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सीबीआई की भूल

Posted on 18 November 2013 by admin

कुमारमंगलम बिड़ला के हिंडाल्को के पार्लियामेंट स्ट्रीट स्थित ऑफिस पर जब कोल मामले को लेकर सीबीआई ने छापा मारा था तो जिस सेफ में उसे 25 करोड़ मिले थे उसी सेफ से कथित तौर पर एक डायरी भी मिली थी, समझा जाता है कि उस डायरी में उन तमाम पैसों के हिसाब-किताब दर्ज थे कि वे कहां से आए और किस मद में किस तारीख को खासकर राजनैतिक चंदे के रूप में कहां गए। पर इस मामले में पिंजरे में बंद तोते से एक गलती हो गई कि उसने इस डायरी की फोटो कॉपी अपने पास रखे बगैर इसे आयकर विभाग वालों को सौंप दी। और अब सीबीआई को कई अहम जानकारियों के लिए ईडी और इंकम टैक्स डिमार्टमेंट वालों के मुंह तकने पड़ रहे हैं।

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आप के द्वार

Posted on 11 November 2013 by admin

भाजपा की एक पूर्व मेयर समेत भाजपा और कांगे्रस के कई असंतुष्टï नेता/नेत्रियों ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में टिकट के लिए आप का द्वार खटखटाया है, दोनों ही पार्टियों के जितने प्रभावशाली नेताओं के टिकट कटे हैं, वे स्वयं या अपने सहयोगियों के मार्फत आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल से संपर्क साधा है, पर केजरीवाल के अपने वोट भले कम हों पर उनके हौंसले कहीं ज्यादा बड़े हैं, उन्होंने भाजपा-कांग्रेस असंतुष्टïो से साफ कर दिया है कि आप का टिकट सिर्फ वैसे उम्मीदवारों को मिल सकता है जिनके दामन पर किसी प्रकार के दाग न लगे हों, राजनीति में ऐसे नेताओं को ढूंढ निकालना किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं।

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भगवा खेमे में मनोरंजना का ज़लवा

Posted on 05 November 2013 by admin

संभवत: मनोरंजना सिंह का नाम पहले पहल तब सुर्खियों में आया जब उन्होंने नरसिंह राव के बेहद करीबी माने जाने वाले उत्तर पूर्व के एक कांग्रेसी धुरंधर मतंग सिंह से विवाह रचा लिया। कालांतर में वह मतंग सिंह के स्वामित्व वाले एनई टेलिविजन की चैयरपर्सन बन गईं, उसके बाद जब बंगाल के चर्चित शारदा चिटफंड घोटाला सामने आया तो उसमें भी कहीं न कहीं मनोरंजना सिंह का नाम उछला। अपने पति मतंग सिंह से लंबे विवाद के बाद अब मनोरंजना ने अपने लिए अलग रास्ता अख्तियार कर लिया है, अब वह सक्रिय राजनीति में उतरना चाहती हैं, और भाजपा की टिकट पर असम के तेजपुर या सिल्चर से लोकसभा का चुनाव लडऩा चाहती हैं, पिछले कुछ दिनों से ये भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी की बेहद करीबियों में शुमार हो गई हैं। संघ से मनोरंजना का पुराना रिश्ता रहा है क्योंकि इनके पिता के.एन.गुप्ता संघ विचारधारा से इत्तफाक रखने वाले एक मंझे पत्रकार थे जिन्होंने संघ का माउथ पीस माने जाने वाले मदरलैंडका लंबे समय तक संपादन किया है। सो पिछले दिनों नागपुर में आयोजित संघ की दशहरा रैली में जब लोगों ने संघ प्रमुख मोहन भागवत और नितिन गडकरी के साथ मनोरंजना सिंह को स्टेज शेयर करते देखा तो वे हक्के-बक्के रह गए, संघ के कार्यक्रम में वह भी एक महिला इतनी प्रमुखता के साथ संघ प्रमुख व भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के साथ बगलगीर दिखें तो फिर उनके प्रभाव का अंदाजा आप आसानी से लगा सकते हैं।

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मंगलम के साथ क्यों हुआ अमंगल?

