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राजा को नहीं चाहिए बेल

Posted on 04 December 2011 by admin

रानी कनिमोझी को 2जी मामले में भले ही बेल मिल गई हो, पूर्व संचार मंत्री ए. राजा ने बेल पर बाहर आने से मना कर दिया है। सूत्र बताते हैं कि राजा ने अपने वकीलों से कहा है कि वे ‘बेल एप्लिकेशन’ मूव न करे क्योंकि बाहर आने पर उन्हें उनकी जान का खतरा है, उन्हें डर है कि उनका हश्र भी सादिक बच्चा सा हो सकता है, जिनकी आकस्मिक मौत की गुत्थी अब तक सुलझी नहीं है। जबकि कोर्ट और जेल में राजा के आचरण को देखते हुए इस बात की पूरी संभावना व्यक्त की जा रही थी कि उन्हें बेल मिल सकती है। राजा लॉ-ग्रेजुएट हैं, उन्हें कानून की बारीक समझ है और उनकी कानूनी समझ को देखते हुए तो कई बार उसके वकील भी हैरान हो जाते हैं। पर अब जो राजा कह रहे हैं यह उनके सियासी समझ का ही द्योतक है।

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मजबूरी में गडकरी

Posted on 27 November 2011 by admin

भगवा राजनीति में कॉरपोरेट शैली के प्र्रवत्तक राजनेता गडकरी सातवें आसमान पर हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने की अपनी इच्छा को सार्वजनिक कर भाजपा की अंदरूनी सियासत में तूफान ला दिया है। अब सवाल सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि वे अगला लोकसभा चुनाव नागपुर से लड़ेंगे या वर्धा से। नागपुर उनकी कर्मस्थली रही है। परचूनी के धंधे से लेकर पोस्टर चिपकाने का उपक्रम उन्होंने वहीं साधा है। गोया कि संघ का मुख्यालय भले ही नागपुर में रहा हो पर भाजपा कभी भी यहां से (1996 को छोड़कर) लोकसभा चुनावों जीत दर्ज नहीं करा पाई है। सो, राजनीति के चतुर सुजान गडकरी जानते हैं कि अगर उन्हें नागपुर से लड़ना है तो उन्हें कांग्रेसी दांव-पेंच आजमाने ही होंगे। यूं भी नागपुर से चुनाव लड़ना खासा महंगा उपक्रम है। आमजौर पर यहां प्रति चुनाव 6 से 7 करोड़ रुपए खर्च होते आए हैं लिहाजा सटोरियों ने अभी से इस बात पर सट्टा लगाना शुरू कर दिया है कि अगर गडकरी यहां से चुनाव लड़ते हैं तो थैली का मुंह और कितना खुलेगा? क्योंकि गडकरी थैली की बोली को समझते हैं और इसके प्रबंधन में भी उन्हें महारथ हासिल है। गडकरी जब भाजपा-शिवसेना की महाराष्ट्र सरकार में लोक निर्माण मंत्री थे तो इंफ्रास्ट्रक्चर की कई बड़ी योजनाएं लेकर नागपुर आए थे। पर नागपुर में गडकरी को मंझे कांग्रेसी नेता विलास मुत्तेमवार का सामना करना पड़ सकता है। लिहाजा उनकी नजर पास की वर्धा सीट पर भी है। जहां पिछले चुनाव में भाजपा के सुरेश वाघमारे दत्ता मेघे के हाथों चित हो गए थे। वैसे भी वाघमारे की गडकरी से कभी पटी नहीं और कांग्रेसी दत्ता मेघे गडकरी के अभिन्न मित्रों में से रहे हैं। और अभी हाल ही में दत्ता मेघे ने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। जानने वाले जानते हैं कि दत्ता ने यह कदम आखिरकार उठाया क्यों? सो, अगला लोकसभा चुनाव गडकरी के लिए एक निर्णायक पेनेल्टी किक के मानिंद है। उनका रूख, बॉडी लैंग्वेज भले ही नागपुर की ओर हो पार्टी में अपने चिरंतन विरोधियों को चकमा देते हुए दरअसल वे अपनी जीत का निर्णायक गोल तो वर्धा में ही दाग सकते हैं। यह उनकी अदा भी है और सियासी मजबूरी भी।

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संसद परिसर में ‘डर्टी पिक्चर?

