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सीबीआई की नजर

Posted on 03 December 2009 by admin

कंपनी लॉ बोर्ड रिश्वतखोरी का मामला तूल पकड़ने लगा है, सीबीआई की टेढ़ी निगाहें सिर्फ बोर्ड के कार्यकारी अध्यक्ष आर. वासुदेवन, कंपनी सचिव मनोज कुमार बांठिया और वकील अंकुर चावला पर ही नहीं टिकी थीं अपितु भाजपा के एक बड़े नेता के साले, एक पारसी लॉ कंपनी, एक रिटायर्ड जज के पुत्र तथा एक उच्च न्यायिक पद पर सुशोभित महिला जज के पुत्र का नाम भी सीबीआई की पड़ताल सूची में शामिल है। आगे-आगे देखिए अभी होता है क्या क्योंकि इसके अलावा भी कई बड़ी मछलियों पर सीबीआई की नजर है। विश्वस्त सूत्रों की माने तो सीबीआई ने पिछले दो वर्ष पूर्व ही इन लोगों के इर्द-गिर्द अपनी जांच का जाल बुन दिया था, इन पर निगाह रखी जा रही थी और इन लोगों के फोन भी टेप किए जा रहे थे।

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लाल भुलक्कड़

Posted on 28 November 2009 by admin

क्या भूले और क्या याद करें अडवानी जी? अब अटल की राह चल निकले हैं, सब भूलने लगे हैं, गम भी और गिले शिकवे भी। अडवानी की कोर टीम को लगता है कि लौहपुरुष भुलक्कड़ या अमनीसिया के शिकार हो गए हैं। अब तो अडवानी अपनी फोन व मीटिंग भी भूलने लगे हैं। कार्र्यकत्ता सम्मेलन हो, पब्लिक मीटिंग या संसद में स्पीच सब एक सी होती है, सो इसमें अडवानी की अपनी सहुलियत भी शामिल है कि वे चाहे कार्र्यकत्ता मीटिंग की स्पीच संसद में दे डालें क्या फर्क पड़ता है। यदि कोई अडवानी से मिलने उनके घर पहुंचता है तो अडवानी किसी रिटायर्ड आइएएस की चिट्ठी या ‘लेटर टू एडीटर’ वाला घिसा-पिटा आइटम उन्हें जरूर थमा देंगे। भूले से अगर आप एक दिन में दो बार चले गए तो यह उपक्रम दोनों ही बार नियम से दुहराया जाएगा। उनकी तारीफ में चाहे जो भी छपा हो वे अब भी अपनी आंखों में आंसू भरकर पढ़ते हैं। पुराने लेख या चिट्ठियां जो भी अडवानी की तारीफ में हो वह उनके घर ऐसे बंटती है जैसे सत्यनारायण पूजन के उपरांत प्रसाद बंटता है। गलती से अगर कोई पत्रकार उनके घर पहुंच जाए तो उसे कोई पुराना छपा लेख थमाते हुए अडवानी संजीदगी से सलाह देते हैं कि आपको भी ऐसा ही लिखना चाहिए। आत्मश्लाघा और आत्ममुग्घता का फर्क सचमुच भूल गए हैं अडवानी जी। यह वाकई भाजपा के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

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मान गए मोदी

Posted on 21 November 2009 by admin

संघ ने अडवानी से निरंतर संवाद कायम रखा हुआ है, सो संघ नेतृत्व ने अडवानी से जानना चाहा कि अगर उन्हें गडकरी के नाम पर ऐतराज है तो वे कोई और नाम सुझाएं, तो अडवानी ने फौरन बतौर अगले अध्यक्ष अपनी पसंद अरुण जेतली को बताया, संघ ने कहा-‘कोई और नाम सुझाएं, इस नाम पर तो हम पहले ही इंकार कर चुके हैं।’ अडवानी ने फिर कहा-‘नरेंद्र मोदी।’ तो संघ ने कहा-‘ठीक है, आप उनसे पूछ कर बतला दीजिए, हमें इनके नाम पर कोई ऐतराज नहीं।’ और इसी बीच संघ ने मोदी को फोन कर उन्हें इत्तला भेज दी कि जब अडवानी का फोन आए तो आप कहना 2013 तक तो सवाल ही पैदा नहीं होता। इसके पश्चात अडवानी ने मोदी को फोन किया और कहा कि ‘अगले अध्यक्ष के तौर पर आपके नाम पर सहमति बनी है।’ तो मोदी ने छूटते ही कहा कि वे 2013 तक यहीं गुजरात में बने रहना चाहते हैं। सो अडवानी के पास गडकरी के नाम पर हामी भरने के और कोई चारा नहीं रह गया था।

