Posted on 22 June 2010 by admin
इन दिनों ऑस्कर फर्नांडीस की कृपादृष्टि से मुकुल वासनिक की बल्ले-बल्ले है, ऑस्कर दस जनपथ के सबसे करीबियों में शुमार होते हैं, चुनांचे जब बिहार में अनिल शर्मा बनाम टाइटलर की लड़ाई परवान चढ़ी तो ऑस्कर ने अपने खासमखास वासनिक को बिहार का प्रभार दिलवा दिया। अब ऑस्कर की कोशिश है कि बिहार में कांग्रेस को मजबूती देने के लिए मुस्लिम, दलित व ऊंची जातियों का नया गठजोड़ तैयार हो, इसके लिए कांग्रेस ने अन्य दलों में सेंधमारी की पूरी तैयारी कर ली है, पार्टी ब्राह्मण नेता जगन्नाथ मिश्र को वापिस अपने घर लाने के लिए प्रयत्नशील है, निखिल कुमार के रूप में पार्टी के पास राजपूत नेता पहले से ही है, राजीव रंजन उर्फ लल्लन के कांग्रेस में अपने से भूमिहारों का झुकाव भी पार्टी की ओर हो सकता है, दलित नेता के तौर पर मुकुल वासनिक पहले ही पार्टी के बिहार प्रभारी बनाए जा चुके हैं, पार्टी ने अपना प्रदेश अध्यक्ष भी कैसर यानी एक मुस्लिम को बना दिया है अब कांग्रेसी रणनीतिकारों को सारी कोशिश इस नए सियासी समीकरण में जातीय रंग भरने की है।
Posted on 22 June 2010 by admin
एक चैनल वाले बीसीसीआई पर मुकदमा ठोंकने की तैयारी में हैं, पूर्व आइपीएल कमिश्नर व मौके के उस्ताद खिलाड़ी ललित मोदी ने चैनल वालों के साथ एक अनुबंध कर लिया था कि उनके चौदह प्रमुख खिलाड़ी चैनल के एक रियलिटी शो खतरों के खिलाड़ी में भाग लेंगे, इसके लिए चैनल ने ऑफ-ऑन रिकार्ड एक मोटी फीस अदा की, सिर्फ सचिन और धोनी ने इस अनुबंध में बंधने से मना कर दिया था, वरना हरभजन से लेकर यूवी तक हर भारतीय क्रिकेटर को इस खेल में शामिल होना था। इस शो को लेकर चैनल इस कदर उत्साहित था कि उसने अपने पुराने होस्ट अक्षय कुमार को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया, पर हालिया दिनों में ललित मोदी पर गाज क्या गिरी, इस मामले में बीसीसीआई ने भी पलटी मार ली, अब आईसीसीआई रूल बुक का हवाला देकर बीसीसीआई चैनल से कह रही है कि हम ऐसे किसी खेल में भाग लेने के लिए अपने खिलाड़ियों को नहीं भेज सकते जहां उन्हें शारीरिक क्षति का खतरा हो, चैनल पूछ रहा है कि ये सब आपने हमारे साथ अनुबंध करने से पहले क्यों नहीं सोचा था?
Posted on 22 June 2010 by admin
भाजपा के गौरवशाली मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भी अपनी एक खास अदा है, वे राज्य से बाहर जहां भी सभा-गोष्ठियों में जाते हैं, उनके वहां आने से पहले उनकी उपलब्धियों का ब्यौरा कहीं पहले पहुंच जाता है, नारे, परचम, मुखौटे और इश्तिहारों की शक्ल में। मोदी के पास उनकी 50 लोगों की एक पेशेवर व समर्पित टीम है जो सप्ताह भर पहले ही उस शहर में पहुंच जाती है जहां मोदी को जाना होता है, वह टीम मोदी के विभिन्न मुखौटों को पहन कर शहर भर का चक्कर लगाती है, मीडिया मैनेज करती है, अखबारों में विज्ञापन छपवाती है और मोदी के पक्ष में स्थानीय माहौल सकारात्मक बनाने के प्रयास करती है, पटना में भी ऐसा ही हुआ।
Posted on 22 June 2010 by admin