Posted on 23 October 2013 by admin

कुमारमंगलम बिड़ला पर कोलगेट मामले में सीबीआई द्वारा एफआईआर दर्ज होने से कॉरपोरेट वल्र्ड सकते में हैं और एक तरह से वहां पर कांग्रेस विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं, इसका पहला असर चुनावी चंदे पर पड़ रहा है, कॉरपोरेट जगत भाजपा के लिए दोनों हाथों से पैसे लुटा रहा है और कांगे्रस के लिए उसकी मुी कसने लगी है। एक मीडिया कंपनी में कुमारमंगलम बिड़ला के 35 फीसदी शेयर है, दरअसल कुमारमंगलम का पुत्र न्यूयॉर्क से मीडिया मैनेजमेंट की डिग्री लेकर आया है और उसका इरादा मीडिया बैरन बनने का हैकुमारमंगलम अपने पुत्र की इच्छाओं को मद्देनजर रखते हुए इस मीडिया कंपनी के 51 फीसदी शेयर लेने जा रहे थे ताकि इसका कंट्रोल उनके हाथों में आ सके। पिछले कुछ समय से इस मीडिया समूह के तीनों चैनल और इसकी बहुभाषीय समाचार पत्रिका का तेवर कांग्रेस व सरकार विरोधी दिखने लगा था, गाहे-बगाहे चैनल के कुछ एंकर कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी पर सीधा हमला भी बोल रहे थे, यह बात कांग्रेस को बेहद नागवार गुजर रही थी। सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस की ओर से कुमारमंगलम को कई चेतावनी जारी किए गए कि उनके चैनल संभल जाए, पर कुमारमंगलम ने यह कहते हुए इस मामले से पल्ला झाड़ लिया कि इस मीडिया समूह का नियंत्रण अभी उनके हाथों में नहीं है। सो, कांग्रेस व यूपीए सरकार को ऐसा लगने लगा कि कुमार का भी एंटी कांग्रेस और प्रो.मोदी स्टैंड है, लिहाजा उन्हें सबक सिखाने की सरकारी रणनीति बुन ली गई। कुमारमंगलम के बहाने कांग्रेस देश के एक शीर्ष उद्योगपति तक भी अपना मैसेज पहुंचाना चाहती है, जिनकी कई मीडिया समूहों में बड़ी हिस्सेदारी है कि वे भी मोदी मोह से वक्त रहते उबर जाए, वरना उनका हश्र भी कुमारमंगलम जैसा हो सकता है।

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मोदी डोनर

Posted on 06 October 2013 by admin

अपने सियासी कैरियर का सबसे बड़ा दांव खेल रहे नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनार हर स्तर पर बड़ी साफ रणनीति बुनी है। टीम मोदी ने 250 ऐसी संसदीय सीटों को चिन्हित कर लिया है जहां भाजपा की जीत की संभावनाएं बन सकती हैं। मोदी की एक सर्वेक्षण टीम इन ढाई सौ लोकसभा सीटों पर कई चरणों का गहन सर्वेक्षण करवा रही है। इस सर्वेक्षण का सर्वप्रमुख एजेंडा यहां से जीत सकने वाले उपयुक्त उम्मीदवारों की तलाश है। जीत का माद्दा रखने वाले इन उम्मीदवारों को पार्टी टिकट मिलने के साथ ही एक करोड़ रूपए की धनराशि मिलेगी, फिर हर सप्ताह उस उम्मीदवार की समीक्षा रिपोर्ट तैयार होगी और उन्हें समय-समय पर और धन राशि मुहैया करायी जाएगी। मोदी ने अपने लोगों से साफ कर दिया है कि योग्य उम्मीदवारों को धन की कमी नहीं आने दी जाएगी। समझा जाता है कि मोदी ने अपना कुल चुनावी बजट सात सौ करोड़ रूपयों के आस-पास रखा है।