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जगन से जनार्दन

Posted on 14 November 2009 by admin

कांग्रेस जानती है कि कर्नाटक में अब भी उसके लिए मैदान खुला हुआ है और राज्य में भगवा मुख्यमंत्री येदुरप्पा के खिलाफ बगावत की बिगुल फूंकने वाले रेड्डी बंधु पहले तो कांग्रेसी हैं। सो अहमद पटेल ने जगन को बुलाकर उन्हें ‘ऑपरेशन कर्नाटक’ की बागडोर सौंपी है। पटेल का खेल साफ है कि जगन किसी मानिंद कर्नाटक भाजपा में दोफाड़ करवा दें, और यह बात भी किसी से छुपी नहीं है कि रेड्डी बंधुओं के व्यवसायिक साम्राज्य के निर्माण में सबसे अहम योगदान जगन के पिता राजशेखर रेड्डी का ही रहा है। जिन्होंने न केवल कर्नाटक-आंध्र के नो मैंस लैंड में रेड्डी बंधुओं के अवैध खनन व्यवसाय को फलने-फूलने का मौका दिया, जरूरत पड़ी तो उन्होंने आंध्र में खनन के लिए सैंकड़ों एकड़ भूमि भी लीज पर दी और इसके लिए उन्होंने अपनी निजी पहल पर रेड्डी बंधुओं को बैंकों से कोई 1 हजार करोड़ का ऋण भी स्वीकृत कराया। जिस जगन ने पिछले वर्ष मात्र दो लाख आयकर दिया हो, इस वर्ष वह राजनेताओं में सबसे ज्यादा आयकर अदा करने वाले व्यक्तियों की लिस्ट में सिरमौर हो गए हैं, और एडवांस टैक्स के मामले में भी जगन ने सबको पीछे छोड़ दिया है। यानी महज एक साल में 78 हजार करोड़ की संपत्ति आखिरकार आई कहां से… शायद यही बात मैडम गांधी को रास नहीं आ रही है… नहीं तो मात्र 36 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने वाले जगन की राजनैतिक राह में रोड़े अटकाने के लिए उनके पास ज्यादा नैतिक कारण हैं भी क्या?

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शीला अंबिका में नहीं गिला

Posted on 01 November 2009 by admin

आज से कोई पच्चीस वर्ष पूर्व श्रीमती इंदिरा गांधी के अभ्युदय काल में ही कांग्रेसी राजनीति को बेतरह प्रभावित करने वाली दो महिला नेत्रियों ने अपनी राजनैतिक पारी का लगभग साथ-साथ आगाज किया, वह हैं केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी और दिल्ली की धुरंधर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। पर एक अजीब इत्तफाक रहा कि इन दोनों महिला नेत्रियों में कभी आपस में नहीं बनी। पर इंदिरा जी की 25वीं पुण्यतिथि को बलिदान दिवस के तौर पर आयोजित करने के लिए जो कमेटी बनी उसमें सोनी और शीला दोनों को ही काफी अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई है। एक और मैडम गांधी यानी सोनिया ने इन दोनों महिला नेत्रियों को साफ ताकीद दी है कि दोनों मिल-जुलकर काम करें, क्या अब दोनों नेत्रियों के दिल और मन मिल सकते हैं पर ये दोनों ही नेत्रियां वक्त की नजाकत को भली-भांति समझती हैं और यह भी समझती हैं कि सोनिया ने इन दोनों पर लगातार नजर रखी हुई है।

