब भाजपा के शीर्ष नेताओं में शुमार होते हैं, चुनांचे जब वे टहलते हैं तो उनके पीछे टहलदारों की एक पूरी फौज भी टहलती है, वॉक खत्म होने के बाद वहीं पार्क में तीन बेंचों को जोड़कर उनकी एक महफिल सजती है, जिसमें जेतली के घोषित अनुनाई धैर्यपूर्वक विभिन्न विषयों पर उनका प्रवचन सुनते हैं। जब एक दिन अभी महफिल सजने ही वाली थी कि एक मोटा-सा व्यक्ति उन बेंच पर आकर पहले से जम गया, जेतली समर्थकों ने उन्हें लाख समझाने की चेष्टा की पर सब व्यर्थ, वह पार्क में कहीं और बैठने को राजी ही नहीं था। उसका कहना था कि चूंकि पार्क एक सार्वजनिक जगह है, लिहाजा उसे यहां से हटाया नहीं जा सकता। कई दिनों तक यह सिलसिला चला, एक दिन एक जेतली समर्थक ने उस व्यक्ति से कहा-‘ब्रदर क्यों रंग में भंग डालते हो, कहीं और जाकर बैठो तो मैं तुम्हें लाख रुपए दूं’ उस स्थूलकाय व्यक्ति ने पलटवार किया-‘मुझे यहीं बैठने दो, चाहो तो दो लाख ले लो!’ दरअसल वह व्यक्ति दिल्ली का एक मशहूर प्रापर्टी डीलर है, जो कभी जेतली जी के करीबियों में शुमार होता था, पर उसके मुंहफट स्वभाव के चलते इन दिनों जेतली ने उनसे दूरियां बढ़ा ली है।

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कपिल की जगह नीलकेणी? कांग्रेस के दो काबीना मंत्रियों चिदंबरम व सिब्बल ने अघोषित तौर पर खुद को ‘पीएम इन वेटिंग’ मान लिया है, चिदंबरम की पाकिस्तान यात्रा, उनकी हालिया भाव-भंगिमाएं इस बात की चुगली खाती हैं, सिब्बल भी अपने कामकाज में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की परवाह नहीं करते। दस जनपथ और राहुल गांधी की इन दोनों मंत्रियों पर निगाहें हैं, खासकर सिब्बल को राहुल करीबियों ने एक नया नाम दे दिया है ‘मिनिस्टर फॉर एनाऊंसमेंट’ और ऐसी हर घोषणा का बाद में जरूरी तौर पर खंडन भी आ जाता है। सो, राहुल की नजर एक ऐसे व्यक्ति पर टिकी है जिन्हें वे देश का अगला मानव संसाधन विकास मंत्री देखना चाहते हैं, वे हैं इंफोसिस के नंदन नीलकेणी, राहुल उन्हें ‘वंडर ब्यॉय’ कहते हैं, साथ यह भी मानते हैं कि देश में आइटी क्रांति लाने में नीलकेणी का एक बड़ा हाथ है। क्या कपिल के लिए मुश्किल घड़ी आने वाली है?

Posted on 12 September 2010 by admin

कांग्रेस के दो काबीना मंत्रियों चिदंबरम व सिब्बल ने अघोषित तौर पर खुद को ‘पीएम इन वेटिंग’ मान लिया है, चिदंबरम की पाकिस्तान यात्रा, उनकी हालिया भाव-भंगिमाएं इस बात की चुगली खाती हैं, सिब्बल भी अपने कामकाज में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की परवाह नहीं करते। दस जनपथ और राहुल गांधी की इन दोनों मंत्रियों पर निगाहें हैं, खासकर सिब्बल को राहुल करीबियों ने एक नया नाम दे दिया है ‘मिनिस्टर फॉर एनाऊंसमेंट’ और ऐसी हर घोषणा का बाद में जरूरी तौर पर खंडन भी आ जाता है। सो, राहुल की नजर एक ऐसे व्यक्ति पर टिकी है जिन्हें वे देश का अगला मानव संसाधन विकास मंत्री देखना चाहते हैं, वे हैं इंफोसिस के नंदन नीलकेणी, राहुल उन्हें ‘वंडर ब्यॉय’ कहते हैं, साथ यह भी मानते हैं कि देश में आइटी क्रांति लाने में नीलकेणी का एक बड़ा हाथ है। क्या कपिल के लिए मुश्किल घड़ी आने वाली है?