नितिन गडकरी को लेकर संघ की पेशानियों पर निरंतर बल पड़ते जा रहे हैं, भाजपा की पटना राष्ट्रीय अधिवेशन समाप्त होने से तुरंत बाद संघ का शीर्ष नेतृत्व गडकरी को नागपुर तलब कर सकता है। समझा जाता है कि एक अंग्रेजी अखबार को दिए गए साक्षात्कार में गडकरी की लाइन तनिक फिसल गई थी और उन्होंने इस इंटरव्यू में यह मान लिया था कि अब मंदिर व हिंदुत्व पर पार्टी को वोट नहीं मिलने वाला लिहाजा पार्टी अब विकास के एजेंडा को आगे बढ़ाएगी और जरूरत पड़ी तो अल्पसंख्यकों को लुभाने की भी जुगत भिड़ाएगी, क्योंकि किसी भी प्रकार पार्टी को अपना वोट शेयर 10 फीसदी बढ़ाना है तभी वह 2014 में दिल्ली की तख्त का सपना देख सकती है। संघ को लगता है कि यह उसकी सुविचारित सोच पर चोट है, संघ को यह भी लगता है कि गडकरी अब पूरी तरह अडवानी, अनंत व अरुण के हाथों में खेल रहे हैं और वे सिर्फ वही सोच और बोल रहे हैं जो देश का कथित सेक्यूलर मीडिया उन्हें दिखा रहा है।
Posted on 22 June 2010 by admin
तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नहीं है क्या कि तुमने चीखों को सचमुच सुना नहीं है क्या
मैं एक जमाने से हैरान हूं कि हाकिम ए शहर जो हो रहा है उसे देखता नहीं है क्या
डा. शहरयार की इस लफ्जेबयानी में जैसे पूरे भोपाल शहर का दर्द सिमट आया है, जब दिसंबर 3, 1984 की एक अलस्सुबह यूनियन कार्बाइड के भोपाल प्लांट से मिथाइल आइसोसानेट जहरीली गैस के रिसाव से 3,500 लोगों की जान चली गई और 2 लाख से ज्यादा लोग इससे प्रभावित हुए। जरा देखिए दोषियों को देश की शीर्ष अदालत से सजा क्या मिली है महज दो वर्ष। क्योंकि तब शीर्ष अदालत ने इतने बेगुनाह की मौतों के जिम्मेदार लोगों पर धारा 304 (ए) (लापरवाही से हुई मौत) के तहत ही ट्राई करने का अंतिम फैसला किया था, इस धारा में दोषी साबित हो जाने पर अधिकतम सजा ही दो वर्ष है, अगर सुप्रीम कोर्ट अपना यह फैसला वापिस लेता है तो दोषियों को धारा 304(पार्ट-2) के तहत सजा का मार्ग प्रशस्त हो सकता है यानी यह सजा की अवधि बढ़ाकर 10 साल तक की सकती है।
Posted on 08 June 2010 by admin
जगन रेड्डी कांग्रेसी हाईकमान के समक्ष कुछ महती चुनौतियां लेकर उभरे हैं, इन दिनों जगन ने अपने जन जागरण अभियान और पब्लिक रैलियों से न केवल प्रदेश के मुख्यमंत्री रोसैया बल्कि दिल्ली दरबार तक का जीना दूभर किया हुआ है। जगन के पिता राजशेखर रेड्डी को चंद्रबाबू से बड़ा बनाने की कवायद ने कांग्रेस ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था, और आज हालत यह है कि कांग्रेसी उसी वाईएसआर के पुत्र के परों को कुतरने में जुटी है। “वाईएसआर स्कूल ऑफ थॉटस” के लोगों के विचार से जब राजशेखर रेड्डी विमान दुर्घटना में मारे गए तो उनके गम में 644 लोगों ने आत्महत्याएं कर लीं, तब जगन ने यह संकल्प लिया था कि वे इन सभी 644 घरों में शोक संवेदना व्यक्त करने जाएंगे और जगन ने इन सभी शोक संतप्त परिवारों को अपनी ओर से 50 हजार रकम देने की घोषणा भी कर डाली थी, और जगन ने धीरे-धीरे इन घरों में जब रकम भेजनी शुरू कर दी तो मुख्यमंत्री खेमा यह कहने लग गया कि ये सभी तो सामान्य मौत के शिकार हुए थे, फिर भी जगन को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा है वे उन घरों में जा भी रहे हैं और पब्लिक रैलियां भी कर रहे हैं, और अगर जगन को कोई बड़ा कदम उठाना भी हुआ तो अभी वे इंतजार करना चाहते हैं…जब तक कि राज्य में चुनाव की घड़ी और करीब न आ जाए।
Posted on 08 June 2010 by admin
