Posted on 27 February 2011 by admin
कांग्रेस का सियासी वातायन 10 जनपथ बनाम 7 रेसकोर्स की अघोषित जंग की टंकार से गुंजायमान है। कथित तौर पर एक कमजोर प्रधानमंत्री की इतनी दृढ़ भाव-भंगिमाएं जैसे कभी देखी नहीं गई थीं। कांग्रेस की सर्वशक्तिमान सोनिया गांधी बदलते वक्त और रंग बदलती राजनीति में बेचारगी की ऐसी प्रतर्िमूत्ति कभी नहीं लगी थीं क्या इसे महज एक संयोग माना जाए कि रविवार को इसी कॉलम के अंतर्गत पहली-पहली बार यह सत्य उद्धाटित होता है कि सोनिया और पीएम के बीच सब ठीक-ठाक नहीं चल रहा, पार्टी और सरकार के बीच खींचातनी है। आनन-फानन में 10 जनपथ को सूचित किए बगैर बुधवार को पीएम के हितैषी रणनीतिकार न्यूज चैनल संपादकों की प्रेस-कांफ्रेंस बुला लेते हैं। और जरा गौर फर्माइए पीएम उसमें सफाई क्या देते हैं, जो बातें सिलसिलेवार ढंग से इस कॉलम में प्रकाशित हुई थीं-मसलन सरकार व पार्टी में कोई तनातनी नहीं है’, ‘मैंने कभी इस्तीफे की धमकी नहीं दी…’ आदि-आदि। यानी दाल में कुछ काला है।
Posted on 23 February 2011 by admin
भले ही सात रेसकोर्स और दस जनपथ में एक अघोषित जंग छिड़ चुकी है, सियासत की बिसात पर नित्यदिन नए व्यूह रचनाएं भी की जा रही हों, पर अपने द्वारा नामित प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगने का नैतिक साहस अब भी सोनिया नहीं जुटा पा रहीं। सोनिया और उनके वफादारों को ऐसा लगता है कि अगर मनमोहन से इस्तीफा मांगा गया तो उनकी ‘शहीदी छवि’ बन सकती है, जबकि सोनिया के ऊपर ‘प्रतिनायिकता’ के छींटे पड़ेंगे, मनमोहन के बाद कौन? इस सवाल पर भी सोनिया वफादार एक राय नहीं। ले देकर प्रणब मुखर्जी का ही ‘ऑप्शन’ बचता है, पर क्या गारंटी है कि वह भी प्रधानमंत्री का तख्तोताज हासिल करने के बाद अपनी ढपली अपना राग न अलापने लग जाएं, जब तक यह सवाल बना हुआ है, मनमोहन भी बने हुए हैं।
Posted on 10 December 2010 by admin
कांग्रेस को 6 दिसंबर का इंतजार है, अगर विपक्ष का यह रवैया यूं ही जारी रहा तो क्या बाबरी-विध्वंस के बरसी के दिन कम्युनिस्ट, सपा समेत अन्य कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियां भाजपा के साथ खड़ी होकर 2जी राग अलाप सकती हैं? यही तो कांग्रेस देश को दिखाना चाहती है, देखो, विपक्ष किस कदर बंटा हुआ है। वैसे भी 9 दिसंबर को कांग्रेसी राजमाता सोनिया गांधी का जन्म दिन है और ज्यादातर कांग्रेसी सांसद इस पावन दिन पर दिल्ली में ही जमे रहना चाहते हैं, ताकी सोनिया-आरती की पूर्णाहुति डाल सकें, सो वे नहीं चाहते कि संसद की कार्यवाही अनिश्चतकाल के लिए स्थापित हो जाए।
Posted on 14 November 2010 by admin
2जी स्पैक्ट्रम बंटवारे में ऐसी कंपनियों की चांदी हो गई जिन्हें पहले टेलिकॉम सेक्टर का कोई भी अनुभव नहीं रहा था, एक चर्चित कंस्ट्रक्शन कंपनी के मेमोरेंडम में तो संचार शब्द का जिक्र तक नहीं था। जब उसे स्पैक्ट्रम का बंटवारा हो गया तब जाकर कंपनी ने अपने ‘आर्टिकल ऑफ एशोसिएशन’ में बदलाव किया और इसके तुरंत बाद इस कंपनी ने मोटे मुनाफे पर ‘इटलीसेट’ नामक कंपनी को अपना लाइसेंस बेच दिया। सिर्फ इसी कंपनी ने नहीं अपितु कई अन्य कंपनियों ने भी अपने-अपने लाइसेंस मोटे मुनाफे के साथ बेच दिए, पैसों के लेन-देन में भी पर्याप्त अनियतिताएं बरती गईं, विदेशी खातों में पैसे सेटल किए गए, कैश का भी लेन-देन रहा, यानी घोटालों की फेहरिस्त काफी लंबी है।