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फटा ऑर्डिनेंस, निकला जीरो

Posted on 29 September 2013 by admin

नई दिल्ली के प्रेस क्लब में शुक्रवार को देश ने कांग्रेस का सबसे बड़ा सियासी ड्रामा देखा, पर तालियां कम बजीं। सवाल कहीं ज्यादा उछला कि दागी नेताओं से संबंधित अपनी ही सरकार के ऑडिनेंस को बकवास करार देने वाले युवराज ठीेक से बता नहीं पाए कि इसकी हर मीटिंग में शरीक रह कर भी उन्हें तब यह ब्रह्मïज्ञान क्यों नहीं प्राप्त हुआ? ऐन वक्त जबकि चारा घोटाले में 5 से 10 साल तक जेल जाने का खतरा लालू यादव के सिर मंडरा रहा है तो चारा कांड में कालांतर में उनके वकील रह चुके कपिल सिब्बल को यह नायाब आइडिया सूझा और उन्होंने इस ऑर्डिनेंस की ड्राफ्टिंग में अपनी सारी काबिलियत झोंक दी और कैबिनेट से ऑर्डिनेंस पास हो गया। यानी सुप्रीम कोर्ट की भावनाओं को धता बताते हुए नए ऑर्डिनेंस में नई व्यवस्था कायम की गई कि निचली अदालत यहां तक कि हाई कोर्ट से भी दोषी करार दिए जाने पर यह ऑर्डिनेंस ऐसे दागी नेताओं को स्टे देगा अर्थात उनकी संसद सदस्यता डिस्क्वालिफाई नहीं होगी, यानी वे सदन में आएंगे सिर्फ अपनी सैलरी नहीं ले पाएंगे, वोट नहीं दे पाएंगे पर अगला चुनाव लड़ पाएंगे। जबकि सुप्रीम कोर्ट का ‘प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट’ में साफ मानना है कि कन्विकशन पर स्टे नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि सजा होने पर सांसद की सदस्यता जाती रहेगी और वह अगला चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।

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पीएम से नाराज़ अमेरिका

Posted on 22 September 2013 by admin

क्या मनमोहन सिंह से अमेरिका नाराज़ है? इस 25 सितंबर को प्रधानमंत्री अपने दल-बल के साथ अमेरिका जा रहे हैं, इस दौरे की तैयारियों के सिलसिले में भारतीय राजनयिकों के तब पसीने छूट गए जब अमेरिकी प्रशासन और व्हाइट हाऊस की ओर से उन्हें बताया गया कि भारतीय प्रधानमंत्री के इस दौरे में उनसे मिलने के लिए अमेरिकी राष्टï्रपति बराक ओबामा उपलब्ध नहीं रहेंगे। बड़ी मान-मनौव्वल और मशक्कत के बाद ओबामा मनमोहन से लंच पर 15 मिनट के लिए मिलने के लिए तैयार हुए। दरअसल, अमेरिका की नाराज़गी दो वजहों से ज्यादा है, एक तो उसे लगता है कि भारत के राष्टï्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशेकर मेनन ‘प्रो-चाइना’ और ‘एंटी-अमेरिका’ हैं, दूसरा अमेरिका को लगता है कि न्यूक्लीयर डील को लेकर यूपीए-1 सरकार के दौरान जितना उत्साह दिखाया गया था, यूपीए-2 आते-आते भारत सरकार ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया है। डील को भले ही औपचारिक तौर पर गो-अहेड मिल गया हो पर इसके क्रियान्वयन की दिशा में यूपीए-2 कोई प्रयास नहीं कर रही है। पिछले कुछ दिनों से अमेरिका ने खुलकर अपनी नाराज़गी दिखानी शुरू कर दी है, जैसे सीरिया के ताजा मसले को लेकर ओबामा ने रूस, चीन जैसे देशों से बात की पर भारत से बात करना और इस मुद्दे पर उनका समर्थन लेना उन्होंने जरूरी नहीं समझा। ओबामा की बात छोड़ भी दें तो वहां के स्टेट सेक्रेट्री की ओर से भी भारतीय प्रशासन को कोई फोन नहीं आया। दरअसल, अमेरिका की नाराज़गी की असली वजह भारत का अमेरिका की जगह व्यापार के लिए अन्य देशों को महत्त्व देने से है। हालिया रक्षा सौदों में भारत ने अमेरिका की बजाए फ्रांस, जर्मनी व इस्त्रायल जैसे देशों को महत्त्व दिया है। अमेरिकी कंपनी ‘बोइंग’ की जगह फ्रांस की विमानन कंपनी ‘एयर बस’ से कहीं ज्यादा विमानों की खरीददारी हुई है। चीन से द्विपक्षीय व्यापारिक समझौते हुए हैं, रूस से भारत अपने संबंधों को बेहतर बनाने में जुटा है। ये बातें अमेरिका पचा नही पा रहा है।

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दो सीटों से चुनाव लड़ेंगे दिग्गी

Posted on 16 September 2013 by admin

दिग्विजय सिंह लोकसभा का अगला चुनाव मध्यप्रदेश की दो संसदीय सीटों विदिशा और सागर लड़ सकते हैं। दिगगी ने अपनी विदिशा की उम्मीदवारी को लेकर इसकी सार्वजनिक घोषणा कर दी है कि वह भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज के खिलाफ चुनाव लडना चाहते हैं। पर स्वयं सुषमा दिग्गी राजा के खिलाफ विदिशा से चुनावी मैदान में उतरने को लेकर ज्यादा उत्सुक नहीं। अगर दिग्गी विदिशा से आते हैं तो सुषमा अपनी सीट बदल कर फरीदाबाद या नई दिल्ली शिफ्ट कर सकती हैं, या वे इन दोनों ही जगहों से चुनाव लड़ सकती हैं।