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सबसे बड़े खिलाड़ी गडकरी

Posted on 12 September 2010 by admin

कभी बेहद हड़बड़ी में दिख रहे गडकरी ने खुद को संयत रखना सीखा है, कम से कम झारखंड के हालिया प्रकरण में उन्होंने जैसे अपने पार्टी दिग्गजों अडवानी, सुषमा व जेतली को भी आइना दिखाने का काम किया है। अडवानी व सुषमा पूरी तरह से शिबू सोरेन के साथ मिलकर झारखंड में सरकार बनाने के खिलाफ थे। सो, गडकरी ने अपने विश्वस्त सहयोगियों (मसलन पीयूष गोयल, राजनाथ सिंह) के साथ मंत्रणा कर एक व्यूह रचना कर डाली यहां तक कि उन्होंने इस मामले में पार्टी की संसदीय बोर्ड की राय जानने की भी जहमत नहीं उठाई, पीयूष गोयल को ‘ऑपरेशन झारखंड’ का इंचार्ज बनाया गया और उनके सहयोगी के तौर पर अजय संचेती, तुलसी अग्रवाल, संदीप कालिया व नरेश ग्रोवर ने भी मोर्चा संभाल लिया। अजय व नरेश नागपुर के बिल्डर है, संदीप कालिया मुंबई के हैं और उनकी तारीफ इस कॉलम में पहले भी लिखी जा चुकी है। अपने लोगों को काम में लगा गडकरी स्वयं रूस चले गए, जहां उनसे संपर्क साधना भाजपा के अन्य सीनियर नेताओं के लिए मुमकिन न था, गडकरी का ओवरसीज संपर्क नंबर पीयूष गोयल और उनके चारोेंं साथियों के पास था, गडकरी रूस में लगातार अपने इन लोगों के संपर्क में थे, और वे अवतरित भी तब हुए जब झारखंड में अर्जुन मुंडा सरकार बनने का रास्ता प्रशस्त हो गया।

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प्रवचन अडवानी

Posted on 05 September 2010 by admin

भाजपा के सभी ‘फर्स्ट टाइमर’ यानी पहली दफा सांसद बने 45 संसद सदस्यों को दिल्ली से लगे नरेला के झिंझोली शिविर में राजनैतिक प्रशिक्षण के लिए ले जाया गया, संघी तर्ज पर यह एक दिन का प्रवास था, जिसमें अडवानी मुख्य वक्ता थे। पर उक्त शिविर में इस कदर अव्यवस्था का आलम था कि कुछ पूछिए मत, एक-एक कमरे में तीन-तीन सांसदों को ठहराया गया, भगवा सांसदों को सुबह चार बजे ही उठा दिया गया। दैनिक क्रिया, व्यायाम, योगा, सोना बाथ व मसाज के बाद नौ बजे परांठे, सब्जी व दही का नाश्ता दिया गया। कर्नाटक के बिचारे एक सांसद को तो सोते में चूहे ने काट लिया, जिन्हें बाद में रेबीज का इंजेक्शन लगवाना पड़ा। खैर, दस बजे से अडवानी का प्रवचन आहूत था, कोई सवा दो घंटे बोले अडवानी जी, पर तब तक आधे सांसद तो बैठे-बैठे सो गए थे, बाकी झपकी ले रहे थे, जो सामने की कतार में थे, वे बमुश्किल अपनी उनींदी आंखें खोल पा रहे थे, उस पर अडवानी का हर पल दो पल में तुर्रा था कि ‘आप अपनी नोट बुक्स निकाल लें, जरूरी नोट्स ले लें, मुख्य बिंदू नोट रहेगा तो भविष्य में आसानी होगी।’ पर भाजपा के भविष्य और चंद जगे सांसदों ने समवेत स्वर में कहा-‘नहीं सर, हमें याद रहेगा।’ क्या अडवानी का प्रवचन? या शिविर के कड़ुवे अनुभव?

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