Posted on 19 October 2010 by admin
सियासी आईसीयू में भर्ती और अपने अस्तित्व को बचाने की अंतिम सांसे गिन रही कर्नाटक की येदुरप्पा सरकार को बचाने में भाजपा के शीर्ष हाईकमान ने अपनी सारी ताकत झोंक दी। भाजपा के मुखिया नितिन गडकरी ने ऐन आखिरी वक्त सरकार को बचाने की जिम्मेदारी वहां के चर्चित खनन सरताज व सरकार में मंत्री रेड्डी बंधुओं को सौंप दी, एक तरह से यह कांटे से कांटा निकालने का ही उपक्रम है। सर्वप्रथम, गडकरी ने येदुरप्पा को उनके हालिया मंत्रिमंडल फेरबदल के लिए झाड़ पिलाई, सनद रहे कि सरकार पर संकट इसके बाद से ही गहराने लगा था। यानी अपनी खासमखास शोभा की मंत्रिमंडल में वापसी और चार असंतुष्टों की रूखसती येदुरप्पा को भारी पड़ गई। जिन रेड्डी बंधुओं को नीचा दिखाने के लिए येदुरप्पा ने सारा उपक्रम साधा था, उनका यह दांव उल्टा पड़ गया और अंतत: सरकार बचाने के लिए उन्हीं रेड्डियों के आगे उन्हें घुटने टेकने पड़े। सरकार पर से संकट को टालने के लिए गडकरी स्वयं पल-पल की जानकरी के लिए जनार्दन रेड्डी से हॉटलाइन पर जुड़े हैं जो लगातार असंतुष्टों के संपर्क में हैं और चेन्नै से गोवा के चक्कर काट रहे हैं। वहीं येदुरप्पा भगवान की शरण में चले गए और विभिन्न मंदिरों की परिक्रमा लगा रहे हैं।
Posted on 19 October 2010 by admin
सीबीआई के नए मुखिया को लेकर केंद्र में लॉबिंग तेज हो गई है। अभ्यर्थियों के दावे और दांव भी उसी कदर मुखर होने लगे हैं। सबसे मजबूत दावा झारखंड कैडर के ए.पी. सिंह का है, उन्हें एक सक्षम अधिकारी माना जाता है, फिलवक्त वे सीबीआई में बतौर स्पेशल डायरेक्टर कार्यरत हैं। आरपीएफ के डीजी रंजीत सिन्हा भी ताबड़तोड़ प्रयास कर रहे हैं, वैसे भी सिन्हा को लालू यादव के बेहद करीबी माना जाता है। मध्य प्रदेश के डीजी पुलिस ए.एस. राउत भी रेस में हैं, राउत को केंद्रीय मंत्री कमलनाथ का करीबी माना जाता है, कांग्रेस के कई अन्य नेता भी उनके नाम की पैरवी कर रहे हैं। अब महिलाएं भी क्यों रहें पीछे। सो, दक्षिण की एक पूरी लॉबी किसी महिला को सीबीआई के अगले निदेशक के पद पर देखना चाहती है। चेन्नै की पुलिस कमिश्नर लतिका शरण के लिए दक्षिण की कई पार्टियां आपसी मनमुटाव को भुलाकर एकजुट होकर लॉबिंग कर रही हैं।
Posted on 19 October 2010 by admin
केंद्रीय रसायन मंत्री एम.के.अझागिरी को भले ही अपना मंत्रालय चलाने में रस नहीं आ रहा हो और किंचित वे कैबिनेट की बैठकों से भी नदारद रहते हों, पर मंत्रालय के खर्चे पर और विभिन्न डेलीगेशन के हवाले से सपत्नीक विदेश की यात्राएं खूब कर रहे हैं। अभी पिछले दिनों वे खाद उत्पादक उद्योगपतियों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ सपत्नीक चीन के दौरे पर गए थे। इससे पहले वे आस्ट्रेलिया के दौरे पर थे। पिछले 8 महीनों में वे आधा दर्जन से ज्यादा विदेश यात्राएं कर चुके हैं, वे भी सरकारी खर्चे पर। अब तो डीएमके के नेतागण भी कहने लगे हैं कि अझागिरी ने तो मदुरै को जैसे भुला ही दिया है और वे रसायन से ज्यादा विदेश मंत्री हो गए हैं। देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या काले चश्मेवाले बाबा इस पर कोई संज्ञान लेते हैं कि नहीं?