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मोदी पीएम बनें तो अडवानी को सोनिया की जगह मिलेगी

Posted on 11 September 2013 by admin

नरेंद्र मोदी के खिलाफ विरोध की अलख जगाने वाले अडवानी कैंप को मनाने की मुहिम अब स्वयं संघ ने संभाल ली है। संघ ने अडवानी कैंप के समक्ष एक सुलह का फॉर्मूला रखा है और कहा है कि अगर केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनती है तो उसमें एल.के.अडवानी को एनडीए का चेयरपर्सन बनाकर ठीक वैसे ही पॉवर दिए जाएंगे जो आज यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के पास हैं। इसके अलावा एक ओर धुर मोदी विरोधी नेता मुरली मनोहर जोशी से कहा गया है कि पार्टी उन्हें देश का अगला राष्टï्रपति बनवाने की दिशा में पहल करेगी। वहीं नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज के गुस्से पर पानी फेरने के इरादे से संघ ने उन्हें मोदी की कैबिनेट में नंबर दो या स्पीकर बनवाने का आश्वासन दिया है और कहा है कि अगर एक बार केंद्र में भाजपा आती है तो उन्हें गृह या रक्षा जैसे सबसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालय सौंपे जा सकते हैं। ं पल-पल सियासी रंग बदल रहे नितिन गडकरी को संघ की ओर से यह आश्वासन मिला है कि अगर 2014 में केंद्र में भाजपानीत गठबंधन की सरकार बनती है तो पार्टी चलाने की कमान एक बार फिर से नितिन गडकरी को सौंपी जा सकती है।
नई दिल्ली के वसंत कुंज स्थित मध्यप्रदेश भवन के मध्यांचल में संघ व भाजपा नेताओं की दो दिवसीय बैठक हुई। बैठक के पहले दिन संघ की ओर से नेतृत्व की कमान भैय्याजी जोशी ने संभाली वहीं दूसरे दिन की बैठक में संघ प्रमुख मोहन भागवत स्वयं उपस्थित थे। इस बैठक में अटल बिहारी वाजपेयी को छोडक़र भाजपा का पूरा पार्लियामेंट्री बोर्ड मौजूद था। बैठक में पार्टी के वयोवृद्ध नेता अडवानी दरअसल इस बात को लेकर चिंतित थे कि अगर एक बार पार्टी की कमान मोदी के हाथों में आ गई तो भाजपा का पूरा स्वरूप मोदीमय हो जाएगा और अन्य नेताओं के लिए पार्टी के इस नए फॉरमेट में कोई जगह नहीं बचेगी। इसलिए अडवानी अपनी ओर से बारंबार यह संदेश देना चाह रहे हैं कि यह उनके अस्तित्व को बचाने की लड़ाई नहीं है अपितु वे भाजपा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं कहीं अडवानी की एक मुख्य चिंता मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर भी है, अडवानी कैंप का दावा है कि वहां कम से कम 30-40 सीटें ऐसी हैं, जिस पर मुस्लिम मतदाता एक हद तक निर्णायक है या वह इन सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में वोट करता है अथवा तटस्थ रहता है। लेकिन अगर एक बार मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले पीएम उम्मीदवारी को लेकर मोदी के नाम का एलान हो जाता है तो शिवराज सिंह चौहान को मुस्लिमों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है और भाजपा की विधानसभा चुनाव में 30 सीटें कम हो सकती हैं। सो, अडवानी कैंप ने संघ पर यह दबाव बनाने की कोशिश की है कि मोदी के नाम का एलान पांच राज्यों के हालिया विधानसभा चुनावों के बाद हो, पर संघ ने साफ कर दिया है कि नरेंद्र मोदी को लेकर संघ का मंतव्य बेहद साफ है और उसका स्पष्टï तौर पर मानना है कि नरेंद्र मोदी को सामने रख कर चुनाव में जाने पर भाजपा को इसके अप्रत्याशित परिणाम मिल सकते हैं और भाजपा अपने दम पर 2014 के लोकसभा चुनाव में 272 के बहुमत का जादुई आंकड़ा छू सकती है। सो, संघ ने एक तरह से इस दो दिवसीय बैठक में साफ कर दिया है कि मोदी की पीएम उम्मीदवारी का एलान पार्टी की 13 सितंबर को आहूत होने वाली संसदीय बोर्ड की बैठक में हो सकता है। संघ ने भाजपा नेताओं से यह भी साफ कर दिया है कि चूंकि 19 सिंतबर से पितृपक्ष यानी श्राद्ध शुरू हो रहा है सो मोदी के नाम का एलान किसी भी तरह से 19 सितंबर से पहले होना चाहिए। लेकिन इस मामले में सबसे बड़ा पेंच यह है कि अभी तक औपचारिक रूप से यही तय नहीं हो पाया है कि पार्टी संसदीय बोर्ड की 13 सितंबर को ही बैठक होगी। संसदीय बोर्ड की बैठक की तारीख को लेकर पार्टी में अब तक सस्पेंस बरकरार है। पर संघ ने अपनी ओर से प्रयास जारी रखा हुआ है। इसी क्रम में बुधवार 10 सितंबर को पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी मोहन भागवत के एक खास मैसेज के साथ अडवानी से मिले और उनके साथ कोई सवा घंटे का वक्त गुजारा। समझा जाता है कि गडकरी ने अडवानी को इस बात के लिए राजी करने के प्रयास किए कि भाजपा में अडवानी की प्रासंगिकता और भूमिका बनी रह सकती है बशत्र्ते वे संघ के तयशुदा फॉर्मूले के मुताबिक काम करें। अन्यथा नरेंद्र मोदी को लेकर संघ एकतरफा फैसला लेने को मजबूर हो सकता है। सवाल यही अहम है कि क्या अडवानी एनडीए की सोनिया गांधी बनने को तैयार हैं? पर मौजूदा सियासी हालात में जब हर तरफ यानी पार्टी, संघ और इसके अनुषांगिक संगठनों में मोदी के पक्ष में तेज बयार बह रही हो तो अडवानी के पास इस प्रस्ताव को मानने के सिवाय चारा भी क्या बचता है?

