Posted on 11 January 2012 by admin
जब यह मसला सरकार के पास आया तो उस वक्त कैबिनेट की मीटिंग चल रही थी। मीटिंग के बाद इस मसले पर विचार करने के लिए 5 लोग रूक गए, प्रधानमंत्री, चिदंबरम, प्रणब मुखर्जी, ए.के.एंटोनी व सलमान खुर्शीद। प्रणब इस पक्ष में थे कि इस मसले को और उलझाना ठीक नहीं क्यों नहीं इन्हें 2012 में ही रिटायर कर दिया जाए, तो पीएम ने कहा कि अगर ये 2012 में रिटायर होंगे तब एक सिख सेना प्रमुख बन जाएगा। और तब अंगुली उनकी ओर उठेगी, तब चिदंबरम ने कहा ठीक है अगले को बना देते हैं, इस पर पीएम ने कहा कि वह एक मराठी है उसे बनाने से सिख समुदाय में मेरे प्रति नाराजगी जाएगी कि मैंने जे.जे.सिंह को तो बनवा दिया, पर एक जट सिख को नहीं बनने दिया। ये पांचों शीर्ष नेता मिलकर भी किसी सामूहिक फैसले पर नहीं पहुंच पाए, नतीजन ऊहापोह का आलम बरकरार है।
Posted on 11 January 2012 by admin
आर्मी प्रमुख वी.के.सिंह के जन्म प्रमाण पत्र का मसला फिर से सुर्खियों में है। वे जब 1965 में एनडीए में शामिल हुए थे तो 1951 के हिसाब से कम उम्र थे, तब संभवत: इनके पिता ने इनकी 1950 की तिथि लिखवा दी थी। इन्होंने अपनी उम्र का मुद्दा खुद ही उठाया। इनके पिता जब पुणे में थे तब वे वहां के आर्मी अस्पताल में पैदा हुए थे, उनका बर्थ सर्टिफिकेट भी वहीं का लगा है। जब उन्होंने अपने जन्मतिथि का मुद्दा उठाया तो सरकार ने मान लिया कि ‘ठीक है आपके जन्म का वर्ष 1950 ही रहेगा’ और तब उन्होंने इसे मंजूर भी कर लिया था। जब वे थल सेना प्रमुख बनाए गए तो सरकार ने मान रखा था कि वे 31 मई 2012 को रिटायर हो जाएंगे। अब इसमें पेंच यह है कि अगर वे 2012 में रिटायर होते हैं तो अगले सेना प्रमुख बिक्रम सिंह बनेंगे, जो एक जट सिख हैं। अगर इनकी जन्मतिथि 1951 मान ली जाती है तब ये 2013 में रिटायर होंगे और इनकी जगह नार्दन आर्मीकमांडर महाराष्ट्र के लेफ्टिनेंट जनरल के.टी.परनाईक आर्मीचीफ बनेंगे।
Posted on 27 December 2011 by admin
छत्तीसगढ़ के भाजपाई मुख्यमंत्री रमण सिंह पर अब से पहले सिर्फ भाई-भतीजावाद व जातिवाद के आरोप ही लगते रहे थे, भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी ने जो छत्तीसगढ़ में एक ताजा जनमत सर्वेक्षण करवाया है और इस सर्वेक्षण के नतीजों ने पार्टी की रातों की नींद छीन ली है। यह सर्वे कहता है कि अगर मौजूदा समय में छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हुए तो वहां भाजपा की लुटिया डूब सकती है। सर्वे के मुताबिक अगर अभी चुनाव हुए तो वहां 55 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभर सकती है। रमण सिंह की अगुवाई में भाजपा को महज 26 सीटों से ही संतोष करना पड़ेगा। लोकप्रियता की दौड़ में भी भगवा मुख्यमंत्री रमण सिंह पिछड़कर चौथे नंबर पर आ गए हैं। सबसे पहले चरणदास महंत, फिर विद्याचरण शुक्ल, तीसरे नंबर पर अजीत जोगी और चौथे नंबर पर रमण सिंह। रमण काल के लिए अवसान गीत गाने का समय आ गया है?