Posted on 27 November 2011 by admin

जब से लोकसभा व राज्यसभा टीवी का प्रादुर्भाव हुआ है, सदन की तस्वीर जस की तस लोगों के सामने है। सो, ऐसे में अपने मेगा धारावाहिकों का मोह छोड़कर फिल्म व्यवसाय के क्षेत्र में ‘रागिनी एमएमएस’ और ‘डर्टी’ पिक्चर जैसी कथित साफ्ट पॉर्न फिल्में लेकर मैदान में उतरीं एकता कपूर को एक नायाब आइडिया आया। उन्होंने अपने ‘डर्टी’ पिक्चर के हीरो इमरान हाशमी को प्रचार व पब्लिसिटी के लिए सीधे पार्लियामेंट हाउस ही भेज दिया। वह तो शुक्र मनाइए भाजपा नेता स्मृति इरानी का जिनके जोरदार विरोध के बाद ‘किसिंग हीरो’ के नाम से ख्यात हाशमी को उल्टे पांव लौटना पड़ा नहीं तो वे अपने ‘डर्टी इरादों’ की झलक पार्लियामेंट में दिखा ही जाते।

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मनमोहन के ब्लैक मनी मिनिस्टर्स

Posted on 27 November 2011 by admin

काले धन के मुद्दे पर केंद्रनीत यूपीए सरकार का रवैया इतना सुरक्षात्मक क्यों है? विश्वस्त सूत्रों के दावों पर यकीन करें तो कम से कम 5 केंद्रीय मंत्रियों पर भी शक की सुई गहरा रही है, इसमें से कम से कम दो मंत्री मध्यप्रदेश के बताए जाते हैं, एक पंजाब से हैं, एक दिल्ली से लगे साथी राज्य से। जो कथित लिस्ट भारत सरकार के कब्जे में बताई जाती है उसमें 792 भारतीयों के नाम शामिल हैं। 10 करोड़ रुपयों से लेकर 8 हजार करोड़ रुपए तक खाताधारियों के अकाऊंट में बताए जा रहे हैं। सबसे ज्यादा पैसा देश के एक कॉरपोरेट घराने के अधीनस्थ चलने वाले एक ट्रस्ट का बताया जा रहा है। स्विट्जरलैंड के विभिन्न बैंकों से पहले भी कई बार खाताधारियों के नाम लीक हुए हैं, लिस्ट चोरी भी हुई है, एक बार ऐसी ही लिस्ट को जर्मन सरकार ने मुंहमांगे दामों पर खरीद लिया था।

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अडवानी की फ्लॉप यात्रा

Posted on 19 November 2011 by admin

अडवानी की बहुप्रचारित जन चेतना यात्रा बस समाप्त होने वाली है। यूपी के बिजनौर के धामपुर में अडवानी की सभा में 5 हजार कुर्सियां लगाई गईं थीं। पर इसमें से दस फीसदी कुर्सियां ही बस भर पाईं। अडवानी नाराज हुए अनंत कुमार की ओर मुड़े और बेहद तल्खी से कहा-‘सिंपली रिडिकुलस।’ उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है सो वहां भीड़ जुटाने के पुख्ता इंतजाम हुए। सरकारी बसों में लोग भरकर लाए गए, प्रदेश सरकार ने भीड़ जुटाने के लिए अपनी सारी मशीनरी दांव पर लगा दी तब कहीं जाकर लोग जुटे।

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आओ मनमुटाव दूर करें

Posted on 19 November 2011 by admin

संसद के मानसून सत्र में कई ऐसे वाकये घटित हुए जिससे लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार व नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज के बीच रिश्तों में दरार साफ देखी गई। तेलांगना मुद्दे पर सुषमा की स्पीच में क्या खूब टोका-टाकी हुई, जवाब में सुषमा ने अन्ना मुद्दे पर राहुल गांधी के भाषण की धाियां उड़ायी और राहुल को समय देने के मामले पर स्पीकर के निर्णय पर सवाल उठाए। फिर लोकसभा सचिवालय में महासचिव की नियुक्ति का मुद्दा भी सुषमा ने प्रमुखता से उठाया। पर अब लगता है कि मीरा कुमार मैडम स्वराज की नाराजगी दूर करने की कोशिश कर रही हैं। पहले तो दीपावली के मौके पर उन्होंने भाजपा नेत्री को एक सुंदर सी साड़ी भेंट की, अब ऐन शीतकालीन सत्र शुरू होने से ठीक पहले सुषमा के हाथों को गर्मजोशी से थाम दैनिक अखबारों में बड़े फोटो छपने के मौके दिए। यह सब इसलिए कि कम से कम संसद का शाीतकालीन सत्र तो ठीक-ठाक से निपटे।