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हाथ को मिलेगा हाथी का साथ

Posted on 08 September 2013 by admin

यूपी में ‘हाथ’ और ‘हाथी’ की दोस्ती के नए आयाम प्रस्फुटित हो रहे हैं। थैंक्स टू मधुसूदन मिस्त्री। जिन्होंने दिग्विजय सिंह से यूपी का प्रभार छीनते ही वहां कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के प्रयास तेज कर दिए। मिस्त्री की बसपा सुप्रीमो मायावती से कई दौर की निर्णायक मुलाकातें हो चुकी हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में यूपी में बसपा व कांग्रेस में चुनाव पूर्व गठबंधन को लेकर सैद्धांतिक रूप से सहमति भी बन चुकी है। इसके बाद ही मायावती की मुलाकात अहमद पटेल और सोनिया गांधी से हुई। कांग्रेस ने एक तरह से बसपा सुप्रीमो के समक्ष स्पष्टï कर दिया है कि अगर बसपा और कांग्रेस के दरम्यान कोई ऐसा गठबंधप परवान चढ़ता है तो उसमें कांग्रेस की कोई टोकन हिस्सेदारी नहीं होगी। बल्कि कांग्रेस का भी इस गठबंधन में एक बड़ा हिस्सा होगा। मसलन अभी यूपी की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 45 पर बसपा और 35 पर कांग्रेस के लडऩे की बात हो रही है। सीटों के बंटवारे का ऐसा प्रस्ताव कांग्रेस की ओर से आया है। सो, मुमकिन है कि इस फॉर्मूले में मामूली फेरबदल (मसलन 50-30)के बाद दोनों दलों में कोई औपचारिक सहमति बन जाए। और सचमुच अगर ऐसा हो जाता है तो यह सपा और भाजपा के लिए वास्तव में एक खतरे की घंटी है क्योंकि मधुसूदन मिस्त्री के हालिया सर्वे में कांग्रेस की यूपी में हालत काफी पतली नज़र आ रही है, और अगर कांग्रेस अकेले अपने दम पर चुनाव में जाती है तो मौजूदा 22 लोकसभा सीटों की जगह उसे बस 4 से 6 सीटें मिलने की बात कही गई है। सनद रहे कि मिस्त्री ने कोई डेढ़ महीने पूर्व ही यह सर्वे रिपोर्ट राहुल गांधी को सौंप दी थी।

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