Posted on 27 December 2011 by admin
5 राज्यों के इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हौंसले बुलंद हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि वह उत्तराखंड व पंजाब में पहले से कहीं बेहतर प्रदर्शन करेगी। यूपी में अजित सिंह से गठबंधन और मुस्लिम आरक्षण के शिगूफे की वजह से वहां कांग्रेस की हवा बनी है। अब कांग्रेस को लगता है कि वह अपने दमखम पर यूपी में 50 से ज्यादा सीटें जीत सकती है। अजित भी 20 के करीब पहुंच सकते हैं और मुलायम सिंह 130 के आसपास। यानी मुलायम, अजित व कांग्रेस मिलकर यूपी में जरूरी बहुमत का जुगाड़ कर सकते हैं इस बार।
Posted on 27 December 2011 by admin
तमाम सियासी झंझावतों से जूझ रही कांग्रेस सरकार की निर्भरता अपने ‘क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप’ पर बढ़ती ही जा रही है। पार्टी और सरकार में दरकिनार कर दिए गए पी. चिदंबरम भी इस ग्रुप के एक अहम सदस्य हैं। इस ग्रुप के अन्य सदस्यों में कपिल सिब्बल, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद और पवन बंसल हैं। विपक्ष से जूझने-भिड़ने की रणनीतियों को भी यही मंत्री समूह अंतिम रूप देता है। संसद के 9 नंबर कमरे में दिन के तकरीबन 1 बजे इस गु्रप की अहम बैठक में महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं। अगर कभी-कभार यह ग्रुप 9 नंबर कमरे में नहीं जुटता तो फिर अंबिका सोनी के कमरे में यह जमावड़ा जुटता है। शायद यही वजह है कि पीआईबी रूम में अंबिका सोनी व कपिल सिब्बल अक्सर साथ दिख जाते हैं।
Posted on 11 December 2011 by admin
सुषमा स्वराज ने अपने सियासी चातुर्य कौशल से विपक्षी दलों, यहां तक की वामपंथियों का दिल जीतने में भी कामयाबी पा ली। यह नेता प्रतिपक्ष का ही खालिस उपक्रम था कि उन्होंने विपक्षी एका की तान को बरकरार रखा। वामपंथी दल महंगाई पर चर्चा पहले चाहते थे और एफडीआई पर बाद में, सुषमा मान गईं। उन्होंने महंगाई पर डिबेट के लिए गुरूवार का दिन चुना और एफडीआई पर संसद में सोमवार का दिन बहस के लिए रखा। नेता प्रतिपक्ष ने लगभग तय कर रखा था कि किसी भी कीमत पर सदन में अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाना है, चाहे सरकार अल्पमत में ही क्यों न हो। सुषमा को बखूबी इस बात का इल्म था कि अगर एफडीआई पर वोटिंग की नौबत भी आई तो ममता विपक्ष का साथ नहीं देंगी। बसपा-सपा सौदा कर लेंगे, और वामपंथियों की राजनीतिक मजबूरी है कि वे भाजपा के ‘मोशन’ पर वोट नहीं करेंगे। सो, मैडम स्वराज ने तय कर रखा था कि अगर बात शक्ति परीक्षण पर ही आती है तो तस्वीर तो स्थगन प्रस्ताव पर भी साफ हो सकती है।
Posted on 11 December 2011 by admin
देश के प्रमुख ज्योतिषगण मनमोहन सरकार के भविष्य को लेकर चिंता जता रहे हैं। इन भविष्यवेताओं की राय है कि अप्रैल 2012 में केंद्र में सत्ता पलट हो सकता है या सरकार की कमान बदल सकती है। इस समय केंद्र में शुक्र की दशा चल रही है। फरवरी से शुक्र में राहू की अंतर्दशा शुरू हो जाएगी। शनै:शनै: यह भयंकर सियासी उथल-पुथल लेकर आएगा। केंद्र में वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर की सरकार के रूखसती के वक्त भी ग्रह-नक्षत्रों की यही दशा-दिशा थी। यानी अप्रैल 2012 में मनमोहन सरकार का जाना ज्योतिषगण तय बता रहे हैं। देखना दिलचस्प रहेगा कि तब क्या नए निजाम राहुल गांधी के हाथों में सत्ता की बागडोर आ सकती है?