Posted on 19 October 2010 by admin
देश के नए विदेश सचिव के लिए एक तरह से हरदीप पुरी का नाम लगभग पक्का हो गया था, वे न सिर्फ इस पद के लिए सबसे योग्य और सीनियर थे, अपितु उनका प्रो-अमरीकी रुझान भी उनके लिए बोनस के मानिंद था, अमरीकन लॉबी भी एक तरह से उनके पक्ष में दिखती थी, पर भाजपा नेता लालकृष्ण अडवानी के बेहद करीबी होना ही पुरी के लिए उनके गले की फांस बन गया और यूपीए सरकार की नजरें उन पर टेढ़ी हो गई हैं, कांग्रेस को जब से खबर लगी है कि पुरी न सिर्फ अडवानी के बेहद करीबी हैं अपतिु उन्होंने भाजपा के टिकट पर नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ने की भी इच्छा जताई थी, सो अब यूपीए सरकार हरदीप पुरी को सुपर सीड करके उनके एक जूनियर राजन मथाई को देश का अगला विदेश सचिव बनाना चाहती है, कृष्णा को इस बाबत दस जनपथ की मुरली बखूबी सुना दी गई है।
Posted on 22 June 2010 by admin
यूनियन कार्बाइड की साइट पर आज भी हेजारडस (खतरनाक) मैटीरियल का ढेर लगा है, वहां का पूरा भूमिगत जल विषैला हो चुका है, अदालत ने अपने एक आदेश में इस खतरनाक कचरे को हटाने के लिए कंपनी को 100 करोड़ रुपए जमा कराने को भी कहा था, क्योंकि बाद में यूनियन कार्बाइड को डॉ केमिकल ने खरीद लिया था, 11.6 बिलियन डॉलर में हुए सौदे में यूनियन कार्बाइड डॉ केमिकल कंपनी की सब्सिडरी बन गई थी, इस मामले में महान कांग्रेसी वकील अभिषेक मनु सिंघवी डॉ केमिकल की ओर से मैदान में उतरे थे, सो ऐसे में मध्यमार्गी न्याय का फंडा मौजूं ही लगता है।
Posted on 22 June 2010 by admin
इस पूरे मामले में मुआवजे की राशि को लेकर भी झोल है। सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने 490 मिलियन डॉलर का मुआवजा तय किया था, जो यूनियन कार्बाइड को भारत सरकार को देना था, यह 1989 की बात है तब जस्टिस आर.एस.पाठक (अब दिवंगत) सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस थे और हैरानी की बात देखिए बाद में वही पाठक साहब अमरीका की कृपादृष्टि से ही इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में जज बन गए। आज पाठक साहब की पुत्र की फर्म आनंद पाठक एंड कंपनी देश की एक शीर्ष लॉ-फर्म में शुमार होती है। पर सीआर पीसी की धारा 357 (3) के मुताबिक अगर मुआवजा कम है तो इसकी पुनर्समीक्षा हो सकती है। पर लगता नहीं है मनमोहन सरकार इस बात को लेकर जरा भी फिक्रमंद है क्योंकि फिलवक्त केंद्र सरकार का सारा ध्यान अमरीका द्वारा पोषित न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल को किसी प्रकार से लाने पर टिका है।