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पवार का पुत्री प्यार

Posted on 20 October 2009 by admin

क्या यह मराठा क्षत्रप शरद पवार के लिए यह उनका आखिरी विधानसभा चुनाव है? नहीं तो क्या कारण है कि अपनी पुत्री सुप्रिया सूले को अपनी राजनैतिक विरासत सौंपने के लिए पवार साहब इस कदर बेकरार हैं। शायद अपने भतीजे अजित पवार को लेकर पवार साहब ज्यादा चौकस है और अजित की सियासी भाव-भंगिमाओं से लगता है उन्हें इन दिनों इनसे बगावत की बू आ रही है। सो, पवार साहब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के पास इस आशय का निवेदन लेकर पहुंचे थे कि अगर कांग्रेस उनकी पुत्री को गठबंधन (कांग्रेस-एनसीपी) का नेता प्रोजेक्ट करने को तैयार है तो चुनाव पश्चात वे भी अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में करने को राजी हैं। पर कांग्रेसी कहां सुप्रिया सूले को मुख्यमंत्री मानने को राजी हैं, कांग्रेसियों का तर्क है कि अभी सुप्रिया की उम्र और उनका राजनैतिक अनुभव दोनों ही कम है, पर यह बात एक बाप के गले थोड़े ही उतर सकती है।

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खुद पर पत्थर

Posted on 05 October 2009 by admin

‘इस सादगी पर कौन न मर जाए या खुदा लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं’ सो अगर गांधी-नेहरू परिवार भी दैनंदिन जीवन में सादगी को अपनाने की वकालत करने लग जाएं तो बात दूर तलक जानी चाहिए, पर जब से कांग्रेसी युवराज ने रेलगाड़ी में सफर करने का निर्णय लिया और मैडम सोनिया गांधी ने इकॉनॉमी क्लास में सफर करने का निर्णय लिया उनकी सुरक्षा में जुटी एसपीजी की तो जैसे नींद ही उड़ गई है। और जब से राहुल की लुधियाना शताब्दी टे्रन पर पत्थर पड़े हैं देश की खुफिया एजेंसियों का तो जैसे चैन ही लुट गया है। प्रारंभिक खुफिया जांच में एक सनसनीखेज खुलासा होने की बात कही जा रही है, सूत्र बताते हैं कि प्रारंभिक जांच से पता चला है कि राहुल की ट्रेन पर पत्थर बरसाने का आइडिया उनकी सुरक्षा में जुटी एजेंसी का ही था ताकि इस खतरे का हवाला देकर राहुल को आगे से टे्रन की सवारी करने से रोका जा सके।

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अडवानी फिर वही कहानी

Posted on 18 September 2009 by admin

मौके की नजाकत को भांपते हुए अडवानी ने संघ नेतृत्व को संदेश दिया है कि वे उनके चहेते अरुण जेतली को भाजपा का अगला अध्यक्ष बनवाने की पहल करें, जाहिर है कि अगर जेतली बतौर अध्यक्ष पार्टी की कमान संभालते हैं तो उनके द्वारा रिक्त की गई राज्यसभा में नेता-प्रतिपक्ष की कुर्सी पर सबसे मजबूत दावा अडवानी के हनुमान वेंकैया नायडू का हो सकता है। पर संघ की असली चिंता तो इस बात को लेकर है कि अडवानी अपना पद कब छोड़ेंगे?

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वेंकैया के एक ही खैवेया

Posted on 14 September 2009 by admin

वेंकैया नायडू ने अडवानी के लिए एक नया फार्मूला निकाला है कि ‘पद के बदले पद दो’ यानी अगर अडवानी की नेता प्रतिपक्ष पद से छुटी भी होती है तो उन्हें भाजपा संसदीय बोर्ड का चेयरमैन बनाया जाए, यानी जब तलक पार्टी में अडवानी की प्रासंगिकता बनी रहेगी तब तक वेंकैया की भी पूछ होगी।

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संघ का मंतव्य

Posted on 14 September 2009 by admin

संघ ने तय किया है कि इस दफे भाजपा को एक ‘लो-प्रोफाइल’ अध्यक्ष मिलेगा, जिससे कि भगवा पार्टी पर उसकी पकड़ और नियंत्रण सतत् बनी रहे, वस्तुत: संघ भाजपा की कमान अब सीधे अपने हाथों में रखना चाहता है और भाजपा के दैनंदिन कारोबार को भी प्रभावित करना चाहता है। सो, भाजपा का अगला अध्यक्ष कोई भी हो सकता है, कोई भी यानी कोई भी, चाहे बाल आप्टे ही क्यों नहीं।

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