Posted on 11 December 2011 by admin
आखिर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। अौर कब तक तमाम विपक्षी हमलों को झेलते हुए सुरक्षित रह पाएंगे पी. चिदंबरम। विपक्ष संसद में उनका बायकॉट कर रहा है, एक स्वामी तो बकायदा उनके खिलाफ धूनी रमा रहे हैं। कोर्ट में उनके खिलाफ दो गवाहों की गवाहियां अहम हैं, साथ 2जी मामले में फाइलों में कई अहम राज दफन हैं, जिससे चिदंबरम का भविष्य तय हो सकता है। वे अपने को बचाने की निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी इस लड़ाई में दिल्ली के दो बड़े अंग्रेजी दैनिक उनका साथ दे रहे हैं। दक्षिण भारत का भी एक अग्रणी अंग्रेजी दैनिक अब भी उनके स्तुतिगान में लगा है। एक वकील होने के नाते ज्यूडिशयरी में भी उनकी अच्छी पहचान है। एक कॉरपोरेट वकील होने के साथ वे देश के वित्त मंत्री भी रह चुके हैं। चुनांचे कॉरपोरेट जगत में भी उनके दोस्तों की काफी तादाद है। बावजूद इसके इस दफे पीसी के लिए इस सियासी लाक्षागृह से बच निकल पाना इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि विपक्ष अपने पूरे हमलावर अंदाज में उनके खिलाफ पूरी तरह मुस्तैद है।
Posted on 04 December 2011 by admin
प्रणबदा के प्रति ममता के दुलार की जगह एक अनजाने-अनदेखे आक्रोश ने ले लिया है। दीदी दादा से बहुत नाराज हैं, इतनी नाराज कि वह प्रणब दा को बंगाल से मंत्री मानने को भी तैयार नहीं। दीदी को लगता है कि दादा बतौर वित्त मंत्री बंगाल के साथ दोएमर् बत्ताव कर रहे हैं, बंगाल के हितों की अनदेखी कर रहे हैं। दीदी का वश चले तो वह सोनिया व मनमोहन से कह कैबिनेट से प्रणब की छुट्टी करवा दें, एफडीआई पर इसीलिए दीदी के तेवर इतने कड़े हैं।
Posted on 04 December 2011 by admin
राहुल गांधी अब यूपी के कांग्रेसी सांसदों व मंत्रियों से सख्ती से पेश आ रहे हैं। उन्होंने अपनी नाराजगी से अपने पार्टी नेताओं को वाकिफ करा दिया है। राहुल की चिंता दरअसल इस बात को लेकर है कि जब वे यूपी जाते हैं तब ही यूपी के नेतागण हरकत में आते हैं, उनके पीछे-पीछे मंत्री-सांसदों की पूरी टीम चलती है, पर जैसे ही युवराज दिल्ली वापिस आते हैं सब दिल्ली में ही रम जाते हैं। सो, राहुल ने अपने सांसदों व मंत्रियों की जिलेवार डयूटी लगा दी है। राहुल अपनी रौ में है और यूपी के ये विधानसभा चुनाव उनके लिए एक ‘लिटमस टेस्ट’ के मानिंद है, सो वह अपना हर कुछ दांव पर लगा रहे हैं। राहुल की नाराजगी कहीं न कहीं केंद्र सरकार और उनके मुखिया से भी है, राहुल को लगता है जब यूपी में सिर पर चुनाव हैं तो ऐसे में केंद्र सरकार उन मुद्दों को कैसे हवा दे सकती है जो प्रथम द्रष्टया ही जनविरोधी दिखते हैं। सो राहुल का मनमोहन व केंद्र सरकार के प्रति भी रवैया सख्त हुआ है।