जया बच्चन ने आखिरकार राज्यसभा का मोह छोड़ ही दिया और कारण बताया है पारिवारिक वजहों से, चाहे अमर सिंह और बड़े भैया में जितनी भी दूरियां बढ़ गई हो “बिगबी” अभी भी अमर सिंह का वह अहसान नहीं भूले हैं जब अमर की वजह से उन्हें सिनेमाई सफर में एक नया जीवन मिला। अभिषेक और ऐश्वर्या चाहे अमर को इतना ना भी पसंद करते हों, पर वे नहीं चाहते थे कि बच्चन परिवार एक अनावश्यक राजनैतिक विवाद में घसीटा जाए। और ऐन वक्त पर तो सबसे अहम भूमिका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने निभाई, जिन्होंने फोन कर अमिताभ बच्चन से यह पेशकश की कि अगर गुजरात उन्हें अपना ब्रांड-एंबडेसर बना सकता है तो यह प्रदेश जया भाभी को राज्यसभा में भेजने की कूवत भी रखता है, बस यहीं बात बन गई और जया ने अपने इरादों से नेताजी (मुलायम) को वाकिफ करा दिया।
Posted on 28 May 2010 by admin
संसद में “कटमोशन” पर बसपा का सपोर्ट लेना कांग्रेस के लिए यूपी में काफी महंगा साबित हो रहा है, वरना मायावती की कार्यशैली से नाराज फ्लोटिंग वोटर्स का रूझान जिस तरह कांग्रेस की ओर बढ़ रहा था, इस घटना के बाद जैसे इस प्रक्रिया पर लगाम लग गया हो। सो कांग्रेसी युवराज को यह जिम्मा दिया गया कि इस नुकसान की भरपाई वे किसी भी मानिंद करें, सो अपनी मिर्जापुर रैली में राहुल गांधी सुनियोजित तरीके से बसपा पर गरजे और बसपा को राज्य से जड़ से उखाड़ फेंकने का आह्वान तक कर डाला पर बिचारे युवराज को कहां मालूम था कि इस सियासी होम में उनकी अंगुली जल सकती है।
Posted on 28 May 2010 by admin
ममता दीदी की रेल फेल हो रही है क्योंकि इन दिनों उनका एकमात्र एजेंडा बंगाल के बहाने तृणमूल को पटरी पर लाने में लगा है। उनकी स्वयं की पार्टी में विद्रोह का आलम है और दीदी के कई सांसदों ने उनके नेतृत्व के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है-कबीर सुमन का नाम तो सबको मालूम है। पर कई नाम अभी और भी है जहां विद्रोह की कुलबुलाहट साफ देखी जा सकती है। नई दिल्ली स्टेशन पर भगदड़ मची और कई मासूमों की जान चली गई, ऐसे में ममता का एक बेहद कठोर बयान आया कि चूंकि दिल्ली में उनका घर नहीं सो वह कोलकाता में रहती है, यूपीए सरकार की खासी किरकिरी करा दी दीदी ने, पहले भाषाई समस्या को लेकर अझागिरी का रवैया अड़ियल था अब दीदी ने आग में घी डालने का काम किया है, अब तो विपक्षी कहते फिर रहे हैं कि बेहतर होगा कि मनमोहन सरकार अपनी कैबिनेट की बैठक भी वीडियो कांफ्रेंसिंग की माध्यम से करे क्योंकि इनके अधिकांश मंत्रियों के घर तो दिल्ली से बाहर ही हैं।
Posted on 28 May 2010 by admin
नक्सलवाद से निबटने में कौन सा रवैया कारगर होगा इसको लेकर कांग्रेस दो खेमों में बंट गई है, एक वर्ग है जिसका मानना है कि इस समस्या का हल शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत द्वारा संभव है, इस मत की स्वयं सोनिया गांधी है और दिग्विजय सिंह लगातार यही खटराग अलाप रहे हैं, एक गरम वर्ग है जिसकी नुमांइदगी चिदंबरम सरीखे लोग कर रहे हैं। इनका मानना है कि अगर भारत को नेपाल बनने से रोकना है तो इस समस्या का एकमात्र हल आर्मी को इस्तेमाल है। इस वर्ग का मानना है कि नक्सलियों को पैसों और संसाधनों की कोई तंगी नहीं है, उन्हें देश के बाहर से भी पैसा मिल रहा है और देश में भी। केंद्र सरकार की जितनी भी स्क्रीमें नक्सल प्रभावित राज्यों में पहुंच रही है, नक्सली इसमें चांदी काट रहे हैं, और मोटी कमीशन ले रहे हैं, यहां तक कि उन राज्यों में तैनात सरकारी कर्मचारियों को भी नक्सलियों को अपनी तनख्वाह में से भी कमीशन देनी पड़ रही है।