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गडकरी के फैसले की घड़ी

Posted on 19 November 2011 by admin

12 दिसंबर को नागपुर हाई कोर्ट का एक अहम फैसला आने वाला है जो भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी के राजनैतिक भविष्य का फैसला कर सकता है। और यह भी फैसला कर सकता है कि गडकरी को दूसरा अध्यक्षीय टर्म मिलेगा कि नहीं। योगिता ठाकरे का परिवार हर संभव लड़ाई लड़ने के मूड में है। पर कांग्रेस है कि इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देना चाहती, क्योंकि बतौर भाजपाध्यक्ष गडकरी कांग्रेस को सूट करते हैं। वैसे 12 दिसंबर महाराष्ट्र भाजपा के एक महत्वपूर्ण नेता गोपीनाथ मुंडे का जन्मदिन भी है। पर यह महज इत्तफाक है कि इससे गडकरी व मुंडे के वर्चस्व की लड़ाई का कोई लेना-देना नहीं।

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कर्नाटक में भाजपा पर संकट

Posted on 13 November 2011 by admin

बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं के करीबी श्रीरामलू ने पैंतरे बदल लिए हैं। इनके समर्थकों ने बेल्लारी इलाके में भाजपा के पोस्टर-बैनर-झंडे हटाने शुरू कर दिए हैं यानी बेल्लारी से कभी भी भाजपा का तंबू उखड़ सकता है। येदुरप्पा भी जेल से छूट आए हैं और उनका दावा है कि उन्हें अभी भी 70 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। वे जब भी चाहे कर्नाटक की भाजपा सरकार को जमीन सुंघा सकते हैं। पर इससे पहले श्रीरामलू देवेगौड़ा के साथ मिलकर राज्य में एक नई पार्टी की गठन की कोशिशों में जुट गए हैं। समझा जाता है कि उनकी इस मुहिम को येदुरप्पा का भी आशीर्वाद प्राप्त है। आशंकाओं के गहराते-मंडराते बादलों की आहटें पढ़कर गडकरी ने फौरन श्रीरामलू से बात की तो श्रीरामलू का दो टूक कहना था कि खनन व्यवसाय से जुड़े लोग किस पार्टी में नहीं है,क्या कांग्रेस के साथ ऐसे लोग नहीं हैं? पर कांग्रेस जैसे दल हमेशा अपने लोगों का बचाव करते हैं, जबकि भाजपा में अपने ही लोगों के कपड़े उतारे जाते हैं। श्रीरामलू के उग्र तेवरों को देखते हुए गडकरी ने चुप्पी साध लेने में ही भलाई समझी।

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यूपीए में जंग की टंकार

Posted on 13 November 2011 by admin

प्रणब मुखर्जी और चिदंबरम के बीच संग्राम को भले ही आलाकमान ने बीच-बचाव करके इस पर विराम लगवा दिया हो, पर दोनों नेताओं के बीच शीतयुध्द अब भी जारी है। और कयास लगाए जा रहे हैं कि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान यह शीतयुध्द कभी भी भभक कर आग पकड़ सकती है और कोहराम मच सकता है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि केंद्रनीत सरकार में सबसे शक्तिशाली तिकड़ी प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री के दरम्यान इस कदर तलवारें खिंची हो कि ये तीनों सत्ता के संवैधानिक केंद्र एक दूसरे की जासूसी करवा रहे हों, इस तथ्य से अनजान कि अगर जब भी राज से पर्दा हटेगा तो बेपर्दा होगी यूपीए सरकार।

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नासाज सोनिया, बेजार कांग्रेस

Posted on 13 November 2011 by admin

अमरीका से लौटने के बाद से ही सोनिया गांधी के मुलाकातियों की लिस्ट काफी छोटी हो गई है। वहां से लौटने के बाद जब उन्होंने मुलाकातियों को मिलने का वक्त देना शुरू किया तो उस लिस्ट में बमुश्किल तीन-चार नाम हुआ करते थे, अब यह संख्या बढ़ कर आठ से दस लोगों तक पहुंची है। और उन्हें भी मात्र 2 से तीन मिनट का समय मिल पा रहा है जो कि नाकाफी है, सोनिया ने पार्टी में एक अघोषित-सा निर्देश जारी किया हुआ है कि उनसे मिलने के इच्छुक लोग राहुल से मिलकर उन तक अपनी बात रख सकते हैं, पर कांग्रेस में हर फरियादी का मक्का तो सोनिया ही है, शायद यही वजह है कि कांग्रेस में बेचैनी का आलम बरकरार है, कई बड़े व महत्त्वपूर्ण मामले लंबे समय से लंबित पड़े हैं, कोई बड़ा फैसला नहीं हो पा रहा है।

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